Friday, 27 December 2024

pani poori

 पानी पूरी

 पानी पूरी गोलगप्पा 

गुपचुप टिकिया और पड़ाका

खट्टा मिट्ठा पानी भरकर

गप गप खायें लेयें चटाखा

मटर सोंठ और आलू भरकर

झटपट दोना आगे करकर

मुन्ना खाये मुन्नी खाये

खाये काकी काका

गुपचुप टिकिया और पड़ाका

पानी पूरी गोलगप्पा 

टपक रहे हैं ऑंख से ऑंसू

मुॅुंह से सी सी निकल रही है

अभी और खाने हैं हमको 

  • सट सट सट सट करे सटाका

गुपचुप टिकिया और पड़ाका

गोल गोल और फूला फूला 

मुॅह में लाया पानी

गोल गप्पा  गोल गप्पा 

मुॅंह में बजे पटाका

गुप चुप टिकिया और पड़ाका

             पानी पूरी गोल गप्पा


pani

 सबसे प्यारा पानी

सरदी में पानी छूते ही 

बिजली सी छू जाती है

पानी देख देख कर मुझमें

 ठंडी सी भर जाती है

पड़ न जाये एक बॅंूद भी

 तन पर पानी से बचते हैं

गरम गरम पानी से नहाते 

तब भी थर थर कंपते हैं

गरमी में मांगे सब पानी

सबसे प्यारा लगता पानी

 


Tuesday, 24 December 2024

chanda ki barat

 च्ंादा की बरात


 


च्ंादा की बारात सजी है


झिलमिल तारे बने बराती


बादल बाजे चले बजाते


चपला नृत्य दिखाती ।


आसमान का चक्कर लेकर


 सूरज के दरवाजे आई


चंदा का स्वागत करने


किरणें अगवानी को आईं।


सूरज की बेटी घूंघट में


धीरे से पग धरती आई


लाज भरे नयनों से हंसकर


ऊषा ने माला पहनाई


क्रते हुए विदा बेटी को


स्ूारज की ऑंखे भर आईं


गले लगा बेटी को कसकर


छल छल छल ऑंखें छलकाईं ।


 


 

Sunday, 22 December 2024

kahan ja rahe badal bhaiya

 कहॉं जा रहे बादल भैया


मुझको जरा बताओ ,


इतनी जल्दी क्या है तुमको


तनिक देर रुक जाओ ।


थोड़ा सा पानी ,खेतांें को


थोड़ा सा पेड़ांें को


कुछ पानी तालों को देदो


 कुछ पानी मेड़ों को


भारी भारी लाद पोटली


क्यों भागे जाते हो


पौधे सारे सूख रहे हैं


इनको क्यों तरसाते हो ।


नदिया हो गई दुबली दुबली


प्यासी सूख रहीं हैं,


तुमको पानी लाते देखा


मन तें हूक रही हैं


क्रते हो कल्याण जगत का


निर्भर तुम पर सब प्राणी


तुमसे ही है भरा समंदर


धरती की चूनर धानी ।


 


Saturday, 21 December 2024

Anmol ankhen bal geet

 

vueksy vka[ksa

 

lcls I;kjh ;s vka[ksa

lcls U;kjh nks vka[ksa

budk dksbZ eksy ugha

dksbZ rjktw rksy ugha

>jus lh f>yfey vka[ksa

Lkxj lh xgjh vka[ksa

Lkkou lk ygjkrk ekSle

Ckkny lh dkyh vka[ksa

Lkwjt pank nhi flrkjs

Lkcdks djrh jks’ku vka[ksa

Eku dh lkjh ckrsa dgrha

Tkhou /ku vuqie vka[ksa

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gal nsrha [kqf’k;ksa ls vka[ksa

Øksf/kr gksus ij ty mBrha

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vkalw ls Hkj tkrh vka[ksa

Friday, 20 December 2024

Why do we say it

 

To eat humble pie

                                                                                                                                                                                                                To apologize for one’s behavior, the correct term is umble pie that is still made in some parts of Britain. It is a pastry and contains the odd and ends of the edible parts of the inside of an animal called “Umbles”It was gratefully received from their rich master by the poor people of long ago and to eat this was to confirm  one’s poverty and dependence upon some other person. It is not known how the “H” got in to the recipe

                                                                                               

Wednesday, 23 October 2024

jhakkad Danav

 झक्कड़ दानव


किसी गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। उसका पुत्र बड़ा निकम्मा और आलसी था जबकि बुढ़िया लोगों का धान आदि कूट कर अपना व उसका पेट पालती थी। एक साल गाँव में अकाल पड़ा, बुढ़िया को वह काम भी मिलना बंद हो गया अब घर में फाके होने लगे तो लड़का लोगों के खेतों पर थोड़ी बहुत मजदूरी करने लगा। धीरे धीरे सभी काम काज बंद हो गये गाँव े में सभी परेशान रहने लगे। घर की गाय का दूध पहले तो बिक जाता था अब वह भी नही बिकता था गाय का चारा पानी नहीं मिल रहा था तो उसने दूध भी देना कम कर दिया। दो दिन से बचे दूध को बुढ़िया ने जमाया और मटकी में भरकर लड़के को देते हुए बोली,‘ बेटा जरा काम काज ढंग से कर। यह दही शहर ले जाकर बेच दे। वहीं से कुछ  पैसों का खाना और कुछ पैसों का ठेल लगाने लायक सौदा ले आना यहाँ बेच देंगे।’ यह कह के रस्सी की इंडुरी बनाकर लड़के के सिर पर मटकी टिका दी।

माँ ने खाना लाने के लिये थैला दिया और कहा कि लौटते में जंगल पड़ेगा कंद मूल तोड़ लाना। वही रास्ते में खा लेना। यह कहकर एक चाकू थैले मे डाल दिया। लड़के ने थैला गले में लटकाया और ‘दही लो दही’ की आवाज लगाता चल दिया।

चलते चलते लड़के को जंगल में एक मकान दिखाई दिया। लड़के ने सोचा कुछ देर आराम किया जाय फिर आगे चला जाय। वह उस खाली पड़े मकान में घुसा। चारों ओर देखा तो हैरान रह गया। बड़ी सी हांडी में खाना पक रहा था पर पकाने वाला कोई दिखाई नहीं दिया। उसने ‘कोई है! कोई है!’ की आवाज लगाई। किसी ने जबाब नही दिया तो ऊपर अटारी पर चढ़ कर लेट गया। लेटते ही उसे नींद आ गई।

वह मकान एक राक्षस का था। कुछ ही देर में वह वापस आया। घर में घुसा कि उसे मानुष गंध आई। वह चिल्लाया मानुष गंध! मानुष गध! लड़के की नींद खुली भयानक राक्षस की चारों ओर सूँ सूँ कर सूंघते देख एक बार तो डर गया परंतु हिम्मत नही खोई हांडी में मुँह दे जोर से धरधराती आवाज बनाता हुआ बोला ‘यह कौन मूर्ख है जिसने मेेरी नीद खराब की। उसकी शामत आई है क्या?’

राक्षस को ताज्जुब हुआ कि ऐसा कौन व्यक्ति आ गया जो उससे इस तरह बोल रहा है। अब तक उसने सबको घिघियाते ही देखा था वह अकड़ कर बोला, ‘मैं..मैं..अक्कड़ दानव हूँ।’

‘ तो लगता है तूने मेरा नाम नही सुना कभी , मैं झक्कड़ दानव हूँ। चल भाग यहां से मुझे सोने दे।’

   ‘क्या? ’अक्कड़ दानव को बहुत गुस्सा आया ,‘तू क्या समझता है अपने आपको। मेरे जैसा शक्तिशाली कोई नही है।’ 

‘अच्छा ’हा! हा! हा! कहकर लड़का जोर से हँसा,‘ अगर तू मुझसे बड़ा है शाक्तिशाली है तो मैं अपना बाल फेंकता हूँ अपने बाल से मिला लेना ’कहकर लड़के रस्सी फेंक दी। राक्षस इतना बड़ा बाल देख हैरान रह गया। फिर भी बोला ,‘मैं नहीं मानता’‘ अच्छा तो मैं थूकता हूँ तू भी थूक।’ राक्षस ने जोर से गला खखार कर थूका लेकिन लड़के ने दही उलट दिया। अब तो राक्षस डर गया पर फिर भी हिम्मत नही हारी बोला, ‘अच्छा देखते है जो ज्यादा खायगा वही बड़ा है।’

लड़के ने थैला कमीज के नीचे किया और अटारी पर से उतर आया। अपने सामने एक लड़के केा देख पहले तो जोर से हँसा फिर दो बड़ी बड़ी हंडिया में खाना परोसा। दोनों ने खाना शुरू किया। लड़का सारा खाना थैले में भरता जा रहा था कभी कभी दिखाने को एक दो ग्रास खा लेता। जब उसका थैला भर गया तो बोला अभी बस इतना ही खा सकता हूँ पहले इतना खाना निकाल दूँ तब और खाऊँगा यह कहकर चाकू से थैला चीर दिया। सारा खाना बाहर निकल आया। फिर खाने की तैयारी करने लगा। राक्षस का भी पेट भर गया था उसने सोचा यह तरकीब अच्छी है। उसने चाकू उठा कर पेट चीर लिया। राक्षस तड़प कर वही ढेर हो गया। लड़के ने राक्षस का सब धन बटोरा और वापस घर आ गया और माँ के साथ सुख से रहने लगा।


Monday, 21 October 2024

ahoi athe ki braj ki katha

 अहोई आठे

नन्द भौजाई मिलिके खदाने में ते मिट्टी खोदिवे गई। मट्टी खोदत में नन्द पै स्यायी मैय्या के चिकुली चिकुला (बच्चा) कट गये। स्याओ ने नन्द कूँ पकरि लयौ और बोली कै तैनें मेरे बच्चान कूँ काट दयौ है तू मोकूँ अपनी कूँख दे। बाकी सात भौजाई हती उनमें ते सातइ भौजाई ने स्याओं ते कही - मैय्या! जाकी कूँख मति लैं, जि तौ पराये घर की है। जाकी बदली मेरी कूँख लैलै। 

तब ते सातई भौजाई के बच्चा होंय और मरि मरि जाँय। बाकी की छै भौजाईन कें तो खूब सुख हो उनके बेटा -बेटी खू खेलते कूदते और जाकें बिचारी के बड़ों दुख रहतौ। बु जाँकू रात दिना ताहिने मारयो करतीं - जा और दिया अपनी कूँख पराई जाई से पीछें। बाँकू ऐसे दुखी देखि कें काऊ परोसिन ने वाय एक उपाय बतायौ कै कातिक लगत जो आठें आवैं बाकूं अहोई आठें कहें हैं सो तू बाकौ बर्त रहिये। बाकौ वर्त सुख सुहाग और सन्तान कू दैवे बारौ है। बाके करिवे तें तेरे सब दुख दूर है जामिंगे। वा दिना तेरे यहाँ अहोई माता आवैगी तू बाके मूड़ के डींगर ( जंुआ ) देखिवे जइयो। बाके सुख हैवे ते बु तोकू सब कछू दै जावेगी। 

कातिक लगत आठें आई। बानें लीप पोत के भीति पै चन्दा तारे बनाये और स्याओ माता की मूर्ति काढ़ी। दिन भर निर्जला वर्त राख्यो। संजा कूँ अहोई माता बुढ़िया के रूप मं आई। वाय खूब भोजन कराये और फिर बाके डींगर देखिवे बैठि गई, गोद में अपनो हाल ही कौ पैदा भयौ छोरा हू डारि लयौ। बीच बीच मं बा छोरा कूँ नौच देई करैं। जाते बु छोरा जोर जोर ते रोवन लगै। अहोई माता बोली - चौं बहू जि लाला काये कूँ रोइ रहो है? बहू ने कही - जापै पहरिवे, औढ़िवे और बिछाइवे कू कपड़ा लत्ता नाँहि ताते रोइ रहौ है। तो बुढ़िया ने अपने कान मं ते एक रूई की फुरफुती निकासि कैं आँगन में फैंक दई। सोई वहाँ तौ बढ़िया बढ़िया कपड़ान कौ ढेरि लग गयौ। थोरी देर पीछै फिर बहू ने बालक कू नौचि दयौ। तै बालक फिर रोमन लग्यौं। बालक कूँ रोमत देखि कैं फिर अहोई ने पूछी - बहू अब काये कूँ रौवे है? बहू बोली कैं मैय्या जि अकेली है जाकैं और कोई भैय्या बहन नायें बाते रोवै है। अहोई मैय्या ने अपने कान ते दूसरी फुरफरी निकारि कैं फैंक दई सोई बाके सगरे बालक जो मरि गये बु सब आँगन मंे खेलने लगे। बहू ने फिर अपने बालक कूँ नौंच दयौ - फिर अहोई ने पूछी कै अब काहे कूँ रावे है। बहू बोली कै जि तुम्हारी कान की फुरफुती के ताई मचलि रहौं है। अहोई नेवाय अपने कान की फुरफुती हू दे दई। सोई बाकें सकल सिद्धनवौ निद्ध है गई। बड़े बड़े महल चौवारे बनि गये। खूब धन दौलत है गयो। अहोई माता की दया ते बाकैं सब आनन्द है गये। जैसी अहोई मैय्या बाकें पहिलें आई वैसी काऊ कैं मति अइयो और जैसी पीछें आई वैसी सब काऊ कैं अइयो। 



Friday, 4 October 2024

ve kuch shan

 वे कुछ क्षण

शनिवार , फरवरी 21 1970 चार बजे का समय होगा, मार्क अपनी मित्र नैन्सी के साथ मियामी नदी पर समुद्री दीवार के मुहाने पर कार धोने के लिये ले गया। नैन्सी ने मुस्करा कर सहायता करनी चाही तो मार्क ने हाथ पकड़कर प्यार से कार ही में बैठा लिया। 

‘ठीक है तो मै बैठी तुम्हें देखती रहूँगी।’ मार्क ने मुस्तांग (कार का नाम) को नदी से 45 का कोण बनाते हुए खड़ किया था। उसका बांया सामने का पहिया कंकीट की बनी दीवार पर टिका था। कार के अन्य पहिये स्काई हारवर मरीना की घास पर टिक थे। उस स्थान का मालिक स्वयं मार्क का पिता ही था। 

मुस्तांग की सफाई करने में मार्क को आधा घंटा लगा। पानी के छीटों से बचने के लिये नैन्सी ने कार के सभी शीशे कस कर बंद कर दिये थे। वहीं पास ही मार्क के पिता अपनी नाव पोकाहीन्तास पर काम कर रहे थे। 

कार मे बैठी नैन्सी ने उसमें लगी कार रेडियो सुनने के लिये उसने इगनीशन चाबी घुमायी। लेकिन गलती से वह चाबी दूसरी ओर घुमा गई। एकाएक मार्क चौंका। कार आगे खिसक रही थी। लो गेयर में पड़ी गाड़ी का स्टार्टर शोर करने लगा। मार्क ने जल्दी से दरवाजा खोला और ब्रेक पर पैर रखना चहा लेकिन मुस्तांग किनारे की ओर उतरने लगी। 

पोकाहोन्तास पर खड़े मार्क के पिता ने देखा कि गाड़ी के पिछले पहियों ने जमीन छोड़ दी है। कुछ क्षण के लिये वह स्थिर हुई। स्तब्ध उन्होने देखा उनका पुत्र कार के साथ आधा बाहर आधा भीतर घिसटता हुआ उसे पीछे घसीटने में लगा हैं। जैसे ही कार नीचे झुकी एक तेज लहर आई और दरवाजे की बन्द कर गई। 

पीछे रह गये मार्क ने झपट कर कार की छत पर चढ़ कर नैन्सी की तरफ का दरवाजा खोलना चाहा। आगे की सीट के पास पहुँचकर वह चिल्लाया। बाहर आ जाओ बाहर निकलो लेकिन कार तब तक पूरी झुक चुकी थी और मार्क बाहर लटका रह गया। उसका दाया पैर दरवाजे में फंस गया उसे कुचलती कार नदी में जा गिरी। 

चार बजकर बत्तीस मिनट पर मार्क ने पिता सहायता के लिये फोन कर रहे थे। नारमन नामक फायर मैन उसी क्षण अपने साथियों के साथ घटना स्थल की ओर रवाना हो गया। 

पानी के अंदर मार्क का दम घुटने लगा। किसी तरह वह दरवाजे मे से पैर निकालने में सफल हो गया। सतह पर आकर चिल्लाया नैन्सी नीचे कार में है कोई सहायता करो। साँस भरकर वह फिर कार ढूंढने पानी में चला गया पर कुछ क्षण में ही उसे वापस आना पड़ा उसके फेफड़े फूल गये थे। और वह पत्ते की तरह काँप रहा था। 

किनारे पर अब तक भीड़ जमा हो चुकी थी। उन्ही में से डेबिड हार्ले नामक व्यक्ति कमर में रस्सा बाँध कर कूद गया। पानी में गहन अंधेरा छाया था। चार पाँच फिट नीचे कार अदृश्य पड़ी थी। हाथ से टटोलने पर डेबिड ने महसूस किया कि उसका एक दरवाजा ऊपर की ओर है उसने उसे खोलने की कोशिश की लेकिन खोल न सका तो दरवाजे के हेंडल में कस कर रस्सी बाँध कर ऊपर आ गया। 

