Monday, 8 September 2025

Do bhai

 दो भाई

बहुत समय पहले एक गाँव में दो भाई रहते थे। बड़े भाई का विवाह हो चुका था लेकिन छोटा भाई अभी कुँवारा था, तथा बहुत सीधा सादा भी था।

छोटा भाई ने खेत में ज्वार बोया था, लेकिन पूरे खेत में केवल एक ज्वार का पौधा उगा। यह पौधा खेत के बीचोंबीच था। उसे वह पौधा इतना सुंदर लगा कि वह पूरे जतन से उस पौधे की देखरेख करने लगा। पौधा जल्दी बड़ा हो गया और उसमें ज्चार का फूल एकदम बड़ा सा लगा। धीरे धीरे फूल में ज्वार लगने लगा। दाने बहुत बड़े बड़े थें लेकिन जैसे ही वह पकने लगा एक अदभुत चिड़िया आई और ज्वार को तोड़ कर ले गयी। सीधा सादा भाई हाथ हिलाता चिड़िया के पीछे भागा। भागते भागते वह बहुत दूर निकल आया धीरे धीरे रात हो गयी और चिड़िया ने दिखाई देना बंद कर दिया। अब छोटे भाई ने अपने चारों ओर देखा। वहाँ बड़े बड़े पहाड़ घने जंगल थे। चीते, शेर, भेड़िया गुरगुरा रहे थे। उसे एक विशाल वृक्ष दिखाई दिया, उस पर चढ़कर पत्तियों के बीच छिप कर बैठ गया।

पेड़ के नीचे कुछ ही देर बाद तीन मित्र चीता, भेड़िया और बंदर आकर एकत्रित हुए। चीते बोला, आज बहुत आराम महसूस हो रहा है। भाई बंदर कोई कहानी सुनाओं। बंदर बोला, कोई कहानी तो आती नहीं है हाँ एक मजेदार किस्सा सुना सकता हूँ। भेड़िया और चीता किस्सा सुनने केा तैयार हो गये तो बंदर ने किस्सा सुनाना शुरू किया।

दक्षिण पूर्व में करीब पचास मील दूर एक छोटा सा गाँव है। वहाँ एक लड़की को एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज तो बहुत सरल है लेकिन कोई जानता नहीं है। उसके पिता ने घोषणा की है कि जो भी इसका इलाज कर देगा उसकी शादी उस लड़की से कर दी जायेगी। यदि इस पेड़ की छाल खुरच कर उसकी तीन गालियाँ बना कर लड़की को खिला दीं। जाय तो वह ठीक हो जायेगी।

चीता और भेड़िया ने आह भरी काश हम आदमी होते तो शादी का कितना अच्छा अवसर था।छोटे भाई ने बैठे बैठे उस डाल पर में इतनी छाल उतार ली कि करीब तीन गोलियाँ बन जाय। तीनों जानवर कुछ देर तक और गपशप करते रहे फिर चले गये।

प्रातः होते ही छोटा भाई पेड़ से उतरा गोलियाँ लेकर गाँव की ओर चल दिया रास्ता पूछते पूछते गाँव पहुँचा। बीमार लड़की के घर पहुँच उसे गोली खिला दी। लड़की तुरंत अच्छी हो गयी। पिता ने तुरंत छोटे भाई की शादी उस लड़की से कर दी।

उधर बड़े भाई को छोटे भाई की कमी बहुत खल रही थी। क्योंकि वह घर के और खेत के सभी भारी काम छोटे भाई से करवाता था। बड़ा भाई पत्नी से बोला, छोटा न जाने कहाँ धूम रहा है उसे घर आकर काम धाम करना चाहिये। यह कहकर वह छोटे भाई को ढूँढ़ने निकला। चलते चलते रात हो गयी और वह भी उसी पेड़ के नीचे पहुँचा। जानवरों के डर से वह भी पेड़ पर छिप कर बैठ गया।

तीनों जानवर पहले दिन की तरह एकत्रित हुए। चीते ने कहा, बंदर भाई कोई किस्सा सुनाओ। बंदर बोला कल कोई पेड़ पर छिप कर हमारी बातें सुनकर धनवान बन गया, आज पहले देख लें कोई यहाँ छिपा तो नहीं है। बड़े भाई ने जब यह सुना तो डर से इतने जोर से कांपने लगा। कि पेड़ जोर जोर से हिलने लगा। बंदर तेजी से पेड़ पर चढ़ा और बड़े भाई को जमीन पर गिरा लिया और तीनों जानवर उस पर टूट पड़े और उसे मार कर खा गये।


Wednesday, 3 September 2025

Khoya uunt

 खोया ऊॅट

बीजापुर के महाराजा वीर सेन बहुत अधक बुद्विमान एंव कुशल शासक थे। उनके कुशल नेतृत्व मंे चार बुद्विमान मंत्रियों का बहुत हाथ था। परन्तु राजा को अपने ऊपर बहुत विश्वास था। वह कभी कभी अपनी बात क आगेे मंत्रियों की नहीं चलने देता था। एक बार उसने जनता पर चाहे अमीर हो गरीब एक महल बनवाने के लिये कर लगाने की कही। मंत्रियों ने स्पष्ट रूप से कहा यह जनता पर अत्याचार होगा। जैसा कि उन्हे आशा थी राजा अपनी इच्छा के खिलाफ बात सुनकर बहुत गुस्सा हुआ। राजा ने सोचा उसके महल को ये मंत्री लोग बनने नहीं देना चाहते हैं। उसने उन चारों को उसी क्षण देश निकाला दे दिया।

चारों मंत्रियों ने जन साधारण से कपडे पहने और शहर से बाहर चल दिये। लक्ष्यहीन चलते चलते वे एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे पहुंचे। वहां से चार रास्ते जाते थे पहले कि किसी एक पर चलें वे पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिये बैठ गये। बैठे इधर उधर की बात कर रहे थे। बातों ही बातों मे इधर उधर ध्यान दिया तो लगा कि रात को इस स्थान पर बारिश हुई है और एक अकेला ऊंट उस रास्ते से गुजरा है चारों उस ऊंट के पदचिन्ह को देखकर ऊंट का वर्णन करने मंे लग गये। अभी वे इस विषय में बात ही कर रहे थे कि एक ऊंट वाला रोता चीखता आया । उसका ऊंट खो गया था उसने उन लोगो से पूछा कि क्या उन्हांेने उसका ऊंट देखा है ?

पहले मन्त्री ने कहा “ क्या तुम्हारा ऊंट बांये पैर से लंगडाता था”

“ हां हां हजूर वह लंगडाता था क्या आपने उसे देखा है ?”

