Wednesday, 29 January 2025

chanda ki dadi

 च्ंादा के घर आई दादी


गोल रुपहले रथ पर चढ़कर 

चंदा के घर दादी आई ,

बैठंूॅंगी कुछ दिन तेरे घर

इन्द्रलोक से चलकर आई ।

चक्कर सात लगाये हैं

परीलोक को जाउंगी

तबतक थोड़ी देर ठहरकर 

मोतीचूर बनाउंगी ।

कामधेनु से दूध लिया है

खोआ यहीं पकाउंगी

मेवा केशर और चाशनी

उसमें खूब मिलाउंगी। 

चंदा बोला दादी अम्मा

समझो इसको अपना घर

मर्जी आये वही करो तुम

नहीं यहॉं पर कोई डर।

बादल ने अम्मा को देदी 

थोड़ी दूध मलाई 

तब अम्मा ने बिजली से

थोड़ी थेाड़ी आग मंगाई 

गोल चमकते लड्डू का 

अम्मा ने था ढेर लगाया

आसमान से गंधर्वों को

लड्डू खाने को बुलवाया

चंदा को भी खूब खिलाये

लड्डू मोती चूर के 

खुषबू वाले मेवा  वाले 

मीठे मीठे बूर के ।

बाकी लड्डू भर झोली में 

चंदा से दादी यॅूं बोली

परी लोक में भी ले जाऊ

लड्डू भरकर झोली।

दादी बैठी अपने रथ पर

रख झोली बादल के सर

खुषबू पाकर हवा चली

झांका झोली के  अंदर

धीरे धीरे फाड़ी झोली

लड्डू झर गये सारे

लपक न पाई दादी उनको 

चमके बनकर तारे ।


Monday, 27 January 2025

aai garmi

 मुन्ना ही क्यों पढ़ता



चिड़िया तो बस गाना गाती

मेढ़क बस टर्राता

बादल देख मोर नाचता

कभी न देखा पढ़ता।


सूरज चंदा को ना फुरसत

इधर इधर फिरने से

पर्वत की तो आफत ही बस

आ जाती हिलने से।


इन्हें न कोई कभी डांटता

नहीं बिठाता पढ़ने

कहीं न इनको जाना पड़ता

रोज पहाड़े रटने।


मुन्ने जी यदि जरा खेलते

सब है डांट लगाते

पढ़ो पढ़ो का शब्द हमेशा

रहते उन्हें सुनाते।

















गर्मी आई


सर्दी की मुठ्ठी हुई बंद

ठंडी हवा अब हुइ्र मंद

मफलर टोपी गये उतर

ओवरकोट न आये नजर

सी सी कोई नहीं सिहरता

मुँह से धंुआ नहीं निकलता

चौराहों पर नहीं अलाव

चौपालों के पड़े पड़ाव

संध्या को भी चहल पहल

लोग रहे अब सुबह टहल

होली की है अब तैयारी

डैडी लाकर दो पिचकारी

सब पर छोड़ेगे हम रंग

नाचेंगे सरसों के संग।



akbar birbal ke kisse 1

  अकबर बीरबल के किस्से

बादषाहत किस काम की


अकबर के कोई सन्तान नहीं हुई थी, सलीम  चिष्ती की दरगाह पर उन्होंने मन्नत मानी और तब उनकी बेगम मरियम उज जमानी के एक पुत्र हुआ । उसका नाम अकबर ने सलीम रखा । वह किषोरावस्था से ही मद्यपान करने लगा। उसकी मद्यपान की आदत से अकबर बहुत परेषान रहने लगा। उसने बहुत प्रयत्न किया कि किसी प्रकार से वह दुर्व्यसन से छूट जाये। अंत में बीरबल की सलाह से अकबर ने नगर में ढिंढोरा  पिटवा दिया‘ ‘षहजादे सलीम से गद्दी का हक छीन लिया गया है। बादषाह किसी योग्य व्यक्ति को गद्दी का हकदार बनाना चाहते  हैं। इसके लिये गरीब या अमीर होना आवष्यक नहीं ,आवष्यक है योग्यता। वह राज्य काज कर सके इसके लिये उस व्यक्ति को बादषाह के कुछ प्रष्नों का उत्तर देना होगा । अगर वह उचित उत्तर देगा तो बादषाह उसे अपना उत्तराधिकारी बनायेंगे।’

  नगर में जनता में बेचैनी हो गई। जनता को सलीम के हक छीना जाना पसंद नहीं आ रहा था। सलीम को खबर हुई कि बादषाह उसका हक छीनकर किसी अनजान व्यक्ति को देना चाहते हैं तो वह भी घबराया। परंत्ुा ढिंढोरा पिट चुका था, इसलिये वह कुछ कर नहीं सकता था । वह चुप बैठ गया, सोचा अगर तकदीर साीधी चली तो उसका हक नहीं छिनेगा।

नियत दिन बादषाह के बाग में मंडप  बनाया गया। मंडप के बीच में गद्दी के हकदारों के बैठने और खड़े होने के लिये स्थान निष्चित किया गया। पद और प्रतिष्ठा के अनुसार नगर के गणमान्यों के बैठने लिये स्थान बनाया गया। जगन्नाथ पंडित,बीरबल , टोडरमल, अब्दुलफजल,खानाखाना फैजी,ख्वाजाजंग, तानसेन, तानतरंग बैजू बाबरा ,कविगंग और राज माता। करीब एक लाख लोगों के बैठने के लिये व्यवस्था की गई थी । महिलाओं के बैठने के लिये अलग व्यवस्था थी,वहां पर्दा लगा हुआ था। धीरे धीरे पंडाल भर गया। एक एक करके सरदार, उमराव, अमीर,दरबारी,राजा,महाराजा , सेठ ,साहूकार सबके आ जाने के बाद अकबर आये , साथ ही उनके बीरबल भी थे । सब अपने अपने नियत स्थान पर बैठ गये । चोबदार ने पुकारा ,‘ जिस किसी को दिल्ली की बादषाही का अधिकारी बनना है,वह आगे आये,यहां गरीब अमीर उमराव राजकुमार षहजादा जो कोई परीक्षा में उत्तीर्ण होगा,वह गद्दी का उत्तराधिकारी होगा ।’

चोबदार की घोषणा सुनकर पदाभिलाषी आकर नियत स्थान पर एकत्र हुए, उनमें एक साधारण से वस्त्र पहने किषोर भी था । अकबर के दरबार के प्रमुख बारह व्यक्ति थे।। प्रत्येक को बारी बारी से प्रष्न पूछने थे ।

पं ॰जगन्नाथ ने पूछा,‘ जगत में सबसे बड़ी खान कौन सी है ?’

