Sunday, 20 July 2025

chandrgrahan

 चंद्र ग्रहण

एक वृद्ध विधवा मृत्युशैया पर लेटी थी। उसके दोनों पौत्र पास ही खड़े थे। बच्चों वह बोली, और दादियों की तरह मैं तुम्हारे लिये सोना-चांदी तो छोड़ नहीं जा रही हूँ। बड़े के लिये सिल और छोटे के लिये बट्टा छोड़े जा रही हूँ यह कहकर मर गई। बड़े भाई ने सोचा मैं इस सिल को लेकर क्या करूँगा मुझे कोई रसोई में नौकरी तो करनी नही है। उसने सिल रसोई में ही छोड़ी और परदेश मेहनत करके कमाई करने लगा। और बड़ा आदमी बन गया।

छोटे भाई को दादी पर अटूट विश्वास था  जरूर बट्टे का कोई न कोई उपयोग जरूर होगा छोटे ने सोचा नहीं तो दादी क्यों देती? यह सोच कर वह जहाँ भी जाता उसे साथ ले जाता। अड़ोसी-पड़ोसी खूब हंसते। वह लकड़ी बेच कर अपनी रोटी का गुजारा करने लगा परंतु गरीब ही रहा।

एक दिन जब वह लकड़ी बीन रहा था एक सर्पिणी वहाँ आई। छोटा लड़का डर के मारे पेड़ पर चढ़ गया। सर्पिणी बोली, डरो नहीं मैं तो बस तुम्हारा बट्ट़ा उधार लेने आई हूँ। इसका क्या करोगी? छोटे भाई ने पूछा, मेरे पति अभी ही मर गये है सर्पिणी बोली अगर उनके नथुनों से यह जादुई बट्टा लगा दिया जाय तो वह फिर से जीवित हो जायंेगे।’’

‘ मैं नही जानता कि यह बट्टा जादुई है।’’ छोटे भाई ने आश्चर्य से पूछा,

‘मेरे साथ आओ तुम्हें पता चल जायेगा ।’’सर्पिणी ने कहा, वह उसके पीछे पीछे घने जंगल में गया वहाँ एक सर्प मरा पड़ा था। उसने अपना बट्टा उसके नथुनों से लगाया वह फौरन जीवित हो गया।

‘इस बट्ट़े की शक्ति इसकी सुगंध में है’’ सर्पिणी ने कहा ,‘परंतु यह तब ही तक रहेगी जब तक कि तुम किसी से बताओगे नहीं।’ तब दोनों छोटे भाई को धन्यवाद कह चले गये।

छोटा भाई गाँव के लिये चला रास्ते में उसे एक कुत्ते का शव मिला। उसे मरे देर हो चुकी थी इसीलिये उसकी देह अकड़ गई थी। उसने जैसे ही उसके नथुने से अपना बट्टा लगाया कुत्ता उछल कर खड़ा हो गया। छोटे भाई ने उसका नाम अकडू़ रखा। अकडू तब से अपने जीवनदाता का स्वामिभक्त वफादार साथ हो गया।

शीघ्र ही छोटा भाई मृत्यंुजय वैद्य के नाम से प्रसिद्ध हो गया। किसी को भी यह पता नहीं लग पाता था कि यह बट्टा है जिसके कारण रोगी ठीक हो जाते हैं। वे समझते वह बट्टा केवल दवा पीसने के लिये रखता है। कुछ दिन बाद राजा की लड़की का देहांत हो गया। राजा ने छोटे भाई को बुलाया छोटे भाई ने राजकन्या को जीवित कर दिया। बदले में राजा ने राजकुमारी की शादी छोटे भाई से कर दी।

एक दिन छोटे भाई ने सोचा अगर यह बट्टा मृत्यु को जीवन में बदल सकता है तो बुढ़ापे को भी जीत सकता है। यह सोचकर प्रतिदिन एक बार खुद सूंघता एक बार राजकुमारी को सुंघा देता। राजकुमारी सोचती यह वैद्यराज की कोई सनक होगी। कुछ वर्ष बाद छोटे भाई को लगा कि उसने बुढ़ापे की दवा ढूँढ़ ली है क्यांकि वह और राजकुमारी जरा भी उम्र में नहीं बढ़े थे। लेकिन चंद्रमा को दोनों मृत्युलोक के निवासियों से जलन होने लगी। सूर्य तक बुड्ढा हो रहा है चंद्रमा ने सोचा प्रतिदिन शाम को वह लाल भूरा सा कुम्हलाया हो जाता है वह बट्टा चुराने का मौका देखने लगा।

एक दिन बट्टा कुछ भीग गया इसीलिये छोटा भाई उसे धूप में बैठकर सुखाने लगा। ‘मेरे सरताज, राजकुमारी ने हठ करते हुए कहा आप एक राज्य के उत्तराधिकारी है आप एक बट्टे को लेकर धूप में सुखाने बैठे रहे कुछ अच्छा नहीं लगता। यह काम सैनिकों पर छोड़ दो राजकुमारी ने इतनी हठ की कि उसे छोड़ना ही पड़ा लेकिन उसे किसी का विश्वास नहीं था। इसलिये वह अकडू को वहाँ पर बिठा अंदर आ गया। अकडू बट्टा को देखने लगा। चंद्रमा को मौका मिला और वह बट्टा चुराने आकाश से नीचे आया। सूर्य की तेज रोशनी में धुंधलाया चांद अकडू को दिखाई न दिया और चांद बट्टे को लेकर भागा बट्टे की खुशबू के सहारे वह चंद्रमा के पीछे भागा।

तब से लगातार कुत्ता चंद्रमा का पीछा कर रहा है। रात में तो उसे चंद्रमा दिखाई देता है। परंतु दिन में वह बट्टे की सुगंध के सहारे पीछा करता है। क्यांेकि रातदिन वह बट्टे को सूंघता रहता है इसलिये वह अमर हो गया है। कभी वह उसे पकड़ लेता हे और निगलने की कोशिश करता है लेकिन कठोर होने की वजह से निगल नहीं पाता और उसे उगलना पड़ता है फिर से दौड़ शुरू हो जाती है।


Saturday, 19 July 2025

chatur maina

 चतुर मैना


बहुत दिन हुए सांरग नामक एक चित्रकार के पास एक मैना थी। प्रातः होते ही वह खिड़की पर जा बैठती और जोर जोर से बोलती,‘ बड़े भैया सुबह हो गई। बड़े भैया सुबह हो गई।’

एक बार हाकिम ने अपने नये महल को चित्रित करने का कार्य सारंग को सौंपा। सारंग के साथ मैना भी रोज जाती। यदि सारंग का ब्रश गिर जाता मैना चोंच में दाब लाती। कभी खतरनाक स्थानों पर खड़े होकर चित्रकारी करनी होती तो मैना उसे सावधान करती जाती ,‘बड़े भोया सावधान रहना। बड़े भैया सावधान रहना।’ अन्य कारीगर भी मैना को प्यार करने लगे। उन्होने उसे तरह तरह के गीत सिखा दिये। 

एक दिन सारंग गणेश जी का चित्र बना रहा था कि हाकिम वहाँ आया उसने पूछा,’’यह किसका चित्र है?’’ सारंग बोला, ’’ ये गणेश जी हैं भाग्य सफलता और दीर्घजीवन के देवता। तभी मैना भाग्य, सफलता, दीर्घजीवन के देवता।  भाग्य, सफलता, दीर्घजीवन के कहती फुदक कर सारंग के कन्धे पर जा बैठी। हाकिम को चिड़िया बहुत पसन्द आई वह बोले,’’ यह चिड़िया किसकी है?’’

