Tuesday, 12 August 2025

Dakoo aur naai

 डाकू और नाई

दादा के समय की कहानी है। चार बड़े डाकू जेल से भागकर साधु का वेश बनाकर गाँव गाँव घूमने लगे। एक दिन घूमते घूमते वे एक गाँव के बाहर वीरान पड़े मंदिर में पहुँचे। मंदिर अच्छा खासा रहने लायक था उन लोगों ने वही अड्डा जमा लिया। वे इतना सादा जीवन बिता रहे थे कि भोले भाले गाँव वाले उन्हें वास्तव में साधु समझने लगे। प्रतिदिन उन्हें भोजन पहुँचाने लगे।

उनमें से एक डाकू कुछ अधिक होशियार था उसे मंत्र वगैरह भी आते थे तथा रामायण आदि कुछ धार्मिक ग्रन्थ भी पढ़ रखे थे। वह रामायण की कहानियों सुनाकर ग्राम वासियों को प्रभावित करने लगा। मंत्रों केा बुदबुदाकर झाड़फूक करता। खेतों में घरों में पवित्र पानी का छिड़काव करता था। अगर किसी गाँव वाले का कोई पालतू जानवर अकेला घूमता मिलता तो बाकी तीनों शिष्य बने डाकू उसे किसी गुप्त स्थान पर बांध देते। जब उसका मालिक उसे ढूँढ़ता हार जाता तब उससे पूछता तो आंखे बंद समाधि सी लगाने का बहाना कर वह कहता तुम्हारा जानवर अभी जिंदा है जैसा जैसा मैं कहता हूँ करो और जिस दिशा में बताई जाओ तो जानवर मिल जायेगा।

यह कहकर वह उसे रास्ता बताता और उस गाँव वाले को अपना जानवर मिल जाता। यह चमत्कार उसने इतनी बार किया कि लोग उसे पहुँचा हुआ महात्मा समझने लगे। उन्होंने उनके लिये कुटिया बनवाई सत्संग भवन बनवाया और मंदिर का जीणोद्वार कर दिया। लेकिन चारों डाकू अपनी आदतों के गुलाम थे रात को चुपचाप गाँव वालों की बत्तख मुर्गी आदि चुराकर खा जाते थे।

गाँव वाले प्रतिदिन श्र(ापूर्वक फल-फूल, तकिया आदि उपहार उनके लिये लाते रहते जो कुछ भी वे डाकू मांगते गाँव वाले तुरंत हाजिर कर देते थे।

एक दिन गुरु साधु बोला, जबसे हम जेल से भागे है कोई भी दावत नही खाई है तुम लोगों का क्या ख्याल है? यह सुनते ही सबकी आंखों में चमक आ गई तो वह बोला लेेकिन तब तक रुकना पड़ेगा जब गाँव वाले मूर्ति की प्रतिष्ठा कर विधिवत मेरे हाथ में मंदिर सौंप देंगे।

जिस दिन मूर्ति की प्रतिष्ठा थी पूरा गाँव मंदिर में एकत्रित हो गया। गुरु ने कहा, मैने ध्यान लगाया था मेरी स्वर्गीय महान आत्माओं से बात हुई थी महामारी फैलने वाली है। प्रेतात्माऐं का प्रवेश होगा। ये प्रेतात्माऐं विनाशत्माऐं होगी इनका मुकाबला कोई नहीं कर पायेगा। तुम लोग चूहे बिल्ली की तरह असहाय मौत मरोगे। मैंने मैंने महान आत्माओं से बातचीत की है कि गाँव वालों की सहायता करें और आने वाले दुर्दिनों से तुम्हारी रक्षा करेें।

गाँव वाले यह सुनकर घबड़ा गये। वे उन साधुओं के पैरों पर गिर गये कि उन्हें बचायें। गुरु बोला इस आगे वाले दुर्भाग्य से बचने का उपाय हो सकता है अगर प्रेतात्माऐं और उनके साथियों की दावत का इंतजाम किया जायेगा। जब वे अंदर भोजन करने में व्यस्त होंगे तब उन्हें निष्क्रय कर मंदिर को चारों ओर से पवित्र जल व धागे से बांध दूंगा। दस बोतल शराब दो सूअर के सिर दस बत्तख दस मुर्गे की बलि चढ़ानी पड़ेगी। कढ़ी, चावल, फल, सब्जी की भंेट चढ़ानी होगी। केले के पत्तों का मंडप बनाकर गुलाब अर्क से छिड़काव करना होगा। खाने की खुशबू से वे मंदिर के अंदर प्रवेश कर जायेंगे तब वे हमारी मर्जी पर होंगे।