इसके उत्तर में किसी ने गोलकुंडा की खान , किसी ने बाई की,जिसके मन में जो खान याद आई बताई । उनके बीच में एक आवाज आई ,‘ सबसे बढ़कर ओला खान है ’।

पं॰जगन्नाथ ने देखा यह उत्तर उसी किषोर ने  दिया था। 

बीरबल ने उठकर तुरंत प्रष्न किया,‘ लड़के इस नाषवान् जगत में सबसे बढ़कर क्या है ?’

लड़के ने बिना सोच विचार के उत्तर दिया,‘धर्म’

आगे का प्रष्न कवि गंग ने किया,‘ पुत्र सबसे मीठा क्या है ’

लड़का बोला ‘गरज’

ख्वाजा ने प्रष्न किया‘ पवन से भी बढ़कर वेगवान् कौन है ?’

गरीब लड़के ने उत्तर दिया‘ मन’।

फैजी ने खड़े होकर पूछा,‘राज्य की अमूल्य वस्तु कौन है ’?

लड़के ने उत्तर दिया,‘ राजनीति। उत्तर देकर लड़का बोला ,इतने सरल प्रष्नों की आषा नहीं थी’ दरबार में सन्नाटा छा गया ।यह लड़का इतने कठिन प्रष्नों को सरल बता रहा है। पंडित जगन्नाथ ने फिर पूछा,‘ सच्चा साक्षी कौन है ?’

लड़का बोला ‘अपना मन’।

बीरबल ने पूछा,‘संसार की स्थिति कहां तक है?’

लड़के ने उत्तर दिया ,‘ अपनी मृत्यु तक’

बादषाह अकबर आष्चर्य से लड़के की ओर देख रहे थे,वे बोले ,‘ मृत्यु से संसार का क्या संबंध?’लड़के ने उत्तर दिया,‘प्राण हैं वहीं तक सब कुछ,फिर आप मरे तो जग मरा ’। बादषाह ने बीरबल से लड़के की बुद्धिमानी की सराहना  की । गंग कवि ने पूछा ,मूर्ख कैसे जाना जाता है ?’ लड़का ’‘बोलने से ’।

मियां तानसेन को भी पूछने की इच्छा हुई ,उन्होंने खड़े होकर प्रष्न किया,‘राग और फाग में क्या अंतर है ?’लड़का दृढ़ता से बोला ,नाग और काग के बराबर।

सारी सभा उस लड़के की बुद्धमानी और चपलता से चकित हो गई।’

नगर की जनता और सभा में उपस्थित सभी को लगा कि अब सलीम का भाग्य दुर्भाग्य में अवष्य बदल जायेगा। फैजी ने सोचा कि ऐसा प्रष्न किया जाये कि लड़का घबरा जाये। उन्होंने पूछा,बादषाह के क्रोध का स्वरूप क्या है?’उत्तर मिला ,‘लगी हुई आग ’।

अबुलफजल बोले,‘‘किसके फल मीठे हैं’।

लड़का बोला ,-धैर्य के

बैजू बाबरा से भी पूछे बिना नहीं रहा गया,उन्होंने पूछा,‘अच्छा पुत्र बताओ,‘ रेती में कितने दाने हैं ’

उत्तर मिला ,‘जगत में जितने मनुष्य जीवित हैं उन सबके षरीर में जितने रोम हैं उतने ’

रहीम खनखाना ने पूछा,‘बल की सहायता करने वाला कौन है?’लड़के ने तत्काल उत्तर दिया,‘ साहस ’राजा टोडर मल ने पूछा,‘सबसे नीच दषा कौन सी है ?’लड़के ने उत्तर दिया ‘गुलामी’ । राजा टोडरमल का चेहरा उतर गया, वे चुपचाप बैठ गये। राजा मानसिंह ने पूछा,‘पुत्र बताओ संसार में नीच से नीच व्यापार कौन सा है ?लड़का बोला,‘ भिक्षा।’ राजा टोडर मल की फिर एक प्रष्न पूछने की इच्छा हुई ,उन्होने खड़े होकर पूछा,‘‘पुत्र बताओ  वह कौन सी वस्तु है जो एक बार गये फिर नहीं लौटती है ’ लड़का बोला ,‘समय ’।

एक साधारण से दिखने वाले किषोर से इतने व्यावहारिक अच्छे सटीक उत्तर सुनने की किसी को आषा नहीं थी । बादषाह अकबर ने प्रसन्न होकर कहा ,‘लड़के तेरी जो इच्छा हो मांग ’

लड़का बोला,‘मेरी एक इच्छा पूरी हो जाये तो मैं चला जाऊं एक दरबारी बोला ,‘लड़के बादषाह तेरी हर इच्छा पूरी करेंगे,अपनी इच्छा तो बताओ ।’

लड़के के हाथ में एक गन्ने का टुकड़ा था,वह बोला ,‘यह गन्ना बहुत मीठा है, यदि इस गन्ने से बादषाह किसी से बांसुरी बनवा दें तो एकदम मीठी स्वर लहरी निकलेगी ,मैं मीठी तान बजाता बादषाह बन जाउंगा ’। यब एक दूसरे का मुंह देखने लगे। गन्ने से बांसुरी कैसे बन सकती है।

‘जब मेरी एक इच्छा पूरी नहीं हो सकती तो बादषाहत किस काम की, मैं वृथा क्यों ठहरूें।’कहकर गन्ने का टुकड़ा वहीं छोड़कर चल दिया। बादषाह ने उसके पीछे दरबारी भेजे लेकिन लड़का कहीं नहीं दिखा ं।


Friday, 24 January 2025

jadui desh

 जादुई देश

बसंता की सुनहरी धूप ढलती जा रही थी बच्चे एक एक कर लॉन में इकट्ठे होने लगे।

गहरी भूरी एक इकहर बदन और लम्बे कद वाला सा आदमी ने फाइलो और कागजो के ढेर से सिर ऊपर उठाया। आंखे बेहद शांत थी वह सब बच्चों को अच्छी तरह से पहचानता था। उसके अपने दो बच्चो के साथ मोहल्ले पड़ोस के सब बच्चे वहाँ मौजूद नजर आ रहा था। अधिकतर यही होता था।

अगर भीड़ ऐसी ही बढ़ती रही तो मुझे एक बड़े घर की खोज करनी पड़ेगी निगाहे कमरे में चारों ओर घूम गई घर कमरा घिरा घिरा और छोटा था।

