Tuesday, 26 August 2025

ole

 कुषुआ कहानी 

ओले

तीन ओले भाई थे। एक लंगड़ा,एक अंधा और एक भाई गूंगा था। तीनों की मां बुढ़िया पीली पोषाक पहनती थी। एक दिन एक डाकिया यात्रा पर जा रहा था । तीन दिन तक वह चलता रहा। एक रात तेज बारिष हुई,उसे कोई आश्रय नहीं मिला। वह चारो ओर किसी घर की तलाष करने लगा । कुछ दूर पर उसे रोषनी चमकती दिखाई दी। वह यह सोचकर उस ओर चल दिया कि रोषनी किसी घर की है ।

वहां जरूर कोई घर होगा।’ चलते चलते उसने सोचा। उस स्थान पर पहुंच कर उसने देखा कि पास पास दो झोंपड़ियां बनी हुई हैं। एक बुढ़िया दरवाजे के पास बैठी है। वह ओलों की मां थी । डाकिया बोला ,‘ मां षरण दो ।’

‘ बहुत अच्छा मैं तुम्हें षरण दूंगी,’ बुढ़िया ने कहा

बुढ़िया अपने तीनों बेटों के लिये एक बड़े बर्तन में खाना बना रही थी।

‘ अंदर आओ ’ बुढ़िया ने यात्री को बुलाया। उसके अंदर आने पर बोली ,‘ मेरे बेटे आ रहे हैं, मैं उन्हें क्या बताउंगी, अब मैं क्या करूं अगर तुम्हें देख लिया तो मार डालेंगे ।’

उसी समय तड़ तड़ की आवाज आकाष से आई,ओले आ रहे थे । बुढ़िया बोली ,‘एक मेरा बेटा लंगड़ा है दूसरा अंधा है और तासरा गूंगा है । लंगड़ा और अंधा बहुत बदमाष हैं उन्हें किसी को मारने में डर नहीं लगता है। तुम उन्हें मिल गये तो तुम्हें मार डालेंगें कोने में बैठ जाओ। ’’

एक बड़े से कटोरे में उसने मांस दिया। मांस सब जानवरों का मिला हुआ था। लेकिन जितना डाकिया खा रहा था उतनी ही उसकी भूख बढ़ रही थी । कारण यह था ओले रास्ते पर से गुजर रहे यात्रियों और जानवरों को मारकर मां को लाकर देते थे । यह मांस अभिषप्त होता था और किसी की भी भूख संन्तुष्ट नहीं कर पाता था।

धीरे धीरे तड़तड़ की आवाज नजदीक आती जा रही थी। झोंपड़ी के चारो ओर आवाज आइ्र फिर दरवाजे पर अंत में ठंडे पानी के छींटे आने लगे। ‘जल्दी खाना खतम करो जल्दी।’ बुढ़िया चिल्लाई। 

यात्री ने जल्दी से खाना खाया। ओलों की तड़तड़ दरवाजे पर आई। बुढ़िया ने यात्री को एक बड़े बर्तन में ढक दिया। तीनों ओले भाई एक एक करके आये। बुढ़िया ने उन्हें खाना दिया। षीघ्र ही एक भाई बोला,‘ मां कुछ गंध सी आ रही है,यह कहां से आ रही है ।’

‘मालुम नहीं,’ बुढ़िया बोली,‘ यहां तो कुछ नहीं है ।’ 

कुछ देर में दूसरा बोला,‘ मां कुछ न कुछ तो है गंध आ रही है ।’

‘ हो सकता है आटा सड़ गया है उसकी गंध आ रही है ।’

‘ तीनों भाई चुप हो गये और सो गये। यात्री को बहुत देर तक नींद नहीं आई।काफी रात गये वह सो गया । सुबह नींद खुली तो देखा न झोंपड़ी ,न ओले न बुढ़िया। खुले मैदान में मेड़ के किनारे सो रहा था ं आष्चर्य चकित वह उठ कर चल दिया ।


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