मेरी! सरंग ने कहा।

हाकिम अपनी लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते मैना से बोले ?‘आओ तुम्हें कुछ खाने को दूँगा।’’मैना हाकिम के पास गई। 

दूसरे दिन हाकिम का सेवक चित्रकार के पास आया और बोला कि हाकिम की इच्छा है कि चित्रकार मैना को हाकिम कोे उपहार स्वरूप भेंट कर दे। वे बदले में तुम्हें सोना चाँदी भेंट करेंगे। चित्रकार ने कहा’’ जाओ हाकिम से कह दो मेरी चिड़िया बिकाऊ नहीं है। मैना छत के कुंदे से चिल्लाई मैना बिकाऊ नहीं,’’मैना बिकाऊ है सेवक चेहरे पर एक कठोर मुस्कराहट लिये चला गया। 

कुछ ही दिन बाद चित्रकार बीमार पढ़ गया। वह हाकिम के पास से पाँच चाँदी के सिक्के बतौर पेशगी लेने आया। लेकिन चित्रकार दो महीने तक बीमार रहने की बजह से काम पर नही जा पाया और अपना ऋण नहीं चुका पाया। 

सर्दियों में हाकिम अपने नये महल में गया उसने देखा पूर्व दिशा के बड़े कमरे की छत पर एक हिस्सा बिना चित्रित रह गया है। वह गुस्से में आग बबूला हो गया और सारंग को पकड़ बुलाया। हाकिम ने उसे आज्ञा दी कि इस नुकसान के बदले मैना दे और पाँच चाँदी के सिक्के वापस करें। चित्रकार ने मैना देने को मना कर दिया। हाकिमा ने उसे जेल में डाल दिया। 

मैना ने अपने मालिक को लगातार कई दिन तक खोजा। एक दिन उसे सफलता मिल गई। एक टूटे पाइप से वह जेल के कमरे में पहुँची ओर खुशी से सारंग की गोद में पंख फैलाकर बैठ गई। सारंग की आँखे आँसुओं से घिर आई। वह बोला,’’ मैना तू मुझे बहुत प्यार करती है न देख तेरे कारण हाकिम  मुझे मारता है उल्टा लटकाता है पर मैने तुझे बचपन से पाला है मैं तुझे दूसरे के हाथ में कैसे दे दूँ? मैना की आँखें भी बरसने लगी। 

मैना प्रतिदिन उसी रास्ते से सारंग के पास पहुँचने लगी और चित्रकार को ढांढस बँधाती। एक दिन एक संतरी ने उसे मैना से बातें करते देख लिया उसने हाकिम से शिकायत कर दी। हाकिम जब वहाँ आया तो मैना छत पर उड़ गई। सैनिकों को पकड़ने आते देख उड़ते हुए बोली ,‘हाकिम तुम सबको धोखा दे सकते हो पर मुझे नहीं।’ हाकिम गुस्से से पागल हो गया। उसने सब सैनिकों को और सेवकों को आज्ञा दी कि मैना को तीन दिन के अन्दर पकड़ लिया जाय नहीं तो सबको सजा मिलेगी। सैनिक पूरे राज्य में मैना को ढूँढते फिरे। 

दूसरी रात चोरी चोरी मैना सारंग से बात कर रही थी कि सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। पाइप वे उसके घुसते ही बन्द कर आये थे। वे चिड़िया को हाकिम के पास लाये। हाकिम अपनी दाढ़ी सहलाते बोला,‘ काली चिड़िया अब बोल अब क्यों नही उड़ पाई? ’ चिड़िया उदास पिंजरे में चुप बैठी रही।‘ बहुत चबड़ चबड़ करती थी अब कहाँ गई सारी बोली। अब तुझे खा ही जाऊँगा। बोल उबालकर खाऊँ या भून कर?’’ उदास चिड़िया धीमे स्वर में बोली,‘हाकिम तुम तो हो ही माँस भक्षी मानव माँस खाते हो, रक्त पीते हो तो मै क्या चीज हूँ। खा लो मुझे जैसा तुम चाहो। एक दिन बोटी बोटी काट कर तुम्हारी कुत्तों को खिलायी जायेगी।’ 

हाकिम बम के गोले की तरह फट पड़ा,‘ ले जाओ इस कुतिया को। इसे जिन्दा काट कर तेल में तल डालो।’ रसोइये ने जल्दी जल्दी मैना के पर नोंचे चाकू और मैना को थाली में रख तेल लेने अन्दर भंडार गृह में गया। मैना ने जान बचाने की सोची। पंख हिलाये पर वह उड़ नही सकती थी। रसोइया वापस आ रहा था वह तेजी से गहरी नाली में घुस गई। 

बेचारी चिड़िया पूरा एक साल उस गन्दी नाली में छोटे छोटे कीड़ों को खाकर जिन्दा रही। बसन्त में मैना के नये पंख उग आये। वह चुपचाप चोरी चोरी नाली से बाहर आई और उड़ गई। उसने सारंग को फिर ढूढंना शुरू किया। सारंग  जेल से भाग कर पहाड़ियों में जा छुपा था मैना उसे ढूढं न सकी। एक दिन सारंग को ढूढंती ढूढंती वह राजमार्ग से गुजर रही थी कि उसने ढोल ओर ताशे की आवाज सुनी। उसने देखा कि हाकिम सालाना बलि चढ़ाने मन्दिर की ओर जा रहे है वह उधर ही उड़ गई।

धूप और दिया जलाकर हाकिम ने देवी को घुटने टेक कर प्रणाम किया कि देवी की मूर्ति बोली, ‘हे न्हाकिम आज तुम्हें सारे राज्यवासी धिक्कार करते हैं कहते हैं कि तुम लालची हो और स्वार्थ सिद्धि के लिए अपराध करते हो। हाकिम देवी के मुँह से कोप वचन सुन थर थर काँपने लगा। वह फर्श पर लेट गया ओर देवी के चरणों में नाक रगड़ने लगा। वह गिड़गिड़ा रहा था। देवी फिर बोलीं,’’ अगर तुम जोर जोर से बोल कर जनता के सामने अपने अपराधों को बयान करो तो मैं अब भी तुम्हें क्षमा कर सकती हूँ लेकिन एक बात याद रहे, कुछ भी झूठ बोलने की कोशिश मत करना, नही तो कुत्ते से भी बदतर जिन्दगी यापन करनी पड़ेगी। 

गिड़गिड़ाते हुए हाकिम ने अपने सब अपराधों को जोर जोर से बोला। जनता के मुँह आश्चर्य से खुले रह गये। देवी फिर बोली,‘ वैसे तो तुमने इतने अपराध किये हैं कि तुम्हारी जिन्दगी कुत्ते की जिन्दगी होनी चाहिये परन्तु तुम अपनी गलती पहचान गये इस लिये मैं तुम्हें हल्की सी सजा ही देती हूँ।’ हल्की सी सजा सुन हाकिम को बहुत संतोष हुआ वह फिर देवी के चरणों में झुक गया। 