मार्क दोबारा कूदना चाहता था लेकिन उसकी हालत इस योग्य थी ही नहीं उसे पीछे खंीच लिया गया तब तक फायर मैन और पुलिस पहुँच गई। फायर मैन बान लेन और डान ग्रीन दोनों नदी में कूद गये। बाब ने महसूस किया कि कार में ताला लगा हुआ है और शायद ड्राइवर की तरफ वाला द्वार है गाड़ी दाहिनी तरफ की करवट से पड़ी हुई थी। 

शाम गिविन्स और पोल डेमन ने भी पानी में उत्तर कर कोशिश की लेकिन द्वार नहीं खोल पाये। वास्तव में जब कार दीवार पार कर रही थी नैन्सी समझ ही नही पाई थी कि क्या हो रहा है। जब विन्ड स्क्रीन पर पानी फैला तब उसे हाश्ष आया। अपने रैड क्रास के जीवन रक्षा के कोर्स में उसने सीखा था कि ऐसे खतरे में गाड़ियों में हवा के बबूले छिपे रह जाते हैं चारों ओर अंधकार छा गया था। पानी धीरे धीरे उसके पैरों से कमर तक फिर छाती तक चढ़ आया था। पानी के सिर तक पहुँचने पर वह समझ गई कि अब वह कुछ ही क्षणों की मेहमान है। 

कार के पिछले हिस्से में उसने तैरने की कोशिश की और एक साफ स्थान पर गहरी साँस ली। उसे कुछ हवा के बबूले मिल गये थे। नैन्सी ने हिम्मत नही छोड़ी वह शान्त रही उन लोगों को किसी तरह ज्ञात हो जाना चाहिये कि मै जीवित हूँ कहीं मृत जान कर कोशिश करना न छोड़ दे। उसने पीछे के शीशे थपथपाना शुरू किये। कुछ क्षण तक वह ऊपर देखती रही कुछ काला काला नजर आया कहीं मिट्टी बादल तो नही? उसने सोचा तभी बादलों ने आकृति ग्रहण की दो गहरे रंग के पैर नजर आये। यह मार्क या जो गाड़ी न मिल पाने की बजह से वापस लौट गया। 

नैन्सी को साँस लेना मुश्किल हो गया था। गाड़ी को पानी में आये पाँच मिनट हो गये थे। हवा के बबूले भी खत्म हो गये थे और किनारे से तेजी से पानी आना शुरू हो गया था। डरी हुई नैन्सी ने हवा लेने के लिये इधर उधर मुँह घुमाया और कुछ ही क्षणों में उसके आगे अंधकार छा गया। अब तक दस मिनट बीत चुके थे और लारी नार्टन अंदर आने की कोशिश में था। पहली डुबकी में नार्टन ने भी औरों की तरह ड्राइवर वाले दरवाजे को ही खोलने की कोशिश की लेकिन उसे लगा कि वह दरवाजे पर खड़ा नही है वरन् उसके सहारे तैर रहा है शायद कार लहरों के थेपेड़ो से पलट गई थी। 

पहली डुबकी में वह साठ सैकिंड तक साँस रोके रहा। उसने प्रत्युत्तर की आशा से शीशा थपथपाया परन्तु कुछ सुनाई न पड़ा। चौथी बार उसके साँस रोकने की ताकत कम होती जा रही थी। जो भी अंदर है वह समाप्त हो चुकी है उसने सोचा। 

अपनी अगली डुबकी में उसे कार नही मिली। अब उसमें पन्द्रह सेकिड तक साँस रोकने की ताकत बाकी थी। आठवीं बार वह पानी में गया और ड्राइवर के दरवाजे पर पहुँच गया। आठ सैकंड बीत चुके थे। बोनेट की तरफ तैरता वह दूसरी तरफ पहुँचा वहाँ द्वार टटोला तो पाया दरवाजा कुछ खुला है। उसने उसे आधा मीटर और खोला और अंदर टटोला पर कुछ नजर न आया। अब तक तेरह सेकंड बीत चुके थे। साँस लेने की उसे बेहद आवश्यकता महसूस हुई लेकिन लड़की को इस समय छोड़ना उसे गवारा न था। 

उसने धमनियों के द्वारा साँस लेना प्रारम्भ किया और कार मैं घुस्ने का प्रयास करने लगा। दूसरे ही क्षण उसका हाथ किसी वस्तु से टकराया। एक संेडिल पहने पाँव थे। बीस संकिड बीत चुके थें 

थकान से लड़ता हुआ नाार्टन भयानक तेजी से काम कर रहा था। उसने लड़की को आगे की सीट पर खींच लिया और उसकी पतली कमर के चारों ओर हाथ से घेरा बना दिया। तभी उसे लगा एक हाथ धीरे धीरे स्वंय ही उसके दाहिने हाथ को लपेट सा रहा है नार्टन एक उत्साह से भर उठा। 

जीवन के इस क्षण ने बिजली की तेजी से उसमें जीवन संचार किया। उसने किसी तरह खींच कर उसे कार में से निकाला। कुछ ही क्षण में नैन्सी सतह पर थी। उसके बाद निकला नार्टन । नैन्सी का चेहरा काला पड़ चुका था। आँखें बंद थी नार्टन शंकित हो उठा उसी क्षण नैन्सी ने हवा के लिए इधर उधर सिर हिलाया और चिल्लाई बचाओ। 

नार्टन ने उसी समय नैन्सी को उल्टा लिटा कर उसके पेट से पानी निकालना शुरू किया लेकिन पानी केवल कुछ बूंद ही निकला। बेहोशी की हालत में भी नैन्सी ने अपने अंदर पानी नहीं जाने दिया था। हाश्ष में आने पर नैन्सी ने अपने को हरी घास पर पाया। वह धीरे धीरे साँस लेने लगी। आँखें बंद थी। उसे मार्क की दुखी आवाज पड़ी इसकी आँखें खुलेंगी नही क्या? नैन्सी समझ गई कि वह सकुशल है। कुछ देर बाद वह अस्पताल में थी उसे आक्सीजन चढ़ रहा था। नार्टन ने धीरे धीरे उसकी पलकों पर हाथ फेरा पन्द्रह मिनट तक जीवन से संघर्ष करने के बाद नैन्सी ने फिर आँखे खोंल दी।   


Sunday, 29 September 2024

chand chamak utha

 इंगलैड की लोक कथा पर आधारित



चाँद चमक उठा


बहुत दिन पहले की बात है इतने पहले की कि सूर्य चन्द्र का पृथ्वी पर चमकने का ढंग ही अलग था। दोनों पृथ्वी पर ही तेजी से चलते थ्ेा और एक जगह पर जरा जरा देर रहते थे। सूर्य क्योंकि बड़ा था इसलिये ज्यादा देर हर देश में चमकता उसमें इतनी तेज रोशनी थी कि वह जब दूसरे देश चला जाता तब भी हल्की रोशनी पहले देश में रहती। लेकिन चन्द्रमा की रोशनी शीतल थी। वह ठंडा था तो गर्म रहने के लिये काला लबादा पहन लेता। जब वह मुँह खोलता एकदम उजाला हो जाता पूर्णमासी का सा ,और फिर लबादा पहन कर आगे चला जाता। तो अंधकार छा जाता। अंधकार छाते ही चोर डाकू अपने घरों से निकल पड़ते और राहगीरों को लूट लेते थे। जनता परेशान थी कि क्या करें। अंधेरे में दिखाई देता नहीं था। चोर डाकू पहचाने भी नहीं जाते थे। चाँद केा जब यह ज्ञात हुआ कि उसके लबादा पहनने ही जनता में भय पैदा हो जाता है तो बहुत परेशान हुआ। 

एक दिन चाँद काला लबादा पहन कर सड़कों पर आ गया और चोर डाकुओं केा पकड़ने के लिये इधर उधर घूमने लगा। बारिश की वजह से जगह जगह कीचड़ हो रहा  था और गड्डों में पानी भर गया था। चन्द्रमा का पैर इधर उधर पड़ जाता उससे लबादा हट जाता उससे जरा जरा झलक हो जाती और अंधेरे में वह देखता कि साये इधर उधर घूम रहे हैं। चाँद हल्के हल्के पॉव रखते चला जा रहा था कि एक पत्थर से पैर टकराया उसने पास की टहनी पकड़ ली लेकिन यह क्या टहनी हाथ की हथकड़ी बन गयी। चाँद ने बहुत छुड़ाने की कोशिश की लेकिन हथकड़ी न छुड़ा सका। चाँद को पास से किसी की चीख सुनाई पड़ी वह समझ गया कोई राहगीर अंधेरे में भटक गया है। चाँद ने देखा चोरों ने उसे गले से पकड़ लिया है। और भी हाथ उसकी ओर बढ़ रहे हैं तभी चाँद के मुँह से जरा लबादा खिसक गया और उस व्यक्ति को रास्ता दिखाई पड़ गया रोशनी देखकर चोर पीछे हट गये। वह व्यक्ति चाँद केा धन्यवाद देता हुआ चला गया। चाँद ने अपने को बहुत छुड़ाने की कोशिश की लेकिन छुड़ा नहीं पा रहा था। चोर डाकुओं ने अपने सबसे बड़े दुश्मन को अपने कब्जे में देखा तो प्रसन्न हो गये उन्होंने पीछे से जाकर उसको बाँध दिया उसका लबादा पूरा ढका और एक साथ सबने मिलकर पकड़ लिया  और लताओं से कसकर बाँध दिया। सारी रात वे चाँद केा ठिकाने लगाने की सोचते रहे। लेकिन समझ नहीं आ रहा था क्या करें। भोर की पहली किरण के साथ ही उजाला होने लगा अब चोर डाकू घबड़ा गये कि कि कैसे करें। कुछ चोरों ने कहा मार दें और दबा दें। पर कुछ ने कहा नहीं हत्या नहीं करेंगे क्योंकि कुछ भी हो चाँद करता तो सेवा ही है ऐसे व्यक्ति की हत्या करके महापाप नहीं करेंगे। अंत में जब अधिक उजाला फैलने लगा तो एक चोर ने पास ही पानी भरे गहरे गड्डे में उसे फेंक दिया और गड्डे पर भारी पत्थर रख दिया। चाँद को दबाकर सब अपने अपने घर चले गये। जब तक पूरा सुबह का उजाला हुआ चाँद पानी में डूब चुका था।

दिन गुजरते गये लेकिन चाँद नहीं निकला जनता बहुत परेशान थी क्योंकि अब तो चोर डाकू निर्द्वन्द्व होकर लूटपाट करते उन्हें किसी का डर ही नही रह गया 

दिन गुजरते गये लेकिन चाँद नहीं निकला तो जनता को बहुत चिन्ता हुई। आखिर चाँद को हो क्या गया। चोर डाकुओं की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि अब वे मुँह ढक कर घरों के आस पास घूमते रहते कोई भी बाहर निकलता पकड़ लेते और उसे लेकर घर में घुसकर लूटपाट कर लेते।

shesh

Tuesday, 17 September 2024

afeemchi ka bhoot

 अफीमची और भूत

रात में एक गांव मे एक मकान भुतहा था उसके पास से भी कोई गुजरता नही था उसी गांव मे एक आलसी अफीमचीं था वह लोंगो से मांग मांग कर गुजारा करता था उसे गांव वालों ने अपने मनांेरंजन का साधन बनाया हुआ था। एक दिन गांव बालो ने उसे चिढाते हुए शर्त लगायी कि वह उस मकान मे रात मे रह कर दिखाये तो उसे दस दिन तक खाना खिलायेंगे और अफीम पिलायेंगे वह राजी हो गया पर बोला साथ मे अच्छा अच्छा खाना रखना होगा अफीम और सिगरेट भी। उसके गांव वालों ने अफीम दी सिगरेट दी साथ ही एक आम एक उबला अंडा एक ककडी और एक बडी सी रोटी रख दी। अफीमची अफीम खा कर वहां पहुचे।

आधीरात मे चार भूत आये। उस मकान मे आदमी को देखकर आश्चर्यचकित रह गये वह गुर्रान और भयानक आवाज निकालने लगें। अफीमची की नीदं टूटी अधखुली आंखां से चारों को देखा और अफीम के पिनक में बोलें, “हूॅ यार सोने दो नीद मत खराबे करो” यह सुनकर उन्हे और भी आश्चर्य हुआ और एक ने आंख से आग निकाल कर डराया। अफीमची ने जेब टटोली और सिगरेट जरा कर बोला वह बडा अच्छा किया जो आग जलायी मे दियासलाई तो लाया ही नही था अब तो भूत चक्कर मे पड गये।

यह कैसा आदमी है डरता ही नही है।

अब अफीमची को भूख लगी वह अध मुंदी आंखो से पोटली टटोलते बोला, “यहां क्या क्या है वाह मिल दढियल तुम हो वह देसी आम को छूकर बोला। एक भूत का नाम दढियल था क्योंकि उसके खूब दाढी थी वह डर गया तब अफीमची ने अंडा छुआ वाह गंजे तू भी है बडा अच्छा हुआ उनमे से एक भूत का नाम गंजू था क्योंकि उसके सिर पर बाल थे न दाढी पर। वह भी डर गया। अब अफीमची का हाथ ककडी पर पडा एक इनमे से लम्बू था उसे सब लम्बू कहते थे वह भी डर गया। अब अफीमची ने रोटी छुई वाह गोल मटोल तुम भी हो चौथे भूत का नाम गोल मटोल था क्योंकि वह ढिगना और मोटा था। अब अफीमची बडबडाया पहले खांउगा दढियल फिर गंजू उसके बाद लम्बू सबके बोद मे गोलम गोल।

यह सुनते ही चारों भूत उसके पैर पकड कर बैठ गये “मालिक हमें छोड दो हमे जाने दो हमारी जान बख्श दो” अफीमची नशे मे बोला नही नही मुझे भूख लगी है तुम्हे जाने दूंगा तो खाऊंगा क्यों?”

नहीं मालिक हमारी जान छोड दो तो हम आपको सात घडे सोना देंगे” अफीमची की आंखे खुली वह कुछ समझा कुछ न समझा और बोला जाओं पहले सोना लाओ अब तो एक भागा भागा सात घडे सोना लाया। और दे जान घुडा मांगे। तब से भूत उस मकान मे नही आते और अफीमची अमीर हो गया।

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Friday, 13 September 2024

sandesh sahas katha

 संदेश

मोरना, रॉस, फैलेक्स और उन दोनों की बहनें मोरना फैलेसिया चारों पश्चिमी पहाड़ियों पर आकर बहुत प्रसन्न थे चारों छुट्टियाँ मनाने इनवदेरिस जा रहे थे वर्हां का यूथ होस्टल में इन्होंने आरक्षण लिया था।

बार्डन जॉन इवान बहुत अच्छज्ञ आदमी है नाव वाले ने पहाड़ी लहडोम यहाँ मालो दूसरा घर नही है लेकिन वह मछली पकड़ने और चिड़ियों के ऊपर किताबें लिखने में मस्त है।

हाँ हमने पुस्तकालय में उनकी लिखी किताबें देखी है फैलेसिया ने कहा, लेकिन गरमियों में जब होस्टल खुलता है तब तो बहुत से अजनबी रहा। बहुत कठिन यात्रा है नाविक बोला हाँ उधर पहाड़ो पर चढ़ना बहुत मजा आयेगा।

लॉच डैरेस का महीना आ गया था मोड़ पर ही एक महिला चिट्ठियाँ लिये खड़ी थी।

हे भगवान मीलो दूर अकेले में तो कमा नही रह पाऊँगी।

देखते यहाँ भी डकैती हुई सुनसान में  अखवार उठाते हुए कहा, वैस्टररॉस में मालिक की मृत्यु होने पर मकान बिका उसका सामान और पैसे गाड़ी में भरकर उसके उत्तराधिकारी के पास जा रहे थे उसमें प्राचीन कलाड्डतियाँ थी जिन्हें रास्ते में लूट कर वैन खाई में लुढ़का दी, घायल ड्राइवर और टूटी फूटी वैन के विषय में तीन घंटे बाद जानकारी हो पाई।

लेकिन जहाँ तुम बात रहे हो वहाँ पास ही एक गाँव है क्यों नाव वाले गाँव हे न रॉस बीच में बोला है तो अल्के बैग लेकिन उसमें कोई रहता नही है नाव वाले ने निराशा से सिर हिलाया लेकिन क्यों?