बड़े कमरे की तरफ से उसकी पत्नी की पदचाप सुनाई थी। उसके चेहरे पर अपराधी के से भाव छा गया। बड़ा घर जरूर लेना पड़ेगा। उसके खुद के चारों बच्चे बड़े होते जा रहे हैं। पहले वह कितना भाग्यवान था कि सब खर्चे आराम से बर्दाश्त कर लेता था।

असने लैम्प की रोशनी कुछ धीमी कर दी। उसकी पत्नी गाड कमरे में आई’ फैक तुम्हारे वफादार सुनने वाले आ गये है। उसके कथन में कड़वाहट स्पष्ट झलक रही थी।

वह मुस्कराया कम से कम बच्चों के बीच तो मैं पूरी तरह से सफल हूँ।

ऐसा नहीं फ्रैक वह शांति से बोली तुम्हारी नई पत्रिका भी सफल  रहेगी। हो सकता है लेकिन तब तक आने बिना भुगतान किये बलो के ढेर की ओर देखा अगर जब तक पत्रिका चले तब तक कोई और जरिया आमदनी का हो जाता।

ऐसा कर सकते हो भाड कुसी खिसका कर फ्रैक के समीप बैठते हुए बोला, शाम को खाना खा कर तुम कुद काम घर पर ही क्यो नहीं कर लेते?

कहते कहते उसे रुक जाना पड़ा। क्यों कि लॉन में से जोर से खिलखिलाने की आवाज आई दोनों उधर ही देखने लग माड आह गरती उठ गई नही मैं जानती हूँ यह नहीं हो पायेगा।

फ्रैंक ने बेचैनी से माड की ओर देखा वह खिड़की के पस गई और पर्दा एक ओर खिसका दिया। बच्चे अब घर की ओर बढ़ रहे थे। उनकी आवाजे सुनाई पड़ने लगी थी बातो में उत्साह था।

मैं जानता हूँ कि तुम सोचती हो कि मैं इन बच्चों के लिये ताने बाने बुनने में बहुत समय जाया करता हूँ। फ्रैंक दो बच्चे तुम ही कहती हो इस समय को कुछ काम कर उपयोग में ला सकता हूँ कुछ भी माड उसके चेहरे की ओर देख उसकी बात सुन आह भरते भी मुस्कर उठी फ्रैंक कहता गया आज मैं उन्हें अंदर नही आने दूँगा। बहुत समय बरवाद होता है इतने भोर बिलो का भुगतान आखिर कैसे करूँगी? वह कागजों को देखकर कसमसाया।

बाहर से स्वीटी की उत्साह भरी आवाज आ रही थी मालुम नही आज रात को कहानी में क्या होगा दरवाजे के बाहर जूतों की खटखटाहट आ रही थी फ्रैंक बेचैनी से कुर्सी पर पहलू बदल रहा था उसे बिलों की चिंता अधिक सवार थी।

गाड कुछ क्षण उसे देखती रही फिर खिलखिला पड़ी खिड़की से हट करउसने कसीदा हााि में उठाया और बोली, फ्रैंक उन्हें अंदर आ जाने दो नहीं तो कल रात तक मैं तुम्हें चैन पड़ेगा और न इन बच्चों को।

दस क्षण बाद ही कमरा बच्चों की आवाजों से भर गया। फ्रैंक ने एक के बाद एक का अभिवादन किया। उनकी खुशियों के बीच वह बिल और आंकडत्रे सब भूल गया। 

हैलो मार्था और बाबी आना ऐलन बहुत अच्छा बहुत अच्छा! वाह! वाह! बिलकुल नया रिबन? अरे वाह यह कौन है स्वीटी? तुम्हारा चचेरा भाई। मुझे बाहर एक नई आवाज भी सुनाई दी थी

क्या आप हमारे लिये कहानी पड़ेंगे स्वीटी के चचेरे भाई ने शर्माते हुए पूछा, बच्चे फर्श पर बैठने में व्यस्त थे वो कहानियाँ पढ़ते नहीं सुनाते है स्वीटी ने कहा, अब जल्दी से बैठ जाओ।

मै। पढ़ नहीं सकता, फ्रैंक ने बताया उसने जोर की अंगड़ाई ली और बच्चे के साथ फर्श पर आ बैठा, ये कहानियाँ किताबो में नही लिखी है ये तो मेरे दिमाग में लिखी हुई है।

अपनी लम्बी टांगो को सिकोड़ते हुए वह मुस्कराया, अच्छा बताओ बच्चों मैंने कल कहाँ पर छोड़ा था? 

डॉरोथी को स्केयर को मक्के के खेत में मिला जल्दी से स्वीटी ने कहा और तब...

हाँ तब वे दोनों माणिक देश दिजाड को देखने चल दिये दूसरे बच्चे ने जोड़ा

बिलकुल ठीक मुझे याद आ गया फ्रैंक ने कहा, कमरा कहानी सुनने के लिये बिलकुल शांत हो गया। फ्रैंक का दिमाग बिना यह जाने इधर उधर घूमने लगा।

मुझे यह सब कितना अच्छा लगता है। काश मैं कहानियाँ सुनाकर ही कुछ रुपये कमा सकता। अरे हाँ यह सब समस्या सुलझ जायेगी। कितना मजा रहेगा अगर वह डारोथी और विजाडे के जादुई देश को लेकर कहानी लिख चले। नहीं यह कैसे हो पायेगा मैं अभी तक इस कल्पित देश का नाम तक नही सोच पाया हूँ।

सुनाइये न! सुनाइये ना बच्चे चिल्लाये फ्रैंक हड़बड़ा उठा अरे वह कहाँ सोचने लगा हाँ ठीक, वह बोला अब स्केयर को और टिनबुडमैन

अंकल ड्डपया ये बताइये न ये दोनों कहाँ रहते थे स्वीटी गिड़ड़िाया।

मुझे इस कल्पित देश का नाम सोचना ही पड़ेगा। उसकी आंखे स्वीटी के प्रश्न का उत्तर देने के लिये कमरे में इधर उधर घूमने लगी वे कहाँ रहते थे वह बुदबुदाया।

उसने पुराने ढंग के पियानों की ओर देखा फटे कॉलीन स्टोव उंहुं कुछ नहीं उसकी निगाहे फाइलों के कैबीनेट पर पड़ी वाह यह ठीक रहेगा। वह बच्चों से बोला वो आगे के अदुभुत प्रदेश में रहते थे।