मूर्ति से आवाज आई,’’ सबसे पहले तो अपनी दाढ़ी नोच लो जिससे तुम आम आदमी नजर आओ।’हाकिम ने फौरन दाढ़ी नोच डाली। सब बाल हटा दिये एक भी नहीं छोड़ा। देवी की आवाज फिर सुनाई दी,’’ अब मेरे आगे तीन सौ पैसठ साष्टांग दंडवत करो जिससे आगे से तुम निरपराधियों को दंड बैठक न लगवाओ। 

वह जल्दी जल्दी साष्टांग दण्डवत् करने लगा। चेहरा बालों के नुचने से लहूलुहान हो रहा था। बार बार ठोड़ी को जमीन पर टेकन से वह लस्त हो गया। बैठक पूरी करते न करते वह वेदी पर लुढ़क गया। तभी उसे अपने ऊपर चिचियाने की आवाज सुनाई पड़ी,’’हाकिम यह मैं हूँ। पिछले साल तुमने मेरे पंख नोचे मैने तुम्हारी दाढ़ी नुचवा दी। पिछले साल तुमने मेरे बड़े भैया के हाथ पैर तुड़वाये इस साल मैने तुम्हारे। 

हाकिम ने अपना सिर उठाया। वह समझ गया कि क्या माजरा था पर तब तक मैना ऊँची आकाश में उड़ गई। 


Wednesday, 16 July 2025

adbhut bansuri

 अदभुत बांसुरी


एक समय की बात है किसी गांव में एक बहुत मेहनती और धनी किसान रहता था लेकिन अपना कहने के नाम पर उसके पास केवल एक कुत्ता और एक बांसुरी थी जिस पर वह अदभुत संगीत बजाया करता था। 

सारा दिन खेत में मेहनत करने के बाद जब वह बांसुरी होठों पर लगाकर धुन निकालता तो सारा वातावरण अदभुत संगीत से भर जाता । उसकी धुन सुनकर चिड़ियाऐं जानवर आदमी सब खिंचे चले आते । सबको उस बांसुरी वाले से बहुत प्यार था ।

गांव के धनी जमींदार की लड़कियां चाहती थीं कि बांसुरीवाला उनसे षादी करले लेकिन बांसुरी वाला जब देखता कि उन लड़कियों को मेहनत करने की जरा भी आदत नहीं है तो वह उनसे बात भी करना पसंद नहीं करता। एक दिन चिढ़कर उन लड़कियों ने उसे एक गहरे गड्डे में धक्का दे दिया । लड़का कुछ देर के लिये बेहोष हो गया। होष में आने पर उसने गड्डे में से निकलने की कोषिष की। उसका कुत्ता जोर जोर से भौंक रहा था।

 ‘ मेरी बांसुरी दो ’ लड़के ने कुत्ते से कहा । बांसुरी मिलने पर लड़के ने उसे बजाना ष्षुरू किया। कुछ बंदर पास ही संगीत सुनने के लिये गड्डे के चारो ओर एकत्रित हो गये। पर लड़के को गड्डे से बाहर निकलने में असहाय देख पास ही खड़े वृक्ष की डाली गड्डे में झुका दी जिसे पकड़ कर वह बाहर आ गया।

जब लड़कियों ने उसे सही सलामत देखा तो खिसियाकर उसे खाई में धक्का दे दिया। खाई बहुत गहरी थी लेकिन लड़के का ष्षरीर मजबूत था उस पर वह लताओं पर गिरा ,वह बच गया। कंद मूल खा खा कर किसी तरह कई दिन में वह बाहर आया। वह काफी कमजोर हो गया था। उसके बाल बढ़ गये थे। चलते चलते वह एक धान के खेत में पहुंचा। उस खेत में दो बहनें धान की रखवाली कर रही थीं। बड़ी बहन उसको देखकर भय से चीख कर भागी और षिकारियों को आवाज लगाने लगी ,लेकिन छोटी बहन को युवक की दीन दषा देख दया आई उसने उसे आगे बढ़कर सहारा दिया,

‘ लगता है तुम भूखे प्यासे हो’ यह कहकर उसने अपने हिस्से का खाना उसके सामने रख दिया। बड़ी बहन को छोटी बहन का व्यवहार जरा भी अच्छा नहीं लगा वह उसे क्रोध भरी निगाह से देख रही थी। खा पीकर जब लड़का तृप्त हुआ तो उसने सिर काढ़ने के लिये कंधा मांगा। बड़ी बहन बोली ,‘ हां कुछ देर में कहना कपड़े देदो ।’

लेकिन छोटी बहन ने उसे कंधा लाकर दिया। अब युवक ने मुंह धोया सिर काढ़ा फिर कमर में बंधी बांसुरी निकाल कर बजाना प्रारम्भ किया तो बड़ी बहन मुग्ध हो उठी। लड़कियों के पिता को युवक बहुत अच्छा लगा । उसने उससे अनुरोध किया कि वह उसकी किसी लड़की से ष्षादी कर वहीं रहे। इसके लिये पिता ने दोनों लड़कियों से छोटे छोटे घर बनाने के लिये कहा । पिता ने देखा कि युवक छोटी बहन की घर बनाने में सहायता कर रहा है उसने उसी के साथ उसकी षादी कर दी ।


Tuesday, 15 July 2025

chatur hasan

 चतुर हसन

बहुत दिन पहले की बात है एक बहुत ही क्रूर सुल्तान था उसके सात बेटे थे। एक गरीब भाई था जिसके सात लड़कियाँ थी। गरीब भाई प्रतिदिन सुबह आकर भाई की कोर्निश बजाता और कहता सात पूतों के पिता सदा आबाद रहो और सुल्तान जबाब देता शांति मिले सात खैरातों के पिता। एक दिन गरीब भाई को किसी प्रकार का काम नही मिला उसने अपनी एक पुत्री सुल्तान के पास भेजी। लड़की सुल्तान से बोली मेरे पिता आज अपनी बीमारी की बजह से नही मिल पायेगें आज वे कुछ कमा कर भी नही ला पाये हैं क्या आप कुछ सहायता करेगें?