यह सुनकर गाँव वालों में कुद जान आई उन्होंने इंतजाम करने का वायदा किया। भविष्यवाणी वाले दिन सब गाँव वाले प्रेतात्माओं के लिये उपहारों से लदे फंदे मंदिर पहुँचे। गुरु ने गंभीर वाणी से कहना प्रारम्भ किया, मित्रों आज का दिन गाँव में प्लेग फैलने का दिन है। मैं और मेरे शिष्य इस मंदिर को पवित्र धागे से बांध देंगे। तीन दिन तक अंदर हम उन आत्माओं को प्रसन्न करने का प्रयत्न करेंगे। तुम सब लोग अपने घरों में जाओ। अंदर से बंद कर ईश्वर की प्रार्थना करो कि संकट का समय टल जाय। जब तक हम धागे को हटायें नहीं कोई भी उसकी सीमा में प्रवेश करने की हिम्मत न करें क्योंकि ये आत्माऐं शक्तिशाली हैं जो भी इसमें अंदर जायेगा वह पागल हो जायेगा। इसलिये ध्यान रखना और हमारी सफलता की कामना करना।

अपने साथियों की सहायता से गुरु ने मंदिर को चारों ओर से पवित्र धागे से बांधा और आशीर्वाद देकर गाँव वालों को विदा किया। गुरु चेलों के साथ अंदर संत्संग भवन में गया और जोर जोर से हो हो करने लगा। खाली भवन में उनकी हो हो गूँज कर ऐसे लग रही थी कि हजारों लोग चिल्ला रहे हो। गाँव वालों को विश्वास हो गया कि प्रेतात्माओं को भोजन की सुगंध आ गई है और वे भोजन करने आ गई है। अपने कान बंद कर वे तेजी से घरों की ओर भाग गये और अंदर बंद करके बैठ गये।

जब साधुओं की विश्वास हो गया कि वे अकेले रह गये हैं तो उन्होंने शराब पीना और खाना प्रारम्भ किया। जैसे जैसे शराब गले के नीचे चली उन्हें रंग चढ़ना प्रारम्भ हुआ कोई चिल्लाने लगा कोई गाने लगा। एक ने उठकर नाचना प्रारम्भ कर दिया। एक ने जोर जोर से अपने पुराने पापों का बखान प्रारम्भ किया और जोर जोर से हंसने लगे कि किस प्रकारसरलता से गाँव वालों केा वेवकूफ बनाया है।

नाई स्वरूप कुछ दिन पहले गाँव से दूर में अपने रिश्तेदार से मिलने गया हुआ था। उसे साधुओं की भविश्यवाणी आदि के विषय में ज्ञात नहीं था। उसी रात वह वापस लौट रहा था कि रास्ते में मंदिर पड़ा। मंदिर का बगीचा पार करने पर उसके  घर का रास्ता छोटा पड़ता था। अनजाने में ही धागे को पारकर वह मंदिर के पास से गुजरा तो अंदर से आने वाले शोर केा सुनकर वह ठिठक गया। अंदर से शराबियों की बातें और हंसना सुनकर वह सन्नाटे में आ गया। साधुओं की कुटियाएँ देखी तो वे खाली थी। उसने संत्संग भवन में झिरी से झांका। चारों साधुओं के चोगे एक तरफ पड़े थे और वे खाना खाने पीने में लगे हुए मस्त हो रहे थे।

पहले तो वह वेवकूफों की तरह खड़ा रहा कि क्या करना चाहिए। कोई हथियार उसके पास था नहीं। अकेले चारों से लड़ना वेवकूफी होगी। उसने पूरे गाँव को जमाने का निश्चय किया। दबे पांव वह जल्दी से गाँव की ओर भाग लिया। गाँव में पहुँच कर यह देख कर हैरान रह गया कि गाँव का हर दरवाजा बंद है यहाँ तक कि उसका अपना घर भी और हर दरवाजे के पीछे से भजन गीत आदि की आवाज आ रही है। उसकी कुछ समझ नहीं आया तो वह जोर से बोला, हो! हो! इस सबका क्या अर्थ है? तुम लोग ऐसे क्यों प्रार्थना कर रहे हो? पता है जिन चारों साधुओं को हम इतने दिन से खिला पिला रहे थे वे सब मंदिर में नाच गा रहे हैं शराब पी रहे हैं। आओ चलो उन्हें पकड़कर पुलिस के हवाले कर दे वे लोग जेल से भागे डाकू है।

पहले तो नाई की आवाज सुनकर गाँव वाले समझे कि प्रेतात्माएँ बाहर निकल आई है और अब हमें खाने आई है लेकिन ध्यान से सुनने पर उन्होंने नाई की आवाज पहचान ली और समझ गये कि वह पवित्र धागे की हद पार करके मंदिर के पास से आ रहा है। आवश्य अब पागल हो गया है। उसके पिता ने दरवाजा खोला और जल्दी से पकड़कर उसे अंदर बंद करने लगे वह चिल्ला कर बोला, मैं पागल नहीं हूँ बिलकुल ठीक हूँ जिन्हें तुम साधु समझ रहे हो वे डाकू है मैंने झिरी से झांककर देखा है अगर विश्वास नही है तो मेरे साथ चल कर देख लो।

