Friday, 25 September 2026

Raja bhoj

 राजा भोज


      एक तालाब के किनारे एक घने बरगद का विशाल वृक्ष था। वह तलाब हमेशा लबालब भरा रहता था और जंगल के सभी जानवर वहाँ पानी पीने आते थे। सारे जंगल के तलाब भीषण गर्मी में सूख जाते थे ,लेकिन बरगद की छाया उस तलाब को नहीं सूखने देती थी। पेड़ के नीचे एक बड़ा चौकोर पत्थर पड़ा था। यद्यपि वहाँ कोई भी पूजा नहीं करता था, वह स्थान अभिशप्त समझा जाता था ,कहते थे कि एक चीते की आत्मा वहाँ रहती है।

एक गीदड़ जिसे उसके लालच और बुरे व्यवहार के कारण उसकी जाति से निकाल दिया गया था, ने उसे पत्थर को अपना सिंहासन और बरगद के वृक्ष को अपना निवास स्थान बनाने का निश्चय किया। अपने आपको नाम दिया राजा भोज।

खाली राजा भोज नाम रखकर उसे संतोष नहीं हुआ, अपनी विशेषता दिखाने के लिये पुराने जूते किसी राहगरी के उठा ले आया, कहा जाता है कि उसे चीते ने ही खाया था एक अपने कान में लटका लिया और एक अपने अगले पांव में पहन लिया। वह सिंहासन पर झुककर बैठ गया और अपने को राजा से कम नहीं समझ रहा था। अब जो भी जानवर या चिड़िया पानी पीने आता वह अपने सामने सर झुका कर पहले कहलवाताः 

सोने से सज्जित

हाथी दांत का सिंहासन है।

कानों में मोती से मंडित

बैठा राजा भोज है।

इस वेवकूफी के लिये बहस करने से अच्छा सब जानवर उसके किये को कहते और पानी पीकर चले जाते ,यहाँ तक कि चीता हाथी मन ही मन हंसते कि एक फूंक में इसे उड़ा दें, वो भी कहते और डरपोक हिरन, खरगोश भी कहते। गीदड़ समझता सब जंगलवाले वास्तव में उसे राजा मानने लगे हैं और खुश होता था।

एक दिन एक बहुत बड़ा नीले सिर वाला गिरगिट पानी पीने आया। वह इतना प्यासा था कि घिसट घिसट कर पानी तक पहुँच पा रहा था। तलाब तक पहुँचा लेकिन गीदड़ को नहीं देखा जैसे ही वह पानी की ओर झुका गीदड़ गरजा,‘ पहले रुको भाई इस पानी के मालिक की प्रशंसा में कहो तभी पानी पी सकते हो कहोः

सोने से सज्जित

हाथी दांत का सिंहासन है

कानों में मोती से मंडित

बैठा राजा भोज है।

बड़ी मुश्किल से गिरगिट ने शक्ति बटोर कर सिर उठाया और बोला,‘ ओ गीदड़ मैं बहुत प्यासा हूँ मैं वह यह सब जब तक जरा जीभ गीली न कर लू नहीं कह सकता।’

‘नहीं तो मैं पानी नहीं पीने दे सकता,’ गुर्राकर गीदड़ ने कहा, ‘मुझे अर्ध्य दो। ’

‘मैं पानी पीलूं’ गिरगिट गिड़गिड़ाया,‘ मैं बिना पानी मर जाऊँगा पानी पीलुंगा तब आराम से प्रशंसा करुंगा’ 

‘नहीं,’ राजा भोज ने कहा, ‘सब जानवर और पक्षी मेरे तलाब में से पानी पीने से पहले मुझे नमस्ते करते है तुम्ही केवल ऐसे हो जिसने इंकार किया है जैसा मैं कहता हूं वैसा ही करना होगा तुम्हें’

      ‘केवल एक घूँट मैं प्रार्थना करता हूँ, मैं जैसा तुम कहोगे करूँगा जैसी प्रशंसा कहोगे करूँगा।’

गीदड़ ने देखा कि ज्यादा बहस करना बेकार है तैयार हो गया। वास्तव में गिरगिट प्यास के कारण बेहाल था,‘ ठीक है एक घूँट, मैं दयालु राजा हूं, मैं एक घराने का राजकुमार हूं। अपनी प्रजा की  देखभाल करना राजकुमार का काम है चलो एक घूंट पी लो’

गिरगिट ने सिर झुकाया और गटगट गटागट पानी पीता चला गया।

‘रुको! रुको! बस बहुत हो गया ,’राजा भोज चिल्लाया ,‘मैंने केवल एक घूँट भरने के लिये कहा था’ लेकिन गिरगिट पानी पीता चला गया जब तक कि प्यास बुझ नही गई।