सुल्तान ने कहा ,‘जाओ भंडार से ज्वार ले जाओ। ’दूसरे दिन जब गरीब भाई सुल्तान से मिलने गया सुल्तान ने कहा ,‘मैने तुम्हारा पालन पोषण आदि किया तुम बदले में मुझे ऐसा पानी लाकर दो जो न कुऐं का हो न नदी का न वर्षा का नही तो मैं तुम्हारा सिर उड़ा दूँगा।’ 

गरीब भाई रोता हुआ घर आया पुत्रियों को बताया सबसे छोटी पुत्री बोली,‘ पिताजी जरा भी परेशान न होईये मैं वह पानी दूँगी।’ उसने माँ और बहनों से नहाने के लिये कहा नहाकर उसने उन्हें आग के चारों ओर बैठा दिया । गर्मी से पसीना बह उठा । उसे ऊँट की खाल की बोतल में भर कर पिता को सुल्तान के पास ले जाने के लिये दे दिया। 

गरीब भाई ने सुल्तान को पानी दिया और कैसे एकत्रित किया यह भी बताया। तब सुल्तान बोला 

‘मुझे ऐसा दूध लाकर दो जो किसी जानवर या महिला का न हो।’

 गरीब भाई फिर उदास होकर घर आया छोटी पुत्री सुनकर हँसी और बोली,‘ पिताजी यह तो बहुत सरल कार्य है आप क्यांे परेशान होते हो। ’वह सब बहनों को लेकर ंजगल में गई वहाँ कई वृक्षों की डाली तोड़ने पर दूध निकलता था उसे एकत्रित किया और पिता को लाकर दिया और कहा ,‘पिताजी ऐसे तो सुल्तान आपको परेशान करता रहेगा। आप आज सभा में पूछना कौन ज्यादा अच्छा है सात पुत्र या पुत्रियाँ? वे यही कहेगें कि सात पुत्रियाँ पुत्रों के नाखून के बराबर भी नहीं तो आप कहना ऐसी बात है तो आप अपने सब से बड़े सबसे बहादुर बेटे को लायें मैं अपनी सबसे छोटी बेटी को लाऊँगा दोनों को कुछ रूपया देना । दोनों उनसे व्यापार करके लाये ,अगर मेरी बेटी आपके बेटे से कम पैसे कमा कर लाये तो उसका सिर काट लेना अगर मेरी बेटी ज्यादा कमा कर लाती है तो तुम्हारे पुत्र के साथ मेरी जो इच्छा होगी करूँगा। ’

गरीब भाई ने लड़की के कहे अनुसार भरी सभा में बात दोहराई ।सुल्तान तैयार हो गया। सुल्तान का बड़ा पुत्र और गरीब भाई की पुत्री आई उन्हें एक एक घोड़ा तलवार और थोड़ा रूपया देकर भेज दिया। जैसे ही दोनों बाहर निकले राजा के पुत्र ने लड़की को फातिमा कहकर पुकारा तो पुत्री ने क्रोध से कहा,‘ खबरदार अब से मुझे केवल चतुर हसन कहना नही तो तुम्हारा सिर काट डालूँगी। ’

आगे दो सड़कें थी एक पर लिखा था आगे खतरा है दूसरी पर लिखा था सुरक्षित मार्ग। लड़की ने राजपुत्र से पूछा,‘ किस मार्ग से जाना पसंद करोगे तो राजपुत्र बोला ,‘सुरक्षित मार्ग से। ’राजपुत्र सुरक्षित मार्ग से आगे बढ़ा जबकि लड़की खतरे वाले मार्ग से चलते चलते एक शहर के बाजार में पहुँची ंवहाँ उसने बाजार का सबसे कीमती सामान पूछा वहाँ पता लगा नमक सबसे मँहगा है उसने नमक का व्यापार शुरू किया। वहाँ वह लड़को के कपड़े पहन कर लड़के के वेष में सुल्तान के पुत्र के साथ उसका मित्र बनकर रहने लगी। 

लेकिन सुल्तान पुत्र को सदा संदेह रहता था। एक दिन उसने अपनी माँ से कहा हसन के गाल एकदम लड़कियों जैसे चिकने है लेकिन बेटे माँ ने कहा कहीं लड़कियाँ इस प्रकार के व्यापारिक कार्य कर सकती हैं वैसे मैं उसका एक इम्तहान लूँगी अगर वह सफल होता है तो लड़का है असफल तो लड़की। मैं चाय के साथ खजूर दूँगी अगर खजूर दाँत से कुतर कर उसकी गुठली नीचे डाले तो लड़की अगर तोड़ कर खाये गुठली दूर फैंके तो लड़का। 

लेकिन चतुर हसन ने खजूर तोड़ा और गुठली दूर फेंक दी। लड़का माँ से बोला,‘ माँ तुम्हारी परीक्षा में हसन सफल हुआ लेकिन फिर भी मैं मानने के लिये तैयार नही हूँ क्योंकि उसके गाल बिल्कुल चिकने हैं’।

‘  अच्छा तो उसे शिकार के लिये ले जाओ अगर शिकार जिन्दा पकड़े तो वह लड़का है नहीं तो लड़की।’।

लड़की ने एक जानवर दूर देखा तेजी से उसके पीछे घोड़ा दोड़ा दिया ।उसका तब तक पीछा किया जब तक कि जीवित पकड़ नही लिया। सुल्तान पुत्र की माँ बोली बेटा यह पुरूष ही है। लेकिन सुल्तान पुत्र को यकीन नही आया तो माँ ने कई अन्य तरह से परीक्षा ली जैसे पेड़ पर चढ़ना पुरूषोंचित ढंग से खाना, कपड़ा पसंद करना आदि लेकिन सबमंे लड़की सफल होती गई तो माँ बोली ,‘अच्छा मैं एक आखिरी परीक्षा लेती हूँ। इसके बाद कोई शक नही रह जायेगा उससे जल में नहाने की कहना।’ 

सुल्तान पुत्र के नदी में नहाने की इच्छा से लड़की पेरशान हो उठी वह भगवान से प्रार्थना करने लगी हे ईश्वर तुम जानते हो मैने घर किन परिस्थितयों में छोड़ा है तुम मेरी सहायता करना। यह कहकर वह सुल्तान पुत्र के साथ निकली। जैसे ही वह आगे बढ़ी उसके और सुल्तान पुत्र के बीच में बरात आ गई जिस समय सुल्तान पुत्र नही के किनारे पहुँचा वह आखिरी कपड़े पहन रही थी। सुल्तान पुत्र ने फिर से नहाने के लिये कहा तो उसने मना कर दिया कि उसे बुखार आ जायेगा। अब तक लड़़कांे के पास काफी धन एकत्रित हो गया था उसने सबसे विदा ली और सुल्तान पुत्र के पलंग पर लिख कर रख आई एक लड़की की तरह मैं आई लड़की ही मैं जाती हूँ लेकिन कोई भी मुझे पहचान नही पाया पकड़ नही पाया। 

सुल्तान पुत्र ने माँ को पत्र दिखाया और कहा मैं उसके घर तक पीछा करूँगा तब पकडूँगा। उधर राज पुत्र एक शहर में गया वहाँ वह जुआ खेलने लगा धीरे धीरे वह सारा रूपया गंवा बैठा बाद में एक सराय में नौकर हो गया। हसन उस शहर से गुजरी और उसी सराय में खाना खाने गई उसने अपने और अपने दासों के लिये खाना मंगाया। जब चचेरा भाई खाना लेकर आया तो उसने पूछा कि वह पहचाना या नही। चचेरा भाई बहुत शर्मिन्दा हुआ। लड़की ने सराय के मालिक से चचेरे भाई को मुक्त करा कर साथ ले जाना चाहा तो सराय मालिक ने कहा कि उसने चचेरे भाई को बहुत सा रूपया उधार दिया है। अगर वह चुका दे तो ले जा सकती है। 

रास्ते में अपने सारे दासों के चचेरे भाई के साथ भेज दिया ओर स्वंय अकेले गई। अपने शहर में पहुँचने पर जब लोगें ने राजा के पुत्र को दासों के साथ और लड़की को अकेले आते देखा तो बहुत प्रसन्न हुए और सुल्तान को खबर दे दी। 