तभी दूसरा मंत्री बोला,‘ मेरा ख्याल है वह केवल लंगडा ही नही था उसकी पूंछ भी नही थी।’

“हां बिलकुल वही है मेरा ऊंट उसके एक आंख भी नही हैं आप लोग बता नही रहे हैं कि वह कहां है तो जरूर आप लोगो ने उसे चुराया है”

अब चौथा बोला “ हम सच कह रहे हैं हमने उसे देखा तक नहीं है, चुराने की बात तो बहुत दूर रही हां एक बात बताना भाई वह बहुत कमजोर भी था”

“ हे भगवान “ ऊंट वाला बोला,‘ मै बिलकुल सही कह रहा हूॅ अवश्य आप लोगो ने मेरा ऊंट चुराया है मै राजा से शिकायत करूंगा।’

“ हम तुमसे सत्य कह रहे हैं ” प्रथम म़न्त्री ने कहा ,‘फिर कह रहे हैं हमने तुम्हारा ऊंट देखा भी नहीं है राजा से शिकायत करना चाहते है तो करो पर हम तुम्हारा ऊंट लौटाने मंे सहायता नहीं कर पायेंगे। इसमे समय बरबाद करोगे इससे अच्छा है अभी अधिक दूर नही होगा उसे खोजो। हम लोग ईमानदार भले आदमी हैं।

“ईमानदार भले आदमी ,‘ऊंटवाला चिल्लाया,‘ मैं तुम जैसे लोगो का खूब अच्छी तरह से जानता हूॅ जो अच्छी तरह से कपडे पहनकर जनता को लूटते हैं तुम्हीं लोगो ने ही मेरा ऊंट चुराया है ” वह रोता चिल्लाता राजा से शिकायत करने चला ,‘न्याय मुझे न्याय चाहिये।’

अभी वह अधिक दूर नहीं गया होगा कि उसे राजा अपने अंगरक्षको के साथ आता दिखाई दिया। न्याय न्याय! की मांग सुन वीरसेन रूक गये। ऊंट का मालिक परेशान था वह उलझन में यही निश्चत समझ बैठा कि वे ही ऊंट चोर हैं।

‘महाराज’ वह राजा के पैर पडते बोला “ मै एक गरीब ऊंट वाला हूॅ। अगर मेरा ऊंट खो गया तो मै भूखा मर जाऊंगा। हजूर ही मुझे बचा सकते हैं”।

‘रुको भाई “ राजा ने कहा मुझे बात तो बताओ ।”

ऊंट वाले ने कहा सब बात बताई और कहा कि चोरांे को दंड देकर मेरा ऊंट दिलवाइये।

“ इसमे परेशानी की क्या बात है चलो मुझे चारों चोरांे को दिखाओ मैं एक अपना अंगरक्षक  यहीं छोड देता हूॅ तुम घोडे पर चढ जाओ।

ऊंटवाला घोडे पर राजा को उसी बरगद के पेड के नीचे लाया जहां चारों म़ंत्री आराम से बैठ बाते कर रहे थे।

राजा को यह देखकर बडा आश्चर्य हुआ कि जिन्हे ऊंट बाला चोर बता रहा है वह उसके द्वारा निश्काषित मंत्री हैं। वे लोग ऐसा नही करेंगे यह राजा को विश्वास था। वह बिना किसी पूछ ताछ के भी यही निर्णय देता लेकिन ऐसा करना उचित नहीं समझा क्योंकि इससे ऊंट वाले को सतोष नहीं होता इसलिये उसने चारों से ऊंट के लिये पूछा।

“ चुराने की तो दूर रही हमने उसे देखा तक नहीं है।’ चारों ने कहा

उनके विरूद्व की गई शिकायत के हिसाब से यह आश्चर्य जनक बात थी। 

‘तब तुम्हें यह कैसे मालूम हुआ कि वह लंगडा था ?’ राजा ने पूछा।

“ बहुत साधारण बात है महाराज प्रथम मन्त्री ने कहा यह तो उसके गीली मिटटी पर चिन्हों को देखकर कोई  भी कह सकता है। आप भी देखिये बायें खुर को पूरे दबाब से नहीं रखा गया है”

राजा और अंगरक्षकों ने देखा और सन्तुष्ट हो गये “ यह तो ठीक है लेकिन यह कैसे मालूम हुआ कि उसके पूंछ नही थी क्या पद चिन्हांे से यह बात भी मालूम की थी क्या?’

“ नहीं हजूर “ दूसरा मंत्री बोला यह बात पद चन्हांे से नही बल्कि जांेको को देखकर कहा था जो जमीन पर पड़ी है” राजा ने देखा अनेको जोंकंे  रक्त पीकर जमीन पर पडी हुई है‘ अगर ऊॅट के पूॅछ होती तो वे इतना खून पी पाती उससे पहले ही वह उन्हे पूंछ से झाड देता ।’

“ अच्छा कैसे कहा की उसके आंख नही थी?”

 तीसरे मन्त्री ने स्पष्ट किया कि उसकी दांयी आंख नहीं थी” राजा ने चौक हर पूछा “ वह कैेसे? ’ 

‘हुजूर यह तो कोई भी घास को देखकर कह सकता है कि बायीं तरफ घास काफी थी फिर भी ऊॅट ने दाहिनी तरफ से ही घास खायी है।”

राजा और ऊॅट बाला सब सन्तुष्ट हो गये  । चौथे मंत्री ने ऊॅट के गोबर को देखकर बताया था कि वह कमजोर है अब उनकी निर्दाेषता मे केाई सन्देह नही रह गया था। ‘आप लोगों की बुद्वि देखकर ’,राजा ने कहा ,‘मेरी आंखें खुल गई है आप लोग वस्तु को अच्छी तरह से देखकर परखना जानते हैं दिमाग को खुला रखते हैं यह मैं इस छोटी सी घटना ही से जान गया हॅू ंआप लोगो की सलाह कि जनता पर अधिक कर नहीं लगाना चाहिये मै आदर करता हूॅैै। क्या आप लोग अब मेरे साथ और फिर से अपना पद सम्भालें चारों मन्त्री राजमहल मे लौट आये। ऊॅट वाले को एक ऊॅट देकर उसे विदा किया।


Monday, 1 September 2025

do bhai

 दो भाई


बहुत समय पहल एक गाँव में दो भाई रहते थे। बड़े भाई  का विवाह हो चुका था लेकिन छोटा भाई अभी कुँवारा था बहुत सीधा सादा भी था।

छोटे भाई ने खेत में ज्वार बोया लेकिन पूरे खेत में केवल एक ज्वार का पौधा हुआ। यह पौधा खेत के बीचों-बीच था। उसे वह पौधा इतना सुंदर लगा कि वह पूरे जतन से उस पौधे को देख-भाल करने लगा। पौधा जल्दी ही बड़ा हो गया और उसमें ज्वार का फूल एकदम बड़ा सा लगा। धीरे-धीरे फूल में ज्वार लगने लगे। दाने बहुत बड़े-बड़े थे। लेेकिन जैसे ही वह पकने लगा एक अद्भुत चिड़िया आईं और ज्वार को तोड़ ले गई। सीधा सादा भाई हाथ हिलाता चिड़िया के पीछे भागा। भागते-भागते वह बहुत दूर निकल आया। धीरे धीरे रात हो गई और चिड़िया ने दिखाई देना बंद कर दिया। अब छोटे भाई ने अपने चारों ओर देखा। वहाँ बड़े-बड़े पहाड़ घने जंगल थे चीते, शेर, भेड़िया गुरगुरा रहे थे। उसे एक विशाल वृक्ष दिखाई दिया उस पर चढ़कर पत्तियों के बीच छिप कर बैठ गया। 

