बहुत याद आते हैं बचपन के खेल
चलती थी जब हम बच्चों की रेल
जोर से इंजन बजाता था सीटी
खड़ा एक साथी बन जाता था टीटी
एक रहता पीछे दूजा अगाड़ी
छुक छुक छुक छुक करती चलती थी गाड़ी
हर कमरे के आगे रुकते थे जाते
एक नई सवारी वहां पर बिठाते
चाय ले लो चाय ले लो की नकल थे बनाते
फिर पूड़ी भांजी की ठेलें लगाते
सारे मुहल्ले के ही बच्चे थे बहन भाई
न भाई था दूर का न बहन पराई
हमारे वो रिश्ते आज भी अपने हैं
नयी पौध के सगे भाई भी सपने हैं।
No comments:
Post a Comment