लेकिन किसी ने भी उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया ज्यों ज्यों उसकी आवाज ऊँची होती गई उन्हें विश्वास होता गया कि वह पागल हो गया है और उसे अंदर बंद कर दिया। नाई स्वरूप का दिल बैठने लगा कि ये तो उसे पागल समझ रहे हैं सत्य को समझ ही नहीं रहे है। 

नाई स्वरूप समझ गया कि गाँव वालों को ऐसे नहीं समझाया जा सकेगा। मन ही मन वह कोई उपाय सोचने लगा। सुबह वह उठा और ऐसे व्यवहार करने लगा जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। घरवाले से हंस हंस कर बात कर रहा था। गाँव वाले चारों ओर घिर आये और उसकी पीठ थपथपा कर बोले कि भगवान का लाख लाख शुक्र है कि तुम ठीक हो गये नहीं तो हम समझे थे कि तुम पागल हो गये हो। 

नाई स्वरूप अब इस इंतजार में था कि किस प्रकार से उन साधुओं की पोल सबके सामने खोले और हरदम उन पर नजर रखने लगा। एक दिन उसने एक चेले को गाँव के एक खेतिहर की गाय को ले जाते देखा। उसे उसने बाग के पीछे एक गड्डे में ले जाकर बांध दिया। तुरंत चतुर नाई के दिमाग में सारा खेल समझ में आ गया। उसने उस चरवाहे को जाकर बताया और कहा कि वह गुरु महाराज से जाकर पूछे वे ही बतायेंगे पहले तो चरवाहा स्वरूपा नाई को शक की निगाह से देखता रहा कि कहीं पागलपन का असर तो नहीं है लेकिन फिर अपनी गाय को देखा और गुरु महाराज के पास जाकर गाय के विषय में पूछा तो मंत्र आदि पढ़ने का नाटक कर गुरु महाराज ने वहीं पर गाय का बंधा होना बताया तो चरवाहे को भी गुरु महाराज पर शक हो गया।

अब स्वरूपा के साथ वह चरवाहा और दो तीन गाँव के नवयुवक भी हो गये क्योंकि उन्हें भी साधुओं पर कुछ कुछ शक था। कई बार मुर्गी बत्तख के पंख मंदिर के पास देखे थे। एक बार छोटे चूजे पकड़ते देखा भी था।

स्वरूपा नाई और चरवाहे ने पुलिस के सिपाहियों के पकड़े पहने और डंडा घुमाने अपने साथ के युवकों के घर में घुसे। उधर वे युवक मंदिर की हद के पास जहाँ दो चेले झाडू लगा रहे थे कहने लगे, आज गाँव में पुलिस घूम रही है। कुछ महिने पहले चार डाकू जेल से भाग गये थे पुलिस वालों को खबर लगी है कि वे इधर ही की तरफ आये है, यहाँ तो सब गाँव वाले ही है पता नहीं।

उन चेलों का चेहरा वे ध्यान से देख रहे थे। चेलों का चेहरा फक हो गया तुरंत ही वे मंदिर के अंदर चले गये। उधर नाई स्वरूपा और उसकस साथी गाँव प्रधान को अपनी योजना समझा कर ले आये थे और कहा था यदि उसकी बात गलत निकले तो उन्हें पागल समझ ले। साथ में गाँव के अन्य व्यक्ति भी थे। दोनों मंदिर के पास उपस्थित युवकों ने बताया कि उनकी बात सुनकर चेले अंदर चले गये है। अब मंदिर को चारों ओर से घेरकर सब दूर दूर पर छिपकर बैठ गये कुछ ही देर में चारों साधु मंदिर के पिछवाड़े से छिपते छिपते भागने के लिये निकले। सब लोग उनके पीछे लग गये। कुछ आगे चलने पर वे एक गुफा में गये वहाँ से उन्होंने गाँव वालों से धोखाधड़ी कर करके एकत्रित धन उठाया और गाँववालों का वेश बना कर बाहर निकले ही थे कि गाँववालों ने घेर लिया। अब साधु घबड़ा गये। नाई स्वरूपा और उसके साथ ने डंडा खटखटाते हुए उन्हें गरेबां पकड़ा और कहा, क्यों बच्चू बहुत मना ली मोज। तो साधु थरथर कांपने लगे। अब गाँववालों को पूरा विश्वास हो गया कि वे डाकू है सब उन्हें पीटने लगे। गाँव प्रधान ने किसी तरह से उन्हें बचाया और थाने पहुँचा दिया यहाँ नाई स्वरूपा को और अन्य युवकों को घोषित इनाम के रुपये मिले।