आखिरी परिवार छः महिने पहले चला गया तभी नाव किनारे से लगी लो इनवदरिाच आ गया।

चारों फिसलने भरे पत्थरों पर पॉंव रखते किनारे की ओर बड़े नाव वाले ने चिड़ियों का बंडल जॉन इवान को देने के लिये लड़को का दे दिया जॉन इवान को घर यूथ होस्टल के पास ही है तुम्हें ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा।

वो हम दे देंगे बंडल रखते है। नाविक को बाइ बाई करते वे यूथ होस्टल की ओर बढ़े होस्टल सुनसान था रॉस ने खटखटाया लेकिन कही कोई आवाज नहीं आई।

पीछे से देखे फैलेक्स ने कहा हमने पहले से खबर भिजवाई थी प्राप्ति भी मिल गई थी। कुछ परेशानी भरे लहजे में फैलेक्स ने कंधो पर से बोझ नीचे रखते कहा,

हो सकताहै वार्डन चिड़िया को ही कहीं देख रहे हो मोरना ने शक जाहिर किया।

चलो उनकी कॉटेज में चला जाय फैलेसिया बहुत थक रही थी पास ही बहते झरने से पानी पीकर हताश सी बोली चलो। रॉस ने वार्डन की डाक को लिया।

कॉटेज की चिमनी से धुंआ नहीं उठ रहा था आदमी न आदमजात का निशान दूर दूर तक नहीं था।

हे फैलेक्स एक दम से खुले दरवाजे के बाहर कूदा क्योंकि एक बड़ी बिल्ली कूद कर भागी और कोई हलचल नहीं थी। 

एक बात है रॉस ने कहा, वार्डन का अपना बिजली का हिसाब किताब तो है देखो तार जा रहे हैं।

फैलेक्स ने देखा सामान बेतरती कुर्सिया उल्टी पड़ी थी एक तस्वीर दीवार से गिरी पड़ी थी एक केतली से चाय बह कर संभवतः वार्डन के नाश्ते पर बह रही थी।

यहाँ तो लड़ाई हुई है वह खिड़की के नीचे लगे वायरलैस सैट की ओर ऊफ लगता है इसे हथोड़े से तोड़ दिया गया। 

यह कोई मामूली वायरलैस सेट नही है रॉस ने कहा, यह ट्रांसमीटर है।

लगता है उसे बात करने से रोका गया है उन्होंने एक दूसरे की ओर देखा।

लगता है अपरण हुआ है। फेलेसिया ने कहा,

लेकिन क्यों? किसने किया मोरना चीखी यहाँ दूर दूर तक कोई बिन्दी नहीं है कोई नाव भी नही दिखी बिना नाव के कोई जाही नहीं सकता। सड़क है नहीं

हमारे लॉच में प्रवेश करने से पहले नाव निकल गई होगी।

लेकिन अधिक देर नहीं हुई है पानी सूखा नहीं है वैड काटी गई है ताजा है दूहा ताजा है सुबह से पहले का काम नहीं लगता।

अब दोपहर हो चुकी है रॉस ने कहा, जिसने भी किया उसे कई घंटे मिल चुके होंगे।

यही कहीं बांध रखा हो। तभी उसकी नजर कई नोटों पर पड़ी यह चोरी भी नही है।

उन्होंने कॉटेज का चप्पा चप्पा छान मारा तभी रॉस ने कुछ निशान देखे देखो ये घसीटने के निशान है वे उसे इधर से ले गये है।

वार्डन की नाव थी लेकिन वे लोग चलाना नही जानते थे। उन्होंने पहल खाना खाया रेडियो में समाचार सुने, उसमें डकैती की खबर भी थी जिसमें संभावना व्यक्त की गई थी कि डकैत अभी यही छिपे है।

वार्डन की नाव में उन्होंने लॉच पार करना प्रारम्भ किया। देखा नीचे पहाड़ी पर एक व्यक्ति खड़ा हैं वह हमें ही देख रहा है।  अरे वह गया उसने नीचे किसी को इशारा किया और गायब हो गया। दूरबीन से कैलेसिया ने आंखे हटाई।

गाँव के पास उन्होंने नाव रोकी गाँव सुनसान था एक घर के पास रूकते

बोला, पूरे गाँव मंे यही घर सही सलामत है यद्यपि खिड़कियाँ इसकी भी टूटी है जैसे ही दरवाजा खिसकाया वह पीछे हटा अंदर कोई है मरा हुआ नही वह बंधा हुआ हैं

किर्र किर्र आवाज करता द्वार खुला। फैलेक्स ने उस कोने में पड़े व्यक्ति के हाथों में बंधी गांठे खोलनी शुरु की ओर रॉस ने चाकू निकाल लिया। उस व्यक्ति का चेहरा सूजा हुआ था आगे का दांत टूटा हुआ।

मोरना दौड़ कर पानी ले आई और उस व्यक्ति के चेहेर पर छीटें डाले। वह व्यक्ति जल्दी जल्दी पानी पी गया। तब बोला, तुम लोग  मुझे ढूँढ़ ही लिया, मैं भी यही सोच रहा था शायद तुम लोग मुझे खोजा मैं वार्डन हूँ जानडयून। 

दोनो लड़के वार्डन के हाथ पैसे को तेजी से मलने लगे।

मेरे टागो में चोट लगी है अब शायद ही चल पाऊँ। कुछ देर पहले तो सोच रहा था शायद यहीं मर जाऊँगा लेकिन आपका यह हॉल किसने बनाया और क्यों? मोरना बोली, लॉच के मुहाने पर एक छिपने का स्थान है मैं वहाँ सुबह पांच बजे बैठकर चिड़ियों केा देखता हूँ आज भी बैठा था। एक स्टीमर आया यूँ तो स्टीमर आते रहते है मेरा ध्यान था कि चिड़ियाएँ न भाग जाये तीन व्यक्ति डैक पर लड़ रहे थे वे डकैती की बातें कर रहे थे मैं चौकन्ना हो गया वे कार केा जंगल में छिपाकर स्टीमर के जरिये सामान ले जाना चाह रहे थे मैं ट्रांसमीटर से उनकी खबरे भेजने के लिये छिपकर कॉटेज की ओर बढ़ा लेकिन उनकी नजर मुझ पर पड़ गई। तो आपने समाचार भेज दिया फैलेक्स ने पूछा

वार्डन असमंज में पड़ गया नहीं जानता। दिन के समय एक ही व्यक्ति तक मेरे ट्रांसमीटर की आवाज पहुँच सकती है वह अपाहिज है जब मैंने ट्रांसमीटर चलाया अपने मित्र का इशारा मिला ही था कि ये तीनों कमरे तक पहुँच गये मैं इतना ही कह पाया जॉनी मेरे ऊपर हमला किया किसी ने मेरे समीप हथोड़े से हमला किया मेरी उनसवे लड़ाई प्रारम्भ हो गई पात नहीं जॉनी ने मेरी बात सुनी या नही ईश्वर जाने।

उसके बाद ट्रांसमीटर डैड हो गया रॉस ने कहा, इन्होंने उसे तोड़ दिया।

जॉन डयून ने उठने की कोशिश की लेकिन फिर गिर पड़ा।

लॉच से एक नाव आ रही है मोरना ने खिड़की से झांकते कहा नाव बहुत तेजी से आ रही है। 

उनके पास हथियार होंगे पीछे के दरवाजे से निकला लेकिन....

जैसा मैं कहता हूँ करो वार्डन कराहते बोला लेकिन पिछला दरवाजा कसकर बंद था। पीछे कोई खिडत्रकी भी नही थी। वे घबड़ा गये उनके सामने कोई रास्ता नहीं था।

सबने वहीं पड़ी लोहे की छड़े हाथ में ले ली। फैलेसिया ने कुर्सी का हत्था लिया।

चारों बाहर आ जाओ बाहर से एक आवाज आई लेकिन कोई भी नहीं हिला वार्डन ने कहा, उनका कहना मानो।

वेमन से उन्होंने हाथ उठाये अब तीनों व्यक्ति दिखने लगे थे। 

बाहर निकला नहीं तो गोली मार देंगे।

दाढ़ी वाले क्रूर से दिखने वाले व्यक्ति ने कहा लेकिन कोई नहीं तो उन्होंने दीवाल पर गोली की सी कर दी घर हिल उठा।

रुको जालिमों रॉस चिल्लाया तभी मोरना ने देखा एक ओर सफेद नाव रुकी उसमें से पोलिस के आदमी उतर रहे है।  लीसिया अब हम बच जायेंगे। पुलिस आ गई है मोरना फुसफसाई।

तभी बाहर से आवाज आई रस्सी कहाँ है उन्हें बांध देंगे तभी पुलिस आफिसर की कड़कती आवाज आई तुम्हें चारों ओर से घेर लिया गया है तुम्हारी नाव भी हमारे कब्जे में हैं तुम लोग बच नही सकते। एक बंदूक की गोली कॉटेज से चली।

यहाँ चार लड़के लड़कियाँ भी है हमारे पास अगर उनकी सुरक्षा चाहते हो धरपकड़ की सी आवाज आई मोरना कुर्सी का हत्था लिये नीचे उतरी रॉस अपनी छड़ चला रहा था ओर फैलेक्स को दो व्यक्तियों ने पकड़ रखा था। उसने हत्था चला दिया लड़के से दिखने वाले डकैत के सिर पर खटाक से लगा उसने अपना सिर थामा और एक हाथ से बंदूक दागी लेकिन मोरना के सिर से एक फुट ऊपर गोली दीवाल में धंस गई। फैलेक्स समय मिल गया वह खड़ा हो गया उसने तीसरे व्यक्ति को पकड़ लिया बंदूक उसके हाथ से गिर पड़ी जिसे रॉस ने उठा लिया और उसी क्षण पुलिस अंदर आई।

एक घंटे बाद तीनों बंधे पुलिस की नााव में थे और चारों सैलानी और वार्डन अपने होस्टल में इस्पैक्टर ने बताया कि जॉनी ने पुलिस केा फोन किया था कि तुम पर आक्रमण हुआ है हमने घटनाक्रम मिला लिया और तुरंत चले आये

ओह तो जॉनी ने संदेश सुन लिया।


Monday, 19 August 2024

magar ki khal sahas katha

 साहस कथा 

मगर की खाल


बलदेव अभी लड़का ही था और उसका काम था, खेतों में घुस आये साही और सूअरों को भगा देना। कभी कभी बाघ, चीता बकरियों की फिराक में गाँव में आ जाते तो बंदूक दाग कर भगा देना। यद्यपि बलदेव की राइफल पुरानी पड़ गई थी लेकिन तेल डालकर वह उसे चमकाये रखता था, गोलियाँ मंहगी थीं खर्च भी देखभाल कर ही करता था। बंदूक वाले गाँव में दो चार ही थे और गांव वाले समय समय पर खेतों की रक्षा के लिये उन्हें बुलाते रहते थे।

एक दिन बलदेव नदी के उथले जल में बत्तखों को देख रहा था। बत्तखों के सिर पर मोर का सा ताज था, ‘वाह! क्या राजा के से मुकुट हैं, एकाएक बत्तखों के बीच से एक थूंथनी प्रगट हुई’ ओह! छोटा-सा मगर आ गया। ’बलदेव ने सोचा।

लेकिन जब वह ऊपर पूरा आया तो वह छोटा-मोटा मगर नही था एक विशालकाय मगर  था। मगर बत्तखों को परेशान नहीं करता इसलिये बत्तखें आराम से तैरती रहीं, लेकिन इस मगर ने अपना विशाल मुँह खोला, एक बत्तख को लपका और पानी में डुबकी लगा गया। सब बत्तखें हड़बड़ा कर भाग खड़ी हुईं। मगर की लंबाई दो भैसों के बराबर थी। यद्यपि नदी में मगर थे पर इतना बड़ा मगर गाँव वालों ने नही देखा था।

बलदेव ने दुबारा मगर देखने की बहुत कोशिश की लेकिन फिर दिखाई नहीं दिया। काश वह उसके रहने का स्थान देख पाता।एक दिन बलदेव ने गाँव वालों की चीख-पुकार सुनी। कुछ अघटित घट रहा था। उस चीख पुकार में ‘बलदेव बलदेव’ की आवाजें भी शामिल थीं। बलदेव दौड़कर पहुँचा, देखा मगर ने एक गाय पकड़ रखी थी और उसे पानी में घसीट रहा था।

गाय अनाथ हरखू की थी और उसे बहुत प्यारी थी। उसकी रोटी का एकमात्र सहारा थीं। गाँववाले पत्थर छड़ी टहनी जो हाथ में था उसी से मगर को मार रहे थे। कई आदमी गाय की पूंछ पकड़ पीछे खींच रहे थे। और कुछ हरखू को पकड़ रहे थे जो नंगे हाथों ही मगर को मारने दौड़ रहा था।

बलदेव को निशाना नही मिल पा रहा था उसने रास्ता छोड़ने को कह गोली दागी पर मगर पर उसका कोई असर नहीं हुआ। उधर गाय हार गई और मगर शिकार के साथ पानी में समा गया। ऐसे तो सारे गाँव वाले भी उसके पेट में समा सकते हैं। सबके दिमाग में यही था।

हरखू सिसक रहा था। बलदेव ने निश्चय कर लिया कि वह मगर को मार कर ही रहेगा। बलदेव मगर को जगह जगह ढूँढ़ता और मगर बलदेव को। वे एक दूसरे के पक्के दुश्मन बन चुके थे।

एक दिन बलदेव ने करीब करीब उसे घेर ही लिया था। नदी में आखें और नाक निकाले लेटा हुआ था। पास ही लकड़ी का लठ्ठा तैर रहा था जब तक बलदेव की नजर उस पर पड़ी तब तक मगर की भी नजर उस पर पड़ चुकी थी और नजर पड़ते ही पहचान उभरी  और वह डुबकी लगा गया। बलदेव समझ गया मगर उसे पहचानता भी है और उसका मकसद भी पहचानता है। लगता है मगर भी उसे पकड़ने की फिराक में है। बलदेव और मगर के बीच यु( ठन गया था और जीत केवल मृत्यु ही बता सकती थी। बलदेव अब उसकी हर हरकत पर नजर रखने लगा। कहाँ पथरीली नदी के हिस्से में से निकल कर कहाँ चट्टानों पर बैठता है। नदी का निचला हिस्सा बहुत ठंडे पानी का था वहॉं मगर कम ही जाना पसंद करते थे लेकिन वह मगर वहीं रहता था।

बलदेव के घर से वह स्थान कई कोस था। जगह जगह निरीक्षण के बाद बलदेव ने निश्चय किय कि सबसे अच्छी जगह मगर के शिकार के लिये मटियाला किनारा है। नरम मिट्टी में उसके घिसटने के निशान बहुत देखे थे और एक दुर्गन्ध उस स्थान से आती थी। वह मगर का खाना सुरक्षित रखने का स्थान था। बलदेव प्रतिदिन वहाँ उसके इंतजार में बैठने लगा। कई दिन बलदेव ने उसे देखा लेकिन या तो बहुत दूर होता था या उसे देखते ही सरक जाता। एक दिन वह राक्षस ठीक बलदेव के छिपने के स्थान के नीचे से निकला। वहाँ से वह निशाना भी आराम से ले सकता था।

बैंग बंदूक की गोली का धमाका हुआ। चिड़ियाएँ डर कर उड़ चलीं। मगर घिसट कर नदी की तरफ चला ,ओह !   मरा हुआ मगर डूब जाता है यह क्या हुआ अब शिकार हाथ नही लगेगा। वह उसे रखना चाहता था। अब तक का उसका सबसे बड़ा शिकार होता। बलदेव जल्दी जल्दी नीचे उतरने लगा जिससे वह मगर को पानी में जाने से रोक सके लेकिन उसे पता नही था कि वह उसे कैसे रोकेगा?

मगर के पास वह जा नही सकता था क्योंकि उसके पास पहुॅंचना मौत के मुँह में पहुँचने के समान था , साँप की तरह वह अपना शरीर तोड़ मरोड़ रहा था, उसकी पूंछ की मार बहुत तगड़ी होती है। मगर पानी तक पहुँच गया। कुछ देर स्थिर रहा फिर पानी में डूब गया। एक रक्त की रेखा पानी में रह गई।

बलदेव को बड़ा क्षोभ हुआ। शिकार हाथ से निकल गया। उसने धोती उतारकर हाथ में ली और पानी में कूद गया। शायद उसे पकड़ कर घसीट कर ला सके। पानी के अंदर मगर उल्टा पड़ा था। जैसे मरी हुई मछली होती है। धोती का फंदा बनाकर उसने मगर की पूंछ में डाला। उसके छूने से मगर में हरकत हुई लेकिन बलदेव ने सोचा अभी शरीर गर्म है हरकत हो सकती है। वह सांस लेने के लिये ऊपर आया। एक मिनट बाद फिर नीचे गया। जैसे ही उसे छुआ उसने झटका लिया और पलट गया, ऊफ! वह मरा नहीं था।

बलदेव सब वहीं छोड़ ऊपर की तरफ बढ़ा लेकिन मगर और तेजी से यह देखने बढ़ा कि उसे किसने छुआ। यद्यपि वह अर्द्ध चैतन्य था लेकिन गति बलदेव से अधिक तेज थी, दो उछाल मारकर ही वह बलदेव के पास आ गया और उसका एक पैर पकड़ लिया। यद्यपि बलदेव ने बहुत हाथ पैर मारे लेकिन कुछ ही देर में उसकी सांसों में पानी भर गया और वह बेहोश हो गया।

अगर मगर स्वयं पूरी तरह होश में होता तो यह बलदेव का अंतिम दिन होता। जैसे कि अन्य मगर शिकार पानी में खीच ले जाते हैं , वह बलदेव को पानी में नहीं ले गया बल्कि पानी में बने अपने खाना रखने के कमरे में धकेल दिया, क्योंकि बलदेव को जब होश आया उसका मुँह कीचड़ में था और वह एक ढलान पर पड़ा हुआ था। रोशनी की किरण उस पर एक दरार मेें से आ रही थी और हवा के झोंके आ रहे थे। तेज दर्द की टीसें उठ रही थी। उसके चेहरे के नीचे ही खुला स्थान था जहाँ से वह नदी का तल बखूबी देख सकता था। पहले बालू पर घिसटने के गहरे निशान थे फिर कुछ ही दूर पर मगर की पीठ दिखाई दी। वह खोह के बाहर ही आराम कर रहा था। बलदेव ने चारों ओर देखा वहाँ उसके खाने का सामान रखा  था। उसे शीघ्र ही गाय के सींग भी दिखाई दे गये।

एक भय की लकीर उसे ऊपर से नीचे तक सिहरा गई। जीवन का मोह उसमें एक नई आशा लेकर आया। पैर उसका फट तो गया था पर टूटा नही था सारा लहूलुहान हो रहा था। विचार कौंधा ‘यह मिट्टी है। लक्कड़बग्घे मगर का खाना खोद कर निकाल लेते हैं वह भी क्या निकल सकता है?’