जब सब लोग दरबार में पहुँचे तो सुल्तान हँस रहा था और लड़की का पिता जोर जोर से रो रहा था। लड़की ने अपना घोड़ा अपने पिता की ओर किया साथ ही सारे गुलाम सारे धन दौलत से लदी गाड़ी भी लड़की के साथ चल दी और सुल्तान पुत्र अकेला ही अपने पिता की ओर बढ़ा। लड़की ने अपने रोते हुये पिता का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा पिताजी आपकी बेटी लड़के से कम नही है। यह दृश्य देख सदमें से सुल्तान वही मर गया। 

अपने धन से लड़की ने पिता का घर फिर से बनवाया। सुल्तान की मृत्यु के बाद गद्दी बड़े लड़के ने संभाल ली वह चाचा के पास आया कि आपस की शत्रुता पिता के साथ गई। हम सात भाई हैं आपके सात पुत्रियाँ हैं आपस में विवाह कर दीजिये। मैने क्योंकि फातिमा के साथ यात्रा की थी इसलिये में फातिमा से शादी करूँगा। 

फातिमा के पिता तो तैयार हो गये लेकिन फातिमा ने इंकार कर दिया बोली ,‘पिताजी यदि मैं शर्त हार गई होती तो क्या ये लोग मुझे जिन्दा छोड़ते इसलिये मैं यह मानने के लिये तैयार नही। उधर सुल्तान का बेटा भी उसके पीछे पीछे पहुँच गया। फातिमा को जैसे ही ज्ञात हुआ है कि सुल्तान पुत्र आया है वह तुरन्त पुरूषों के कपड़े पहन कर आई दोनों बातें करने लगे। बाते करते करते सुल्तान पुत्र ने कहा हसन क्या तुम्हारे देश में लड़के कान में बाली पहनते हैं। फातिमा का हाथ अपने कानों पर चला गया सुल्तान पुत्र हँस पड़ा फातिमा अपनी गलती समझ गई और शर्मिन्दा हो गई।

अब फातिमा का भेद खुल गया और सुल्तान पुत्र ने फातिमा केे पिता से फातिमा का हाथ माँग लिया। 


Monday, 14 July 2025

chand chamak utha

 चाँद चमक उठा


बहुत दिन पहले की बात है इतने पहले की कि सूर्य चन्द्र का पृथ्वी पर चमकने का ढंग ही अलग था। दोनों पृथ्वी पर ही तेजी से चलते थ्ेा और एक जगह पर जरा जरा देर रहते थे। सूर्य क्योंकि बड़ा था इसलिये ज्यादा देर हर देश में चमकता उसमें इतनी तेज रोशनी थी कि वह जब दूसरे देश चला जाता तब भी हल्की रोशनी पहले देश में रहती। लेकिन चन्द्रमा की रोशनी शीतल थी। वह ठंडा था तो गर्म रहने के लिये काला लबादा पहन लेता। जब वह मुँ खोलता एकदम उजाला हो जाता, पूर्णमासी का सा और फिर लबादा पहन कर आगे चला जाता। तो अंधकार छा जाता। अंधकार छाते ही चोर डाकू अपने घरो से निकल पड़ते और राहगीरों को लूट लेते थे। जनता परेशान थी कि क्या करें। अंधेरे में दिखाई देता नहीं था। चोर डाकू पहचाने भी नही जाते थे। चाँद केा जब यह ज्ञात हुआ कि उसके लबादा पहनने ही जनता में भय पैदा हो जाता है तो बहुत परेशान हुआ। 

एक दिन चाँद काला लबादा पहन कर सड़कों पर आ गया और चोर डाकुओं केा पकड़ने के लिये इधर उधर घूमने लगा। बारिश की वजह से जगह जगह कीचड़ हो रहा  था और गड्डो में पानी भर गया था। चन्द्रमा का पैर इधर उधर पड़ जाता उससे लबादा हट जाता उससे जरा जरा झलक हो जाती और अंधेरे में वह देखता कि साये इधर उधर घूम रहे हैं। चाँद हल्के हल्के पॉव रखते चला जा रहा था कि एक पत्थर से पैर टकराया उसने पास की टहनी पकड़ ली लेकिन यह क्या टहनी हाथ की हथकड़ी बन गयी। चाँद ने बहुत छुड़ाने की कोशिश की लेकिन हथकड़ी न छुड़ा सका। चाँद को पास से किसी की चीख सुनाई पड़ी वह समझ गया कोई राहगीर अंधेरे में भटक गया है। चाँद ने देखा चोरों ने उसे गले से पकड़ लिया है। और भी हाथ उसकी ओर बढ़ रहे हैं तभी चाँद के मुँह से जरा लबादा खिसक गया और उस व्यक्ति को रास्ता दिखाई पड़ गया रोशनी देखकर चोर पीछे हट गया। वह व्यक्ति चाँद केा धन्यवाद देता हुआ चला गया। चाँद ने अपने को बहुत छुड़ाने की कोशिश की लेकिन छुड़ा नहीं पा रहा था। चोर डाकुओं ने अपने सबसे बड़े दुश्मन को अपने कब्जे में देखा तो प्रसन्न हो गये उन्होंने पीछे से जाकर उसको बाँध दिया उसका लबादा पूरा ढका और एक साथ सबने मिलकर पकड़ लिया  और लताओं से कसकर बाँध दिया। सारी रात वे चाँद केा ठिकाने लगाने की सोचते रहे। लेकिन समझ नहीं आ रहा था क्या करे। भोर की पहली किरण के साथ ही उजाला होने लगा अब चोर डाकू घबड़ा गये कि कि कैसे करें। कुछ चोरों ने कहा मार दें और दबा दें। पर कुछ ने कहा नहीं हत्या नहीं करेंगे क्योंकि कुछ भी हो चाँद करता तो सेवा ही है ऐसे व्यक्ति की हत्या करके महापाप नहीं करेंगे। अंत में जब अधिक उजाला फैलने लगा तो एक चोर ने पास ही पानी भरे गहरे गड्डे में उसे फेंक दिया और गड्डे पर भारी पत्थर रख दिया। चाँद को दबाकर सब अपने अपने घर चले गये। जब तक पूरा सुबह का उजाला हुआ चाँद पानी में डूब चुका था।

दिन गुजरते गये लेकिन चाँद नहीं निकला जनता बहुत परेशान थी क्योंकि अब तो चोर डाकू निर्द्वन्द्व होकर लूटपाट करते उन्हें किसी का डर ही नही रह गया 

दिन गुजरते गये लेकिन चाँद नहीं निकला तो जनता को बहुत चिन्ता हुई। आखिर चाँद को हो क्या गया। चोर डाकुओं की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि अब वे मुँह ढक कर घरों के आस पास घूमते रहते कोई भी बाहर निकलता पकड़ लेते और उसे लेकर घर में घुसकर लूटपाट कर लेते।