Monday, 11 August 2025

soorya chandra

 सूर्य चन्द्र

जल प्रलय से पूर्व की कहानी है। सूरज सात भाई थे। चारों ओर चमचम चमचम करते सात सूरज घूमा करते। चंदा तारो की फीकी सी रोशनी टिमटिम करती रहती। एक लड़का रोज चंदा को बांसुरी बजा कर सुनाया करता था क्योंकि वह सूरज की तरफ जाता तो गर्मी से झुलसने लगता परंतु चंदा के पास आता तो उसे शीतलता अनुभव होती। दोनो में दोस्ती हो गई। 

लड़का रोज जंगल में शिकार करके लाता उसकी मॉं पका देती थी। एक दिन जब वह शिकार खेलने गया तो चंद्रमा को बॉसुरी सुनाने में अधिक समय लग गया। शिकार करने गया तो कुछ मिला ही नही। एकाएक एक जगह उसे एक हिरणी दिखाई दी वह गर्भवती थी। जैसे ही उसने निशाना बॉधा हिरणी बोली कि वह बच्चे को जन्म देने वाली है अगर उसे न मारे तो वह उसे ऐसी बात बतायेगी जो किसी को मालूम नही है और बहुत काम की है 

लड़के ने धनुष नीचे कर लिया हिरणी बोली ,‘आज रात को अंधकार होते ही चारों ओर पानी ही पानी हो जायेगा। पृथ्वी जलमग्न हो जायेगी। तुम सात दिन का खाना लेकर एक किश्ती में जो मेरी बात का विश्वास करले उसके साथ बैठ जाना। जलप्रलय के समय सब मनुष्य समाप्त हो जायेगें तुम बच जाओगे।’ उसके बाद लड़के को कोई शिकार नही मिला घर पर मॉ आग जलाये बैठी इंतजार कर रही थी। वह लड़के को खाली हाथ देखकर उस पर खूब चिल्लाई। लड़के ने मॉ को हिरणी की बात बताई तो उसे विश्वास नहीं आया। 

वह बाहर बैठकर किश्ती बनाने लगा। पड़ोस की एक लड़की ने लड़के को किश्ती बनाते देखा तो कारण पूछा लडके ने उसे हिरणी की बात बताई तो वह भी अपने लिये सात दिन का खाना लेकर आ गई। शाम तक किश्ती तैयार हो गई। लड़का और लड़की उसमें खाना लेकर बैठ गये। सब लोग आते जाते उनका मजाक उड़ाते पर लड़का लड़की हिरणी की बात का विश्वास कर बैठे ही रहे जैसे ही अंधेरा हुआ एकदम बिजली कड़की और धमाके से बरसात शुरू हो गई। 

सारी पृथ्वी जलमग्न हो गई समस्त गॉव वाले डूब गये परंतु लड़का लड़की किश्ती मे बैठे अंजीर के पेड़ पर पहॅुच गये। सात दिन तक पानी बरसता रहा अंत में सातो सूर्य निकल आये चंद्रमा भी अपनी शीतल चंदनी लिये एक तरफ टिमटिम करने लगा। सितारे उसके चारों ओर घूमने लगे। परंतु बरसात के बाद सातो सूर्याें की रोशनी बहुत प्रखर हो गई। जल्दी ही सारा पानी सूख गया। पेड़ पौधे झुलस गये सारी धरती सूखने लगी। लड़का गर्मी के कारण झुलसने लगा। उसने अपनी परेशानी चंद्रमा को बताई। 

कुछ देर तक तो चंद्रमा सोचता रहा। फिर उसने उपाय सोचा और इन्द्र इन्द्राणी से कह रहे थे कि आज पूर्णिमा के दिन जो अपने से छोटे को खालेगा वो दूसरे दिन अधिक बलवान होकर निकलेगा । चंद्रमा ने सुनकर कुछ सोचा और सबसे बड़े भाई सूरज के पास पहुॅचा और बोला ,‘ भाई तुमने सुना क्या?’ सूरज बोला,‘ क्या ?’ चंद्रमा ऐसे बोला जैसे रहस्य की बात बता रहा हो 

आज मैं अपने सारे पुत्र तारों को खा जाऊॅगा तो मै ये दूसरे दिन मेरे मुॅह से और भी अधिक विशाल और बलवान होकर निकलेगें यह कहकर उसने तारों को खाना शुरू कर दिया। चंद्रमा छोटा था धीरे धीरे उसने एक दो तारों को मुॅंह में रखना शुरू कर दिया। उसकी देखा देखी सूरज ने जल्दी जल्दी अपने छः भाइयों को खा लिया। जब चंद्रमा ने देखा कि सूरज अपने भाइयों को खा चुका है तो झट से मुॅह में दबाये तारों को उगल दिया और खिलखिला कर हंस पड़ा । उधर छः सूर्याे के कम हो जाने से लड़के ने बहुत राहत महसूस की ओर पृथ्वी की जलन भी कम हो गई। कहीं कहीं थोड़ा पानी बच रहा था। बच गया लड़के ने चंद्रमा को बहुत बहुत धन्यवाद दिया। परंन्तु सूरज ने जब चंद्रमा को हॅसते देखा तो वह गुस्से से लाल हो गया। और चंद्रमा को खाने लपका। चंद्रमा ने झटपट अपने बेटों को समेटा और भाग चला। 

