Monday, 21 November 2016

बचपन के खेल

 बहुत याद आते हैं बचपन के खेल
चलती थी जब हम बच्चों की रेल
जोर से इंजन बजाता था सीटी
खड़ा एक साथी बन जाता था टीटी
एक रहता पीछे दूजा अगाड़ी
छुक छुक छुक छुक करती चलती थी गाड़ी
हर कमरे के आगे रुकते थे जाते
एक नई सवारी वहां पर बिठाते
चाय ले लो चाय ले लो की नकल थे बनाते
फिर पूड़ी भांजी की ठेलें लगाते
सारे मुहल्ले के ही बच्चे थे बहन भाई
न भाई था दूर का न बहन पराई
हमारे वो रिश्ते आज भी अपने हैं
नयी पौध के सगे भाई भी सपने हैं।



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