‘ हाँ ओ गीदड़’ वह सलाम करने का बहाना करते हुए बोला,‘ मैं तुम्हारे योग्य तुम्हें कविता सुनाउंगा, इस प्रकार अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करूँगा।

काई मिट्टी से सज्जित

      टूटा फूटा पत्थर है

     जूता पहने गीदड़ बैठा

      कहता राजा भोज है।

यह कहकर पूँछ हिलाता भाग चला और उसके पीछे पीछे गुस्से से पीछे पीछे गीदड़ । गिरगिट लम्बे रास्ते से जा रहा था उसका घर अभी बहुत दूर था। गीदड़ तेजी से उसके पीछे आ रहा था। जब बिलकुल समीप आ गया तो गिरगिट एक सेमल के पेड़ पर चढ़ गया और एक फूलों के गुच्छे के पीछे छिप गया।

‘नीचे आओ बदमाश,’ गीदड़ पंजे मारते बोला।

‘ अरे रे राजा भाट! तुम्हारा पुराना जूता कहीं गिर गया,’ गिरगिट हंसता बोला,‘जाओ अपने खजाने को ढूँढ़ लाओ। तुम्हें खूब समय मिलेगा ढूँढ़ने का ,क्योंकि मैं छः महिने के लिये सोने जा रहा हूँ।’

गुस्से से राजा भोज कांप रहा और गुर्रा रहा था,‘ जरूरत पड़ी तो साल भर तक यहाँ बैठा तुम्हारा नीचे उतरने का इंतजार करूँगा।’

सेमल के फूल की लाल कलियां और सफेद गुच्छे के पीछे से बार बार गिरगिट देखता और गीदड़ ऊपर घूर रहा था। काफी देर बाद जब अपलक देखती आंखो पर सूर्य की रोशनी पड़ी ,आंखों से पानी निकलने लगा, उसने देखा गिरगिट टहनी पर आराम से बैठा है, उसे लगा वह सो रहा है तो राजा भोज ने भी अपनी ठोड़ी अगले पंजे पर रख ली। देखने में तो उसने आंखे बंद कर ली पर धीरे धीरे वह बिलकुल सो गया। पहले तो हल्के हल्के घर्राटे लिये फिर गहरी नींद में सो गया।

गिरगिट सोने का बहाना किये हुए था चुपचाप सब देख रहा था। उसने गीदड़ के द्वारा बड़बड़ाए शब्द भी सुने थे। उसने धीरे से उतरकर अपने बिल में जाने का निश्चय किया। वह तने से एक छोटी टहनी पर नीचे आया फिर एक आवाज के साथ जमीन पर कूदा। गीदड़ फौरन जाग गया और पीछा करना फिर शुरू हो गया।

इस समय गिरगिट केा निश्चय था कि वह घर आराम से पहुँच जायेगा क्योंकि एक दो क्षण गीदड़ को यह देखने में भी लगा था कि वह किस ओर भागा है। गिरगिट बहुत तेज भाग रहा था लेकिन फिर भी उसके पैर बहुत छोटे छोटे थे और दौड़ के लिये नहीं बने थे। धीरे धीरे गीदड़ ने दूरी पार कर ली अब उसकी फों फों करती सांस उसे छू जाती थी जब वह अपने छेद से आधा जंगल दूरी पर था उसने गीदड़ के दांतों की चुभन अपनी पूंछ पर महसूस की। राजा भोज ने उसे मुँह पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया। गिरगिट ने पंजे जमीन में कसकर गड़ा दिये ,‘ मुझे तुमसे कुछ कहना है।’

‘हूँ ’गीदड़ बोला । वह कुछ बोल तो सकता नहीं था क्योंकि उसकी पूंछ मुँह में दबी थी ‘ओ मेरे राजा,’ गिरगिट बोला ,‘एक प्रश्न पूछना है।’

‘हूँऊ’ गीदड़ बोला,

‘अरे यह कैसे राजपुत्र हो हूँ कहा है जब कि आपके घराने के अन्य व्यक्ति गी हाँ कह ते हैं अगर राज घराने के हो तो राजा भोज गी ,हां कहो

गी हाँ गीदड़ को अपने घराने का ख्याल आया।

अब गी हां कहने से उसे मुँह बोलना पड़ा जब कि हम कहने में वह केवल नाक से ही हूँ कह दे रहा था जैसे ही जरा मुँह गीदड़ का खुला गिरगिट की पूंछ आजाद हो गई और वह अपने घर में आराम से घुस गया इस प्रकार दुष्ट गीदड़ से जान  बची।


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