तबसे आज तक सूर्य चंद्रमा का पीछा कर रहा है और चंद्रमा दिन में न निकल कर तारों के साथ रात में निकलता है ।  


Sunday, 10 August 2025

upkar ka badla

 उपकार का बदला


बहुत समय पहले विटालिस नाम का व्यापारी घने जंगलों से गुजर रहा था कि जानवर पकड़ने के गड्ढे में गिर गया। उस गड्ढे में एक सांप और एक शेर पहले से ही मौजूद था। विटालिस ईश्वर को याद करता काँपता हुआ उन दोनों खूँखार जानवरों की ओर देखने लगा लेकिन इस समय वे स्वयं विपत्ति में थे इसलिये उसे घूरते चुपचाप बैठे रहे।

प्रातः काल जंगल में लकड़ियाँ बीनने के लिये आये एक लकड़हारे ने गड्ढे से आती आवाजें सुन झाँक कर देखा। उसे देख विटालिस बोला, ”मैं वेनिस का रहने वाला विटालिस हूँ, धोखे से इस गड्ढे में गिर गया हूँ, इस गड्ढे में एक शेर और एक सांप भी है, ईश्वर की कृपा से अभी तो इन्होंने मुझसे कुछ कहा नहीं है परन्तु किसी भी क्षण ये मुझे खा सकते हैं, यदि तुम मुझे इस गड्ढे में से निकाल दोगे तो मैं तुम्हें अपनी आधी जायदाद दे दूँगा।“

‘ठीक यदि तुम वादा करो तो मैं तुम्हें इसमें से निकाल दूँगा।’ लकड़हारे ने पूछा।

विटालिस भगवान की कसम खाता हुआ गिड़गिड़ाने लगा। जिस समय लकड़हारा विटालिस को निकाल रहा था शेर और सांप भी अपने ढंग से जताने लगे कि वह उन्हें भी निकाल दे। रस्सी और लकड़ी के सहारे शेर और सांप भी बाहर निकल आये। उन्होंने लकड़हारे के पैर चाटे और चले गये। विटालिस ने लकड़हारे को गले लगाया और चलने लगा तो लकड़हारे ने पूछा कि वह अपना वादा कब पूरा करेगा तो विटालिस बोला, ‘चार दिन बाद वेनिस मेरे घर आ जाना।“

लकड़हारा घर आकर खाना खाने बैठा ही था कि शेर एक मृत बकरी लेकर आया उसे लकड़हारे के सामने रखकर चुपचाप चलने लगा तो लकड़हारा उसकी माँद देखने चला। शेर की माँद देखकर वह वापस आया ही था कि सांप आया उसके मुँह में एक बहुमूल्य मणि थी। सांप ने वह मणि लकड़हारे की तश्तरी में रख दी। लकड़हारा सांप का घर भी देख आया।

चार दिन बाद लकड़हारा मणि अपने साथ लेकर व्यापारी के महल वेनिस शहर पहुँचा। उस समय विटालिस भोजन कर रहा था। लकड़हारे को देख अनजान बनते ”मैं अपना हिस्सा लेने आया हूँ।’ लकड़हारे ने याद दिलाते हुए कहा।

‘वाह! वाह! तुमने तो बड़ी आसानी से कह दिया कि हिस्सा दो पता है मैने यह धन कितनी मुश्किल से कमाया है। ’यह कहकर नौकरों से कहकर धक्का देकर उसे निकलवा दिया।

लकड़हारा बहुत दुःखी हुआ और शहर के न्यायाधीश को जाकर पूरा किस्सा बयान करते हुए सांप द्वारा दी गई मणि दिखाई। न्यायाधीश ने मणि जौहरी को दिखाई जिसने बताया कि मणि बहूमूल्य है। लकड़हारा, न्यायाधीश को दोनों जानवरों के रहने के स्थान पर ले गया, लकड़हारे को देखकर प्यार से उसके पैरों में लौटने लगे। न्यायाधीश समझ गया कि लकड़हारा सच कह रहा है। उन्होंने विटालिस को वादा पूरा करने की आज्ञा देते हुए कहा कि वादा पूरा करने की स्थिति में जेल की सजा दी जायेगी।