परेशान होकर वे लोग शहर की एक बुढ़िया के पास गये। उसे सि(ि प्राप्त थी वह खोये लोगों का पता बता देती थी। उन्होंने पूछा आखिर चाँद कहाँ चला गया बुढ़िया मेज पर काले पकड़े से ढके आइने को देखकर मंत्र पढ़ती बुदबुदाती जाती थी फिर आइने में देखकर बताती थी। उसने देखा कहीं पानी में रोशनी हो रही है पर किधर यह नहीं दिखाई दे रहा था। उसने उन लोगों से कहा एक नारियल गुड़हल का फूल और नीबू की टहनी सात दरवाजों पर रखना और जो कुछ भी देखा आकर बताना।

उधर जिस राहगीर को चाँद की चमक दिखाई दी थी वह शहर से वापस आ गया था। चारों ओर चाँद की चर्चा सुनकर 



वह बोला,‘ मैंने चाँद को चोरों के पीछे जंगल में जाते देखा था। मैं भी वही से शहर जा रहा था कि मैं वहाँ रास्ता भटक गया। मुझे चोरो ने पकड़ लिया, वही पर चाँद घूम रहा था, मुझे चाँद की झलक दिखाई दी तो चोरों के चंगुल से मैं तो बच गया था। 

फिर वहाँ क्या हुआ मुझे नहीं मालुम।’

सबने जाकर जो कुछ राहगीर ने देखा था बुढ़िया को बताया। बुढ़िया ने बहुत ध्यान से किताब, आइने और जादुई पात्र में देखा अंत में बहुत हल्की सी चाँद की चमक दिखाई दी। बुढ़िया ने कहा नीम की टहनी में लेकर जाये, जहाँ टहनी झुकने या हरकत करने लगे वहीं खोजे।

सब लोग झुंड बनाकर घने जंगल में गये। चारों ओर घना अंधेरा था क्योंकि वृक्ष इतने घने थे कि सूर्य की रोशनी दिन में भी वहाँ नहीं पहुँचती थी। एक स्थान पर सबकी दहनियाँ बड़ी तेजी से हिलने लगी और जैसे कोई उन्हें खींच रहा हो। उन्होंने देखा एक बड़े पत्थर के नीचे से हल्की सी रोशनी झलक रही है। उन्होंने पत्थर हटाया और देखा चाँद गहरे जल में डूबा हुआ था। 

एक साथ सबने ईश्वर से प्रार्थना की तो धीरे से चाँद ऊपर आया। सबने उसे बाहर निकाला। चाँद उन्हें आर्शीवाद देता आकाश में चला गया और चमकने लगा। तब से ही चन्द्रमा जिस रात गड्डे से निकला पूरी रात चमकता है। और पूरे महिने में बस एक दिन दूसरे देश में जाता हैं बाकी अपना थोड़ा थोड़ा हिस्सा हर जगह छोड़ता जाता है जिससे हर जगह रोशनी रहे और चोर डाकू जनता को परेशान न कर सके।



Saturday, 12 July 2025

pari katha chanchla

 चंचला

पश्चिम मंे एक राजा के सात पुत्र थे पिता की तरह सब पुत्र भी दयालु सहदय और बुद्विमान थे। सबसे छोटा राजकुमार बहुत सुन्दर था उसका नाम अतिरूप था। राजा ने अपने सातों पुत्रो का लालन पालन समान रूप से किया था यहां तक कि पोशाक बगैरह भी समान ही बनवाई। राजकुमारों के बडे होने पर अब राजा के सामने समस्या आई कि वह उनकी शादी के लिये बहुएं समान कैसे लाये। राजा के मंत्रियों ने कहा “ महाराज जब तदबीर काम नहीं करती तब तकदीर पर छोड़ देना चाहिये बाकी का काम ईश्वर के हाथ” राजा मान गया। राजा ने अपने सातों पुत्रों से दिया महल की सबसे ऊंची अटारी पर चढकर तीर फेंकने को कहा। जिस घर पर तीर गिरेगा उसी घर की लड़की से उस राजकुमार की शादी होगी। सातों पुत्रों ने यही किया छः पुत्रों के तीर तो राज्य के छः सम्मानित व्यक्तियों के यहां गिरे। कुछ अमीर कुछ गरीब लेकिन सब सम्मानित । अतिरूप का तीर एक पेड के तने से टकराया उस पर एक बंदरिया बैठी थी आस पास कोई घर भी नहीं था।

पुत्रों की सफलता से जो सबको हर्ष हुआ था अतिरूप के दुर्भाग्य से शोक मंे बदल गया। एक बार फिर कोशिश करो । राजा ने कहा हो सकता है अबकी बार तीर ठीक स्थान पर गिरे।

“ नही पिताजी ’अतिरूप ने कहा ,‘भाग्य यही चाहता है कि मै कंुवारा रहूॅ मै दुबारा कोशिश नहींकरूंगा। रही बंदरिया की बात तो उसे मैं पालतू बनाऊंगा।

छओं पुत्रो की शादी खूब धूमधाम से हुई। सब लोग खुश थे बस अतिरूप को अपने दुर्भाग्य पर दुख था।

बंदरिया का पालन खूब आराम से हो रहा था। उसके गले में सोने हीरे मानिक जड़ा पट्टा पड्ा था। मुलायम बिस्तर थे। राजकुमार उसके साथ खेलकर दिल बहलाया करता। धीरे धीरे राजकुमार उससे बातें करने लगा। शुरू शुरू मे तो केवल खाना खाने की कहता धीरे धीरे सब दिल की बात और पूर दिन का लेखा जोखा कहता सुनाता । बंदरिया कुछ बोलती तो न थी पर लगता जैसे सब समझ रही हो। राजकुमार ने उसका नाम चंचला रखा। राजकुमार का अब ज्यादा तर समय बंदरिया के साथ ही गुजरता क्योंकि बाहर आकर उस पर उदासी छा जाती । राजा देख रहा था कि राजकुमार अतिरूप किसी भी समारोह या उत्सव में भाग नहीं लेता है। लोग तरह तरह की बातें करने लगे पर राजकुमार किसी की भी बातें न सुनता।

इसी प्रकार एक साल बीत गया। छओ राजकुमार खुश थे परन्तु पिता का अतिरूप के लिये दया और प्यार देख चिन्तित भी थे। अतिरूप के लिये उन्हे दुःख भी होता और पिता को दिन पर दिन बढते प्यार को देख ईर्ष्या भी होती। उन्होने अतिरूप को शादी करने की सलाह देने की सोची। पत्नी पति का आधा धर्म निर्वाह करती है अतिरूप के कोई पत्नी नही थी इसलिये छओं भाईयों ने एक एक दिन बारी बारी अपने पिता को घर बुलाया। राजा खुशी खुशी उनके घर गया। सबसे बडे लडके का घर खूब सुन्दर सजा था। द्वार पर मालाऐं लगी थी। दोनो ओर तोरण बने थे । चांदी का लैम्प जल रहा था सारा घर सुगन्धित हो रहा था मधुर संगीत से सारा घर भरा हुआ था। एक सौ एक व्यंजन मेवे का दूध सोने चांदी के बर्तनों मे सजा हुआ था। बहू ने आदर और सम्मान से ससुर को भोजन कराया। राजा बहुत खुश हुआ। आते समय जब बडी बहू ने पैर छूए तो राजा ने नौलक्खा हार उपहार मंे दिया।

दूसरे दिन दूसरे पुत्र के यहां गया वहां भी उसी प्रकार से राजसी भोजन शान शौकत से कराया गया। इस बार अन्य तरह के व्यंजन थे। वहॉ भी राजा ने पुत्र बधू को नौलक्खा हार दिया। इस प्रकार छः दिन हंसी खुशी मंे बीत गये। राजा को अतिरूप का बहुत ख्याल आ रहा था। राजा राजमहल की छत पर शोक मे डूबे टहल रहे थे अतिरूप आया और पिता को अपने महल मे आने के लिये निमंत्रित किया। राजा आश्चर्य से भर उठा। इतना ही नही उसने सब मन्त्रियों दरबारी गणों और राजमहल के प्रत्येक व्यक्ति को तीन दिन तक वहॉं रहने का निमन्त्रण दिया था। परन्तु राजा ने चतुराई से आश्चर्य छिपाया और निमन्त्रण स्बीकार किया । पर मन ही मन वह सोच रहा था। यह हुआ कैसे?