पेड़ के नीचे कुछ ही देर बाद तीन मित्र, चीता, भेड़िया और बंदर आकर एकत्रित हुए। चीता बोला,‘ आज बहुत आराम महसूस हो रहा है। भाई बंदर कोई कहानी सुनाओ’, बंदर बोला, ‘कोई कहानी तो आती नहीं है हाँ एक मजेदार किस्सा सुना सकता हूँ।’ भेड़िया और चीता किस्सा सुनने को तैयार हो गये हो बंदर ने कहना शुरू किया, 

‘दक्षिण पूर्व में करीब पचास मील दूर एक छोटा-सा गाँव हैं। वहाँ एक लड़की को कोई लाइलाज बीमारी लग गयी है। कोई भी उसे ठीक नहीं कर पा रहा है। उसके पिता ने घोषणा की है कि जो भी उसे ठीक कर देगा उसकी शादी उस लड़की से कर दूँगा। जब कि इसका इलाज बहुत सरल है, इस पेड़ की डाल की छाल को खुरचकर उसकी तीन गोलियाँ बनाकर उसे खिला दे तो वह ठीक हो जायेगी।’

चीता और भेड़िया ने आह भरी, काश, ‘हम आदमी होते तो शादी का कितना अच्छा अवसर था।’ छोेटे भाई ने बैठे-बैठे उस डाल पर से इतनी छाल उतार ली कि करीब तीन गोलियाँ बन जाय। तीनों जानवर कुछ देर तक और गपशप करते रहे और फिर चलंे गये।

प्रातः होते ही छेाटा भाई पेड़ से उतरा गोलियाँ लेकर गाँव की आरे चल दिया। रास्ता पूछता-पूछता वह गाँव में पहुँचा जहाँ वह बीमार लड़की थी। छोटे भाई ने लड़की को गोलियाँ खिलाई। लड़की तुरंत अच्छी हो गई। पिता ने धूमधाम से छोटे भाई की शादी लड़की से कर दी।

उधर बड़े भाई को छोटे भाई की कमी अखर रही थी क्योंकि वह घर की और खेत के सभी भरी काम छोटे भाई से करवाता था। बड़ा भाई पत्नी से बोला,‘ छोटा न जाने कहाँ घूम रहा है उसे घर आकर ंकाम-धाम करना चहिए।’ यह कहकर वह छोटे भाई को ढूँढ़ने निकला। चलते चलते रात हो गई और वह भी उसी पेड़ के नीचे पहुँचा। जानवरों के डर से वह भी पेड़ पर छिप कर बैठ गया।

तीनों जानवर पहले दिन की तरह एकत्रित हुए। चीता बोला, ‘बंदर भाई कोई किस्सा कहानी सुनाओ’। बंदर बोला, ‘कल कोई पेड़ पर छिपा बैठा था उसने हमारी बातें सुन ली थी और धनवान बन गया आज पहले देख ले कोई यहाँ छिपा तो नहीं है।’ 

बडे़ भाई ने जब यह सुना तो डर से इतने जोर से कांपने लगा कि पेड़ जोर-जोर से हिलने लगा। बंदर तेजी से पेड़ पर चढ़ा और बड़े भाई को जमीन पर गिरा लिया और तीनों जानवर उस पर टूट पड़े उसे मार कर खा गये।


Saturday, 30 August 2025

Antrikhsh ki ek udaan

 ‘अंतरिक्ष  की एक उड़ान’


                                  डा0 ष्शषि गोयल


         विकी को बचपन से ही आकाष में चमकते पिंडों को देखने का बहुत शौक था। विकी के पिता अंतरिक्ष शोध संस्थान के  सदस्य थे । अपनी लंबी दूरबीन से उसे बचपन से ही सितारों का  परिचय दिया करते थे । जब वे  संस्थान के अध्यक्ष बने विकीे भी उसका सक्रिय  सदस्य बन चुका था। अब अपनी यात्राओं में वे उसको साथ रखने  लगे। प्रो0 हरवंष राडार के साथ दूर आकाष में शोध में व्यस्त थे । एकाएक उन्होंने विकी के पिता शर्मन और विकी को बुलाया। राडार के पर्दे पर चमकीली बोैछारें सी दिखने लगीं और लगा छत पर पानी की बूंदे पड़  रही हैं।‘फुऐं फुए  जैसे छोटे छोटे पदार्थ करीब एक हजार मील दूर ठीेक उनके ऊपर ऐसा लग रहा था जैसे झपटनेके लिये तैयार बाज’  दूसरे दिन एक व्यक्ति डा 0 षिवहरे उनके पास आया। उसने भी आकाष की वह वस्तु देखी थी। देखी क्या थी उसे उसका विषद ज्ञान था। वह बोला,‘ पिछले कुछ समय से उड़न तष्तरियों के समूह यहॉं आ रहे हैं । काफी करीब आकर ये ध्वनियॉं निकालते हैं जिसका कारण अज्ञात है । ये ध्वनियॉं इतनी तीखी और उत्तेजक होती हैं कि स्टील का पुल भी ऐसे हिलने लगता है जैसे उत्तेजक वायलन की घ्वनियों से ष्शराब का गिलास ।

‘ क्या उड़न तष्तरियों में जीवन है?’ प्रो0 हरवंष ने पूछा । ‘ यह तो नहीं मालुम ’ पिछले सप्ताह अमेरिकन सरकार ने  अपने  नये  एटोमिक रॉकेट को  खोज बीन के लिये  भेजा था । वह रॉकेट उड़न तष्तरियों के जरा अधिक ही नजदीक पहुॅंच गया और नष्ट हो गया । यह महज आवाज से नष्ट हुआ था’ 

‘ शायद अजनबियों ने सोचा हो कि  हमले के लिये  आ रहे हैं ।’ ष्शर्मन ने कहा

 ‘ अब हम आपके पास सहायतार्थ आये हैं  आप और आपके सहयोगी डा0 शर्मन ने अनेकों अन्तरिक्ष की यात्राऐं की हैं आपके पास आधुनिक  यंत्रों से युक्त अन्तरिक्ष यान है । आपने अन्तरिक्ष से  आती  ध्वनियों का  अध्ययन किया है । ’षिवहरे  बोले 

 ‘ यह तो ठीक है ,’ प्रो हरवंष बोले ,‘ लेकिन आप मुझसे चााहते क्या हैं ?’ 