बड़े जानवर के कंधे की हड्डी पड़ी थी। बलदेव ने ध्ीारे धीरे मिट्टी ऊपर से खोदनी शुरू की। अपने पीछे उसनेे अन्य खाने का सामान रख दिया था जिससे अगर मगर खाने आये तो पहले अन्य सामान ले।

उसका काम ठीक ठीक आगे बढ़ रहा था। मात्र एक पतली सी पर्त रह गई थी । लेकिन पर्त सूर्य की गरमी से सूख गई थी। डर था आवाज से मगर ऊपर से न आ जाए। परन्तु फिर भी उसने पागलों की तरह खोदना शुरू किया। 

उसे पेड़ वगैरह दिखाई देने लगे। वह सिर निकाल पाता कि उसे भारी शरीर के मांद में घुसने का एहसास हुआ। वह भय से चीख उठा और तेजी से ऊपर निकला कैसे वह नहीं जानता। कुछ देर में मिट्टी से सना वह जमीन पर खड़ा था लड़खड़ाता वह घर पहुँचा मरहम पट्टी करवा वापस आया और मगर को तार से गोद गोद कर मार डाला। उसे खोह में से निकाल कर घर लाया। उस विशाल मगर की खाल उसने दीवार पर टांग दी जिसे देख देख कर उसके बच्चे आज भी खुश होते हैं।


Saturday, 17 August 2024

jute vala billa

 वास्तविकता यह थी कि वे जौ के खेत और मवेषीखाना एक राक्षस के थे जो सामने पहाड़ी पर एक महल में रहता था लेकिन पहरेदार और गड़रियों को आज्ञा मानने की आदत थी तो वे चुपचाप मान गये। अब बिल्ला दौड़ा दौड़ा राक्षस के महल में गया। बाहर से आवाज लगाई‘ हैलो यहां एक बिल्ला महल के मालिक से मिलना चाहता है।

महल का द्वार फौरन खुला राक्षस बोला,‘ ये तुम्हें जूते कहां से मिले?’

‘ ये जूते ,‘ बिल्ले ने कहा,ये जूते तो मेरे मालिक विलोवन्डर ने दिये हैं ।’

एक जूते कपड़े पहने बिल्ले को देखकर राक्षस को आष्चर्य हुआ था उसने बिल्ले को महल में आने दिया। 

राक्षस ने एक कमरे का ताला खोला। बिल्ले ने देखा कमरा सुन्दर सुन्दर चीजों से भरा है। बिल्ला पूंछ समेट कर आग के पास बैठ गया।

‘ मैंने सुना है ,‘बिल्ला बोला,- कि तुममें बहुत षक्ति है और अपने आपको किसी भी जानवर में बदल लेते हो ।

‘हां मैं बदल लेता हूं ।’ राक्षस ने लापरवाही से कहा ।

‘अब देखूं तो जानूं’ बिल्ले ने कहा

‘अच्छा तब मानोगे ’ राक्षस गरजा साथ ही एक बाघ के रूप में बदल गया।

बिल्ला बाघ को देखकर डरा और खिड़की से कूद कर एक पेड़ पर जा बैठा।

राक्षस ठठा कर हंसा और फिर अपने राक्षस के वेष में आ गया ।

बिल्ला फिर अंदर आया और बोला,‘ तुम इतने बड़े हो इसलिये ऐसे बड़े बाध के रूप में आने में तुम्हें कोई तकलीफ नहीं हुई होगी । हां किसी चिड़िया या चुहे के रूप में आने में बहुत मुष्किल होगा तुम्हारे लिये क्यों है न ।?

‘ तो देखो ’राक्षस चिल्लाया साथ ही एक छोटे से चुहे के रूप में बदल गया । उसी क्षण की चालाक बिल्ला प्रतीक्षा कर रहा था। एक ही कूद में वह चूहे पर झपटा और निगल गया ।

उधर राजा , उसकी लड़की और जैक गाड़ी में उसी सड़क से आ रहे थे। जौ के इतने बढ़िया खेत को देखकर राजा ने पूछा‘ ये खेत किसके हैं ।’

डयूक ऑफ विलोवन्डर के ’दोनों पहरेदार एक स्वर में बोले।

मोटे मोटे जानवरों को देखकर उनके पहरेदार गडरियों ने भी यही कहा।

राजा की गाड़ी महल पर पहुंची बिल्ला बाहर निकल आया,‘ डयूक आफ विलोवन्डर के महल पर आपका स्वागत है ,’बिल्ला बोला ,आइये अंदर आइये ।’

अंदर राक्षस द्वारा सजाया जादुई भोजन तैयार था। इतना स्वादिष्ट भोजन महल आदि देख कर राजा बोला ,‘ नहीं जानता तुम्हारा आगे क्या ख्याल है लेकिन अपनी पुत्री का हाथ तुम्हारे हाथ में देकर मुझे खुषी होगी । जैक भी राजकुमारी को देखकर उसके प्रेम में पड़ गया था ।

राजकुमारी भी यही चाहती थी इसलिये निष्चित किया गया कि दूसरे दिन ही जैक की षादी राजकुमारी से की जायेगी। जैसे ही वे लोग गये जैक बिल्ले की ओर मुड़ा और बोला ‘वफादार दोस्त मैं सोच भी नहीं सकता कि मैं तुम्हे मारकर फर का कोट बना रहा था जब राजकुमारी से मेरी षादी हो जायेगी तो तुम्हें उच्च पदवी प्रदान करूंगा।

‘ नहीं बिल्ला बोला ,‘अब तुम मुझे मार दो ,चांदी की छुरी लेकर मेरा गला काट दो ं-

‘नहीं यह मैं कभी नहीं कर सकता।’ जैक चिल्लाया 

‘नहीं यह करके मेरे ऊपर भारी एहसान करोगे।’ बिल्ला गिड़गिड़ाया।

अंत में जैक राजी हो गया जैसे ही चांदी की छुरी से बिल्ले का गला छुआ जोर जोर से बादल गड़गड़ाने लगे ओर बादलों में बिल्ला गायब हो गया उसकी जगह एक बहुत संुदर राजकुमार खड़ा था।

‘मेरे को तुमने राक्षस के मायाजाल से से मुक्त किया है’ राजकुमार ने कहा,,‘ ये खेत ये मवेषीखाने ये महल सब मेरे हैं  लेकिन जैक मैं ये सब तुम्हें खुषी से देता हूं मेरी इससे कहीं ज्यादा भूमि और महल समुद्र के पार है मैं वहां जा रहा हूु ।’ यह कहकर राजकुमार छोटे छोटे जूते ले सड़क पर चल दिया। कुछ देर तक वह दिखाई दिया फिर उसका षरीर धुधलाता गया और गायब हो गया ।


Tuesday, 13 August 2024

kath ka putla 4

 जिमी ने आश्चर्य से पिनोकियो की ओर देखा। अब पिनोकियो वह पिनोकियो नहीं था। अब वह कमजोर और मूर्ख काठ के पुतले की जगह साहसी और निस्वार्थ पिनोकियो था। जिमी ने कहा -मगर भाई समुद्र तो यहाँ से बहुत दूर है।’ पिनोकियो ने कहा मैं इसकी परवाह नही करता अपने पिताजी की जान बचाने के लिये मुझे कोई जगह दूर नही मालूम होती। इतने में वहाँ नीलम परी चील के रूप में प्रकट हुई और बोली चिन्ता मत करो मै तुम्हें अपनी पीठ पर ले जाकर वहाँ पहुँचा दूंगी। इसके बाद उसने पिनोकियो को अपनी पीठ पर चढ़ा लिया। जिमी भी चील पर सवार हो समुद्र की ओर चला। रात भर उड़ने के बाद चील एक ऊँचे चट्टान पर उतरी। उसी के नीचे विशाल समुद्र गरज रहा था। चील ने पिनोकियो से कहा मैं तुम्हें तुम्हारे पिता के यहाँ ले जा सकती हूँ। क्या तुम ऐसी खतरनाक यात्रा करने को तैयार हो? पिनोकियो ने कहा हाँ मैं तैयार हूँ। आप जो मुझे अपनी पीठपर चढ़ाकर यहाँ तक ले आयीं उसके लिये आपको धन्यवाद है। अच्छा गुडवाई। चील ने भी जबाव में गुडवाई कहा और चली गयी। पर पिनोकियो और जिमी दोनों में किसी को भी मालूम नही हुआ कि वह चील नीलम परी थी। 

चील के चले जाने पर पिनोकियो ने अपनी गधे की दुम में एक बड़ा पत्थर बाँधा जिससे वह समुद्र की तह में अपना लंगर डाल सके। फिर दोनों उस चट्टान से कूद पड़े। पत्थर के भारी होने से पिनोकियो बहुत जल्द समुद्र के नीचे चला गया। उससे चिपका छोटा जिमी भी था। दोनों एक दूसरे को पकड़े समुद्र की तह में पहुँचे। पहले तो वहाँ बहुत अंधेरा मालूम हुआ। 

धीरे धीरे हरी रोशनी दिखाई देने लगी। फिर दोनों ने देखा उनके सिरों पर पेड़ो की डालियों की तरह समुद्री पौघे छाये हुए हैं। चारों ओर रंग बिरंगी चमकती मछलियाँ तैर रही थी। पर पिनोकियो को उनसे कुछ मतलब नही था। वह तो दूसरे ही इरादे में वहाँ गया था। उसने गुफाओं और कन्दराओं में उस व्हेल मछली की तलाश की। पर उसकी दुम में जो पत्थर बंध था उससे वह बहुत धीरे धीरे चल पाता था। उसने अधीर होकर कहा ,‘जिमी बताओ वह जगह कहाँ है जहाँ वह व्हेल रहती है।’ जिमी ने कहा ,‘मुझे मालूम नहीं मगर हम यहाँ के लोगों से पूछकर उसका पता लगा लेगें।’ यह कहकर उसने एक सीप को धीरे से ठोकर लगाओ। सीप खुल गयी और मोती निकल आया। जिमी ने कहा ,‘भाई मोती मुझे क्षमा करना तुम्हें मालूम है व्हेल कहाँ रहती है?’ यह सुनते ही मोती डर के मारे बिना कुछ कहे सीप में समा गया। इसी तरह दोनों ने वहाँ के स्कूली बच्चों मैदान में चरते घोड़ो और दूसरे जीव जन्तुओं से व्हेल का पता पूछा मगर किसी ने भी डर के मारे बतलाया नही। फिर भी दोनों हताश नहीं हुए और व्हेल की खोज में आगे बढ़ते गये। पर कहीं भी उस खूखांर जानवर का पता नहीं मिला। पिनोकियो ने कुछ चिन्तित होकर कहा समय बीतता चला जाता है। अब तक हम लोग उसका पता नही लगा सके। मेरे पिता भूखों मर रहे होगें। वह अपने पिता को जोर जोर से पुकारने लगा। पर उसके जबाव में कही से भी आवाज नही आयी। जिमी ने कहा,‘ पिनोकियो चलो घर चलें हमें यहाँ उस व्हेल का पता नही लग सकता। शायद हम लोग भूल से दूसरे समुद्र में चले आये हैं।’ पिनोकियो ने कहा,‘ नहीं जिमी चाहे जो हो अब मैं पीछे पैर नहीं रख सकता।’ 

पास ही व्हेल मछली खुर्राटे भर रही थी। कभी कभी उसकी पीठ पानी की सतह पर दिखाई पड़ जाती जिससे टापू होने का धोखा होता था। उसी के पेट में बूढ़ा मिस्त्री था। उसकी पालतू बिल्ली और लाल मछली भी उसके साथ थी। मिस्त्री ने व्हेल के पेट में एक छोटा सा मकान, बक्सों के टुकड़े से बना लिया था। खाने पीने के बर्तन भी उसने बना लिये थे, मगर खाने का सामान बहुत कम था। यहाँ तक कि वह मरने मरने को हो गया था। हर रोज वह व्हेल के पेट में बंसी लगाकर मछलिया मारा करता पर जब वह सो जाती थी तब उसके पेट में एक भी मछली नही जाती थी। जिपेट्टो ने बिल्ली से कहा- हम लोग यहाँ भूखों मर रहे हैं और पिनोकियो न जाने कहाँ क्या कर रहा होगा। जब बूढ़ा मिस्त्री बाहर मछली मारने चला गया तब बिल्ली फिगारो से रहा नही गया, वह भूख से बेचैन हो लाल मछली पर झपटी। जिपेट्टो इसे देख लिया। उसने बिल्ली को डाँटा और कहा कि इसीलिए तुमको इतने दिन से पाल रखा था कि तुम अपने साथी को ही हड़पने लगो। खबरदार ऐसा मत करना।’ इतने में व्हेल मछली के पेट में एक बक्स आया। जिपेट्टो ने समझा उसमें खाने की चीजें होंगी पर खोलने पर उसमें एक भोजन बनाने की किताब मिली। उसके पन्ने खोलकर जिपेट्टो पढ़ने लगा। एक पन्ने पर मछली बनाने की विधि लिखी थी। पढ़ते ही उसके मुँह से राल टपक पड़ी वह अपनी पालतू लाल मछली की ओर बढ़ा और उसे कड़ाही में तलने जा ही रहा था कि उसे ख्याल आया कि मैं क्या कर रहा हूँ। उसने मछली से माफी माँगी और कहा कि हम दोनों इतने दिनों तक साथ रहे अगर भूखों मरना ही है तो दोनों एक साथ मरेंगे। बड़ा करूणाजनक दृश्य था। सबने समझा कि आखिरी वक्त आ गया। 


Jute vala Billa

 जूते वाला बिल्ला

कहानी एलिजाबेथ ऐबेट प्रस्तुति डा॰ षषि गोयल

बहुत दिन हुए एक आदमी के तीन पुत्र थे ,मरते समय उसने बड़े पुत्र को घर दूसरे पुत्र को खेत दिये लेकिन सबसे छोटे पुत्र को अपना पालतू बिल्ला दे गया । सबसे छोटा पुत्र जैक यह समझ न सका कि बिल्ले का क्या करे ? ‘इसे मार दूं’ उसने कहा,‘ फिर उसके फर का कोट बनालूं। लेकिन उसका फर मेरे को पूरा नहीं पड़ेगा।’

‘मालिक मेरे को मत मारो’ बिल्ले ने जैक से कहा,‘ मेरे को एक जैकेट एवं एक जोड़ी जूते देदो ,आपको खास नुकसान नहीं होगा।’ जैक जानता था कि कोई खास खर्च नहीं आयेगा इस लिये उसने बिल्ले को एक जैकेट,एक जोड़ी जूते एवं एक हैट दे दिया। बिल्ले ने इन्हें पहना और एक खाली टोकरी उठाई और रास्ते पर निकल पड़ा ।

 बिल्ले ने बहुत दूर जाकर एक घर देखा ,उसके पिछवाड़े हरी सलाद की पत्तियां उगी हुई थीं। उसने द्वार खटखटाया, मालकिन ने झांका तो बिल्ला बोला,‘ मेरे मालिक ने जो डयूक आफ विलोवन्डर हैं वे सलाद के लिये पत्तियां चाहते हैं, अगर थोड़ी पत्ते दोगी तो वे तुम्हें अच्छा इनाम देंगे।’ मालकिन बहुत खुष हुई उसने बिल्ले को पत्तियां देदीं। बिल्ले ने जल्दी से बोरे में पत्तियां भरी फिर अपने रास्ते निकल पड़ा। एक जगह उसने खरगोष के घर बने देखे ं एक बड़े से घर के पास उसने पत्तियों का बोरा टिका दिया। थोड़ी ही देर में एक पहलवान खरगोष वहां आया । पत्तियों को सूंघकर उन्हें खाने के लिये बोरे में घुस गया । बिल्ले ने बोरे के मुंह को कसकर बंद किया,पीठ पर लादा और चल दिया। चलते चलते वह राजा के महल पर पहुंचा,‘सुनो सुनो ’ बिल्ले ने कहा ,एक बिल्ला राजा से मिलना चाहता है। ’ राजा के पहरेदार ने खिड़की से झांका,एक बिल्ले को  मनुष्यों की पोषाक में देखकर दंग राजा के पास भागा आया,

‘महाराज! महाराज!’ वह चिल्लाया’ एक जुते पहने बिल्ला बारादरी में खड़ा है।’

‘ वाह! क्या दृष्य होगा,’ राजा ने कहा,‘ मुझे सुनकर अच्छा लगा ,बुलाओ उसे ं’पहरेदार बिल्ले को राजा के पास लाया । उसे ऊपर से नीचे तक देखने के बाद राजा ने कहा,‘ वाह क्या मजेदार तमाषा है ,तुम्हारे इस बोरे में क्या है ?’

