Saturday, 18 January 2025

surya aur parmaal kahani veerangnaen

 सूर्य और परमाल

सन् 718 बगदाद के खलिफा वलीद सिंध की लहलहाती प्रकृति प्रदत्त संपदा का लोभ न छोड़ सका उसने अपने सेनापति मुहम्मद बिन कासिम को सिंध पर आक्रमण करने भेजा। सिंध के महाराज दाहर ने अपने युवा पत्र जयशाह को बगदाद की सेनाओं के साथ युद्ध के लिये भेजा यद्यपि जयशाह ने सेना का कुशल संचालन किया और सैनिक वीरता पूर्वक लड़े लेकिन खलीफा की विशाल सेना के सामने न टिके सके और बंदरगाह पर बगदाद का झंडा लहराने लगा।

पुत्र की मृत्यु से व्यथित लेकिन वीरता और ओज से शत्रु को ललकारने स्वयं महाराज दाहर रणक्षेत्र में लडे़े लेकिन मृत्यु को प्राप्त हुए। महाराज दाहर के गिरते ही देवल की सेना ने आत्म समर्पण कर दिया। बगदाद की सेना ने जश्न मनाते बड़े गर्व के साथ मृत दाहर का सिर खलीफा को भेंट किया। महल की स्त्रियॉं भी अस्त्र शस्त्रों से सज्जित खलीफा की सेना से डटकर लोहा लेती रही और अंत में मृत्यु को प्राप्त हो गईं।

कासिम और उसके साथी दाहर के महल को लूटने लगे। मुख्य लूट का माल उनके लिये दाहर की युवा पुत्रियॉं सूर्य और परमाल थीं। खलीफा की आत्मा का रेशा रेशा इस माल को पाकर प्रसन्न होगा ,साथ ही खलीफा के अहं को संतुष्ट करने के लिये स्वर्ण थाल में दाहर का सिर रखा और छत्र लेकर कासिम ने कड़े पहरे में लूट के इस सामान को बगदाद खलीफा के पास भेंट स्वरूप भेज दिया और स्वयं भारत विजय का कार्यक्र्रम बनाने लगा। 

दाहर का सिर देखकर खलीफा थर थर कॉंप उठा था अल्लाह क्या हिन्दुस्तान के काफिरों की शक्लें इतनी खूंखार होती हैं उसने तुरंत उन्हें वहॉ से हटाने की आज्ञा दी, लेकिन जब सूर्य परमाल पर उसकी ऑंख पड़ी तो नजरें टिकी रह र्गइं। बहिश्त की हूरें जन्नत की पारियॉं उसके मुॅह से निकला। खलीफा ने सूर्य और परमाल को अपने शयन कक्ष में बुलाया और सूर्य के सामने निकाह का प्रस्ताव रखकर अपनी बेगम बनाना चाहा। सूर्य की ऑंखोें से टप टप ऑंसू गिर पडे। यह देखकर वह उसे चुप कराने के लिये उठा ही था कि सूर्य एक तरफ हटते हुए बोली ,‘हमें हाथ मत लगाना खलीफा, यह तो हमारा सौभाग्य होता जो हम इस विशाल साम्राज्य की मलिका होते लेकिन नीच कासिम हमें पहले ही अपवित्र कर चुका है।’ 

सुनकर खलीफा धक रह गया उसके विश्वास पात्र ने उसे धोखा दिया। नीच कासिम मेरे ही साथ धोेखा। खलीफा की ऑखों से चिनगारियॉं निकल रही थीं। परमाल कुछ न समझ सकी उसने आश्यर्च से सूर्य की ओर देखा सूर्य मुस्करायी परमाल भी तात्पर्य समझ गई एक हंसी की रेखा उसके होंठों पर भी खिंच गई । 

खलीफा ने कड़कती आवाज में हुक्म दिया कासिम की लाश में भूसा भर कर लाया जाये। कासिम ने आज्ञा सुनी तो धक रह गया उसने सैनिकों को बहुत रोका कि एक बार खलीफा के सामने जिंदा ही पेश होने दो वह निर्दोष होने का प्रमाण देदे बस फिर चाहे तो स्वयं खलीफा तलवार से सिर अलग कर दे। लेकिन सैनिकोें ने कासिम की एक न सुनी और खलीफा की आज्ञा का पालन कर दिया। जब कासिम की भुस भरी लाश खलीफा के सामने आई तो खलीफा ने क्रोध से लात मारी। सैनिकों ने कासिम की प्रार्थना खलीफा को सुनाई तो खलीफा सोच में पड़ गया,‘ क्या कासिम सच कह रहा था क्या वह बेकसूर था उस से मासूम लड़कियॉ ऐसा झूठ बोलेगी नहीं यह नहीं हो सकता।’ सोचते सोचते वह छत पर टहलने लगा उसने सूर्य और परमाल को वहीं हाजिर होने का हुक्म दिया। 

एक दूसरे से सटी सूर्य और परमाल छत पर आइंर्। उन्हें देखते ही खलीफा बोला ‘देखो लडकियों मैने कासिम को कल सजा देदी है। मेरे साथ बेवफाई की यही सजा है लेकिन एक बात सच बताना क्या तुमने सच कहा था। ’

सूर्य हंस पडी ,‘नही वह तो झूठ था बिलकुल झूठ ’खलीफा की ऑखों मे चिनगारियॉं धधक उठी,‘ तुमने झूठ क्यों कहा’ सूर्य की गर्दन तन गई ,‘अपने देश के लिये ,वतन के लिये और पिता की मौत का बदला लेने के लिये ’उसकी ऑंख ेचमक रही थीं फिर सोच में पडे खलीफा की ओर देखते हुए बोली,‘ उस कासिम की क्या बिसात हम आर्य कन्याओं को हाथ भी लगा सके।’ 

‘तुम्हारे अभिमान को ऐसा कुचल दूॅंगा कि ’खलीफा दंड सुना पाता कि दोनों बहनों ने कमर में छिपी कटार निकाली और एक दूसरे की छाती में धंांेप दी दोनो के निर्जीव शरीर महल की छत से लुढक पड़े। खलीफा दाहर की क्रूर ऑंखे चमकी जैसे उनमें हंसी थी। 





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