‘ हम चाहते हैं कि आप उन रहस्यमयी उड़न तष्तरियों के  नजदीक जाकर उनका अध्ययन करें व फोटो आदि ले लें  । उन अजनबियों से किसी प्रकार बात करें यद्यपि इसमें काफी खतरा है लेकिन मनुष्य के  लिये वरदान सिद्ध होगा और भारत विष्व पटल पर नाम करेगा कि हमारे यहॉं  ऐसे प्रतिभाषाली वैज्ञानिक हैं । ’

 दो दिन बाद  प्रो0 हरवंष , विकी उसके पिता शर्मन के साथ अपने अत्याधुनिक विमान में बैठे थे । इसके अंदर अपनी स्वयं की गुरुत्वाकर्षण ष्शक्ति थी यह किसी भी दिषा में चलाया जा सकता था । राडार के पर्दे पर बार बार चमक दिखाई दे रही थी और आवाज सुनाई पड़ रही थी । वहॉं

 पहुॅंचने में आधा घंटे की देरी थी  । 

 नीचे पृथ्वी एक गेंद की तरह लुढ़कती दूर जा रही थी । आकाष गहरा नीला होता जा रहा था । विकी जरा जरा घबराने लगा । एक दो बार दूसरों का चेहरा देखा । विकी के पिता का चेहरा भी जरा जरा  पीला था । एकाएक उन्हें एक आवाज सुनाई दी जैसे चर्च में घंटियॉं बज रही हों  ।विकी ने दूरबीन से देखा जो  दृष्य पर्दे पर था वह उसे जिन्दगी में नहीं भूल सकता । करीब सौ प्याले  के आकार की वस्तुऐं आकाष में नृत्य की माफिक  लहरा रही थी । उनके चारो ओर रोषनी निकल रही थी। ध्वनि पकड़ने वाले यंत्र से उनका संगीत आ रहा था । देखते और  सुनते उड़ते वे उनसे  केवल सौ मील दूर रह गये ।उन्होंने हवा का दबाव सह सकने  योग्य कपड़े पहने  और पारदर्षक हैमलेट पहने।अब तष्तरियॉं स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। उनका कमरा संगीत से गॅूंज रहा था । प्रांे0 हरवंष ने उनसे करीब एक  मील दूर यान स्थिर कर लिया ।

यान की चालक सीट पर अब विकी के पिता थे और  प्रो 0 हरवंष ने  चित्र खींचने प्रारम्भ कर दिये  । कुछ देर तक कुछ नहीं हुआ ।विकी बेचैन था कब उड़नतष्तरियॉं उन लोगों के यान को देखेंगी। एकाएक छोटे छोटे अन्तरिक्ष यानों के बीच में एक विषाल यान प्रकट हुआ उसमें से सबसे अधिक तेज प्रकाष निकल रहा था ।विकी के दिमाग में घंटियॉं सी बजने  लगी  फिर उनके  बीच  से ध्वनि तरंगें विकी के दिमाग में प्रवाहित होने लगीं ,‘ वे कह रहे थे ‘ लड़के को भेजा , लड़के को भेजो ।’ विकी ने  अपने पिता और प्रो0 हरवंष की ओर देखा । उनके चेहरे से लग रहा था कि वे ध्यान से  सुन रहे हैं । यद्यपि कोई आवाज नहीं थी  यह मानसिक संदेष था । और निष्चित ही  उन्होंने भी उसे सुना था ।विकी के पिता बोले ‘ लड़के को नहीं ,मैं स्वयं आता हॅूं  ’ 

लेकिन तुरंत प्रत्युत्तर मिला ‘लड़के को भेजो ’

विषाल यान उड़कर उनके और समीप आ गया था विकी के होंठ सूख गये । बड़ी मुष्किल से अपनी अकड़ी जवान खोली और कहा ,‘ मुझे जाने दो  तभी तो आगे कुछ पता लगेगा ’ 

‘ यह कोई चाल भी हो सकती है ,’प्रो0 हरवंष ने कहा , ‘ तुम्हें बंधक भी बनाया जा सकता है  ।’

विकी खतरा समझ रहा था  लेकिन  बोला,‘ वे मित्र भी हो सकते हैं हमसे अधिक

 बुद्धिमान हैं यही क्यों सोचें कि हानि पहुॅंचायेगे ’ 

 विकी के पिता का चेहरा कठोर हो गया । लेकिन अपने कर्तव्य को सामने रख कर बोले ,‘ बेटा ठीक कहता है वह छल कपट नहीं जानता । बड़ों की बुद्धि उन्हें धोखा दे सकती है ।’ 

 विकी ने अपना हैलमेट पहना और नीचे बने कमरे में गया । एक बटन दबाते ही अंतरिक्ष यान का द्वार खुल गया और वह शून्य में बाहर निकल आया । दाव युक्त हवा के सिलैंडर उसकी पीठ पर बंधे थे  उसी के दबाव से वह उनके यान की ओर बढ़ गया । यह छोटी सी यात्रा अपने  आप में अनोखी थी । वैसे उन्होंने  कई बार अन्तरिक्ष में यात्राऐं की थीं  ,संकट के समय क्या करना है यह अभ्यास किया था लेकिन तब संकट की कल्पना मात्र थी अब संकट सामने था । 

 विषाल जहाज केगुरुत्वाक 

र्षण  के अंदर पहुॅंचते ही उसने  अपना हवा का बटन बंद कर दिया । विषाल यान कई मंजिल के मकान की तरह था। 

और किसी चमकदार पदार्थ का बना हुआ था। अब संगीत की ध्वनि सुनाई नहीं दे रही थी लेकिन फुसफुसाहट सी सुनाई पड़ रही थी।विकी ने यान के एक अंधेरे द्वार में प्रवेष किया। उसके प्रवेष करते ही द्वार बंद हो गया ।विकी को मानसिक रुप से आगे बढ़ने का निर्देष मिला विकी अंदर ही

 अंदर आदेषानुसार बढ़ रहा था मेहराबदार दीवार पर चमकदार रोषनी की पारदर्षी रॉड लगी हुई थी चारो ओर गहन ष्शांति छाई हुई थी । एकाएक एक मनुष्याकृति  उसे ऊॅंचे  आसन पर बैठी दिखाई दी । वह एक वृद्ध दाढ़ी वाला व्यक्ति था  उसने श्वेत वस्त्र पहन रखे थे । चेहरे पर दया और अपार बुद्धि के भाव थे । ‘ मेरे बेटे ,’ संगीतमय ध्वनि उसके मुॅह से निकली ,’ मुझे खुषी हुई कि तुम आये ।’

 ‘ लेकिन  आप तो  बिलकुल हमारे जैसे हैं,’ वह हकलाया , ‘एक साधारण पृथ्वी वासी ’। 

 वह मुस्कराया,‘ यह एक भ्रम मात्र है , मेरी असली आकृति तुम पृथ्वी वालों को सहन नहीं होगी इसलिये मैंने तुम्हारे मस्तिष्क की इच्छा के अनुरूप  रूप रखा है । इसी प्रकार मेरे शब्द तुम्हारे मस्तिष्क से टकराते ही तुम्हारी भाषा में बदल जाते हैं ।’ ।

 विकी हैरानी से देख रहा था ,‘ क्या इस यान में आप ही हैं ? ,’  वह बोला 

उसने पीछे एक द्वार की ओर इषारा करते हए कहा,‘ अन्य भी हैं लेकिन उनसे तुम्हें कोई मतलब नहीं है,‘ मैंने तुम्हें बुलाया है इसलिये मैं ही तुम से कुछ प्रष्न पूछूंगा ।’

 ‘ किस प्रकार के प्रष्न?’