‘ मोटा सा खरगोष हुजूर ।’ बिल्ला बोला,‘ मेरे मालिक ने यह आपके भोजन के लिये भेजा है’। 

तुम्हारा मालिक कौन है ?’

‘ क्यों वह डयूक ऑफ विलोबंडर हैं ’ बिल्ले ने कहा ।

‘ठीक है ’ राजा ने कहा,‘ किसी दिन वो भी मेरे साथ भोजन पर पधारें ।’

दूसरे दिन बिल्ला दो बत्तख लाया। एक बार फ्रि महल के फाटक पर चिल्लाया’

सुनो सुनो, एक बिल्ला राजा से मिलने आया है।’

पहरेदार राजा के पास दौड़ा दौड़ा गया,‘ महाराज वह बिल्ला आज फिर आया है।’

‘ उसे आने दो ।’ राजा ने कहा ।

पहरेदार बिल्ले को लेकर अंदर आया‘ तुम्हारे बोरे में क्या हाथ पैर चला रहा है।’

‘ दो मोटी मोटी बत्तखें ।’ बिल्ले ने कहा,‘ महाराज के हुजूर में अपने मालिक की ओर से पेष करता हूं ।’

‘ तुम्हारे मालिक से मिलना चाहता हूं । ’ राजा ने कहा,‘ किसी दिन उससे कहो मेरे साथ खाना खाये ।’

बिल्ला दौड़ा दौड़ा घर गया और जैक से बोला ,ः कल राजा इधर से गुजरेंगे ,तुम्हें वैसे ही करना होगा जैसे मैं कहूं, अब तुम जैक नहीं डयूक ऑफ विलोवन्डर हो ।’

दूसरे दिन बिल्ले ने राजा की गाड़ियों की खड़खड़ाहट सुनी तो बोला ,‘ जैक दौड़ कर नदी में कूद जाओ लेकिन कपड़े किसी पत्थर के नीचे छिपा देना।’

जैक बिल्ले के कहे अनुसार कूदा , बिल्ला सड़क के किनारे खड़ा हो गया जैसे ही राजा की बग्धी दिखाई दी जोर से वह चिल्लाने लगा ,‘ बचाओ ! बचाओ !मेरे मालिक डूब रहे हैं ,डयूक आफ विलोवन्डर डूब रहे हैं’

राजा ने गाड़ीवान से कहा,‘ इस बिल्ले को मैं पहले भी देख चुका हूं जाओ और उसके मालिक को बचाओ ।

तब बिल्ले से कहा ,’ मालिक को मेरे पास लाना ’

‘ हाय कैसे ? इस समय उनके पास कपड़े नहीं हैं वे डूबे उससे पहले ही कपड़े डूब गये।’

‘ इसमें क्या परेषानी है?’ राजा ने कहा और एक पहरेदार को महल से कपड़े लाने भेज दिया उतनी देर नदी से निकाला हुआ जैक झाड़ी के पीछे छिपा सर्दी से कांपता रहा। जब बिल्ला कपड़े लाया तब उन्हें जैक ने पहना ।

राजा के भेजे कपड़े पहनकर जैक डयूक सा ही लग उठा वरन् और भी सुंदर। राजा ने जैक को  अपने और अपनी पुत्री के साथ गाड़ी पर ही बैठा लिया। गाड़ीवान ने बिल्ले से अपने साथ बैठने के लिये कहा लेकिन बिल्ला आगे आगे भागते हुए चलता रहा ।

बिल्ला षीघ्र  ही गाड़ी की दृष्टि से ओझल हो गया। जल्दी ही वह एक बहुत बढ़िया और बड़े से जौ के खेत के पास पहुंचा जहां दो व्यक्ति पहरा दे रहे थे ं बिल्ले ने दोनों से कहा,‘ इधर राजा आ रहे हैं अगर वे यह पूछें कि खेत किसके हैं तो कहना‘ ये खेत डयूक ऑफ विलोवन्डर के हैं अगर ऐसा नहीं कहा तो लौट कर मैं तुम्हारे टुकड़े टुकड़े कर दूंगा’

 फिर भागता बिल्ला एक मवेषीखाने के पास पहुंचा । वहां बहुत अच्छे अच्छे भेड़ बकरियां गाय भैंसें थे दो गड़रिये उनकी देखभाल कर रहे थे। बिल्ले ने दोनों गड़रियों से कहा,‘ देखो इधर बहुत जल्दी राजा आने वाले हैं वे पूछेंगे ये किसके जानवर हैं तो तुम लोग कहना डयूक ऑफ विलोवन्डर के हैं अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हारे टुकड़े टुकड़े कर दूंगा ।


Thursday, 8 August 2024

Jheel ka rahasy

 झील का रहस्य

आज चलो पिकनिक मनाने चलते है कल वर्षा हुई है आज भी बादल से छाये हैं कॉफी राहत है मजा रहेगा, अमित ने चारू रमन और रीता की ओर देखकर कहा ‘ हॉं चलो चलते हैं पर नौ तो बज गये ” रीता जबतक नहाई नहीं थी बोली ,‘खाना भी तो लेना पड़ेगा । “ तो क्या हुआ आंटी से पूरियॉ बनवा लेते है। ” रमन तो उत्साह में खड़ा भी हो गया । चारू और रमन मौसी के यहॉ गर्मी की छुट्टियों में आये थे अमित और रीता बराबर के से थे इसलिये यहॉ उनका मन खूब लग जाता था और अधिकतर छुट्टियॉ विताने कभी अमित रीता चले जाते या कभी चारू रमन आजाते थे तेज गर्मी की वजह से वे लोग कही बाहर नहीं निकल रहे थे कैरम आदि खेल खेल कर बोर हो रहे थे। टीवी या वी.सी आर पर पिक्चर देख लेते थे शाम को भी घर से निकलने पर लू के थपेडे़ लगते थे। इसलिये रमन की मम्मी उन्हें बाहर नही जाने देती थी। पहली रात की तेज वर्षा ने मौसम काफी खुशनुमा कर दिया था 

“ लेकिन अधिक दूर कहीं मत जाना कहॉं जाओगे पिकनिक पर?’ रमन की मॉ ने पूरियॉ बनाते कहा,‘ हम नदी किनारे तरबूज खरबूज के खेत ं जायेंगे वहीं बाबा की बगीची में खेलेगें ’रमन ने बैट बॉल लिया। चिप्स आदि के पैकेट रखते रीता बोली,‘ ओफू चाकू तो लेना भूल ही गई खरबूजा काटेंगे किससे ’ रीता ने जेबी चाकू ढूॅंढ कर अपने बैग में रख लिया क्यों कि बडे़ चाकू से मम्मी काम कर रही थी। 

ग्यारह बजे तक सब नदी किनारे पहुॅच गये गर्मी के कारण नदी सूखी पड़ी थी एक रास्ते से बहुत से लोग नदी पार कर रहे थे पानी बस एक फुट वहीं से नदी पार कर खेतों मंे पहुॅचे। ‘चलो अंदर की तरफ घूमने चलते है “ रमन ने कहा।,‘ उधर जंगल का रास्ता है, बगीची चलते है “ अमित ने रोकते कहा । ‘अरे! तो क्या हुआ दिन का समय है कोई जंगल हाल ही तो शुरू नही है। जायेगे लौट आयेगेे चलो चलो ।’ सबने सामान लादा और अंदर की तरफ चल दिये कच्चे आम दिखाई दिये तो आम तोड़े बेल तोड़ कर थेैले में डाले ढेर सारे कदम्ब के फूल तोड़़े जब थक गये तो पैर पसार  कर एक घने पैड़ के नीचे बैठ गये ।

‘अब तो भूख लगी है ’ खाने का सामान निकाल कर जैसे टूट पड़े। करीब दो बजे चुके थे अभी तो समय हैं चलो लेटा जाये ठंडी हवा चल रही हैं’ चारू बहुत थक रही थी। ‘थोड़ा आराम करलोे फिर वापस चलते हैं’ यह कहकर रमन ने चारों ओर देखा लेकिन यह क्या रास्ता तो भूल चुके थे अन्दाज ही नही लग रहा था किधर से आये थे ? उसने पूछा ,‘उधर कदम्ब के पेड़ है न’ पर कहते कहते वह स्वयं ही चारों ओर घूम गया । क्योकि चारो ओर  कदंब के पेड़ नजर आ रहे थे अमित ने कहा ,“ उठो उठो रास्ता देखना पडेगा अधेरा हो जायेगा’ वह घबरा गया। कुछ दूर चलने पर ही चारू कहने लगी, जरा सुस्ता लो चला नही जा रहा है ’यह कहकर एक पत्थर के विशाल खंड से लगकर बैंठ गई, चारों वही बैठ गये। “ ‘जब हम आये थे तब यह शिला तो भिली नहीं थी ’रीता ने इधर उधर देखते कहा, तभी उसे एक व्यक्ति आता दिखाई दिया,‘ चलो उससे पूछते है। रुको अमित का मन शंकित हो उठा क्योकि उस व्यक्ति का चलने का  ढंग संदेह पैदा कर रहा था वह चारों ओर शंकिता सा देखता ,बार बार पीछे मुड़ता देखता तेजी से जा रहा था ’कही कोई रास्ता तो होगा चलो इसके पीछे चलते है रमन उत्साहित हो उठा ‘लेकिन दबे पांव’ कुछ दूर चलने पर उन्होंने देखा एक पुराना सा मकान था वह व्यक्ति उसी के अंदर चला गया लेकिन उसके अंदर जाने से पहले वह पलट कर चारों ओर देखने लगा कोई आ तो नही रहा है । चारों बच्चे ओट से मकान को देखने लगे। कुछ ही देर में एक फ्रेंच दाढ़ी वाला व्यक्ति अंदर घुसा। वह भी  घुसने से पहले बहुत सतर्का था । अब इन चारों को निश्चय हो गया कि अवश्य कुछ गड़बड़ है उन्होंने मकान का चारों ओर से निरीक्षण किया  ंपीछे ही नदी बह रही थी एक फेरी बंधी थी । यहॉ पानी गहरा था पीछे भी दरवाजा था पर वह बंद था तभी दोनों व्यक्ति बाहर जाते दिखाई दिये दरवाजा उढका था चारों एक एक के कर उसमें प्रवेश कर गये। चारू रमन एक कमरे में घुसे ,अमित रीता दूसरे कमरे में पहला खाली था दूसरे में खाने पीने का सामान था तीसरा गैलरी पार करके एक और  कमरा नजर आ रहा था उसके दो रास्ते बंटे थे एक पास ही कमरा उढका था अमित रीता उसमें धुसे और रमन रीता चौथे सामने वाले कमरे में धुसे वहॉ धुसते ही वे मैाचक्का रह गये । नई चमचमाती हुई विशाल मशीन थी उसमें अनेक सयन्त्र लगे थे दो टेप रिकार्ड भी ,‘अरे यह तो एसी मशीन तो मैंने रेडियो स्टेशन पर देखी हैं’ ’  ‘चल हट , रेडियो स्टेशन पर तूने देखी ,’                                             ‘मैं मम्मी के साथ रेडियो स्टेशन कई बार गई मम्मी के भजन प्रसारित होते है न वहॉ से ,’  ‘तो यह इसका यहॉं क्या कर रहे हैं’,तभी एक मजबूत हाथ अमित के कंधे पर पड़ा       ‘क्यों बच्चू यहॉ क्या कर रहे हो’दाढी वाला और दूूसरा व्यक्ति लौट आया था इस बारएक तीसरा मोटा व्यक्ति भी साथ वह गुर्राया‘ये बच्चे अदंर कैसे आये दरवाजा बंद नहीं किया था’ ‘किया था बॉस पर अभी बस किनारे तक ही गया  तब तो  यहॉ कोई नहीं था ’        ’चलो इन्हें बांध कर कमरे में डाल दो सोचेगें इनका क्या किया जाये ’                 ‘बच्चे है ये क्या समझे यह भगा दीजिये ,’ दाढी वाले ने कहा ।                      ‘बच्चे बडे़ आफत केे परकाला होते हैं यदि किसी से भी जिक्र कर दिया तो फॅस जायेगें  मोटेे ने कहा ,‘इन्हैं पीछे नदी में डुबो दे यहीं ठीक रहेगा ,’

अभी तो बांध कर डाल दो 

चलो सन्देश देने क्या समय हो गया है एक व्यक्ति ने रमन और चारु केे हाथ बॉध कर उन्हैं पास वाले कमरे मै धकेल दिया बाकी दोनांे ने उस मशीन को चालू कर समाचार पढने शुरू किये समाचार के बाद कोड शब्दोे में बोला ।

अमित और रीता दरवाजे की और से सारा कंाड देख रहे थे उनका बुरी तरह दिल धड़क रहा था। अमित तैरना जानता था लेकिन रीता नही जानती थी नदी तो पार अवश्य करनी हैं लेकिन रास्ता कहॉ पहॅुचेगा हमें पहले चारु और रमन को बचाना है अमित का दिमाग तेजी से धूम रहा था तभी उसे डोंगी की याद आई 

‘क्यों न , नदी पार जाकर पुलिस में खबर दे दूं ’अमित फुसफुसाया ,‘ पता नहीं कितनी दूर हैं हम तब तक उन्होनें उन्हें डुबो दिया तो रीता सहमी हुई थी ,‘ ऐसा कर तू डोंगी चला लेगी ‘ ‘ मैं’ रीता  सहम गई कभी चलाई नहीं’’ ‘ अच्छा छोड़ तू नदी किनारे इधर दरवाजे की तरफ  देखती छुपी बैठी रहना मैं पुलिस में खबर करता हूॅ चल जल्दी समय कम है वे लोग दबे पॉव बाहर निकले एक बार चप्पू की छपछप सें अमित धबरा गया रीता को भी डर लग रहा था पर दरवाजे की और देखती वह छिप गई ,मुॅह के पर्स खोल उल्टा दिया चाकू निकाल लिया पीछे मुठ्ठी ही पकडे उसने अमित के बंधे हाथ की डोरी पर चाकू धिसना शुरू किया जोर नहीं लगा पा रही थी बार बार चाकू गिर जाता  पर कुछ देर मे  वह रस्सी काटने में सफल हो गई 

अमित ने चारु के बंधन खोले लेकिन अब समस्या कमरे से बाहर निकलने की थी कहीं भी कोई साधन नहीं नजर आ रहा था दरवाजा बाहर से बंद था न कोई मेज न कुर्सी। 

‘धत् तेरे की! अब क्या करें ?’अमित को गुस्सा आ रहा था चारु को रोना आने लगा ।

‘देखी जायेगी जैसे ही कोई दरवाजा खेालेगा उसे पकड कर गिरा दंेगे और भाग चलेंगे  आहट पर ध्यान देना।’ दोनांे दरवाजे से टेक लगाकर बैठ गये दो। घन्टे हो गये कोई भी दरवाजा खेालने नही आया 

  ‘हॅंू सोच रहे हैंे बच्चे हैं भूखे प्यासे ही मार देंगें रमन और रीता पता नही कहॅा हैं किस कमरे में हैं’ अमित ने रमन को सुनाने के लिए परिचित सीटी बजाई लेकिन कहीं कोई जबाब नहीे आया 

कुछ ही देर मे कई आहटें सुनाई दी जैसे कई व्यक्ति आ रहे हों लेकिन सब बगल के कमरे की ओर बढ़ गये कान लगाये वे दम साध आहटें सुनने लगे।  एकाएक कुंाडी उतरने की आवाज सुनाई दी दोनों तैयार हो गये जैसे ही जरा दरवाजा खोला इन्होंने झपाटे से पूरा दरवाजा खोल आने वाले को दबोच लिया,‘ अरे! अरे यह क्या ? ’साथ हो दोनांे मौचक्के रह गये क्यांेकि जिसेे उन्होंने दबोचा था वह अमित था वह पुलिस बुला लाया था दो व्यक्तियों को पकड़ लिया था और मोटे वाले व्यक्ति  ,उनके बॉस के लिये जाल बिछा दिया गया था इन देश के दुश्मनों ने पाकिस्तानियों से मिलकर एक अवैध रेडियो स्टेशन बना लिया था जिससे वे जासूसी कर खबरें कोड शब्दों द्वारा मेजा करते थे। बाद में बॉस भी पकड लिया चारों बच्चों को सरकार की तरफ से सम्मान पत्र ब इनाम मिला। 


Wednesday, 7 August 2024

kath ka putla 3

 पिनोकियो अपने पिता को देखने के लिये बहुत उत्सुक था। उसे इतनी उतावली थी कि जिमी के साथ बाजी लगाकर वह दौड़ता हुआ घर चला। मगर जिमी दौड़ने में तेज था, वह बहुत दूर आगे निकल गया। पिनोकियो बहुत पीछे अकेला पड़ गया। चलते चलते वह गाँव के एक ऐसे मुहल्ले में पहुँचा जिधर भले आदमी आँख उठाकर भी नही देखते थे। वहाँ पक्के बदमाशों का अड्डा था। वहीं उसी लोमड़ी और बिल्ली ने उसे देखा और सोचा कि इससे फिर पैसा कमाना चाहिये। लोमड़ी ने आगे बढ़कर कहा -अरे भाई पिनोकियो कहाँ दौड़े जा रहे हो अच्छे हो न? तुम्हें देखकर बड़ी खुशी हुई। पिनोकियो ने कहा कि मैनें थियेटर छोड़ दिया है। अब अपने घर जा रहा हूँ। फिर मैं स्कूल जाऊँगा और मेहनत से पढूँगा। लोमड़ी ने उसे रोककर कहा- तुम क्या कह रहो हो? भला तुम स्कूल जाने लायक हो तुम बीमार दिखाई पड़ते हो और तुम्हारी बीमारी ऐसी खतरनाक है कि ताज्जुब नहीं कि जल्द मर जाओ। ऐसी खतरनाक बीमारी की बात सुनकर पिनोकियो बहुत घबराया। पूछा अब मुझे क्या करना चाहिये?