ओज बच्चे धीमे से गुजारे पापा यह ऑज कहाँ है, फ्रैंक के पुत्र कैनेथ ने कहा,

अरे बेटा बहुत बहुत दूर फ्रैंक ने कहा हम लोगों में से अब तक वहाँ कोई नही जा सका है इसके ओर भयानक रेगिस्तान है और एक ओर दरवाजे की घंटी बजीह बच्चे झुझला गये उनके घर से बुलावा आ गया था वह शाम खत्म हो गई।

आखिरी बच्चे को गुडवाय कहा फ्रैंकक्लेर में आया तो उसमें एक नया उत्साह भरा हुआ था। अब वह उस प्रदेश की कल्पना उसके दिमाग में साकार हो उठी  थी अब वह एक किताब लिख डालेगा। वह जल्दी से मेज पर बैठ एक लिफाफे के पीछे लाइन घसीटने लगा। 

फ्रैंक मॉड ने कमरे में से निकलने का बहाना सा बनाते कहा, ‘यह तुम्हें ओज शब्द कहा से मिला।’

हंसते हुए उसने फाइल की  केबिनेट की ओर इशारा कर दिया। पहले दराज के सामने लिखा था ए से एन और नीचे की दराज पर ओ से जैड तक 

मुझे यह नाम नीचे की दराज से मिला। मैं इस प्रदेश पर एक कहानी लिख रहा हूँ एक पूरी किताब उसने उत्साह से कहा। वह लिफाफे पर झुक गया। वहाँ उसने कई शीर्षक लिख डाले थे डारायी और उसके मित्र स्केयरकेा के अनुभव? मानिक देशो कुछ सोचने पर एक शीर्षक और लिख लिया।

कुछ क्षण लिखने के बाद उन सब शीर्षको को देखता रहा। धीरे धीरे उसने आज का अदभुत विजाइ शीर्षक के चारों ओर घेरा बना दिया।

रचित लेगेन फ्रैंक वॉम प्रसिध्द ओज पुस्तकांे के निर्माता की कहानी।



Thursday, 23 January 2025

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Saturday, 18 January 2025

surya aur parmaal kahani veerangnaen

 सूर्य और परमाल

सन् 718 बगदाद के खलिफा वलीद सिंध की लहलहाती प्रकृति प्रदत्त संपदा का लोभ न छोड़ सका उसने अपने सेनापति मुहम्मद बिन कासिम को सिंध पर आक्रमण करने भेजा। सिंध के महाराज दाहर ने अपने युवा पत्र जयशाह को बगदाद की सेनाओं के साथ युद्ध के लिये भेजा यद्यपि जयशाह ने सेना का कुशल संचालन किया और सैनिक वीरता पूर्वक लड़े लेकिन खलीफा की विशाल सेना के सामने न टिके सके और बंदरगाह पर बगदाद का झंडा लहराने लगा।

पुत्र की मृत्यु से व्यथित लेकिन वीरता और ओज से शत्रु को ललकारने स्वयं महाराज दाहर रणक्षेत्र में लडे़े लेकिन मृत्यु को प्राप्त हुए। महाराज दाहर के गिरते ही देवल की सेना ने आत्म समर्पण कर दिया। बगदाद की सेना ने जश्न मनाते बड़े गर्व के साथ मृत दाहर का सिर खलीफा को भेंट किया। महल की स्त्रियॉं भी अस्त्र शस्त्रों से सज्जित खलीफा की सेना से डटकर लोहा लेती रही और अंत में मृत्यु को प्राप्त हो गईं।

कासिम और उसके साथी दाहर के महल को लूटने लगे। मुख्य लूट का माल उनके लिये दाहर की युवा पुत्रियॉं सूर्य और परमाल थीं। खलीफा की आत्मा का रेशा रेशा इस माल को पाकर प्रसन्न होगा ,साथ ही खलीफा के अहं को संतुष्ट करने के लिये स्वर्ण थाल में दाहर का सिर रखा और छत्र लेकर कासिम ने कड़े पहरे में लूट के इस सामान को बगदाद खलीफा के पास भेंट स्वरूप भेज दिया और स्वयं भारत विजय का कार्यक्र्रम बनाने लगा। 

दाहर का सिर देखकर खलीफा थर थर कॉंप उठा था अल्लाह क्या हिन्दुस्तान के काफिरों की शक्लें इतनी खूंखार होती हैं उसने तुरंत उन्हें वहॉ से हटाने की आज्ञा दी, लेकिन जब सूर्य परमाल पर उसकी ऑंख पड़ी तो नजरें टिकी रह र्गइं। बहिश्त की हूरें जन्नत की पारियॉं उसके मुॅह से निकला। खलीफा ने सूर्य और परमाल को अपने शयन कक्ष में बुलाया और सूर्य के सामने निकाह का प्रस्ताव रखकर अपनी बेगम बनाना चाहा। सूर्य की ऑंखोें से टप टप ऑंसू गिर पडे। यह देखकर वह उसे चुप कराने के लिये उठा ही था कि सूर्य एक तरफ हटते हुए बोली ,‘हमें हाथ मत लगाना खलीफा, यह तो हमारा सौभाग्य होता जो हम इस विशाल साम्राज्य की मलिका होते लेकिन नीच कासिम हमें पहले ही अपवित्र कर चुका है।’ 

सुनकर खलीफा धक रह गया उसके विश्वास पात्र ने उसे धोखा दिया। नीच कासिम मेरे ही साथ धोेखा। खलीफा की ऑखों से चिनगारियॉं निकल रही थीं। परमाल कुछ न समझ सकी उसने आश्यर्च से सूर्य की ओर देखा सूर्य मुस्करायी परमाल भी तात्पर्य समझ गई एक हंसी की रेखा उसके होंठों पर भी खिंच गई । 

खलीफा ने कड़कती आवाज में हुक्म दिया कासिम की लाश में भूसा भर कर लाया जाये। कासिम ने आज्ञा सुनी तो धक रह गया उसने सैनिकों को बहुत रोका कि एक बार खलीफा के सामने जिंदा ही पेश होने दो वह निर्दोष होने का प्रमाण देदे बस फिर चाहे तो स्वयं खलीफा तलवार से सिर अलग कर दे। लेकिन सैनिकोें ने कासिम की एक न सुनी और खलीफा की आज्ञा का पालन कर दिया। जब कासिम की भुस भरी लाश खलीफा के सामने आई तो खलीफा ने क्रोध से लात मारी। सैनिकों ने कासिम की प्रार्थना खलीफा को सुनाई तो खलीफा सोच में पड़ गया,‘ क्या कासिम सच कह रहा था क्या वह बेकसूर था उस से मासूम लड़कियॉ ऐसा झूठ बोलेगी नहीं यह नहीं हो सकता।’ सोचते सोचते वह छत पर टहलने लगा उसने सूर्य और परमाल को वहीं हाजिर होने का हुक्म दिया। 