‘ पृथ्वी के विषय में । कुछ दिन पहले हमारे यन्त्रों ने यहॉं पृथ्वी पर धमाके सुने थे  और एक छोटे ग्रह पर तुम्हारे यहॉं से एक यान गया था । हम सचेत हो गये।संभवतः तुम लोग अन्य ग्रहों पर आक्रमण करने की इच्छा तो नहीं रखते । मैं अनेकों बार पहुॅंचा लेकिन लोगों के मस्तिष्क में मुझे 

 केवल नफरत और भय के विचार मिले  । हम मित्र बन कर आये  हैं केवल ज्ञान प्राप्त करने  तुम्हारा मस्तिष्क छल कपट रहित है’।

‘ मैं भी डर गया था ’ , विकी ने स्वीकार किया ।

‘ भय एक भाव मात्र है जिस पर विजय पाई जा सकती है । लेकिन  क्या तुम भी हम से घृणा करते हो ? क्या युद्ध करना चाहते हो ’?

‘ नहीं हम युद्ध केवल आपस में करते हैं  और घृणा भी बस आपस में ही करते हैं  ।’ 

 एक लम्बी चुप्पी छा गई केवल यन्त्रों  की सरसराहट और किसी  यन्त्र के क्लिक क्लिक करने की आवाज आ रही थी । 

‘ तुम्हारे उत्तरों ने  हमें बड़ी ष्शांति पहुॅंचाई है । एक बोझ सा उतर गया  हम पर से ।’

 ‘ आप कौन हैं ? आप कहॉं से आये हैं ?’

‘ हम मंगल ग्रह के वासी हैं । वहॉं हम बहुत गहरी घाटी में रहते हैं हमारे ऊपर का आवरण रहने योग्य नहीं है । हम सालों से अपने समीप के एक ग्रह का अध्ययन कर रहे हैं । कई बार वीनस ग्रह के निवासियों ने  कठोर बादलों के द्वारा हम पर आक्रमण किया। लेकिन हमारा 

युद्ध इन्फ्रा किरणों पर आधारित है और उन्हें हमने नष्ट कर दिया । अब उनकी शक्ति पृथ्वी की ओर केन्द्रित हो रही है । और वे किसी भी  पल पृथ्वी पर हमला कर सकते हैं ।’ 

‘ अच्छा क्या मैं अपने यान पर जाऊॅं’?

‘ जैसी तुम्हारी इच्छा ’ 

‘लेकिन जाने से पहले मैं एक  बात पूछना चाहता हॅूं  । आपके यान से जो संगीत की ध्वनि निकली थी वह क्या है ?’

 उसने अपने आगे बने  की बोर्ड के आगे के कई बटनों में से एक को दबाया और विकी को घंटियॉं सुनाई देने लगी ।‘ ये छोटे छोटे धातु के गोलों की ध्वनियॉं हैं जिन्हें ऐम्पलीफायर से विकसित किया है प्रत्येक यान को अलग आवाज दी गई यद्यपि हम इसका उपयोग दिषा ज्ञान के लिये करते हैं 

 परन्तु सब  यानों की ध्वनि मिलकर इतनी ष्शक्ति रखती है कि किसी भी प्रकार की धातु  को नष्ट कर दे ,’ ।

‘ यहॉं तक कि  वीनस ग्रह के यानों को भी ?विकी नेे पूछा

 उसने सिर हिलाया , एकाएक विकी के दिमाग में एक विचार कौंधा,’ अगर वीनस ग्रह ने हम पर  आक्रमण किया तो  क्या आप हमारी सहायता करने आयेंगे ?’

 एक क्षण वह विकी की ओर देखते हुए मुस्कराया फिर बोला, ‘ तुम्हें हम पर  बहुत विष्वास हो गया है, और विष्वास को पूरा सहयोग मिलेगा ।’

 ॅ विकी ने विदा ली नीचे की तरफ जाने वाली सुरंग के द्वार पर पहुॅंच कर उसमें घुसने से पहले विकी ने  एक बार फिर विदा के लिये हाथ हिलाते मुड़ कर देखा एक लम्बी सी आकृति फिर वहॉं कुछ नहीं था । 

 अपने यान में आते ही ही प्रोफेसर हरवंष और विकी के पिता ने उसे घेर लिया। पिता के चेहरे पर राहत साफ महसूस की जा रही थी ।विकी ने पूरी घटना का वर्णन किया । उन्होंने ध्वनि पकड़ने वाले यन्त्र की ओर देखा। संगीत की ध्वनि धीरे धीरे कम हो रही थी। यान धीरे धीरे दूर जा रहे

 थे लेकिन विकी  मन ही मन ष्शर्म से गड़ा जा रहा था । मंगल वासियों को पृथ्वी की सभ्यता की खोखली बुनियादों का पता लग गया था ।

 अभी वे उन संगीत मय तष्तरियों को  छोटा और छोटा  होते देख रहे थे  कि पर्दे पर  एक तेजी से आती वस्तु दिखाई दी । प्रो 0 हरवंष ने हिसाब 

 लगाया वह करीब तीन सौ मील  दूर थी और दो हजार मील प्रति घंटे की गति से  सीधे उन लोगों की ओर आ रही थी । एक मिनट बीता  फिर दो  मिनट बीते , तीसरे ही मिनट पर्दे पर एक अन्य उड़न तष्तरी प्रगट हुई लेकिन यह  पहली तष्तहरयों से भिन्न अधिकतर पृथ्वी पर दिखाई देने वाली उड़न तष्तरी जैसी थी। एक गोलाकार वस्तु  पीछे से  चिन्गारियाों की पूंछ  छोड़ती गई । एकाएक विकी के मस्तिष्क में आया ,‘ इसके अंदर ष्शुक्रग्रह के निवासी हैं पृथ्वी के दुष्मन जो सालों से मनुष्य जाति का अध्ययन कर रहे हैं । जल्दी जल्दी उसने दोनों को  मंगलग्रह वासी के द्वारा कही बातें बताईं,’ जल्दी से  भाग चलो ’ विकी के पिता ने कहा और प्रो0 हरवंष ने पृथ्वी की ओर जाने वाला स्विच दबा दिया ।’शक्ति थी लेकिन अंदर लगा कि वह आगे नहीं बढ़ रहा है । उड़न तष्तरी ने रुख सीधा उनकी ओर कर लिया था । प्रति सेंकेंड यान बड़ा होता  जा रहा था। यह उनकी स्थिति से एक मील दूर था और पृथ्वी और उनके बीच आ गया। उसमें बनी 

खिड़कियों में से एक में रोषनी हुई । विकी के पिता ने विकी की बॉंह कस कर पकड़ ली,‘ ये मौर्स ही हैं ’ वह हैरान रह गया  पिता वीनस वासियों के विषय में कैसे  जानते हैं । ध्यान आया पिता पृथ्वी पर आने वाले  संकेतों का सालों से अध्ययन कर रहे हैं  ,‘ ये कह रहे हैं,हमारे पीछे आओ  नहीं तो हम तुम्हें  नष्ट कर द ेंगे’। पिता के स्वर में निराषा सी आ गई ।उन्होंने पर्दे पर देखा अनेकों बंदूकों की नाल जैसी वस्तुऐं यान में से निकल आई थी । एक बार फिर मार्स लोगों की रोषनी चमकी ,विकी के पिता बोले  ,‘ वे हमें तीस सेकेंड का समय  सोचने  का दे  रहे हैं ।’ 