लोमड़ी ने कहा घबराओ मत। इस बीमारी से बचने के लिये बहुत सीधा उपाय है। कुछ दिन आनन्दद्वीप जाकर आराम करो। वहाँ हर रोज छुट्टी रहती है। तरह तरह के खेलने के सामान मिलते हैं। वह बच्चों के लिये तो स्वर्ग ही है। लोमड़ी ने इस ढंग से उसे आनन्दद्वीप का वर्णन किया कि पिनोकियो उसकी बातों में आ गया और वहाँ जाने को तैयार हो गया। 

इधर जिमी जिपेट्टो के घर पहुँचा। जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो पिनोकियो नही था। फिर वह उसे खोजने के लिये लौट पड़ा। जब वह चौराहे पर पहुँचा तब आधी रात हो चुकी थी। उसने देखा कि पिनोकियो फिर बदमाशों के चंगुल में फंस गया है। वह एक छकड़े पर लादा जा रहा था। जिस पर और भी बच्चे चढ़े हुए थे। उस छकड़े का मालिक उन बच्चों को कहीं बेचने के लिये ले जा रहा था। लोमड़ी ने उसी के हाथ पिनोकियो को भी बेच दिया था। बच्चों को लादकर छकड़े वाले ने छकड़े को आगे बढ़ाया। 

जिमी ने फिर एक बार पिनोकियो को छुड़ाने की कोशिश की। वह भी छकड़े के पिछले हिस्से में एक कोने में बैठ गया। वह जानता था कि पिनोकियो फिर आफत में फंसने जा रहा है। उसे बचाना उसका कर्तव्य था। कुछ दूर जाकर सब लड़के छकड़े से उतार कर एक स्टीमर में चढ़ाये गये। जिमी भी चढ़ा। समुद्री यात्रा से उसकी तबीयत खराब हो गयी थी पर उसे अपने लिए चिन्ता नहीं थी। वह पिनोकियो के लिये बहुत चिन्तित था, जिसकी दोस्ती लैम्पविक नामक एक लड़के से हो गयी जो उन लड़को में सबसे बदमाश था। जिमी ने पिनोकियो को उसका साथ न करने के लिये मना किया पर काठके पुतले ने उसकी एक भी न सुनी। उसने लैम्पविक का साथ न छोड़ा। स्टीमर आनन्दद्वीप पहुँचा। वहाँ पहुँचने पर बड़ी धूम धाम से बच्चों का स्वागत किया गया। उन्हें तरह तरह की खाने की चीजें दी गयीं। पिनोकियो ने आनन्दद्वीप को वैसा ही पाया जैसा कि लोमड़ी ने बतलाया था। पर जिमी को वहाँ की एक भी बात पसन्द नहीं आयी। वहाँ गये हफ्तों गुजर गये, जिमी को पिनोकियो एक दिन भी अकेले में नही मिला जिससे वह उसे कुछ समझा सके। वह लेम्पविक और दूसरे बदमाश लड़कों के साथ दिन भर घूमा करता। वे सब चारों ओर ऊधम मचाते और शरारतें करते रहते। छकड़े वाला और उस द्वीप का मेयर उन्हें बढ़ावा देते थे। लेम्पविक के साथ रह कर पिनोकियो बहुत सी बुरी आदतें सीख लीं। एक दिन वह उसके साथ बैठा सिगरेट पी रहा था। जिमी यह देखते ही उसके पास पहुँचा और बोला अब तुम सिगरेट भी पीने लगे। पिनोकियो ने लैम्पविक की नकल कर उसी के बदमाशी भरे ढंग से कहा- तो क्या हुआ? जिमी ने कहा- तुम अपने को खराब कर रहे हो। तुम्हें अभी घर चलना होगा। लैम्पविक ने पूछा- यह कौन है? पिनोकियो बोला -यह मेरा अन्तःकरण है यह मुझे सलाह देता है। लैम्पविक ने कहा जब तुम्हारे ऐसे सलाहकार हैं तो मै जाता हूँ। मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता। यह कहकर वह चला गया। पिनोकियो ने कहा जिमी तुमने यह क्या किया। लैम्पविक मेरा दिली दोस्त था। यह कहकर वह उसके पीछे दौड़ा गया और कहा - भाई लैम्पविक मुझे छोड़कर मत जाओ। मै तुम्हारे ही साथ रहूँगा। 

अब जिमी से यह बर्दाश्त नहीं हो सका। उसने अपने मन में कहा-अब यह मुझे छोड़कर बदमाशों के साथ रहना पसन्द करता है। जो इच्छा हो वह करे अब मैं घर जाता हूँ। अपने किये का फल उसे आप ही मिलेगा। वह उठकर फाटक की ओर चला। पर यह समझकर कि यहाँ पिनोकियो की जिन्दगी खराब हो जायेगी। किसी तरह उसे यहाँ से हटाना चाहिये वह फिर लौट आया। उसने पिनोकियो को एक बार फिर शिक्षा देने की गरज से बुलाया मगर वह आया नहीं पास ही लैम्पविक के इन्तजार में खड़ा था। लैम्पविक आया, मगर इस बार उसकी आवाज गधे की सी थी और शक्ल भी वैसी ही हो गयी थी। 

पिनोकियो ने आश्चर्य से पूछा-यह क्या तुम्हें हो गया? तुम गधे जैसे क्यों दिखाई दे रहे हो? लैम्पविक ने कहा-मुझे गधा बुखार हो गया है और तुम्हें भी जल्द ही होने वाला है। तुरन्त पिनोकियो ने देखा कि उसके लम्बे लम्बे कान हो गये और पीछे एक दुम भी निकल आयी है। यह देखकर वह डर के मारे काँपने लगा। वह अपने को संभाल नहीं सका और जोर से चिल्ला उठा- जिमी मुझे बचाओ। 

जिमी दौड़ता हुआ पहुँचा पर अब आकर वह क्या करता। दोनों को गधे की शक्ल में देखकर उसने कहा- मेरी बात तो तुम लोगों ने सुनी नहीं अब जरा अपनी ओर देखो। दोनों में एक ने भी उसका जबाव नही दिया। जिमी ने उन्हें वहाँ से भाग चलने की सलाह दी। 

वह आगे आगे चला और वे उसके पीछे पीछे भागते चले। पर ज्यों ही पत्थर की दीवाल के पास पहुँचे कि छकड़े वाले ने सामने से उन्हें घेर लिया। उसने शोर मचाना शुरू किया- पकड़ो पकड़ो ये दोनों भागे जा रहे हैं। खतरे की घंण्टी बजने लगी। पहरेदार हाथों में टार्च लिये इधर उधर दौड़ने लगे। बन्दूक छूटने की आवाज से आसमान गंूज उठा। दोनों भगोड़े डर रहे थे कि उन्हें कहीं गोली न लग जाय। इसी बीच पिनोकियो और जिमी दीवाल के करीब पहुँचे। दोनों फाँदकर दीवाल पर चढ़ गये। पर लैम्पविक नीचे ही रह गया। उसके पांव रस्सी से बंध गये थे। वे उसे उसी हालत में छोड़ समुद्र में कूद पड़े और इस तरह अपनी जान बचाकर निकल भागे। दोनों तैरकर किनारे पहुँचे। वहाँ से उनका घर अभी बहुत दूर था। पिनोकियो घर पहुँचने और अपने पिता को देखने के लिये बेचैन हो रहा था। आनन्दद्वीप अब उसे एक सपना सा मालूम हो रहा था। वे जल्दी जल्दी घर की ओर चल पड़े। रास्ते में पिनोकियो की गधे जैसी शक्ल देखकर लोग हँसते थे और उसका मजाक उड़ाते थे। इसलिये उन्होनें रात को सफर करना तय किया। दिन को वे कहीं लुक छिपकर रहते । 

इस तरह आखिर वे जिपेट्टो के घर पहुँचे। उस समय जाड़ा पड़ने लग गया था। वहाँ जाकर देखा कि दरवाजा बन्द है। पिनोकियो दरवाजे पर धक्का देकर आवाज लगायी,‘ बाबूजी दरवाजा खोलो। ’मगर अन्दर से कोई जबाब नहीं मिला। पिनोकियो को बड़ी चिन्ता हुई कि क्या बात है। उसने खिड़की से झांककर देखा अन्दर एकदम खाली था। सब चीजें जहाँ तहाँ बिखरी पड़ी थी। उन पर ढेरों धूल जमी हुई थी। पिनोकियो दुखित होकर कहा-जान पड़ता है पिताजी कहीं चले गये हैं। उसकी आँखों से आसू बह रहे थे। इतने में हवा के झोंके में एक कागज का टुकड़ा उड़ता दिखाई दिया। जिमी ने कूदकर उसे पकड़ लिया, वह जिपेट्टो की चिट्ठी थी। जिमी ने उसे पढ़ा। जिपेट्टो ने लिखा था प्रिय पिनोकियो मुझे पता चला कि तुम आनन्दद्वीप में हो। इसलिये मैं एक छोटी सी नाव में बैठकर तुम्हारी खोज में निकल पड़ा। पर रास्ते में ही जोर का तूफान आया जिससे मेरी नाव उलट गयी और मै समुद्र के नीचे चला गया। वहाँ मुझे एक व्हेल मछली ने निगल लिया। इस समय मैं उसी के पेट में पड़ा हूँ। यहाँ खाने पीने को कुछ नही मिलता। इसलिये मुझे डर है कि तुम अब मुझे देख नही सकोगे। 

पिनोकियो ने कहा- जिमी मेरे पिता तो अभी जीवित है। उन्हें बचाने के लिये अभी भी काफी वक्त हैं मैं उन्हें व्हेल मछली से छुड़ाने जा रहा हूँ। मेरी ही गलती से वह उसके पेट में चले गये। जिमी ने कहा खबरदार ऐसा ने करना नहीं तो तुम्हारी भी जान चली जायेगी। पिनोकियो ने कहा- परवाह नहीं पिता के बिना मैं जीकर ही क्या करूँगा। मैं उन्हें जरूर बचाऊँगा। 


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Saturday, 3 August 2024

Apni dharti

 अपनी धरती




कितनी अच्छी लगती हमको

अपनी प्यारी धरती

ठंडी ठंडी हवा घूमती

नदियाँ कल कल बहती

वृक्ष हमें जीवन देते हैं

स्वच्छ हवा हमको देते हैं

खाना देते पानी देते

गंदी हवा स्वयं ले लेते

अधिक लगायंे पेड़ अगर हम

धरती भी बच जायेगी

रेगिस्तान न और बनेंगे

हरियाली छा जायेगी।


छोटे होते जाते खेत

बढ़ती जाती सूखी रेत

बन गये कंक्रीटों के जंगल

गर्म हवा गाती है मंगल

बढ़ जायेगी गर्मी खूब

वर्फ पिघल हम जाये डूब

सूखेगा नदियों का पानी

पीली होगी चादर घानी

जीवन अगर बचाना है

पेड़ अनेक लगाना है

हरियाली छा जायेगी

धरती मां बच जायेगी।





Friday, 2 August 2024

Aan kahani

 आन  

दिल्ली के तख्त पर औरंगजेब बैठा था शाहजहाँ को उसने कैद खाने में डाल दिया था। उसके अत्याचारों की खबर जब तब आती रहती थी। रूप नगर के नरेश विक्रम सोलंकी के महल के बाहर बाजार लगा था रौनक हो रही थी। राजकुमारी चचंल अटारी पर अपनी सहेलियों के साथ बैठी बाजार की चहल पहल देख रही थी। 

एक बुढिया आवाज लगाती निकली ,‘सजा है तस्वीरों को बाजार राजा महाराजाओं की बहार ’

‘अरे यह क्या बेच रही है ?’ राजकुमारी चचंल ने उत्सुकता से पूछा ,‘जा इसे बुला ला ये तो राजा महाराजा बेच रही है।’ बुढ़िया आई तो राजकुमारी चचंल ने पूछा,‘ कैसी तस्वीरें हैं। ’

‘राजकुमारी जी बड़े-बड़े मुगल सम्राटों की तस्वीरें हैं ,ये देखिये सम्राट अकबर की तस्वीर है ये शहजादे सलीम की तस्वीर है। ये मयूर सिंहासन पर बैठे शाहजहाँ की है।’

 ‘अरे इन तस्वीरों का क्या करूँगी ? हिन्दू राजकुमारांे की तस्वीरें नही है क्या?-

‘हाँ हाँ देखिये ये राज मान सिंह है ये राज जय सिंह, ये राजा जगत सिंह है।’

‘ ये कोई राजा है बूढ़ी माई ये मुगलों के पिट्ठू रहे हैं उनकी नौकरी बजाई है मुझे तो असली राजा की तस्वीर दिखा,’। बुढिया ने  थैले में से दूसरी कपड़े  में लिपटी पोटली निकाली और  प्रताप सिंह करन सिंह और राज सिंह की तस्वीरें दिखाई। 

‘हूँ इनमें कुछ बात है इन्होंने मुगलों से लोहा लिया था पर अब भी मन नही भरा चल प्रताप सिंह करन सिंह राज सिंह की तस्वीरें तो दे दो कोई और तस्वीर भी दिखा। ’तब बुढ़िया ने औरंगजेब की तस्वीर निकाली और बोली,‘ ये आलमगीर की तस्वीर है राजकुमारी इसका सिजदा करो।’ 

‘सिजदा ! ’चचंल की आँख, नाक सिकुड़ गये मैं इसकी सिजदा क्यों करू ? मेरी जूती के नोक पर है ये। ’

‘क्या कह रही हो लड़की! चुप रहो ’बुढ़िया बोली शहंशाह ने सुन लिया तो रूपनगर की ईट से ईट बजा देंगे’। ‘अच्छा’ चंचल हँसी,‘ ऐसी बात है लो मैं इसे पैर से मारती हूँ।’ यह कहकर तस्वीर पर जोर से अपनी जूती मारी और सहेलियों से बोली,‘ लो तुम भी मारो। ’

हँसते हुए एक एक कर सब ने अपने पैर उस तस्वीर को मारे ,तस्वीर टुकड़े टुकड़े हो गई। चचंल ने एक बार फिर अपनी ली हुई तस्वीरें एक एक कर देखी और बोली ठीक इन तस्वीरांे का मूल्य आप ले लो।’ कहकर बुढ़िया को मूल्य दिया। 

बुढ़िया ने तस्वीरों को समेट कर कपड़े में लपेट कर थैले में रखा साथ ही एक कपड़े के टुकड़े में आलमगीर की तस्वीर के टुकड़े भी लपेट कर रख लिये। 

बुढ़िया दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में पहुँची और दरबान से कहा कि उसे आलमगीर से मिलना है। ‘क्या काम है अम्मी जान ? क्या बताऊँ बादशाह को कि तुम क्यों मिलना चाहती हो?’ दरबान ने कहा। ‘

‘नहीं मैं उन्ही को बताऊँगी। ’

दरबान ने बुढ़िया को दरबार में भेज दिया

‘ हाँ क्या अर्ज करना है बताओ बादशाह का’े।’ एक दरबारी ने बादशाह की आज्ञा पाकर बुढ़िया से कहा तो बुढ़िया ने कहा ,‘आलीजहाँ का अपमान एक लौंडी ने किया है मुझे सहन नही हुआ इसलिये दरबार में आई हूँ। 

एकदम सारे दरबार में आवाज उठी,‘ आलीजहाँ का अपमान! क्या कहती हो बुढ़िया किसकी जुर्रत हुई है यह ।’ बुढ़िया ने पूरी घटना नमक मिर्च लगाकर सिलसिले बार बादशाह को सुनाई और तस्वीर के टुकड़े आलमगीर के सामने रख दिये। 