एक दूसरे से सटी सूर्य और परमाल छत पर आइंर्। उन्हें देखते ही खलीफा बोला ‘देखो लडकियों मैने कासिम को कल सजा देदी है। मेरे साथ बेवफाई की यही सजा है लेकिन एक बात सच बताना क्या तुमने सच कहा था। ’

सूर्य हंस पडी ,‘नही वह तो झूठ था बिलकुल झूठ ’खलीफा की ऑखों मे चिनगारियॉं धधक उठी,‘ तुमने झूठ क्यों कहा’ सूर्य की गर्दन तन गई ,‘अपने देश के लिये ,वतन के लिये और पिता की मौत का बदला लेने के लिये ’उसकी ऑंख ेचमक रही थीं फिर सोच में पडे खलीफा की ओर देखते हुए बोली,‘ उस कासिम की क्या बिसात हम आर्य कन्याओं को हाथ भी लगा सके।’ 

‘तुम्हारे अभिमान को ऐसा कुचल दूॅंगा कि ’खलीफा दंड सुना पाता कि दोनों बहनों ने कमर में छिपी कटार निकाली और एक दूसरे की छाती में धंांेप दी दोनो के निर्जीव शरीर महल की छत से लुढक पड़े। खलीफा दाहर की क्रूर ऑंखे चमकी जैसे उनमें हंसी थी। 





Friday, 17 January 2025

chandni fisal rahi

 ब्ूंाद की पायल


हवा ने बदली के गुलगुली मचाई

खिल खिल खिल बदली खिलखिलाई

बदली की दूध भरी मटकी छलछलाई

धरती ने बूंदों की पायल  बनाई

छम छम छम छम करती इतराई

टप टप टप टप ढोलक  बजाई

फूलों ने रंगभरी चूनर लहराई

बजने लगी डालों की मीठी शहनाई

हवा ने बदली के गुलगुली मचाई 































चंादनी  फिसल रही




देख षिखर पर हिम का सागर

     चांदनी मचल गई,

कूद पड़ी खिल खिल करती

      फिर वो फिसल गई,

कभी पेड़ की फुनगी बैठे

      कभी दिखाये चाल,

घेरदार लहंगा फैलाकर 

       नाचे दे दे ताल,

कभी गुदगुदी करे शिला की 

       देख देख मूुसकाये 

कभी वर्फ की गेंद बनाकर 

       गोल गोल  लुढ़काये 

 वर्फीली बरखा में भीगे

           दोनों हाथ फैलाये

थकी चांदनी ओढ़ चुनरिया

            पर्वत पर सो जाये ।




pavitr agni ki chori

 ग्रीक पुराण कथा         पवित्र अग्नि की चोरी


बात उस समय की है जब संसार में केवल पृथ्वी और स्वर्ग ही थे। स्वर्ग के राजा थे जीयस उनकी पत्नी का नाम था हीरा। पृथ्वी पर मानव का जन्म नहीं हुआ था केवल विशाल पशु ही विचरण करते थे। लेकिन उन पशुओं में कोई भी इतना बुद्धिमान नहीं था जो पृथ्वी पर शासन कर सके। देवताओं ने निश्चय किया कि इस प्रकार के प्राणी का निर्माण किया जाय जो पृथ्वी पर सुयोग्य रूप से शासन कर सके। इसके कार्य के लिये प्रामीथियस नाम के एक देवता को चुना गया।

प्रामीथियस ने मिट्टी और पानी से लुगदी बनाकर एक प्राणी का निर्माण किया। जानवर हाथ पैर चारों से चलते थे लेकिन इस प्राणी को उसने सीधा खड़ा किया। अब प्रामीथियस सोचने लगे कि इस प्राणी को ऐसी क्या विशेषता उपहार में दी जाये कि वह अन्य से भिन्न हो सके। प्रामिथियस के बड़े भाई एपीमिथियस ने पशुओं का निर्माण किया था और उसने उन्हें सभी विशेषताएँ दे दी थी जैसे शक्ति, साहस, चालाकी, तेज भागने की कला, पंख, नाखून, सींग। अब मनुष्य को क्या दे?

प्रामीथियस के मस्तिष्क में आया कि मनुष्य को अग्नि उपहार स्वरूप दी जाय। जिससे वह पशुओं को अपने वश में कर सकें तथा उससे अनेकों वस्तुओं का निर्माण कर अपना बचाव कर सके क्योंकि मनुष्य के पास बचाव का कोई भी साधन जैसे सींग, पैने, नाखून मोटी चमड़ी आदि कुछ नहीं था। वह तो हवा, पानी तक से अपनी रक्षा करने में असमर्थ था। प्रामीथियस वापस स्वर्ग आया। उसने सूर्य के रथ से मशाल जलाई और उस पवित्र अग्नि को मनुष्य को उपहार स्वरूप दे आनन्दित वापस स्वर्ग चला गया।

जब जीयस ने मनुष्य के पास अग्नि देखी तो परेशान हो उठा क्योंकि अब मनुष्य पूरी तरह देवताओं जैसा था। जीयस ने सोचकर एक सर्वांग सुन्दरी नारी का निर्माण किया, उसका नाम रखा पांडोरा। उसे प्रामिथियस के घर भेज दिया। पांडोरा को देखकर प्रामीथियस तुरंत समझ गया कि उसे बर्बाद करने के लिये जीयस ने नारी का निर्माण किया है क्यांेकि पवित्र अग्नि को चुराकर वह मनुष्य को दे आया है।

लेकिन एपीमीथियस पांडोरा को देख उसके प्रेम में पड़ गया और उसे घर ले आया। एपीमीथियस के पास एक बक्सा था। जिसमें उसके पास बहुत सी ऐसी वस्तुएँ बंद थी जिन्हें उसने पशुओं को नही दिया था। एपीमीथियस ने पांडोरा को चेतावनी देते हुए कहा कि चाहे कुछ भी हो जाये इस बक्से को नही खोलना। पांडोरा अपनी उत्सुकता रोक न पाई कि आखिर इसमें ऐसा क्या बंद है जो वह नहीं दिखाना चाहता है? जैसे ही वह अकेली हुई बक्से की ओर भागी, उसने सोचा, जरा सा खोल कर देख लूँगी और तुरंत बंद कर दूँगी।