उनसे  पॉंच मील दूर पृथ्वी दिखाई दे रही थी। विकी के गले में गोला सा अटक गया ।षायद ष्शुक्रग्रह वासियों की दुष्मनी का वे लोग पहला षिकार होंगे । नहीं  पहला नहीं  अनेकों विमान बिना किसी प्रकार का सुराग दिये गायब हो गये  । अनेकों आदमी अपने घरों से गायब हो गये  ,‘ पन्द्रह सेकेंड ’ विकी के पिता बोले । 

 विकी कॉंप उठा एकाएक  विकी को याद आया,‘ डैडी  मंगल ग्रह वासियों ने  हमारी सहायता करने का वचन दिया था मैं संदेष भेजने की कोषिष करता हॅंू ।’विकी ने पूरा ध्यान उस वृद्ध मुस्कराते व्यक्ति पर केंन्द्रित किया और चिल्लाया ,बचाओ हमें ’पॉंच सेकेंड तीन सेकेंड बचाओ बचाओ ’ और वह ष्शॉंत हो गया उसके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई उसे लगा उसका संदेष पहुॅंच गया है ,‘ वे आ रहे हैं ’ अभी उसने कहा ही था कि उन्हें  घंटी की आवाजें सुनाई दीं । वे अंधेरे आकाष में देवदूत की भांति प्रकट हुए उनका संगीत सब जगह था उनके आगे पीछे नीचे ऊपर। अब दुष्मन की याद कर उसे दया आई , वह पिंजरे में चूहे की भांति फस गया था । एकाएक संगीत एक तीखी चीत्कार में बदल गया और उस ध्वनि का रुख उन्होंने 

ष्शुक्र यान की ओर मोड़ दिया उनके देखते देखते शुक्रग्रह का यान लाखों छोटे टुकडों में फट गया । आकाष साफ था। मंगल ग्रह के यान ऊपर

 उठने लगे विकी के मस्तिष्क में संदेष आया,‘ पृथ्वी पर वापस जाओ , याद रखना हम तुम्हारे साथ हैं ।’ प्रो0 हरवंष ने  यान का लीवर दबा दिया और वे पृथ्वी की ओर बढ़ने लगे ।







Tuesday, 26 August 2025

ole

 कुषुआ कहानी 

ओले

तीन ओले भाई थे। एक लंगड़ा,एक अंधा और एक भाई गूंगा था। तीनों की मां बुढ़िया पीली पोषाक पहनती थी। एक दिन एक डाकिया यात्रा पर जा रहा था । तीन दिन तक वह चलता रहा। एक रात तेज बारिष हुई,उसे कोई आश्रय नहीं मिला। वह चारो ओर किसी घर की तलाष करने लगा । कुछ दूर पर उसे रोषनी चमकती दिखाई दी। वह यह सोचकर उस ओर चल दिया कि रोषनी किसी घर की है ।

वहां जरूर कोई घर होगा।’ चलते चलते उसने सोचा। उस स्थान पर पहुंच कर उसने देखा कि पास पास दो झोंपड़ियां बनी हुई हैं। एक बुढ़िया दरवाजे के पास बैठी है। वह ओलों की मां थी । डाकिया बोला ,‘ मां षरण दो ।’

‘ बहुत अच्छा मैं तुम्हें षरण दूंगी,’ बुढ़िया ने कहा

बुढ़िया अपने तीनों बेटों के लिये एक बड़े बर्तन में खाना बना रही थी।

‘ अंदर आओ ’ बुढ़िया ने यात्री को बुलाया। उसके अंदर आने पर बोली ,‘ मेरे बेटे आ रहे हैं, मैं उन्हें क्या बताउंगी, अब मैं क्या करूं अगर तुम्हें देख लिया तो मार डालेंगे ।’

उसी समय तड़ तड़ की आवाज आकाष से आई,ओले आ रहे थे । बुढ़िया बोली ,‘एक मेरा बेटा लंगड़ा है दूसरा अंधा है और तासरा गूंगा है । लंगड़ा और अंधा बहुत बदमाष हैं उन्हें किसी को मारने में डर नहीं लगता है। तुम उन्हें मिल गये तो तुम्हें मार डालेंगें कोने में बैठ जाओ। ’’

एक बड़े से कटोरे में उसने मांस दिया। मांस सब जानवरों का मिला हुआ था। लेकिन जितना डाकिया खा रहा था उतनी ही उसकी भूख बढ़ रही थी । कारण यह था ओले रास्ते पर से गुजर रहे यात्रियों और जानवरों को मारकर मां को लाकर देते थे । यह मांस अभिषप्त होता था और किसी की भी भूख संन्तुष्ट नहीं कर पाता था।

धीरे धीरे तड़तड़ की आवाज नजदीक आती जा रही थी। झोंपड़ी के चारो ओर आवाज आइ्र फिर दरवाजे पर अंत में ठंडे पानी के छींटे आने लगे। ‘जल्दी खाना खतम करो जल्दी।’ बुढ़िया चिल्लाई। 

यात्री ने जल्दी से खाना खाया। ओलों की तड़तड़ दरवाजे पर आई। बुढ़िया ने यात्री को एक बड़े बर्तन में ढक दिया। तीनों ओले भाई एक एक करके आये। बुढ़िया ने उन्हें खाना दिया। षीघ्र ही एक भाई बोला,‘ मां कुछ गंध सी आ रही है,यह कहां से आ रही है ।’

‘मालुम नहीं,’ बुढ़िया बोली,‘ यहां तो कुछ नहीं है ।’ 

कुछ देर में दूसरा बोला,‘ मां कुछ न कुछ तो है गंध आ रही है ।’

‘ हो सकता है आटा सड़ गया है उसकी गंध आ रही है ।’

‘ तीनों भाई चुप हो गये और सो गये। यात्री को बहुत देर तक नींद नहीं आई।काफी रात गये वह सो गया । सुबह नींद खुली तो देखा न झोंपड़ी ,न ओले न बुढ़िया। खुले मैदान में मेड़ के किनारे सो रहा था ं आष्चर्य चकित वह उठ कर चल दिया ।


Monday, 25 August 2025

Rip Van Winkle

 

R ip Van Winkle

 

By Washington I riving  published in (1824)

 

 

At the foot of koatskill mountain there was a village. There were the houses of the orignal settlers, of Small yellow bricks brought from having latticed windows and gabled fronts surmounted with weather cocks.

          In one of these house there lived a very simple good natured fellow of  name Rip Van Winkle.       He was great favrouite in the village . The children of the village would shout with joy whevever he appooached.He assisted  at their sports made there playthings, taught them to fly kites and shoot marbles and told them long stories of Ghosts, and wiches.

          The great error in Rip’s compostion was an insuperable aversion to all kinds of profitable laboura. Rip was ready to attend to any body’s business but his own but as to any body business duty and keeping his form in order he found it impossible.

          In fact he declared it was of no use to work on his farm his fences were continually falling to pieces ; his cow would either go astray or get among the cabbaqes His children too were as ragged as and wild as if they beloned to nobody.

          His wife kept continually dinning in his ears about his idleness his careless ness and the ruin he brought for his family. Morning, noon and night her tounge was incessantly going and every thing he said was or did was sure to produces a torrent household  eloquence.

          Rip’s sole domestic adherent was his dog  wolf who was as much henpecked as his master.

