Saturday, 21 June 2025

sunder hai vah

 सुंदर है वह

राहुल ने जेब थपथपाई, पन्द्रह रुपये स्कूटर में पेट्रोल भरवाने के बाद बचे थे। चार रुपये स्कूल के पंेसिल बॉक्स में थे। दस रुपये की रेजगारी एक़ हो गई थी। तब उसने जेब में डाल ली और चुपचाप निकल गया। भरी आंखें और भारी दिल से सोचता चला जा रहा था, किसी को उसकी जरूरत नहीं है वह सबके लिये बोझ हे, एक फालतू चीज जो घर के किसी कोने में पड़ी जगह ही घेर रही है जिसका कोई उपयोग नहीं है। उसके सामने पिता का क्रोधित चेहरा और माँ की गुस्से में भरी आवाज गंूज रही थीं, इस लड़के के मारे बहुत परेशन हूँ कभी कोई काम ठीक से नहीं करता, कोई चीज ढंग से नहीं रखता। अब कहाँ ढूँढ़ चाबियाँ नाक में दम कर रखा है।

यह किसी को परेशान नहीं करेगा, जो होगा देखी जायेगा, लेकिन अब वह लौट कर घर नहीं जायेगा। पिताजी ने स्कूटर में पेट्रोल भरवाने भेजा था, चाबी लौटकर उसने कहाँ रख दी उसे ध्यान ही नहीं। दोनों पेंट की जेब देख ली, कार्निस देख ली, जहाँ चाबी टंगी रहती है वह जगह देख ली पर वह कहीं नहीं थी, पता नहीं कहाँ रख दी। उसे ध्यान ही नहीं रहता, उस समय रेडियो पर इतना अच्छा गाना आ रहा था कि उसे ही सुनता रह गया चाबी का ध्यान ही नहीं रहा कहाँ बध्यानी में रख दी। वह धुन में आगे बढ़ता जा रहा था कि उसे पत्तों के चरमराने की आवाज आई। उसने  चौंक कर अपने चारों ओर देखा, ख्यालों मे बढ़ता वह जंगल कीह तरफ निकल आया था। उसे पीछे कुछ सरसराहट सुनाई दी वह घबड़ा गया, उसने मुड़ कर देखा काला सा साया नजर आया शायद भालू है। वह तेजी से भागा और भागते भागते चट्टान की ओट में हो गया ाअैर दम साध कर रहा था।चिड़िया अपेन अपने घोंसलों में चली गई थी। हाँ कोई कोई लेटलतीफ चिड़िया वापस लौटती टिटकार लगा देती थी।

चट्टान के पीछे उसे गुफा सी नजर आई। एक बार परेशान हुआ कि उसने ध्यान क्यों नहीं दिया अब तो उसे यह भी नहीं मालुम कि किधर जाये जो शहर में जा सके। रात यहीं गुफा में काट तब दिन निकलने पर शहर जायेगा। पर गुफा किसी जंगली जानवर की हुई तो। उसने एक पेड़ की डाल उठा ली। उससे उसने खट खट की और अंदर झांका जमी धुंधली सी रोशनी अंदर पहुंच रही थी, झांकते ही वह दो कदम पीछे हटा और एक चीख उसके मुंह से निकल गई। अंदर कोई विशाल साया था वह थर थर कांपने लगा। उसके पैर जड़ हो गये। उसने उस साये को बाहर आते देख काला आबसूनी चेहरा जिस पर बड़े बड़े दाग, लाल बड़ी आंखे चौड़ी और फैली नाक बाहर निकले बड़े दांत, हर समय दांत होंठों पर रहने से होठ सफेद पड़ गये। थे। वह उस व्यक्ति को फटी आंखों से देख रहा था। जैसे कहानियों का राक्षस उसे गर्दन से उठा कर लटका देगा।

अंदर आया बच्चे, एक कोमल स्वर ने उसे अंदर बुलाया।

एक आज्ञाकरी बच्चे की तरह वह अंदर उसके साथ चला गया। बाहर रहना ठीक नहीं, यहाँ जंगली जानवर भी हैं। जो रात मे निकल आते हैं, बच्चे क्या रास्ता भटक गया है। उसके कोमल स्पर्श और मधुर वाणी से भी उसका भय कम नहीं हुआ। पहले उसे मोटा करेगा खिलायेगा पिलायेगा फिर मार कर खा जायेगा। उसकी आंखों से आंसू टप टप गिरने लगे, तभी एक खि खिच की सी आवाज आई तो वह तेजी से अंदर चला गया। जानवर से इंसान का डर कम था। राहुल सिकुड़ कर एक तरफ बैठ गया और ध्यान से उस व्यक्ति को देखने लगा। उसने चारों ओर देखा। एक तरफ घासफूस का बिछौना था उस पर चादर फैली कोई चीज पड़ी थी। ईंटों का चूल्हा बना था। दो तीन बर्तन भी टंगे थे। अब तक दोनों चुप थे। उफ कितना भयानक चेहरा है पर अब डर कुछ कम हो रहा था। सर्दी बढ़ने लगी उसे कमकपी सी आ रही थी। उस व्यक्ति ने चूल्हें में आग तेज की और राहुल को उसके पास बैठने के लिये कहा सिर खंूटी पर से एक मोटा सा कपड़ा ओढ़ने के लिये दिया। उसे सर्दी बहुत लग रही थी उन कपड़ों को लपेट कर जरा गर्मी आई।