हुआ यह था जब एक एक भाई राजा को अपने महल मे बुला रहे थे अतिरूप बहुत दुःखी और निराश हो गया। पांचवे दिन जब वह बहुत दुःखी हो गया तो उसने अपना दुःख चंचला के आगे रख दिया इसलिये क्योकि किसी से कहकर वह दिन का बोझ कम करना चाहता था

 ‘चंचला! मेरी मूक साथिन कैसा दुर्भाग्य है! भाई दरबारी वगैरह सब इन्तजार में है मै पत्नी के बिना कैसे पिता को बुलाऊॅगा यह तो शुरूआत है तुम बताओ मै क्या करूॅ सब कुछ खत्म हो गया ’ यह कह उदास कोहनी पर मुह टिका कर रोने की सी मुद्रा मे बैठ गया।

तभी चंचला बोली,‘ दुखी मत होओ मेरे देवता उन सबको बुलाओ राजा मन्त्री दरबारी रक्षक सारा राजपरिवार उन्हे तीन दिन के लिये बुलाओ सब कुछ ठीक हो जायेगा।’

  अतिरूप भौचक्का रह गया क्या वह सपना देख रहा है नही सत्य है । अभी चंचला कह रही थी ‘ जाओ राजकुमार इस समय राजा अकेले है और जैसा मैने कहा है वैसा ही कहना।’

बिना कुछ भी सोचे समझे अतिरूप जल्दी से राजमहल गया और सबको निमंन्त्रित कर आया। निमन्त्रण देने के बाद उसे अपनी जल्दबाजी करने का पछतावा हुआ कहीं गडबडी न हो जाय। वह सोच रहा था। यह सब होगा कैेसे? एक बन्दर बोला यह आश्चर्य है परन्तु क्या यह सब भी हो सकता है पर यह होगा कैसे ? यही सोचता वह चंचला के पास आया,‘ मैने सबको निमन्त्रण कर दिया है अब क्या करना है?’ चंचला ने उसकी ओर देखा बोली ,‘कुछ नहीं।’ अतिरूप पीला पड गया। मै बरबाद हो जाऊॅगा वह बोला ‘हाय मैंने यह क्या किया जल्दी बाजी क्या कर डाली पहले इंतजाम हो जाता तब ऐसा कदम उठाता चंचला सच बताओ क्या तुम ही बोली थी अगर तुम ही बोली थेी तो अब फिर बोल सकती हो’।’ लेकिन चंचला चुप रही अतिरूप ने उसे जोर से झकझोर दिया चंचला के हाथ मंे ताबे की प्लेट थी वह गिर पडी प्लेट को उठाते उसे लगा चंचला उस प्लेट की ओर इशारा कर रही है उसने प्लेट देखी तो उस पर लिखा था।

 ‘परेशान मत होओ मैं और नहीं बोल सकती। उसी पेड़ पर जाओ जहां से मुझे लाये थे इस प्लेट को तने के खोखल मंे गिरा कर उत्तर की प्रतीक्षा करना।’ अतिरूप ने प्लेट ली और जल्दी से उस पेड पर पहुंचा। वह एक तीन सौ साल पुराना बरगद का पेड था। पेड बहुत विशाल था उसमें एक बहुत बडा खोखल था। अतिरूप ने प्लेट उसमंे गिरा दी और इंतजार करने लगा कुछ देर तक कुछ न हुआ। उसका संदेह फिर उभर आया। कुछ नहीं होगा मेरा सब कुछ चला जायेगा लेकिन अभी वह सोच ही रहा था कि एक अत्यन्त रूपवती कन्या बाहर आई। वह मूक हो गया। वह बोली,‘मेरे साथ आओ रानी आपका इंतजार कर रही है ’। अतिरूप पीछे पीछे गया। पेड के खोखल में बहुत अंधेरा था धीरे धीरे उजाला दिखाई पडने लगा काफी लम्बा गलियारा सा पार करके एक दम रोशनी दिखाई दी । तीव्र रोशनी से उसकी आंखें चका चाैंध हो रही थी। गोलाई में सौ मेहराबांे का महल बना था मैदान म्ेंा मखमली हरी घास बिछी हुई थी। रंगीन फूलांे का गलीचा सा विछा था । सुगन्धित वृक्षांे से खुशबू से वातावरण महक रहा था। रानी का दरबार लगा हुआ था अत्यन्त रूपवती रानी सोने के हीरे जवाहरात जड़े सिंहासन पर बैठी थी। दो रूपवती दासियां पंखा झल रही थी। कही भी कोई पुरूष नहीश् था। रानी के ऊपर इन्द्रधुनषी झालरें टंगी थी। हवा के पालने से झालरें झिलमिला उठती थी। तभी रानी की आवाज साफ स्वरों मे उभरी ,‘मै जानती हूॅ तुम्हंे चंचला ने भेजा है यंहां यह सब देखकर तुम्हे विश्वास हो गया होगा कि तुम्हारे पिता की दावत का इतजाम भली प्रकार से हो जायेगा जहां तक मै समझती हूॅ हम परियों का इंतजाम देखकर तुम खुश हो जाओगे।’

जैसे ही वह बोल कर चुकी अतिरूप ने अपने को बरगद के पेड़ के पास खड़े पाया। वह समझ गया चंचला परी है अब उसने अपने को भाग्य के सहारे छोड दिया।

दूसरे दिन राजा उठा तैयार होकर चिन्ता से भरा दरबार में आया सब दरबारी राजा केा देखकर उठे झुक कर अभिवादन किया और चल दिये।

महल से बाहर आकर उनकी भवें आश्चर्य से सिकुड गई। राजमहल से राज कुमार के महल तक मखमली गलीचा विछा था तोरण द्वार बने थे। सुगन्धित फूलों से मेहराब बने थे। सब द्वारों पर देा दो पहरे दार खडे सलाम कर रहे थे कही से संगीतज्ञो की टोली आई और गाती बजाती आगे चल दी जैसे ही सब राजकुमार के महल पर पहुंचे अतिशबाजी होने लगी और  गुलाब से महकती पानी की फुहारे सब पर आ गिरी। 