एपीमीथियस को मालुम भी नहीं पड़ेगा। जैसे ही उसने ढकना हटाया तमाम नाशकारक वस्तुएँ जैसेः महामारियाँ, ईर्ष्या, द्वेष, धृणा, दुश्मनी आदि निकल पड़ी और चारों ओर बिखर गई। पांडोरा ने जल्दी से ढकना बंद करना चाहा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और बक्सा खाली हो गया केवल आशा उसमें बंद रह गई। आशा जिसे मनुष्य कभी नहीं छोड़ता।

अब देवताओं केा मनुष्य से कोई खतरा नहीं रह गया था क्योंकि अब मनुष्य के खुद के ही दुश्मन थे जो जानवरों से बदतर थे लेकिन प्रामीथियस को जीयस अभी भी क्षमा नहीं कर पाया।

जिसने स्वर्ग को पवित्र अग्नि को चुराया है उसे दंड अवश्य दिया जायेगा। उसे पहाड़ से जकड़ दिया जाय। वहाँ सूर्य का ताप कभी नहीं मिलेगा, वह कराहेगा, तड़पेगा। एक गिद्ध उसके पेट को निरंतर नोचता रहेगा जितना वह नोचेगा पेट फिर उतना ही होता जायेगा। जीयस ने उसे पहाड़ की चोटी पर बंधवा दिया लेकिन प्रामीथियस न कराहा, न तड़पा, न सहायता के लिये चिल्लाया वह बहादुरी से वहाँ अपने दंड को भोगता रहा।

डॉ॰ श्ािश गोयल


Saturday, 4 January 2025

teacherji bal kavita

 टीचर जी

दादाजी जी की टोपी पहनी

चश्मा पापा जी का

लंबी लंबी बाहों वाला

कुरता चाचा जी का।


भइया जी का पहन पाजामा

मुन्ने राजा हुये बड़े

एक टांग पर टांग चढ़ाकर

कुर्सी ऊपर कूद चढ़े।


पापा मम्मी दादी दादा

वहाँ बुलाकर उन्हें बिठाया

बड़ी शान से भइया जी को

कहा  मानीटर तुम्हें बनाया ।


दादाजी की छड़ी दिखाकर

बोले’ बच्चो लड़ो नहीं ।

अपनी अपनी पुस्तक खोलो

बात जरा सी करो नहीं।


balban ka nyay

 बल्बन का न्याय


बल्बन दरबार में बैठा था। राज्य कार्य चल रहा था। दरबारियों के चेहरे प्रसन्न थे, क्योकिं बल्बन के सैनिकों ने मुगलों को बुरी तरह परास्त कर सतलज पार करने से रोक दिया था। अवध के सिपहसालार हैवत खॉं का इस युद्ध को जिताने में वहुत हाथ था। 

बल्बन अपने बड़े पुत्र मुहम्मद खॉं से बहुत मुहब्बत करता था। उस पर उसकी पूरी आशाऐं थीं। एक बार मुहम्मद खॉं शत्रुओं से घिर गया था उस समय हैवत खॉ ने अपनी जिन्दगी खतरे में डालकर मुहम्मदखॉं की जिन्दगी बचाई थी। बल्बन हैवत खॉ का ऐहसान मंद था। उस समय हैवत खॉं बल्बन को रण के किस्से सुना रहा था। बल्बन बहुत मजे ले ले कर किस्से सुन रहा था कि एकाएक एक औरत दरबार में हाथ जोड़ कर आई,“ ओ मालिक’ अपनी हॉफती सांसो को काबू में करते वह बोली। 

“क्या चाहिये ?’ बल्बन ने नम्रता से पूछा। 

“मैं हैवत खॉ के विरूद्व एक याचिका दायर करना चाहती हूॅ। “स्त्री ने कहा। 

दरबार में हलचल मच गई। बल्बन ने कठोर मुद्रा में दरबारियों को देखा तो दरबारी सहम कर चुप हो गये। फिर बल्बन ने उस स्त्री से पूरा बयान देने के लिये कहा। 

‘मैं एक जादूगर की पत्नी हूंँ। हैवत खां ने लेखाकार की सहायता से मिलकर मेरे पति की हत्या की हैं। मैं आपके पास न्याय मांगने आई हूैं।’

‘तुम्हें न्याय मिलेगा,’ सुल्तान बल्बन ने कहा । उसके बाद हैवत से रण क्षेत्र का विवरण जारी रखने के लिये कहा। हैवत खाँ लड़खड़ाती जबान में विवरण सुनाता रहा। जब वर्णन पूरा हो गया तो बल्बन ने राज्य कोष से खजाना मंगवाकर स्वर्ण मुद्राऐं हैवत खां पर लुटाई। कोषाधिकारी ने घोषणा सुनाई, ‘‘राज्य के प्रति निष्ठापूर्ण सेवाओं से प्रसन्न होकर सुल्तान ने हैवत खां को एक करोड़ स्वर्ण मुद्राऐं बतौर इनाम पेश की हैैं।

इस घोषणा के तुरंत बाद सुल्तान की मुद्रा बदल गई ‘‘ मेरा एक कर्तव्य पूरा हो गया, लेकिन अब मुझे दूसरा कार्य पूरा करना है। आज एक महिला ने मेरे न्याय को दस्तक दी है।’ फिर हैवत खाँ की ओर देखकर कहा, ‘‘ तुम अपनी सफाई में क्या कहना चाहते हो?

‘‘मेरे आका! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, मुझे माफ कर देें। ‘हैवत खां ने प्रार्थना की। ‘स्त्री न्याय मांगने आई है, तुम्हें माफ करने नहीं। ‘‘ बल्बन क्रोधित हो उठा सम्राट की आज्ञा से हैवत खां को तुरंत जंजीरों से जकड़ दिया गया।

न्याय मंत्रियों ने मंत्रणा की।

’इस अपराण की क्या सजा है। ‘बल्बन ने उनसे पूछा

‘‘खून के बदले खून ,बल्बन का यही कानून है, लेकिन अपराधी ने अपराध कबूल किया है,सजा में कुछ दया शामिल की जा सकती है।’

सुल्तान ने सपाट और तीखी आंखों से न्याय मंत्री की ओर देखा, ‘तुम यह इसलिये कह रहे हो क्योंकि अपराधी सुल्तान का वफादार दरबारी है, लेकिन न्याय के मामले में अपने पुत्र को भी नहीं बख्शंूगा। 

लेखाकार को शहर के द्वार पर लटका दिया गया। हैवत खां को पांच सौ कोडे लगवाकर विधवा के सुपुर्द कर दिया कि वह उसे चाकू मार सकती है, जैसे हैवत खां ने उसके पति को मारा।