Tuesday, 5 August 2025

Do bal kavitayen

  मामा की पुरानी कहानी



 बंदर मामा बने पुजारी 

पहनी लुंगी भगवा,

 डाल गले में तार जनेऊ

बन गये सबके अगवा।

राम नाम का कुरता पहना

 माला  गले मे डाली ,

 छापा तिलक लगाया माथे

ऐनक ऑंख चढ़ाली ।

बगल में पोथी पॉंच ली

खट खट पहनी खड़ाऊॅं,

निकले गंगा घाट पर 

आओ पाप भगाऊॅं।

मगरमच्छ की आंखें चमकी 

मामा कुछ तोे याद करो ,

 मीठे फल  अब तुम्हें खिलाऊॅं

पीठ पर गंगा पार करो ।

 सिहर उठे मामाजी सुनकर 

बीच की डुबकी ध्यानकर ,

तोड़ जनेऊ छोड़ खड़ाऊॅं

 जान बचाई भागकर।
















चंदा ऐसा लगता 



चंदा लगता आसमान में 

कोई खेल रहा हो बौल 

या मम्मी ने  खूब बनाई

रोटी गोलम गोल।


 मम्मी ने  बेसन का  लडडू

लगता  है दुबकाया ।

 या पापा की  घुटी चांद की

पहुॅंच रही है छाया ।


चंदामामा जो कुछ भी  हो 

लगता प्यारा प्यारा ,

 दुनिया  भर की  सब चीजों से

एकदम न्यारा न्यारा ।




Saturday, 2 August 2025

Shart lagaiye

 शर्त लगाइये और जीतिए



किसी भी विषय मे आप सुनिश्चित होते हैं जरा सा भी विवाद होने पर झट आपके मुँह से निकलता है कि आओ शर्त लगाएं, पर कभी कभी आप भ्रम में होते है और हर जाते है क्यों न शर्त ऐसी चीजों पर लगाई जाय जिसमें हार संभव ही न हो। तो आजमाइये नµ

1. व्यक्ति को कुर्सी पर इस प्रकार बैठाइये कि धड़ सीधा हो और पैर सीधे जमीन पर हो कुर्सी में नीचे न मुड़े हो। अब खड़े होने के लिये कहे, शर्त है पैरो की स्थिति न बदले और धड़ आगे न झुके। हाथ भी आधार नही लेने चाहिये। जीत आपकी है, व्यक्ति तब तक खड़ा नही हो सकता, जब तक पैरो की कुर्सी के नीचे नहीं मोड़ता या धड़ आगे नही झुकाता।

2. दाँया पैर और दाँया हाथ दीवार से सटा कर बाँया पैर और बाँया हाथ उठाने के लिये कहिये शर्त यह है दाँया हाथ दाँया पैर सीधा रहे और दीवार का सहारा न ले। जीत आपकी है बिना टिकाए बाँया पैर उठने से इंकार कर देगा।

3. आंख पर पट्टी बांध कर सीधा चल सकते है। हाँ हाँ क्यों नही शर्त लगाइये। बिलकुल सीधा कभी नही चल पायेगा क्योंकि हमारे बाँये हिस्से का वजन अधिक होता है, और व्यक्ति स्वाभाविक रूप से गोल घेरे में चलेगा।

4. चार ब्रेड पीस खा सकते है? व्यक्ति हंस पड़ेगा। चार ब्रैड मामूली बात है शर्त लगाइये लेकिन शर्त यह होगी, उसके साथ नमक या पानी का एक घूंट भी नही मिलेगा। रूखे ब्रैड पीस खाने होगे सिके भी नही। यानी बै्रड खोलिये और उस व्यक्ति को पकड़ा दीजिये दो भी नही खा सकेगा, क्योंकि मुँह की लार गं्रथियाँ इतना लार नही बना पायेगी और बै्रड गटकी नही जा सकेगी। जीत आपकी होगी।

आजमा कर देखिये हमेशा मुस्करायेंगे रोना न पड़ेगा।


pavitr agni ki chori

 पवित्र अग्नि की चोरी


बात उस समय की है जब संसार मे केवल पृथ्वी और स्वर्ग ही थे। स्वर्ग के राजा थे श्रेयस, उनकी पत्नी का नाम था हीरा! पृथ्वी पर मानव का जन्म नहीं हुआ था केवल  विशाल पशु ही विचरण करते थे लेकिन उन पशुओ में कोई भी इतना बुद्धिमान  नहीं था जो पृथ्वी पर शासन कर सके। देवताओं ने निश्चय किया कि इस प्रकार के प्राणी का निर्माण किया जाय जो पृथ्वी पर सुयोग्य रूप से शासन कर सके। इसके लिये प्रामीथियस नामक एक देवता को इस कार्य के लिये चुना गया।

प्रामाथियस ने मिट्टी और पानी से लुगदी बनाई उससे एक प्राणी का निर्माण किया जानवर चारांे हाथों पैरो से चलते थे लेकिन इस प्राणी को उसने सीधा खडा किया। अब प्रामीथियस सोचने लगा कि इस प्राणी को ऐसी क्या विशेषता उपहार  मे दी जाय कि वह अन्य से भिन्न हो सके।

प्रामीथियसय के भाई एपीमिथियस ने पशुओं का निर्माण किया था और उसने उन्हें सभी विशषताएंे दे दी जैसे शक्ति साहस चालाकी तेज भागने की कला पांव नाखून सींग आदि। अब मनुष्य को क्या दें?