‘इतनी तौहीन करने की उस काफिर की हिम्मत कैसे हुई ? मैं इसका बदला लूँगा ’।साथ ही उसने कहा ‘सेनापति’

‘ आज्ञा हूजूर’ 

’रूपनगर की एक अदना लड़की ने मेरी तौहीन की है रूपनगर पर सेना ले जाकर धावा बोलो उसकी ईट से ईट बजाकर उस बदजुबान लड़की को डोली में बैठा कर लाओ मैं उससे निकाह पढ़ाऊँगा।’ 

‘जो हुक्म जहाँपनाह ’सेनापति ने कोर्निश की और तुरन्त ही सेना लेकर रूपनगर की ओर प्रस्थान कर गया । साथ ही  आगे एक हरकारा नरेश विक्रम सिंह के पास फरमान लेकर भेज दिया।‘ सेना ने रूपनगर की ओर कूचकर दिया है अपनी पुत्री का डोला तैयार रखे जहाँपनाह आलमगीर की वह बेगम बनाई जायगी। ’

नरेश विक्रम सिंह ने जब फरमान पढ़ा तो काँप उठा। वह महल में इधर से उधर चक्कर काटने लगा। तरह तरह से अपने को समझा रहा था। वह अच्छी तरह जानता था कि मुगल सेना से वह टक्कर नही ले सकता। युद्ध का परिणाम पराजय ही है तब भी वे राजकुमारी को ले जायेगंे इससे अच्छा है उसे डोली में बैठाकर सम्मान से विदा कर दें। पहले भी तो कई राज कन्याओं का विवाह मुगल बादशाहों से हुआ है इसमें कुछ नया नहीं है अनहोनी नहीं है। 

जब राजकुमारी चंचल को ज्ञात हुआ कि पिता ने उसे मुगल सम्राट को सौंपने का निर्णय लिया है तो उसका अन्तर तक क्रोध से लाल हो गया। उसके ह्नदय में संताप की लहरें उठने लगी। वह राजपूत कन्या मुगल बेगम बनेगी उसे लेाग मुगलानी कहेंगे। नहीं यह कभी नही होगा । नहीं नहीं की गूँज पूरे राजमहल मैं गूँज उठी ‘मैं मुगल बादशाह के यहाँ नही जाऊँगी।’ 

उसकी गम्भीर वाणी की नहीं पिता के कानों तक पहँुची। पिता चचंल के पास आये और बोले ,‘चंचल बेटी हम स्वयं कहाँ तुम्हें भेज रहे हैं पर रूपनगर की स्वतन्त्रता इसकी जनता के भले के लिये आवश्यक है कि तुम औरगंजेब की बेगम बनना स्वीकार कर लो । हम पर विपदाऐं टूट पड़ेगी। मुगल बादशाह रूपनगर का विनाश कर देगा। रक्त की नदियाँ बह जायेंगी।’

‘ बह जाने दीजिये पिताजी रक्त की नदी मैं भी उसमें स्नान कर लूँगी। उसकी आवाज में गरज एक राजपूतनी की ललकार थी ।’

‘पर मैं तेरी रक्षा नही कर पाऊँगा, मुझ में इतनी शक्ति नहीं है ।’हताशा के स्वर मैं नरेश विक्रम ने कहा ‘नर सहंार भी होगा और तुझे तो वे तब भी ले जायेंगे।’ 

‘मुझे मेरी इच्छा के विरूद्ध कैसे ले जा सकते हैं मैं राजपूत कन्या हूँ। राजपूतनी की इच्छा के विरूद्ध तो देवता भी कुछ नही कर सकते। हमारे पास तीन सहेलियंा तो सदा रहती है अग्नि विष और तलवार इनके सहारे ही क्षत्राणियाँ अपनी रक्षा करती हैं। आप आराम कीजिये मैं अपनी रक्षा अपने आप कर लूँगी।’ 

कुछ देर नरेश विक्रम सिंह चचंल के कमरे में खड़े रहे उसे समझाना चाहा तो उसने स्पष्ट शब्दों में कह दिया।‘ नही पिताजी कुछ नही मैं अपना निर्णय नही बदल सकती।’ 

नरेश विक्रम सिंह चिंताग्रस्त चचंल के कमरे से निकल आये। चचंल इधर से उधर चक्कर काटती सोच रही थी अपने धर्म की रक्षा कैसे करे । सामने उसके खरीदे चित्र रखेे थे। सबसे ऊपर राजसिंह का चित्र था राज सिंह वह बुदबुदाई। 

‘राज सिंह आप महाराणा  प्रताप के वंशधर हो। ’

वह टकटकी लगार राजसिंह के चित्र को देख रही थी आप मेरी सहायता नही करोगे आपके पूर्वजों ने तो क्षत्रिय धर्म की रक्षा के लिये प्राण न्यौछावर किये थे। रूक्मणि के सामने भी तो यही समस्या आई थी रूक्मणि ने कृष्णा को खत लिखा था। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई मन शान्त हो गया और राज सिंह को पत्र लिखने बैठ गई। पत्र लिखकर अपनी विश्वास पात्र पत्रवाहक को तुरन्त रवाना कर दिया।

राणा राज सिंह ने जब चचंल का पत्र पढ़ा तो उनके क्षत्रिय रक्त में उबाल आ गया। चेहरा क्रोध से रक्तिम हो गया उन्होनें पत्र वाहक से कहा राजकुमारी से कहना उनका पत्र ठीक स्थान पर पहुँच गया है वे निश्चित रहें। राजसिंह ने पत्र की तिथि देखी मात्र एक ही दिन का समय है तुरन्त सेना को तैयार होने की आज्ञा दे कूच कर दिया। 

पत्र वाहक ने राजकुमारी को संदेश दे दिया था। मुगल सेनापति रूपनगर पहुँचा तो उसके स्वागत में द्वार खोल दिये गये और किसी प्रकार को विरोध किये राजकुमारी चचंल का डोला उसके सुपुर्द कर दिया गया। वह मन ही मन उलझन में भी था। आशा के विरूद्ध बहुत ही आसानी से राजकुमारी को सौंप दिया गया। सेना के साथ राजकुमारी का डोला चल रहा था। अरावली की पहाड़ियों के बीच से सेना गुजर रही थी। राजकुमारी बार बार पर्दा उठाकर देख रही थी। वह देखती और पर्दा गिरा देती। 

एकाएक पहाड़ियों से बडे़ बड़े पत्थर बरसने लगे। मुगलिया फौज पत्थरों की बौछार से बचने के लिये भागी आगे रास्ते पर बड़े बड़े पत्थर थे उन्होंने रास्ता बंद कर दिया था। मुगल सेनापति ने पीछे लौटने के लिये कहा लेकिन रास्ता वहाँ भी तब तक पत्थरों से बंद हो चुका था मुगल सेना कैद होकर रह गई थी न आगे जा सकती न पीछे । ऊपर से पत्थर बरस रहे थे और बरसाने वाले दिख नही रहे थे। 

सेना के बीच से आवाजें उठ रही थी कहर कहर आह ओह मर गया। हजारों मुगल सैनिक पत्थरों से कुचल कर मर गये बचे किसी तरह भाग गये। 

राजकुमारी चचंल राणा राजसिंह के समाने उपस्थित हुई राणा राजसिंह ने कहा,‘राजकुमारी मुगल सैनिक भाग चुके हैं अब आपका डोला पिता के पास पहुँचाया जा रहा है’

‘ नहीं महाराणा सिंह नहीं मैं पिता के घर वापस नही जाऊँगी।’ राजकुमारी ने कहा,‘ मुझे तो पिता ने एक मुगल को सौप दिया है अब नही जाऊँगीं। मेरा डोला आपके सामने उतरा है मै अब यहीं रहना चाहूँगी ’कहकर राजकुमारी ने अपना चेहरा झुका लिया। चेहरा रक्तिम हो गया। 

कुछ क्षण राजसिंह चुप रहे फिर बोले ,‘स्वागत है राजकुमारी राजसिंह के महल में आपका स्वागत है ।’’ डोला राजसिंह के महल की ओर चला और जनता में राणा राजसिंह की जय घोष होने लगी।


डा॰ शशि गोयल


Tuesday, 30 July 2024

desh videsh ki kahaniyan kath ka putla

 काठ का पुतला

एक जमाने की बात है एक छोटे से गाँव में एक बढ़ई मिस्त्री रहता था। उसका नाम था जिपेट्टो। वह काठ के खिलौने बनाया करता था। अपने कार खाने में ही वह रहता था। उसने एक बिल्ली और एक लाल मछली पाल रखी थी। एक दिन रात के वक्त एक थके माँदे मुसाफिर ने जिसका नाम जिमी क्रिकेट था। जिपेट्टो के कारखाने में चुपके से घुस कर बसेरा लिया। बच्चे जिपेट्टो को बहुत चाहते थे क्योंकि वह उनके लिये अच्छे अच्छे खिलौने बनाता टूटे खिलौने की मरम्मत कर देता और उन पर नया रंग चढ़ा देता था। जिपेट्टो था तो गरीब मगर उसकी छोटी सी दूकान में बड़ी अजीब चीजें जैसे घड़ियां बक्स आदि जमा थी।

जिस रात को जिमी क्रिकेट ने उसकी दूकान में बसेरा लिया था। उसी रात जिपेट्टो ने एक काठ का पुतला तैयार किया था। जिसकी शक्ल एक लड़के की सी थी। उसकी सभी बातें तो ठीक थी मगर नाक बहुत लम्बी और नुकीली थी। वैसी नाक किसी लड़के की नहीं होती। जिपेट्टो ने उस पुतले का नाम रखा था- पिनोकियो। जिमी क्रिकेट अलग चूल्हे पर बैठा बड़े चाव से उस पुतले को देख रहा था। उसमें लगे एक तार को खींच देने या घुमाने फिराने से वह चलने फिरने लगता नाचता बाजा बजाता और गाता भी। 

जिपेट्टो अपने मन में सोच रहा था कि क्या ही अच्छा होता अगर इस पुतले में जान होती। उस समय उसकी दूकान की खिड़की से आसमान में शुक्रतारा चमकता दिखाई दे रहा था। वह तारा सबकी मनोकामना पूरी करता है। जिपेट्टो ने अपनी मनोकामना पूरी करने के लिये शुक्रतारा से प्रार्थना की कि पिनोकियो एक असली लड़का हो जाय। इसके बाद वह सोने चला गया। 

जिमी क्रिकेट दूर से ही यह सब तमाशा देख रहा था। जिपेट्टो के सो जाने के बहुत देर बाद तक भी उसे नींद नहीं आयी। अकस्मात् उसने देखा कि जिपेट्टो की खिड़की से शुक्रतारा प्रकाश आ रहा है। उस प्रकाश में एक सुन्दर परी आती दिखायी दी। परी के आने के साथ मधुर संगीत भी सुनाई दे रहा था। वह नीलम परी थी। उसका काम यही देखना है कि आदमियों को उनके अच्छे कामों का फल मिले। वह उस रात को जिपेट्टो की मनोकामना पूरी करने आयी थी। उसने सोये हुए जिपेट्टो के पास जाकर धीरे से उसके कान में कहा कि तुमने दूसरों को बहुत आनन्द दिया है, इसलिये तुम्हारी कामना जरूर पूरी होगी। इसके बाद नीलम परी पिनोकियो के पास गयी और उसे अपनी चमकती छड़ी छुआकर उसमें जान डाल दी। वह आँखें मटकाते हुए उठा जैसे सोकर जागा हो फिर अपनी लकड़ी की बाहों को ऊपर उठाकर उंगलियों को हिलाया। 

उसने खुश होकर कहा- ओहो अब मैं चल फिर सकता हुँ। नीलम परी ने मुस्कराते हुए कहा- हाँ हाँ पिनोकियो अब तुम चल फिर और बोल सकते हो। जिपेट्टो को एक लड़के की जरूरत थी। इस लिये आज रात को मैनें तुम्हें जान दी है। 

पिनोकियो ने प्रसन्न होकर कहा- तो अब मेैं एक सच्चा लड़का हूँ? नीलम परी ने कहा- ऐसा कोई जादू नही है जो किसी को सच्चा मनुश्य बना दे। मैनें तुम्हें जान दे दी है। बाकी सब तुम्हें करना है। पिनोकियो ने बड़ी नम्रता से पूछा- बताओ मुझे क्या करना चाहिये। मैं एक सच्चा लड़का बनना चाहता हूँ। 

नीलम परी ने कहा- तुम अपने को बहादुर सत्यवादी और निस्वार्थी साबित करो, जिपेट्टो के लिये अच्छे लड़के बनो ताकि उसे तुम पर गर्व हो। तब तुम एक सच्चा लड़का बन सकते हो। पर नीलम परी अच्छी तरह समझ रही थी कि वह पिनोकियो को बहुत कठिन काम करने को दे रही है। उसने पिनोकियो से कहा कि संसार तरह तरह के प्रलोभनों से भरा है तुममें भले बुरे की पहचान करने का ज्ञान होना चाहिये। 

पिनोकियो के यह पूछने पर कि भले बुरे की पहचान कैसे होगी, परी ने कहा कि तुम्हारा अन्तःकरण भले बुरे का अन्तर बतला देगा। पिनोकियो ने पूछा- यह अन्तःकरण क्या चीज है ? जिमी क्रिकेट दूर बैठा दोनों की बातचीत सुन रहा था। अब उससे रहा नहीं गया। वह उचक कर उनके पास चला गया और बातचीत में शामिल हो गया। उसने कहा- अन्तःकरण एक शान्त क्षीण स्वर है जिसे आदमी ध्यान से नहीं सुनते। इसीलिये आज दुनिया में तमाम गड़बड़ी मची हुई है। पिनोकियो ने बड़े आग्रह से पूछा- तो क्या आप मेरे अन्तःकरण हैं? उसकी बात सुन कर जिमी सकपकाया पर नीलम परी ने संभाल लिया। उसने मुस्काराते हुए जिमी से कहा- तुम दुनियादार आदमी मालूम होते हो। क्या तुम पिनोकियो का अन्तःकरण बनना पसन्द करते हो? 

इसके बाद नीलम परी ने अपनी छड़ी छुआकर जिमी को पिनोकियो का अन्तःकरण बना दिया और कहा कि मैं पिनोकियो को तुम्हारे हाथों में सौंपती हूँ। तुम अपनी सलाह और अनुभव से इसकी मदद करना ताकि यह सच्चा लड़का बन जाय। जिमी ने कहा कि जहाँ तक हो सकेगा मैं पिनोकियो की मदद करूंगा। नीलम परी ने पिनोकियो से कहा- देखो तुम एक अच्छे लड़के बनने की कोशिश करना और अपने अन्तःकरण से पूछ पूछकर आगे पैर रखना। इसके बाद वह वहाँ से चली गयी। 

परी के चले जाने के बाद जिमी ने पिनोकियो से कहा कि जब तुम किसी तकलीफ में पड़ना तो सीटी बजाकर मुझे बुला लेना। सीधे और तडं रास्ते से चलो और अगर तुम्हारा पैर कहीं फिसलने लगे तो सीटी बजाकर मुझे बुला लेना। यह कहकर वह उछल उछल कर नाचने लगा। उसको नाचते देख पिनोकियो भी नाचने लगा। आखिर खुशी के मारे वह अपने को संभाल न सका और धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। 

आवाज सुनकर जिपेट्टो जाग पड़ा पूछा- कौन है? पिनोकियो ने कहा- मैं हूँ। जिपेट्टो ने ख्याल किया शायद कोई चोर घुसा है और अपनी बिल्ली को जगाकर कहा कि इसे पकड़ना चाहिये। पर बाद को अपने पुतले को बेंच पर से जमीन पर पड़ा देख उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पिनोकियो को उठाकर बेंच पर रखा और उससे पूछा कि तुम नीचे कैसे चले आये। उसने कहा- गिर पड़ा था। अपने पुतले की बातचीत करते देख जिपेट्टो को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ। पर उसे विश्वास था कि वह सपना नहीं देख रहा था। उसका पुतला सचमुच बोल रहा था। इससे उसे इतनी प्रसन्नता थी कि उससे हँंसते या रोते नहीं बनता था। खुशी के मारे वह बाजा बजाने और नाचने लगा। 

इसके बाद वह पिनोकियो के सोने के लिये इन्तजाम करने चला गया। इधर पिनोकियो ने देखा कि एक मोमबत्ती जल रही है। उसे उसकी खूबसूरत लपट बड़ी अच्छी लगी और हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ लिया जिससे उसकी एक उंगली जल गयी। फिर भी वह बहुत खुश था। जिपेट्टो पिनोकियो की जलती उंगली देखकर घबराया और उसे पानी के कटोरे में डुबाकर आग को बुझाया। उसे डांटते हुए कहा- खबरदार आग से कभी न खेलना। तुम लकड़ी के बने हो। जाकर चुपचाप सो रहो। 

