बहुत दिनों के बाद सभी को
याद मेरी आई,
सर पर जब बूॅूंदे बरसी
तो मेरी हुई ढुढाई।
एक कोने में खड़ा हुआ था ,
घूल गुबार चढ़ा हुआ था , काला रंग था भूरा हो गया ,
जाना था बाजार जरूरी ,
तब याद मेरी आई ।
आग उगलता जब सूरज था,
तब भी सर पर मैं लगता था ,
मैं सब पर छाया करता था ,
तेज धूप में में ही तपता
दया नहीं आई ।
रखे रखे ताने थी चटकी ,
उन पर जंग जरा सी अटकी,
मकड़ी भी तो तन पर चढ़ गई ,
काम पड़ा तो ढूंढ मचाई
कहॉं है छाता मेरे भाई ।
No comments:
Post a Comment