हैवत खां के साथियों ने बीस हजार दीनारें उस महिला को देकर हैवत खां को मरने से बचा लिया। लेकिन हैवत खां उस घटना के बाद इतना शर्मिदां हुआ कि फिर कभी घर से बाहर नहीं निकला।









Friday, 3 January 2025

vyapari ki beti bal katha

 व्यापारी की बेटी


बात कुछ पुरानी है, एक व्यापारी ने अपनी छत की मरम्मत के लिये एक राज बुलाया। जिस समय राज छत का काम कर रहा था व्यापारी अपनी युवा पुत्री कंगना के साथ छत की मरम्मत का काम देखने आया। राज ने व्यापारी की बेहद सुन्दर लड़की देखी तो उसे देखता ही रह गया। काम करता जाता और चोर नजरों से कंगना को भी देख लेता था। बार बार देखने से उसका ध्यान जरा चूका और उसकी उंगली एक स्थान से कट गई । खून बहते देख कंगना के मुँह से ऑह निकला तो व्यापारी ने भी ध्यान दिया और दासी बुलाकर व्यापारी ने राज की उंगली पर मलहम पट्टी करवा दी। राज ने समझा, कंगना भी उससे प्यार करने लगी है। घर आकर वह कंगना के ध्यान में खो गया। धीरे धीरे वह बीमार रहने लगा और सूखता चला गया।

राज की माँ पुत्र की दशा देखकर बहुत परेशान हुई। उसने पुत्र को वैद्य को दिखाया परन्तु किसी प्रकार का लाभ नही हुआ। वैद्य ने कहा कि कोई बात तुम्हारे बेटे के मन में उमड़ घुमड़ कर रही है। माँ ने प्यार से दुलार से बेटे से पूछा कि आखिर ऐसी क्या बात हो गई है जो वह इतना चिन्तित है।

‘माँ ! अगर तुम मेरे कहे अनुसार करो तब तो मैं तुम्हें बताऊँ नहीं तो कोई फायदा नही,’ राज की माँ ने वादा किया कि वह उसके कहे अनुसार करेगी।

तब राज ने बताया वह कंगना से प्यार करने लगा है और उससे शादी करना चाहता है।

उसकी माँ बहुत उलझन में पड़ी, ‘हम यह सब कर कैसे पायेंगे। कंगना बहुत बड़े व्यापारी की बेटी हैै और तुम एक साधारण राज, कहीं भी तो मेल नहीं है।’

राज ने कहा, ‘माँ ! तुम ने मुझसे वादा किया था।’

‘वादा किया था यह तो ठीक है पर कहीं कहने का मुँह तो हो मुझे पागल खाने में और डाल दिया जायेगा। यह मैंने माना कि तुम अच्छे से राजकुंवर की तरह सुंदर सलोने हो पर हर माँ को अपना बच्चा सबसे अच्छा लगता है, परन्तु यहाँ आकर क्या इस टूटी खटिया पर उसे बिठाओगे, हम कैसे उसका निर्वाह कर पायेंगे।’

‘माँ यह सब बाद की बात है, तुम ऐसा करो,’ राज ने कहा,‘ तुम एक लकड़ी लेकर व्यापारी का दरवाजा खटखटाना, जब तक कि कोई बाहर न आ जाये, तुम कहना मुझे बस व्यापारी से बात करनी है, उसके आने पर मेरी इच्छा बताना, सुनकर अवश्य वह दरवाजा बंद कर लेगा। फिर तुम रोज जाना, अंत में झुंझला कर एक दिन अवश्य वह दरवाजा खोलकर तुम्हें बुलायेगा।’

उसकी माँ व्यापारी के दरवाजे पर जाकर दरवाजा खटखटाने लगी। सेवक ने द्वार खोल और राज की माँ को जाने के लिये कहा लेकिन माँ ने कहा वह व्यापारी से बात किये वगैर नहीं जायेगी। तंग आकर व्यापारी ने पूछा, आखिर वह चाहती क्या है। 

  ‘महोदय , मेरे पुत्र ने जब से आपकी पुत्री को देखा है वह उससे प्रेम करने लगा है, अगर उससे शादी नहीं हुई तो वह मर जायेगा।’

व्यापारी कुछ देर सोचता रहा फिर बोला,‘ ठीक है मैं शादी तो कर दूंगा लेकिन तुम्हारे पुत्र को पहले तीन बहुमूल्य वस्तुऐं लानी पड़ेंगी। ये तीन चीजें हैंः पहली अजदहे के मुँह का मोती, दूसरी सुनहले कछुए का खोल, और तीसरी है सुनहला शेर। अगर ये तीनों चीजें वह ले आया तो मैं अपनी पुत्री की शादी उससे कर दूंगा।’

माँ के घर पहुंचते ही लड़का उठ कर खड़ा हो गया और पूछने लगा कि क्या हुआ

‘ व्यापारी शादी करने के लिये तो तैयार है, ’निराशा से सिर हिलाते हुए माँ ने कहा, ‘लेकिन आशा नहीं है तीन अनमोल वस्तुऐं चाहिये, अजदहे के मुँह में मोती, सुनहले कछुए का खोल, और सुनहला शेर। ये तीनों वस्तुऐं मिलने पर ही वह तुमसे अपनी पुत्री की शादी करेगा।’

‘अरे! ये तो बहुत आसान है। ’ लड़का बोला ,‘मैं जाकर ले आऊँगा।’

उसने पश्चिम की तरफ यात्रा प्रारम्भ कर दी क्योंकि उसने सुना था अनमोल वस्तुऐं पश्चिम की तरफ ही मिलती है।

उसे यात्रा करते करते कई दिन बीत गये, एक दिन उसे रास्ते में एक अजदहा मिला वह बोला, ‘तुम किधर जा रहे हो, अब आगे यहाँ से नहीं जा सकते।’

‘क्यों ? ’राज ने पूछा तो, अजदहा फुफकारते हुए बोला, ‘तुम बुद्ध प्रदेश में जा रहे हो, वह पश्चिमी स्वर्ग है वहाँ तुम्हें बुद्ध अवश्य मिलेंगे, अगर उनसे एक प्रश्न मेरे लिये पूछो तो में जाने दूंगा,’‘ बुद्ध मिलेंगे तो जरूर पूछूंगा बताओ।’ युवक बोला। ‘तुम इस स्थान का नाम बताकर पूछना कि वहाँ रहने वाला अजदहा सैंकड़ों वर्षों से तुम्हारी सेवा कर रहा है फिर भी स्वर्ग क्यों नहीं जाता।’ राज ने उसे आश्वासन दिया वह अवश्य बुद्ध से उसका प्रश्न पूछेगा और आगे चला।