बटलोई उतार कर व्यक्ति ने रोटिया हाथ से थप थप कर बनाकर तंवे पर डाली एक कटोरे में सब्जी और रोटी उकसे सामने रख दी। गरम गरम रोटी सब्जी देख उसकी भूख भड़क उठी। जल्दी जल्दी खाता फिर रुक कर उस व्यक्ति को देखता अब उस व्यक्ति का चेहरा उसे उतना डरावना नहीं लग रहा था। खाकर उसने घड़े में से पानी पिया। अब तक उस व्यक्ति ने उससे कुछ नहीं पूछा या कहा था। ऊनी कपड़े को उसे अच्छे से लपेट कर पुआल पर लेट जोन के लिये कहा।

जरा डर कम हुआ तो उसे उस व्यक्ति के चेहरे में ऐसा क्या है यह देखने का ध्यान आया कभी वनमानुस, कभी मानवभक्षी, आदि वासी याद कर कर उसका कलेजा कांप रहा था। लेटे लेटे वह बार बार कनखियों से उसे देख रहा था अभी ठंड भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। उस व्यक्ति ने एमक मोटा लबादा सा उसके ऊपर डाल दिया और खुद सिमट कर चूल्हें के पास ही लेट गया। बार बार आंख उठा उठा कर उसकी निगाह गुफा के मुँह पर जहाँ उसने कांटो से भरी लकड़ियाँ रख दी थीं और कभी स्वयं उसकी ओर उठ जाती थी कुछ देर में ही चूल्हे से टिका व्यक्ति गहरी और एक सी सांसे लेने लगा और राहुल को भी नींद आ गई।

सुबह वह अचकपा कर उठ बैठा। गुफा खाली थी, वह बाहर आया। रात को भयानक लगने वाला जंगल बहुत खुशनुमा और सूबसूरत लग रहा था। सामने ही तालाब में कमल खिले थे ाअैर वह डरावना व्यक्ति कमल के फूल आग पर भून रहा था। कमल गट्टे ओर कुछ फल तोड़कर रखे थे उसे पास बुलाया। उसने हाथ मुँह धोयें और नमक से दांत साफ किये। जैसे जैसे वह व्यक्ति कह रहा था राहुल कर रहा था। अब उसे उससे जरा सा भी यहाँ आप अकेले रहते हैं। राहुल ही बोला।

खरखराती सी आवाज निकली, हाँ,

लेकिन क्यों

मुझे देख कर तुम्हें डर लगा था न। ऐसे ही जो भी देखता है यही चीख उठता है। ऐसी चीखें सुन सुन कर में थक गया था, दिन में कई बार मुझे अपनी बदसूरती का ऐहसास दिलाया जाता इससे में परेशान हो गया था। अब झुट पूटे में ही में बाहर निकलता हूँ जंगल के किनारे बंधी हुई एक दुकान से सब सौदा लाता हूँ । उसी को मैं जंगल से लकड़ी बीन बेच आता हूँ और डलिया बना लेता हूँ। वहीं बेच देता हूँ उसे मेरे चेहरे की आदत पड़ गई है वह मुझे देख डरता नहीं है। हाँ अब तुम चलो तुम्हें तुम्हारें घर के बाहर तक छोड़ आऊँ बच्चे माँ बाप गुस्सा अवश्य होते हैं पर प्यार था उनका कम नहीं होता। मेरी माँ मुझे बहुत प्यार करती थी और उसे मेरे चेहरे में सारे जहाँ की सुंदरता दिखती थी। उस व्यक्ति की आंख भर आई। नहीं वे मुझ पर बहुत चिल्लाते हैं, माँ तो कहती हूँ काम का न काज का मत काम बिगाड़ने वाला है अब उन्हें चैन मिल गया होगा। राहुल ने रूठने के अंदाज में कहा अच्छा तुम्हारें माँ बाप तुम्हें कितना प्यार करते हैं देखना चाहोगे। राहुल चुप रहा। ठीक हे मेरे साथ चलो। अगर तुम्हारे जाने से तुम्हारे माँ बाप प्रसन्न हों तो तुम मत जाना मेरे पास रहना मैं तुम्हें पढ़ाऊँगा पर एक बार चलो।

उस व्यक्ति के पीछे छिपा छिपा वह घर के पास आया। उसकी माँ घर की चौखट पर बदहवास बैठी थी उसकी आंखों से आंसू गिर रहे थे लग रहा था उसने मुँह में पानी भी नहीं दिया था। पापा बाहर टहल रहे थें बैचेन से कमी दरवाजे क्ी ओर और कभी अंदर टेलीफोन पर दौड़ रहे थे। उनकी भी हालत एक दम खराब थी। वह दौड़ कर उनसे लिप्ट गया। उसे देख माँ ीाी उसे चिपकर कर फड़क फड़क कर रो उठी मेरे अब लाल तू कहाँ चला गया था।

कुछ देर वह मम्मी पापा से चिपका रहा फिर एकाएक उसे उस व्यक्ति का ख्याल आया पापा...जो अंकल मुझे घर पहुँचा गये उनसे मिलवाऊँह। वह दरवाजे तक गया पर वहाँ कोई नहीं था। वह सोचने लगा अंकल कितने अच्छे थे। उसकी आंखों में उनका प्यार भरा चेहरा सुंदर बनकर झलक उठा। कुछ लोग दिल के कितने सुंदर होते हैं। उसने सोचा।

डॉ॰ शशि गोयल

चिदम्बरा


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