          Time Grew worse and worse with Rip Van Winkle when driven from home Rip used to sit with philosophers, and other idle personaqes of the village held it session on a bench before a small inn to eseape from th labaour of the farm and clamor of his wife with his gun stroll away in to the woods. Here he would sometimes seat himself at the foot of a tree and share the contents of his wallct with wolf.

          In a long ramble of the kind on a fine autumnal day, Rip had unconsciously scambled to one of the highest ports of the kootskill mountains shooting squirrel on the other side looked down in to a deep glen ,wild lonely and shagged the bottom filled with fragments from the impending cliffs and scacely light by the reflected rays of the setting sun for sometime Rip lay musing. On this seene evening was gradudly advancing he saw that it would be dark long before he could reach the village and he heaved a heavy sigh when he thought of encountering the terrors of dame van winkle.

          As he was about to descend he heard a voice from a distance hallooing Rip Van Winkle, Rip Van winkle he looked round but could see nothing but a crow he thought his fancey must have deceived him. and turned again to descend.when he heard the same crying throug the still evening air. Rip Van Winkle Rip Van Winkle at the Same time wolf  bristled up his back and giving a low growl skulled to his master’s side looking fearfully down in to the glen He looked anxiously in the same direction and percieved a strange figure slowly and perceived a strange figure slowly toiling up the rocks and bending under the weight of something he carried on he back.He was surprised to see any human being in this lonely and unfrequented place but supposing it to be some one of the neighborhood in need of his assistance he hastened down to yield it.

          The Stranger was a short Squre built old fellow with thick bushy hair and a grizzled beard His dress was of an antique

          Dutch fastion a cloth jerkin strapped round the waist several pair of breeches the outer one of ample volume decorated with rows of buttons down the sides and bunches at the knees.He bore on his shoulder a stout keg that seemed full of liquor and made signs for Rip to approach and assist him with the load . Rip took his load and mutually relievivg one another they clambred up a narrow gully As they ascended Rip every now and then heard long rolling peals like distant thunder that seemed to issue out of a deep raivine.He paused for an instant but thought it to be the muttering of one of thunder showers They came to a hollow like a small amphitheatre.

          On entering the amphitheatre he saw on a level spot in the centre was a company of odd looking personage playing at nine pins .They were dressed in a quaint out landish fastion ; some wore short doublets others jerkins with long knives in their belts and most of them had enormous breeches of similar style with that of the guide’s.

          There was one who seemed to be the commander he wore a laced doublet broad belt and hanger high crowned head and feather red stockings and high heeled shoes with roses in them.

          What seemed particularly odd to Rip was the most mysterious silence As Rip and his companion approached them they suddenly desisted from their play and stared at him with such fixed  statue like gaze ,and such strong uncouth lack lustre countenaces ,that his heart turned within him and his kuees smote together His companion now eupited the contents of the keg in to large flagons and made sign to him to wait upon the company. He obeyed with fear and trembling they quaffed the liqour in profound silence and the returned to their game.

          When no eye was fixed upon him he tasted the beverage which he found had much of the flavour of exellent Dlutch gin.He was soon temped to repeat the draught one tasted proved another and he reiterated his visit to the flygon so often that at length his seuse were over powered ,his eyes swam in his head his head gragually declined and he fell in to a deep sleep.

          On waking he found himself on the green knoll whence he had first seen the old man of the glen.He rubbed his eyes.It was a bright sunny morning the birds were hopping and twittering among the bushes . ‘Surely’ thought Rip, “ I have not  slept here all night.” He recalled the occurrences before he fell a sleep.

          “Oh I that flagon ! that wicked flagon !’ thought Rip What excuse shall I make to Dame Van Winkle .

          He looked round for his gun but in place of the clean well -oiled fowling by him he found an old firelock lying by him. the barrel incrustest with rust the lock falling of and the stock worm eaten. He now suspected that the grave roysters of the mountain had put a trick upon him and robbed him of his of his gun. Wolf too had disappeared but he might have strayed away after a squirrel or pat ridge. He whistled after him and shouted his name but all in vain the eehoes repeated his whistle and shout but no dog was to be seen.

          He determined to revisit the scene of the last evening’s gambol to demand his dog and gun.As rose to walk he found himself stiff in the joints these mountain beds do not agree with me. thought Rip with same difficulty he got down in to the glen but to his astonishment a mountain stream was now fall foaming down it.

          Poor Rip was brought to a stant He again called and whistled after his dog what was to be done.? The morning was passing away He was feeling hungry . He grived to give up his dog and guu he dreaded to meet his wife but it would not do to starve  among the mountains.   

          As he approached the village he met a number of people but none whom he know which some what surprised him for he had thought himself acquainted with every one in country round .Their dress too was different faishon from that to which he was accustomed . They all stared at him with equel marks of surprise specially at his chin the constant recurrence of this gesture induced Rip to do the same when to his astonishment he found his beared had growu a foot long. !

          A troop of strange children at his heels hooting after him. The very village was altered there  were rows of houses which he had never seen before. Strange names were over the doors strange faces at the windows every thing was strange His mind now misgave him. Surely this was his native village which he had left but the day before. That flagon last night thought he has addled my poor head sadly.      

          It was with same difficulty that he found the way to his own house which he approached with silent. Awe expecting every moment to hear the strill voice of Dam van wiukle. He found the house gone to decay the roof fallen in the window shattered and the doors off the hinges .A half starved dog that looked like wolf was skulling about it. Rip called him by name but the cur snarled showed his teeth and passed on,”my very dog “sighed poor Rip,” has forgotten me.”

          He entered the house it was empty forlorn and apparently abandoned. He called loudly for his wife and children the lonely chambers rang for a moment with his voice and then all again was silence.         

          He now hurried forth and hastened to his old resort the “village- inn” but it too was gone . instead of inn there was an hotel. All this bewildered Van winkle The appearance of Rip with his long grizzled beard his rusty fowling piece his uncouth dress and an army of women and children at his heels soon attracted the attention of the tavern people .They croweded round him. One fellow asked in an austere tone what brought him to the village with a gun on his shoulder and a mob at heel .and whether he meant to bread a roit and a map  in the village?”” Alas gentlemen,” cried Rip some what dismayed. I am a poor quiet man a native of the place please tell one where Nicholas vedder?

          An old man replied in a thin piping voice “Nicholas vedder ! why he is dead and gone these eighteen years. !” 

          He asked about others. But no one was there. Rip’s heart died away at hearing of these sad chanqes in his home and friends and finding himself thus alone in the world. He cried out in despair does nobody here know Rip van wimkle “yes one is that fellow leaning against the cherry tree. He looked at the fellow as just he was at his age”

          God knows exelaimed he at his wit’s end. I am not myself I am some body else. I was my self last night, but I fell asleep on the mountain and they ‘ve changed my gun and every thing is changed I can tell what my name or who I am .

          The by standers began to look now at each other there was a whisper also about the gun. In the crowed he heard a young woman chiding her child ,”hush Rip cried she,” hush you little fool. The old man won’t hurt you the name of the child the air of the mother the tone of her voice all awakened a train of recollections in his mind ,”what is your name my good woman,” asked he . “Judith “

          “And your father’s name?*

          ^Ah poor man Rip van winkle was his name but its twenty years since he went away from home with his gun and never has been heard of since his dog came without him but wheither he shot himself or was carried away nobody can tell I was then but a little girl.*

          Rip had but one more question to ask,’ where ‘s your mother?”