प्रामीथियस के मस्तिष्क मे आया कि मुनष्य को अग्नि उपहार स्वरूप दी जाय जिससे वह पशुओं को अपनेे वश मे कर सके तथा उससे अनेकांे वस्तुओं का निर्माण कर अपना बचाव कर सके,क्योंकि मनुष्य के पास अपने बचाव का कोई भी साधन जैसे सींग, पैने नाखून, मोटी चमडी आदि कुछ नहीं था। वह तो हवा पानी तक से अपनी रक्षा करने मे असमर्थ था।  प्रामीथियस वापस स्वर्ग आया। उसने सूर्य के रथ से मशाल जलाई और उस पवित्र अग्नि को मनुष्य को उपहार स्वरूप दे आनन्दित वापस स्वर्ग चला गया।

लेकिन जब जीयस ने मनुष्य के पास अग्निी देखी तो वह परेशान हो गये। क्योंकि अब मनुश्य पूरी तरह देवताओं जैसा था। जीयस ने सोचकर एक सर्वाग सुन्दरी नारी  का निर्माण किया। उसका नाम रखा पांडोरा और उसे प्रामीथियस के घर भेज दिया । पांडोरा को देखकर प्रामीथियस तुरंत समझ गया कि मुझे बर्वाद  करने के लिए जीयस  ने नारी का निर्माण किया है। क्योंकि पवित्र अग्नि को चुराकर वह मनुष्य को दे आया है।

लेकिन ऐपीमीथयस पांडोरा केा देख उसके प्रेम में पड़ गया और उसे घर ले आया। ऐपीमीथियस के पास एक बवसा था। जिसमें उसके पास वहुत से ऐसी वस्तुऐं बंद थी। जिन्हें उसने पशुओं को दिया नहीं था। एपीमीथियस ने पांडोरा को चेतावनी देते हुए कहा कि कुछ भी हो जाये इस बक्से को नहीं खेलाना। 

पांडोरा अपनी उत्सुकता न रोक पाई कि आखिर इसमें ऐसा क्या बंद है जो वह नहीं दिखाना चाहता । जैसे ही वह अकेली हुई वह वक्से की ओर भागी। उसने सोचा जरा सा खेाल कर देख लूंगी और तुरंत बंद कर दूंगी। एपीथिसियस को मालूम भी नहीं पड़ेगा। जैसे ही उसने ढकना हटाया उसमें से तमाम नाशकारक वस्तुऐ,ं महामारियॉं, ईष्या, द्वेष, घृणा, दुश्मनी आदि निकल पड़ी और चारों ओर बिखर र्गइं। पांडोरा ने जल्दी  से ढकना बन्द करना चाहा लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। और बक्सा खाली हो गया केवल आशा उसमें बंद रह गई।  आशा जिसे मनुष्य कभी नहीं छोड़ता।

अब देवताओं को मनुष्य से कोई खतरा नहीं रह गया था। क्योंकि अब मनुष्य के खुद के ही दुश्मन थे जो जानवरों से बदतर थे। लेकिन प्रामीथियस को जीयस अभी भी क्षमा नहीं कर पाया। जिसने स्वर्ग की पवित्र अग्नि को चुराया है उसे दंड अवश्य दिया जायेगा। उसे अपनी कृति मनुष्य  से बहुत प्यार है। जीयस ने कहा,‘ उसे काकेशस पहाड़ की चोटी पर जंजीर से जकड़ दिया  जाय। वहां सूर्य का ताप कभी नहीं मिलेगा  वह कराहेगा, तड़पेगा। एक गिद्ध उसके पेट केा निरंतर नोचता रहेगा जितना वह नोचेगा पेट फिर उतना ही होता जायेगा।

जीयस ने उसे पहाड़ की चोटी पर बंधवा दिया लेकिन प्रामीथियस न कराहा न तड़पा न सहायता  के लिए चिल्लाया वह बहादुरी से वहां अपना दंड भोगता रहा।


Friday, 1 August 2025

chathi seekh

 चौथी सीख

एक राजा के एक पुत्र था। राजा की बहुत इच्छा थी कि राजकुमार पढ़ लिख कर विद्वान बने जिससे राज्य काज आसानी से कर सके। लेकिन राजा का बातों पर राजकुमर ने कभी ध्यान नहीं दिया। बड़े होने पर राजकुमार को अपनी बचपन की भूलों का बहुत दुःख हुआ। उसने भूल सुधारने की सोची। ज्ञान प्राप्त करने की कोई उमर नहीं होती उसने सोचा और अपनी पत्नी को बता कर व तीन गिन्नी लेकर वह विद्या प्राप्त करने चल दिया।

