आराम की रोटी
एक दिन एक जंगली कुत्ते की भंेट एक झबरीले घरेलू कुत्ते से हुई । झबरीला कुत्ता घरेलू कुत्ता था। उसके बाल एकदम चिकने चमकदार लम्बे लम्बे थे ,उनसे खुशबू आ रही थी। बु्रश से भली भांति संवरे थे तथा बेहद हष्टपुष्ट था। उसे जंगली कुत्ता हैरानी सेे देखता रह गया, क्योंकि उसकी खुद की हड्डी हड्डी निकली हुई थी, जगह जगह कीचड़ लगी हुई थीं। जब स्वयं अपनी बदबू सहन नहीं होती थी तो वह नदी तालब या पोखर में लोटपोट कर आता था नहीं तो बरसात में तो बार बार धुल ही जाता था। पर उसकी खाल तो रूखी है बाल भी उलझ रहे हैं। वह उससे उसकी सुंदरता का राज जाने बिना रह नहीं पाया।
वह झबरीले से बोला, ‘भई तुम तो बहुत खूबसूरत लग रहे हो, कहाँ रहते हो? मुझे तो आजकल ढूँढ़़े से भी खाना नहीं मिलता, मंहगाई के कारण लोग जूठा छोड़ते ही नहीं, अब देखों न चील के मुँह में यह हड्डी गिर गई उसे ही निचोड़ रहा हूँ कहीं कुछ मिला ही नही। अब सड़कांे पर भी कुछ नहीं मिलता पर तुम्हें देखकर तो ऐसा नहीं लगता।’
झबरीला मुस्कराया और बोला ,‘ऐसे बने रहने के लिये काम करना पड़ता है, तुम्हारी तरह इधर उधर केवल मटरगश्ती से काम नहीं चलता है।’
‘अरे तो काम की कौन मना करता है भाई काम तो करने को मैं भी तैयार हूँ ,चलो भई मुझे भी ले चलो पर काम क्या करना होगा ?’
‘काम वैसे कुछ खास है नही। रातभर जाग कर घर का पहरा देना होता है जिससे चोर घर के अंदर न आ सके।’ झबरीले ने कहा.
‘फिर सोते कब हो?’ जंगली कुत्ते का मन शंकित हुआ।
‘सारा दिन पड़ा है सोने के लिये। दिन में तो सब जगे होते हैं तो अपना काम है खाना और सोना। वैसे हम लोग सोते ही कितना है जरा सी आहट से तो नीद खुल जाती है। सोने के लिये भी बड़ा नरम बिछौना मिलता है मुझे।’ झबरीले की बात सुनकर जंगली कुत्ते का मन बेहद ललचा उठा।
‘अच्छा भई तब तो तू मुझे भी ले चल यहाँ तो कभी पानी, कभी आंधी, सूखे पत्ते बहुत जान मुश्किल में है जरा से काम के लिये इतना आराम बुरा तो है नहीं।’
‘ठीक है तो चलो मैं तुम्हें अपने मालिक से मिला दूँ।’ कहता झबरीला उछलता कूदता आगे बढ़ा एकाएक जंगली कुत्ते को झबरीले के बालों में फंसा पट्टा दिखाई दिया। वह बोला, ‘भाई यह क्या है?’ ‘ यह पट्टा है’ लापरवाही से झबरीला बोला, ‘आज कल अच्छी नस्ल के कुत्तों को लोग हाल चुरा लेते हैं इसलिये दिन में मेरा मालिक इसमें जंजीर डाल देता है जिससे कहीं इधर उधर न चला जाऊँ। आज तो आँख बचा कर आ ही गया।’
‘क्या ? कहीं घूम नहीं पाते ’
‘हाँ भाई कहीं इधर उधर नहीं जा पाते मालिक की नजर के सामने रहना पड़ता है। परंतु मेरा मालिक बहुत अच्छा है दूध और रोटी खिलाता है वह भी चमचमाते बर्तन में।’
‘पर जंजीर तो छोटी होती होगी रात में दरवाजे लगे होते होंगे। इसका मतलब हुआ तुम्हें अपने मन से कहीं भी घूमने की आने जाने की स्वतंत्रता नहीं है।’
‘नहीं वह तो नहीं आ जा पाते रहना बंधे बंधे एक जगह पड़ता है। रात में खोल देते हैं ’
ना बाबा ना फिर तो मेरा रूखा सूखा खाना ही ठीक है। अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर अच्छे भोजन के लालच में मैं बंधा नहीं रह सकता। ऐसा भोजन , सुख आराम तुम्हें मुबारक। यह कह कर वापस जंगल की ओर भाग लिया।
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