          Oh she too had died but a short time since she broke a blood vessel in a fit of passion at a new England peddlet

          The honest man could contain himself nolonqer he cought his daughter and her child in his arm,” I am your father” cried  he.” young Rip van wimkle once old Rip van wimkle now “does any body know poor Rip van winKle .

          All stood amaged until an old woman tottering out from among the crowed put her hand to her brow and peering under it in his face for a moment exclaimed sure enough it is Rip van wimple it is himself old neighbour why where have your been these twenty long years “

          Rip story was soon told for the whole twenty years had been to him but as one night.

          Rip’s daughter took him to her house Rip recollected poor one of his boy that used to climb upon his back. He was rip’s son ditto of himself feaning against the cherry tree

          Having nothing to do at home and being arrived at that happy age when a men can be the with impunity he took his place once more on the benhce at the inn door and was reverenced as one of the patriarchs of the village and a chronicle at the old times “before the war” happily that was an end he had got his neck out of the yoke of matrimony and could go in and out whenever he pleased without dreading the tyranny of Dame van winkle.

                

Saturday, 16 August 2025

Chaval ke panch Dane

 चावल के पॉच दाने


बहुत पुरानी बात है पाटलीपुत्र में धान्य नामक एक समृद्व और बुद्विमान व्यापारी रहता था। उसके चार पुत्र और चारों पुत्र विवाहित थे। पुत्र वधुओं के नाम थे उज्झिका, भोगवती, रक्षिका और रोहिणी। एक दिन धान्य ने सोचा, मैं अपने कुटुम्ब में सबसे बड़ा हूॅ और सब लोग मेरी बात मानते हैं, ऐसी हालत में यदि मै कहीं चला जाऊॅ , किसी कारण से कामकाज न देख सकूं, परदेष चला जाउं तो मेर बाद मेरे कुटुम्ब की देख भाल कौन करेगा, उन्हे सलाह कौन देगा, कौन मार्ग प्रदर्षन करेगा। यह सोचकर धान्य ने भोजन की विपुल सामिग्री तैयार कराई और अपने सगें संबंधियों को निमं़ित्रत किया।

भोजन के पष्चात् जब सब लोग गपषप कर रहे थे तो धान्य ने अपनी पुत्रवधुओं को बुलाया और उनसे कहा, “देखो बेटियों मैं तुममे से प्रत्येक को धान के पांच दाने देता हॅू तुम इन्हे संभाल कर रखना और जब मै मागूं मुझे लौटा देना।”

चारों बहुओं ने कहां, “ पिता जी जो आज्ञा।” और वे धान के दाने लेकर चली गईं। सबसे बडी बहू ने सोचा, “ मेरे ससुर के कोठार तो धान से भरे पड़े हैं जब मांगेेगंे मैं कोठार में से लाकर दे दूंगी।” यह सोचकर उज्झिका ने उन दानों को उठाकर फेंक दिया और अपने काम में लग गई।

दुसरी पुत्रवधू भोगवती ने यह सोचा, “ मेरे ससुर के कोठार में मनों धान भरे पड़े है परंतु अवष्य से प्रसाद के होंगे। ” बस उन दानों का छिलका उतार कर खा गई।

तीसरी पुत्रवधू रक्षिका से सोचा, “ ससुर जी ने इतने सब लोगों के सामने बुलाकर हमें ये धान के दाने दिये हैं , उन्हें सुरक्षित देने के लिये कहा है अवष्य ही इनमे कोई रहस्य होना चाहिये।” उसने उन दानों को साफ कपडे़ मे बांधकर अपनी रत्नों की पिटारी में रख दिया और अपने सिरहाने रख सुबह षाम उनकी चौकसी करती ।

चौथी पुत्रवधू रोहिणी के मन में भी यही विचार उठा कि अवष्य ससुरजी ने कुछ सोचकर हमें धान के दाने दिये है। उसने अपने नौकरों को बुलाया और कहा, “जब खूब जोर की वारिष हो तो छोटी छोटी क्यारियां इन धानों को खेज में बोदो। उसके बाद दो तीन बार करके एक स्थान से दूसरे स्थान पर रोपो और इनके चारों ओर बाड़ लगाकर इनकी रखवाली करो।”

नौकरों ने रोहिणी के आदेष का पालन किया और जब हरे हरे धान पककर पीले पड गये उन्हे तीखी दंतियों से काट लिया। तत्पष्चात् धानों को हाथ से मला और उन्हे साफ करके कोरे घडों मे भर कर घडों को लीप पोतकर उन पर मोहर लगा कर कोठार मे रखवा दिया। दूसरी वर्षा ऋतु पर आने पर फिर से इन धानों को खेत में बोया। और पहले की तरह काटकर साफ करके घडों में भरकर रख दिया। इसी प्रकार तीसरे और चौथे साल किया । अब इन पॉच दानों के बढ़ते बढ़ते सैंकडों घडे हो गये। इन घड़ों को सुरक्षित रखवा कर निष्चिंत हो गई।

चार वर्ष पष्चात् धान्य ने सोचा कि मैने तो दाने दिये थे उन्हे बुलाकर अब पुछना चाहिये कि उन्होने किस प्रकार से उनकी संभाल की। धान्य ने फिर से अपने सभी सगे संबंधियों को निमंत्रित करके उनके सामने अपनी पुत्रवधुओं को बुलाया और धान के दाने मांगे।

पहले उज्झिका आई। वह अपने ससुर के कोठार में गई और और धानके पॉच दाने लाकर अपने ससुर के सामने रख दिये। धन्य ने अपनी पुत्रवधू से पूछा कि क्या ये वही दाने है या दूसरे। उज्झिका ने सच सच कह दिया कि पिता जी उन दानों को मैने उसी समय फेंक दिया था, ये दाना मैने आपके कोठार से लाकर दिये। यह सुनकर धान्य को बहुत क्रोध आया और उससे उज्झिका को घर झाड़ने पोंछने और साफ सफाई करने के काम में नियुक्त कर दिया।

तत्पष्चात् भागवती आई। धान्य ने उसे घर के खाने पकाने पीसने और रसोई बनाने के काम में लगा दिया। उसके बाद रक्षिका आई उसने अपनी पिटारी खोली और उसमें से धान के पॉच दाने निकाल कर अपने ससुर के सामने रख दिये इस पर धान्य बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उसे अपने कोष खजाने की मालकिन बना दिया।

अन्त मे रोहिणी की बारी आई। उसने कहा, “ पिता जी जो धान के दाने आपने मुझे दिये थे उन्हे मैने घडों मे भरकर कोठार में रख दिये हैं। उन्हें लाने के लिये गाड़ियों कि आवष्यकता होगी। रोहिणी ने अपने ससुर से सब बातें बताई कि उसने किस प्रकार पॉच दाने को खेत में बो बो कर इतने दाने धान पैदा किये है धानों के घडे मंगाये गये अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने रोहिणी को सब घर बार की मालकिन बना दिया।