Saturday, 20 July 2024

jadui batta

 चंद्र ग्रहण

एक वृद्ध विधवा मृत्युशैया पर लेटी थी। उसके दोनों पौत्र पास ही खड़े थे। बच्चों वह बोली, और दादियों की तरह मैं तुम्हारे लिये सोना-चांदी तो छोड़ नहीं जा रही हूँ। बड़े के लिये सिल और छोटेे के लिये बट्टा छोड़े जा रही हूँ यह कहकर मर गई। बड़े भाई ने सोचा मैं इस सिल को लेकर क्या करूँगा ? मुझे कोई रसोई में नौकरी तो करनी नही है। उसने सिल रसोई में ही छोड़ी और परदेश मेहनत करके कमाई करने लगा। और बड़ा आदमी बन गया।

छोटे भाई को दादी पर अटूट श्रद्धा थी, जरूर बट्टे को कोई न कोई उपयोग जरूर होगा छोटे ने सोचा नही तो दादी क्यो देती? यह सोच कर वह जहाँ भी जाता उसे साथ ले जाता। अड़ोसी-पड़ोसी खूब हंसते। वह लकड़ी बेच कर अपनी रोटी का गुजारा करने लगा परंतु गरीब ही रहा।

एक दिन जब वह लकड़ी बीन रहा था एक सुर्पिणी वहाँ आई। छोटा लड़का डर के मारे पेड़ पर चढ़ गया। सर्पिणी बोली, डरो नहीं मैं तो बस तुम्हारा बट्ट़ा उधार लेने आई हूँ। इसका क्या करोगी? छोटे भाई ने पूछा, मेरे पति अभी ही मर गये है सर्पिणी बोली अगर उनके नथुनों से यह जादुई बट्टा लगा दिया जाय तो वह फिर से जीवित हो जायंेगे।’

‘ मैं नही जानता कि यह बट्टा जादुई है ?’छोटे भाई ने आश्चर्य से पूछा,

‘मेरे साथ आओ तुम्हें पता चल जायेगा ,’सर्पिणी ने कहा, वह उसके पीछे पीछे घने जंगल में गया वहाँ एक सर्प मरा पड़ा था। उसने अपना बट्टा उसके नथुनों से लगाया वह फौरन जीवित हो गया।

‘इस बट्ट़े की शक्ति इसकी सुगंध में है’। सर्पिणी ने कहा,‘ परंतु यह तब ही तक रहेगी जब तक कि तुम किसी से बताओगे नहीं।’ तब दोनों छोटे भाई को धन्यवाद कह चले गये।

छोटा भाई गाँव के लिये चला रास्ते में उसे एक कुत्ते का शव मिला। उसे मरे देर हो चुकी थी इसीलिये उसकी देह अकड़ गई थी। उसने जैसे ही उसके नथुने से अपना बट्टा लगाया कुत्ता उछल कर खड़ा हो गया। छोटे भाई ने उसका नाम अकड़ रखा। अकडू तब से अपने जीवनदाता का स्वामिभक्त वफादार साथ हो गया।

शीघ्र ही छोटा भाई मृत्युंजय वैद्य के नाम से प्रसिद्ध हो गया। किसी को भी यह पता नहीं लग पाता था कि यह बट्टा है जिसके कारण रोगी ठीक हो जाते हैं। वे समझते वह बट्टा केवल दवा पीसने के लिये रखता है। कुछ दिन बाद राजा की लड़की का देहांत हो गया। राजा ने छोटे भाई को बुलाया छोटे भाई ने राजकन्या को जीवित कर दिया। बदले में राजा ने राजकुमारी की शादी छोटे भाई से कर दी।

एक दिन छोटे भाई ने सोचा अगर यह बट्टा मृत्यु को जीवन में बदल सकता है तो बुढ़ापे को भी जीत सकता है। यह सोचकर प्रतिदिन एक बार खुद सूंघता एक बार राजकुमारी को सुंघा देता। राजकुमारी सोचती यह वैद्यराज की कोई सनक होगी। कुछ वर्ष बाद छोटे भाई को लगा कि उसने बुढ़ापे की दवा ढूँढ़ ली है ,क्यांकि वह और राजकुमारी जरा भी उम्र में नहीं बढ़े थे। लेकिन चंद्रमा को दोनों मृत्युलोक के निवासियों से जलन होने लगी। सूर्य तक बुड्डा हो रहा है चंद्रमा ने सोचा प्रतिदिन शाम को वह लाल भूरा सा कुम्हलाया हो जाता है वह बट्टा चुराने का मौका देखने लगा।

एक दिन बट्टा कुछ भीग गया इसीलिये छोटा भाई उसे धूप में बैठकर सुखाने लगा। ‘मेरे सरताज’, राजकुमारी ने हठ करते हुए कहा ,‘आप एक राज्य के उत्तराधिकारी हैं। आप एक बट्टे को लेकर धूप में सुखाने बैठे रहें, कुछ अच्छा नही लगता। यह काम सैनिकों पर छोड़ दो।’

 राजकुमारी ने इतनी हठ की कि उसे छोड़ना ही पड़ा लेकिन उसे किसी का विश्वास नहीं था। इसलिये वह अकडू को वहाँ पर बिठा अंदर आ गया। अकडू बट्टे को देखने लगा। चंद्रमा को मौका मिला और वह बट्टा चुराने आकाश से नीचे आया। सूर्य की तेज रोशनी में धुंधलाया चांद अकडू को दिखाई न दिया और चांद बट्टे को लेकर भागा ,बट्टे की खुशबू के सहारे वह चंद्रमा के पीछे भागा।

तब से लगातार कुत्ता चंद्रमा का पीछा कर रहा है। रात में तो उसे चंद्रमा दिखाई देता है। परंतु दिन में वह बट्टे की सुगंध के सहारे पीछा करता है। क्यांेकि रातदिन वह बट्टे को सूंघता रहता है इसलिये वह अमर हो गया है। कभी वह उसे पकड़ लेता है और निगलने की कोशिश करता है लेकिन कठोर होने की वजह से निगल नहीं पाता और उसे उगलना पड़ता है फिर से दौड़ शुरू हो जाती है।


Monday, 15 July 2024

Anokha abhiyan kahani

 अनोखा अभियान 


5 सितम्बर 1970 शनिवार डा॰ ज्यूडिमर उम्र 29 साल और ओसवाल्ड औल्ज उम्र 27 साल दोनों ने केन्या पर्वत की चढ़ाई सम्पूर्ण की ही थी विजय दर्प से उन्होने चारों ओर देखा और फिर 5000 मीटर नीचे हरी धरती देखी। चार साल से वे दोनों पर्वत चढ़ने का अभियान चलाये हुए थे पर इस पर्वत की सुन्दरता अपूर्व थी। पर्वत केन्या की दो चोटियों में बेतियन चोटी 5199 मीटर ऊँची थी इसकी चढ़ाई एकदम सीधी होने की वजह से कुछ ही पर्वतारोही इसकी चोटी पर पहुँच पाते थे। इन दोनों से पूर्व जाम्बिया और दो अमेरिकी व्यक्तियों का एक दल चढ़कर लौटा था। और करीब 750 मीटर नीचे आराम कर रहा थ। 

दोनों आस्ट्रियन युवकों ने बैतियन चोटी के फोटो लिये और 2 बजे नीचे उतरना प्रारम्भ किया। एक दूसरे में बंधे 30 मीटर नीचे एक समतल स्थान पर उतरने के बाद ओल्ज रस्सी बाँधने के लिये चट्टान तलाशने लगा। ज्यूडीमर भी रस्सी बाँध कर एक स्थान पर झुक कर नीचे उतरने का रास्ता देखने लगा। 

एकाएक चीख उमरी और ओल्ज वहाँ अकेला रह गया। ज्यूडीमर के नीचे की चट्टान खिसक गई थी। ओल्ज रस्सी के लिये झपटा क्योकि अभी वह ऊपर ही थी। रस्सी हाथ में आ गई और सरकती गई उसे महसूस हुआ कि उसका माँस जल रहा है और दर्द हो रहा है उसने अपनी एड़ी कस कर जमीन में गाड़ दी और बाद में रस्सी लपेट कर ज्यूडीमर को गिरने से रोकने की कोशिश करने लगा। 

धड़़कते दिल से ओल्ज ने एक मजबूत चट्टान के साथ रस्सी बाँधी और उतर के दोस्त के समीप गया। ज्यूडीमर एक चट्टान के उभरे किनारे पर बैठ गया था। उसका सिर लहूलूहान हो रहा था। ओल्ज ने देखा ज्यूडीमर के सीधे पैर की एक हड्डी टूट कर बाहर निकल आई थी और करीब 5 संेटीमीटर हड्डी का टुकड़ा बाहर टूटा पड़ा था। जाघ में से तेजी से खून बह़ रहा था 

ओल्ज ने जल्दी से एक प्लास्टिक पट्टी उस स्थान पर बाँध दी। ‘मेरा समय आ गया,’ ज्यूडीमर बोला ओल्ज कुछ न कहकर काम करता रहा। उसने ज्यूडीमर के घाव साफ किये और ज्यूडीमर को कसकर चट्टान से बाँध दिया। जिससे वह गिर न पड़े वह देख रहा था सहायता शीघ्र संभव नही है किसी भी क्षण ज्यूडीमर मृत्यु पथ पर बढ़ सकता है पर उसने वही किया जो उस समय कोई कर सकता था। मै दवाई और सहायता के लिये आदमी ले कर आता हूँ। ‘कोई आशा है?’ ज्यूडीमर ने निरशा से सिर हिलाते हुए कहा।‘ ‘देखता हूँ पूरी कोशिश करूंगा।’ 

ठंड बढ़ने लगी थी। ओल्ज ने अपनी नीचे की दोनों जैकेट और कम्बल ज्यूडीमर को ओढ़ा दी और सोने के बैग में लिपटाकर उसके पास खाने के लिये फल रखकर उसे रस्सी से बाँधकर उससे विदा ले नीचे चल दिया। 

ओल्ज की घायल हथेली रस्सी पकड़ने में बहुत तकलीफ दे रही थी। दर्द की वजह से उसे रूकना भी पड़ रहा था। बर्फ की वजह से चट्टाने फिसलनी हो रही थी और बर्फ इतनी अधिक पड़ रही थी कि वह एक दो कदम से आगे देख नही पा रहा था। पर ऊपर अकेले पड़े ज्यूडीमर का ध्यान उसे निरन्तर बढ़ा रहा था। करीब छः बजे वह नीचे ठहरे हुए दल के समीप पहुँचा और उसे सब बताया। 

एक जाम्बियन 4800  की ऊँचाई पर स्थित टॉप हट पर दवाइयों के लिये और सौर्य ऊर्जा से संचालित रेडियो पर संदेश देने के लिये ढाई घंटे की निरन्तर यात्रा कर पहुँचा और नारों मोरू गाँव की पुलिस को इतला दे दी। 

एक पर्वतारोही बचाव दल और केन्या पुलिस पर्वतारोही संस्था के उत्साही सदस्य रार्बट चैम्बसे की अध्यक्ष पाँच घंटे के अंदर ऊपर तेजी से चढ़ रहे थे। दुर्भाग्य से उस समय उपस्थित अधिकतर व्यक्ति काफी दिन से पर्वत पर चढ़े नही थे या चढ़ने के अयोग्य थे।

लेकिन ज्यूडीमर को वहाँ मरने के लिये छोड़ा नही जा सकता है उन्होनें निश्चित किया कोशिश तो करनी ही है। उधर सुबह चार बजे तक वह जाम्बियान दवाईयां लेकर ओल्ज के पास पहुँच गया। एक अमेरिकन रिचार्ड साइक के साथ वे और ओल्ज ऊपर चल दिये। इस समय तक अठारह पर्वतारोही केन्या पुलिस के सिपाही और चार अन्य अधिकारी ऊपर ज्यूडीमर की सहायता के लिये चढ़ रहे थे एक हेलीकोप्टर भी रवाना हो गया था। 

लेकिन ओल्ज को वापस लौटना पड़ा सारा दिन बर्फ गिरती रही और वह चढ़ गया सात सितम्बर चार तीस पर दोपहर ओल्ज ने उस चट्टान के पास पहुँच कर आवाज लगाई पर कोई आवाज नही आई। तीन घंटे से अकेले पड़े ज्यूडीमर को बार बार लग रहा था कि वह नीचे गिर पड़ेगा। वह चेतनाहीन हो गया। 

ओल्ज ने ज्यूडीमर को देखा बुदबुदाया अभी जीवित तो है कम से कम मै सोच रहा था कहीं नीचे न गिर पडे़। उसने एक मार्फीन का इजैक्शन लगाया। ब्रूसों ने रेडियो से बचाव दल से सम्पर्क चाहा कि ज्यूडीमर अभी जीवित है लेकिन सम्पर्क नही हो पाया और वे स्टेªचर का इंतजार करने लगे। 

प्रातः काल एक हैलीकोप्टर उतरा लेकिन हेस्टिग को रस्सियों के लिये फिर वापस जाना पड़ा। ओल्ज ने एक इंजैक्शन ज्यूडीमर के और लगाया और उसके टूटी हड्डी के नीचे कैमरा लकड़ी की तरह लगाकर बाँध दिया ज्यूडीमर को बंडल की तरह बाँधकर एक व्यक्ति के पीछे लाद दिया। लेकिन ज्यूडीमर एक दम जोर से कराह उठा। ओल्ज चिल्लाया उसे नीचे रख दो वह मर जायेगा। नीचे से आने वाला दल ग्लूकोज बगैरह लाया उसी ने उस दोपहर ज्यूडीमर की जान बचाई।

बुधवार को हैलीकोप्टर की घरघराहट सुनाई दी। सबके दिल में आशा जगी कि अब ज्यूडीमर बचा लिया जायेगा। यद्यपि यह सभी जानते थे कि हैलीकॉप्टर मे तो ज्यूडीमर को ले जाया नही जा सकता। परन्तु रस्सियों से बाँधकर शायद कुछ उम्मीद बन सके। लेकिन उसी समय एक धमाका हुआ और हैलीकॉप्टर उभरी चट्टान से टकरा गया और हेस्टिग वहीं समाप्त हो गया। ज्यूडीमर का दिल डूबने लगा उसने अपना मुँह अपने बैग में छिपा लिया। 

उधर ज्यूडीमर के पिता भी अपनी पूरी कोशिश में थे। बुधवार की रात बहुत कष्टप्रद रही। बुखार से तपता ज्यूडीमर पानी पानी चिल्लाता रहा लेकिन पानी होठों से लगाते ही फेंक देता। 

उस दिन और उसके दूसरे दिन 34 पर्वतारोही ज्यूडीमर को नीचे लाने की कोशिश करते रहे। तीखी हवायें और काटती सर्दी मे लड़ते वे ज्यूडीमर को 120 मीटर नीचे लाने में सफल हो गये। 

शुक्रवार की सुबह आस्ट्रियन बचाव दल नैरोबी पहुँच गया एक पुलिस हवाई जहाज में भरकर वे नानयूकी पहुँचे आखिरी पन्द्रह किलोमीटर उन्होने पैदल पार करने थे। आधी रात को पहुँच कर वे वहाँ बाकी यात्रा की तैयारी करने लगे। 

शनिवार सुबह आस्ट्रियन बचाव दल ने चढ़ना शुरू किया। ऊपर से ज्यूडीमर को लेकर उतरने वाले किसी न किसी प्रकार 120 मीटर नीचे और उतार लाये। लेकिन अब उनकी हिम्मत जबाब दे गई थी साथ ही बरसात भी होने लगी। ज्यूडीमर का चेहरा प्लास्टिक के कपड़े से ढक दिया। 

कुछ देर बाद ओल्ज फुसफुसाया ,‘अब हालत नाजुक है’। एक बोला ,‘कहीं इतनी सब मेहनत बेकार न जाय।’लेकिन ज्यूडीमर ने तभी आँखे खोली और धीमे स्वर में बोला,‘यात्रा बेकार नही जायेगी। ’

उन सबमें एक नया उत्साह भर गया और तेजी से वे ज्यूडीमर के बंडल को लटकाये नाइलॉन की रस्सियों पर लटकते 200 मीटर नीचे और उतर आये। फिर फिसलनी तिरछी चट्टानें आयीं बर्फ की टूटी चट्टानंे पार करते 10 बजे के करीब उन्हें कामी की रोशनियों चमकती दिखाई दीं । आस्ट्रियन पर्वतारोहियो के लिये यह अनोखा पर्वतारोहण था जिसे में उन्होने अफ्रीका की सबसे खतरनाक चोटी की चढ़ाई केवल 54 घंटों में की थी और उसमें भी एक अधमृत व्यक्ति को उतार लाये थे। 

अभी ज्यूडीमर को तो आपरेशन बगैरह से गुजरना था लेकिन उसने सब को गदगद कंठ से धन्यवाद दिया उसकी आँखे भर आयी। लेकिन उसके पिता ने रोते हुए मृत पाइलट हेस्ंिटग को याद करते हुए कहा,‘ मै अपना सिर उस महान आत्मा के सम्मान में झुकाता हूँ जिसने उस व्यक्ति के लिये अपना जीवन दान कर दिया। जिसे देखा तक नही। मेरे घर से उसका नाम कभी नही मिटेगा। ’