Saturday, 16 August 2025

Chaval ke panch Dane

 चावल के पॉच दाने


बहुत पुरानी बात है पाटलीपुत्र में धान्य नामक एक समृद्व और बुद्विमान व्यापारी रहता था। उसके चार पुत्र और चारों पुत्र विवाहित थे। पुत्र वधुओं के नाम थे उज्झिका, भोगवती, रक्षिका और रोहिणी। एक दिन धान्य ने सोचा, मैं अपने कुटुम्ब में सबसे बड़ा हूॅ और सब लोग मेरी बात मानते हैं, ऐसी हालत में यदि मै कहीं चला जाऊॅ , किसी कारण से कामकाज न देख सकूं, परदेष चला जाउं तो मेर बाद मेरे कुटुम्ब की देख भाल कौन करेगा, उन्हे सलाह कौन देगा, कौन मार्ग प्रदर्षन करेगा। यह सोचकर धान्य ने भोजन की विपुल सामिग्री तैयार कराई और अपने सगें संबंधियों को निमं़ित्रत किया।

भोजन के पष्चात् जब सब लोग गपषप कर रहे थे तो धान्य ने अपनी पुत्रवधुओं को बुलाया और उनसे कहा, “देखो बेटियों मैं तुममे से प्रत्येक को धान के पांच दाने देता हॅू तुम इन्हे संभाल कर रखना और जब मै मागूं मुझे लौटा देना।”

चारों बहुओं ने कहां, “ पिता जी जो आज्ञा।” और वे धान के दाने लेकर चली गईं। सबसे बडी बहू ने सोचा, “ मेरे ससुर के कोठार तो धान से भरे पड़े हैं जब मांगेेगंे मैं कोठार में से लाकर दे दूंगी।” यह सोचकर उज्झिका ने उन दानों को उठाकर फेंक दिया और अपने काम में लग गई।

दुसरी पुत्रवधू भोगवती ने यह सोचा, “ मेरे ससुर के कोठार में मनों धान भरे पड़े है परंतु अवष्य से प्रसाद के होंगे। ” बस उन दानों का छिलका उतार कर खा गई।

तीसरी पुत्रवधू रक्षिका से सोचा, “ ससुर जी ने इतने सब लोगों के सामने बुलाकर हमें ये धान के दाने दिये हैं , उन्हें सुरक्षित देने के लिये कहा है अवष्य ही इनमे कोई रहस्य होना चाहिये।” उसने उन दानों को साफ कपडे़ मे बांधकर अपनी रत्नों की पिटारी में रख दिया और अपने सिरहाने रख सुबह षाम उनकी चौकसी करती ।

चौथी पुत्रवधू रोहिणी के मन में भी यही विचार उठा कि अवष्य ससुरजी ने कुछ सोचकर हमें धान के दाने दिये है। उसने अपने नौकरों को बुलाया और कहा, “जब खूब जोर की वारिष हो तो छोटी छोटी क्यारियां इन धानों को खेज में बोदो। उसके बाद दो तीन बार करके एक स्थान से दूसरे स्थान पर रोपो और इनके चारों ओर बाड़ लगाकर इनकी रखवाली करो।”

नौकरों ने रोहिणी के आदेष का पालन किया और जब हरे हरे धान पककर पीले पड गये उन्हे तीखी दंतियों से काट लिया। तत्पष्चात् धानों को हाथ से मला और उन्हे साफ करके कोरे घडों मे भर कर घडों को लीप पोतकर उन पर मोहर लगा कर कोठार मे रखवा दिया। दूसरी वर्षा ऋतु पर आने पर फिर से इन धानों को खेत में बोया। और पहले की तरह काटकर साफ करके घडों में भरकर रख दिया। इसी प्रकार तीसरे और चौथे साल किया । अब इन पॉच दानों के बढ़ते बढ़ते सैंकडों घडे हो गये। इन घड़ों को सुरक्षित रखवा कर निष्चिंत हो गई।

चार वर्ष पष्चात् धान्य ने सोचा कि मैने तो दाने दिये थे उन्हे बुलाकर अब पुछना चाहिये कि उन्होने किस प्रकार से उनकी संभाल की। धान्य ने फिर से अपने सभी सगे संबंधियों को निमंत्रित करके उनके सामने अपनी पुत्रवधुओं को बुलाया और धान के दाने मांगे।

पहले उज्झिका आई। वह अपने ससुर के कोठार में गई और और धानके पॉच दाने लाकर अपने ससुर के सामने रख दिये। धन्य ने अपनी पुत्रवधू से पूछा कि क्या ये वही दाने है या दूसरे। उज्झिका ने सच सच कह दिया कि पिता जी उन दानों को मैने उसी समय फेंक दिया था, ये दाना मैने आपके कोठार से लाकर दिये। यह सुनकर धान्य को बहुत क्रोध आया और उससे उज्झिका को घर झाड़ने पोंछने और साफ सफाई करने के काम में नियुक्त कर दिया।

तत्पष्चात् भागवती आई। धान्य ने उसे घर के खाने पकाने पीसने और रसोई बनाने के काम में लगा दिया। उसके बाद रक्षिका आई उसने अपनी पिटारी खोली और उसमें से धान के पॉच दाने निकाल कर अपने ससुर के सामने रख दिये इस पर धान्य बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उसे अपने कोष खजाने की मालकिन बना दिया।

अन्त मे रोहिणी की बारी आई। उसने कहा, “ पिता जी जो धान के दाने आपने मुझे दिये थे उन्हे मैने घडों मे भरकर कोठार में रख दिये हैं। उन्हें लाने के लिये गाड़ियों कि आवष्यकता होगी। रोहिणी ने अपने ससुर से सब बातें बताई कि उसने किस प्रकार पॉच दाने को खेत में बो बो कर इतने दाने धान पैदा किये है धानों के घडे मंगाये गये अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने रोहिणी को सब घर बार की मालकिन बना दिया।


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