चलते चलते उसने एक वृद्ध व्यक्ति को देखा। वह तम्बाकू के खेत में काम कर रहा था। राजकुमार ने उससे पूछा कि कोई एक ऐसा व्यक्ति है जो उसे ज्ञान दे सके। वह ज्ञान की गुरुदक्षिणा हेतु सोने की गिन्नी देगा। वृद्ध व्यक्ति बोला कि प्रति गिन्नी वह एक एक ज्ञान की बात बताने के लिये तैयार है। तीन गिन्नी के बदले तीन बातें बतायेगा। राजकुमार तैयार हो गया तो वृद्ध बोला, ध्यान से सुनो, तुम राज पुत्र हो अगर मित्र या किसी के भी घर जाओ तो आसन खिसकाए बिना कभी न बैठना, अब मुझे एक गिन्नी दो ।

दूसरी नसीहत यह है, वृद्ध ने कहा, तुम राज पुत्र हो जब कभी स्नान करो सामान्य स्नान गृह में कभी न नहाना। अपने नहाने का प्रबन्ध हमेशा अलग ही रखना। अब मुझे दूरी गिन्नी दे दो।

मेरी तीसरी बात यह ध्यान रखना यदि तुम्हारे पाास न्याय हेतु कोई आये तो यह ध्यान रखना जिधर के पक्ष में अधिक व्यक्ति हो उधर ही की बात मानना, राजकुमार ने तीनों गिन्नियाँ वृद्ध को दे दी।

तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हो चुकी है लेकिन एक नसीहत मैं तुम्हें मुफ्त देता हूँ। तुम राजपुत्र हो अगर गुस्सा आये तो प्रकट न होने दो, गुस्से में कोई निर्णय न लो पहले पूरी बात सुनो उसे तोलो तब निर्णय लो।

राजकुमार खाली हाथ वापस चल दिया, मन ही मन पछता रहा था कि उसने फालतू बातों के लिये अपनी तीन बहुमूल्य गिन्नियाँ खो दी। चलते चलते राजकुमार एक शहर में पहुँचा। राजकुमार को भूख लगी थी। वह एक दुकान पर पहुँचा। दुकानदार ने एक कालीन की ओर इशारा करते हुए कहा, बैठो।

राजकुमार को वृद्ध की पहली नसीहत याद आई, उसने कालीन खींचा तो देखा उसके नीचे एक कुँआ था। दुकानदार अजनबियों को वहाँ बिठाकर कुए में गिरा देता था। उसके बाद उन्हें लूट लेता था। उसे वृद्ध की बुद्धिमत्ता पर विश्वास हो गया।

आगे चला तो एक तलाब दिखाई दिया। उसने सोचा नहाया जाये। वृद्ध की बात याद आई उसने जहाँ सब नहा रहे थे वहाँ नहाकर जरा आगे जाकर नहाया। आगे बढ़कर उसे याद आया कि वह अपनी मोतियों की माला भूल आया है लौटकर उसने देखा तो उसे पड़ी मिल गई। सार्वजनिक स्थान पर तो कोई भी ले गया होता।

रात होने पर एक गाँव में गया एक किसान से कहा कि उसे अपने बरामदे में सोने दे। बरामदे में एक व्यक्ति और सोया हुआ था सुबह वह मृत पाया गया। अब गाँव वालों ने विचार करके निष्कर्ष निकाला कि मृत व्यक्ति के शरीर को जंगल मे फेंक दिया जाये। चूंकि राजकुमार भी यात्री था इसलिये वही उसे जंगल में फेंक कर आये। पहले तो राजकुमार ने मना किया फिर उसे वृद्ध की तीसरी नसीहत याद आई कि सबकी इच्छा के विरुद्ध कार्य न करे। वह मृतक को जंगल में खींचता हुआ ले गया। जंगल में लाश फेंकने से पहल उसने मृतक की तलाशी ली उसे रुपयों से भरी थैली मिली वह उसने ले ली।

शाम तक वह अपने राज्य की सीमा में पहुँच गया महल में पहुँचते आधी रात बीत गई बिना किसी को जगाये राजकुमार महल मेें पहुँचा उसने पत्नी के साथ किसी को सोते देखा। गुस्से में उसने तलवार खंींच ली। पर उसे वृद्ध की चौथी नसीहत याद आई, उसने पत्नी को जगाया, हड़बड़ा कर पत्नी उठी। पति को देखकर प्रसन्न हुई उसी समय दूसरे व्यक्ति ने भी चादर हटा कर  देखा ।देखा वह उसका पुत्र था सोचा आज वृद्ध की नसीहत की वजह से वह निर्दोषों की हत्या करने से बच गया। जिन्दगी भर राजकुमार वृद्ध की बातों पर अमल करता रहा और बहुत सी मुसीबतों से बचता रहा।