काफी दूर चलने पर उसे एक विशाल कछुआ मिला। उसने अपना शरीर रास्ते में फैला लिया और राज का रास्ता रोक लिया। राज ने कहा कि उसे जरूरी काम से जाना है।

‘ जाने तो दूँ, पर बुद्ध भगवान् से मेरी एक मुश्किल का हल पूछ लो तो जाओ।’ कछुऐ ने कहा ।

‘मुझे अपनी परेशानी बताओ में भगवान बुद्ध से अवश्य पूछूंगा।’

‘तुम बुद्ध से पूछना कि अमुक स्थान पर रहने वाला कछुआ एक हजार साल से सत्कर्म करते हुए रह रहा है फिर भी उसे स्वर्ग क्यों नही जाने दिया जाता।’ राज ने वादा किया वह बुद्ध से उसका प्रश्न जरूर पूछेगा और आगे बढ़ा।

करीब पन्द्रह दिन तक वह चलता रहा। जंगल घना होता गया, उसे एक मन्दिर दिखाई दिया। वह आराम करने के लिये, वहाँ रुक गया। अंदर जाकर देखा भगवान की मूर्ति के आगे एक लम्बे लम्बे सुनहरे बालों वाला शेर बैठा है। राज एकदम चौंक गया क्योंकि उसे सुनहला शेर ही चाहिये था। उसने शेर से सहायता की प्रार्थना की तो शेर तैयार हो गया। राज ने कहा कि शादी के दिन आकर उसके ससुर के सामने बैठ जाये बस। यह कहकर आगे बढ़ गया।

चलते चलते वह बु़द्ध भगवान के सामने पहुँचा उसने बुद्ध के सामने शीश नवाया। भगवान् ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा जो पूछना है पूछो। राज ने अजदहे और कछुए की समस्याऐं बुद्ध को बताई तो वे बोले,‘ उस अजदहे के मुँह में दो मोती है जब कि अन्य अजदहों के मुँह में एक ही मोती होता है एक मोती थूक दे तो वह स्वर्ग चला जायेगा। कछुए के खोल के अंदर एक सुनहला खोल है जो बहुत खुरदुरा है अगर वह खोल फेंक दे तो वह स्वर्ग चला जायेगा।’

राज इन दोनों उत्तरों को सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ क्योंकि उसे वे ही दोनों वस्तुऐं चाहिये थी। उसने बुद्ध को धन्यवाद दिया और वापस घर के लिये चल दिया। रास्ते में उसने कछुए और अजदहे को उनकी समस्या का हल बताया और कछुए से खोल और अजदहे से मोती लेकर आगे बढ़ा।

घर आते ही उसने दोनों चीजें व्यापारी को सौंप दी और सुनहले शेर के लिये वादा किया कि वह शादी के दिन देगा। अब तो अपनी पुत्री की शादी राज से करनी पड़ी। सुनहला शेर शादी के दिन उपस्थित हुआ। मेहमान तीनों अलभ्य वस्तुओं को देखकर चकित रह गये शादी के बाद राज घर पर ही रहने लगा। वह एक घन्टे के लिये भी पत्नी को सामने से नहीं हटने देता।

 एक दिन पत्नी ने पूछा ,‘तुम काम करने क्यों नहीं जाते’

 तो राज बोला,‘ मैं तुमसे अलग नहीं रह सकता।’

‘ऐसा करो, ’पत्नी बोली, ‘मैं अपनी एक तस्वीर बनाऊँगी उसे अपने साथ ले जाया करना। तस्वीर में तुम मुझे देखना और मैं तुम्हें हमेशा देखती रहूँगी।’

तब से राज जहाँ भी जाता पत्नी का चित्र साथ ले जाता। एक दिन हवा का तेज झोंका आया और तस्वीर हवा में उड़ गई राज उसके पीछे भागा लेकिन हवा उसे एकदम उड़ा ले गई। उड़ते उड़ते तस्वीर राजमहल में जाकर गिरी। राज वहाँ टहल रहा था उसने तस्वीर देखी, ‘क्या इतनी सुंदर लड़कियाँ भी हैं।’ राज ने हिजड़े से पूछा, ‘अगर इतनी सुंदर लड़की है तो उसे ढूँढ़ो में उसे अपनी पत्नी बनाऊँगा।’

हिजड़ा घर घर जाकर उसे ढूढ़ने लगा। अंत में से राज की पत्नी का नाम पता मिल ही गया। वह वहाँ पहुँच गया और राजा का संदेश सुना दिया। राज की पत्नी राज से बोली, ‘आप दुःखी मत होइये तीन साल बाद एक छः फुट लम्बी प्याज और मुर्गों के चूजों से बनी पोशाक पहन कर आना तब सब ठीक हो जायेगा।’

राज की पत्नी महल में आ तो गई लेकिन चेहरा पथरीला हो गया। न कभी हंसती न मुस्कराती। राजा से भी मिलने से उसने इंकार कर दिया। कहलवा दिया उसकी तबियत खराब है। धीरे धीरे राजा की उत्सुकता उसमें समाप्त हो गई और वह अपने महल में अकेली रह गई। समय तेजी से बीतने लगा। तीन साल गुजर गये। दिन रात करके राज ने मुर्गे के चूजों के पंखों की पोशाक सिली और छः फुट लम्बी प्याज का डंडा बना कर महल के सामने गया। उसे देखकर उसकी पत्नी खिलखिला कर हंस पड़ी। राजा यह देखकर हैरान रह गया वह बोला, ‘मैंने तुम्हें तीन साल से हंसते नहीं देखा लेकिन इस बेवकूफ जैसे दिखने वाले व्यक्ति को देखकर कैसे हंस पड़ी।’

हंसते हंसते वह बोली, ‘अगर आप भी चूजों के पंखों की पोशाक पहन कर और प्याज का डंडा लेकर निकलें तो मुझे ऐसे ही आप को देखकर हंसी आयेगी।’

राजा ने सोचा रानी की खुश करने का बहुत आसान तरीका है उसने राज को इशारे से बुलाया अपने बढ़िया राजसी वस्त्र उसे पहनाये और उसकी पोशाक पहनकर प्याज का डंडा हाथ में लेकर सड़क पर निकल गया।

उधर राज की पत्नी ने हिजड़े को बुलाया ओर परों के वस्त्र पहनने वाले के सिर को कलम कर देने की आज्ञा दे दी। राजा को हिजड़ा उस पोशाक में पहचान ही नहीं पाया वह कुछ बोलता उससे पहले ही उसका सिर धड़ से अलग हो गया। राज राजा बन गया और वे सुख से रहने लगे।