राजकुमार आठ दस अंगरक्षकों के साथ बाहर आया और सबको लेकर अंदर गया।। अदर सारा आंगन बहुत सुन्दर अद्भुत रंगो के मेल से सजा हुआ था। इन सबसे ऊपर वे जिस बात से आश्चर्य चकित रह गये थे वह यह थी कि एक अत्यन्त रूपवती राजकुमारी उनके स्वागत के लिये खडी थी। उसने हल्के हरे रंग की साडी पहन रखी थी । उसने दोनेंा हाथ जोड़ कर नमस्ते की।  मुॅंह पर मोहक मुस्कान थी। जैसी वह सुन्दर थी वैसा ही अद्भुत उसका स्वागत था।

तीन दिन तीन पल के समान बीत गये राजा और साथी अत्यन्त प्रसन्न लौट कर आये। फिर अतिरूप ने अपने भाइयों को बुलाया। सब बहुत प्रसन्न हुए इस प्रकार परिवार एक हो गया।

लेकिन अतिरूप के सौभाग्य से सब उसके भाई जलने लगे। दावत के खत्म होन पर बडा भाई उसे एक तरफ ले गया और बोला,‘ अतिरूप भाई संभल कर रहना कही अपनी पत्नी को खो मत देना। वह परी है वह फिर से अपने पुराने रूप मे आ सकती थी गायब हो  सकती है।’

‘नहीं ,अब नहीं जा सकती ,’ अतिरूप भाई पर विश्वास करके बोला, ‘मैने इसकी बन्दर की खाल को बक्से मे बंद कर ताला लगा दिया है।’

‘अरे ! भाई परी के आगे उस बक्से की क्या मजाल सबसे अच्छा यही होगा तुम खाल को जला दो तभी ठीक रहेगा,’ भाई ने सलाह दी।

अतिरूप ने भाई का विश्वास कर खाल को आग मे झोंक दिया उसी समय कमरे मै से चंचला के चीखने की आवाज आयी ,‘मै जली मै जली जा रही हूॅ हाय मै जीवित जल जाऊंगी ’अतिरूप ने खाल पर जल्दी से पानी डाला और चंचला के कमरे मे भागा परंतु वहां पर एक जलती सी चमक के अलावा कुछ न दिखाई दिया चंचला गायब हो गई थी।

अतिरूप पागल सा महल से चीखता भागा। चंचला मेरी प्यारी वापस आ जाओ वापस आ जाओं भाइयों ने अंगरक्षको ने राहगीरों ने उसे बहुत रोकने की कोशिश कि परंन्तु जंगली भैसे की तरह डकराता वह शहर को फांदकर कपड़े फाड कर रेगिस्तान मंे भागता चला गया। कभी पूर्व कभी पश्चिम वह चंचला चंचला चिल्लाता दौडता रहा अंत मे थकर गिर गया । गरम बालू पर दौडता वह तब तक चलता जाता जब तक वह थक कर गिर नही जाता फिर उठता फिर चल देता। एक दिन वह बेहोशी की सी अवस्था मंे गिर गया और रात भर पडा सोता रहा। सुबह उसकी नींद एक आदमी का क्रंदन सुन कर खुली उसकी दाढी कम से कम छः महीने से बढ़ी हुई थी। कपडे फटे हुऐ थे। वह सोता हुआ सा चीखता चला जा रहा था  आजाओ वापस आ जाओ अगर तुम नहीं आईं तो मैं मर जाऊंगा।

अपने जैसा ही एक आदमी देखकर अतिरूप को उस पर दया आई । वह बोला ,‘क्या बात है मित्र तुम्हे क्या दुःख है?’

फटे कपडे वाले ने कहा “ मैने इधर से एक परी राजकुमारी को चिल्लाते मैं जली जा रही हूॅ मैं जली रही हूॅ जाते देखा एक बार देख लेने पर अब मै उसे दुबारा देखने को मरा जा रहा हूॅ।”

राजकुमार को आश्चर्य हुआ जरूर यह चंचला की ही कह रहा है उसने अजनबी को सारी कहानी सुनादी मै उसी को ढूॅढ रहा हूॅ जब तक वह मिल नहीं जायेगी मै रूकूंगा नहीं चाहे मर जाऊॅ।

अजनबी ने सफलता की कामना करते हुए कहा,‘ मित्र जाओ भगवान तुम्हारी सहायता करेगे। उसे जाकर ढूंढो। यह लोहे का डंडा लो यह जादू का है जो ही तुम इसे आज्ञा दोगे ,यह तुम्हारे दुश्मनों को पीटना शुरू कर देगा।

‘धन्यवाद मित्र वह किस रास्ते गई थी जरा बताओगे

‘वह पूर्व की ओर गई थी।’

अतिरूप पूर्व की ओर चल दिया थोडी ही दूर पर हरियाली मिलनी शुरू हो गई। फल फूल सब्जियां आदि भी शुरू हो गई शीघ्र ही वह एक नदी के किनारे जा पहुॅचा। पानी पीकर उसने प्यास बुझाई। अभी वह सोच ही रहा था कि नदी को पार कैसे किया जाय उसके एक दुःखी व्यक्ति बीणा पर जादुई संगीत बजाता दिखा। संगीत इतना मधुर था कि पक्षी सुनने के लिये चहचहाते रूक गये थे गाय घास चबाते चबाते उसकी ओर देखने लगी थी। युवक बीच बीच मे रूक जाता और कहता वापस आओ वापस आओ मै तुम्हे देख्ेा बिना जीवित नही रह सकता ।

अतिरूप को उत्सुकता हुई उसने युवक से पूछा,‘ क्यो भाई तुम किसे देखने को इतने भारी इच्छुक हो।’

‘क्या बताऊं ?’ युवक ने कहा एक परी ‘ मै जली जा रही हूॅ मै जली जा रही हूॅ ’ कहती इधर से निकली उसकी आवाज मे इतना माधुर्य था कि मै जब तक उस आवाज को दुबारा सुन नहीं लूंगा चैन नहीं पा सकता ।

अतिरूप समझ गया वह चंचला के लिये कर रहा है युवक को अतिरूप ने पूरी कहानी सुनाई और कहा ” मैं ही वह अभागा व्यक्ति हूॅ जिसकी बजह से यह दुःखद घटना हुई। जब तक मैं उसे पा नहीं लूूंगा जिन्दा नहीं रहंूगा।”

युवक यह जानकारी पाकर बहुत कृतज्ञ हुआ और बोला,‘ जाओ भई जाओ यह बीना लो इसके तारों से जादुई संगीत निकलता है।’ ‘वह किधर गई थी’ ? युवक से पूछा । ‘वह उत्तर की तरफ गई थी’ युवक ने कहा और अतिरूप उत्तर की तरफ बढ दिया।

रास्ते मे जंगल और पहाड़ मिले। पर्वत एक से एक ऊॅचे थे अंत मे वह सबसे ऊंचे पर्वत पर पहुचा सारी चोटियां बर्फ से ढंकी हुई थी। एक जगह एक साधु बर्फ से ढकी झोपडी मे बैठा था। वह वहां एक क्षण असमंजस मे खडा रहा कि अंदर जाये या नही कि अंदर से आवाज आई,‘ आओ अंदर आओ बेटे मुझे मालूम था कि तुम आ रहे हो।’ अतिरूप ने अंदर घुसकर योगी को प्रणाम किया योगी ने आशीर्वाद देते हुए कहा “ हिमालय के पार जाओ तिब्बत में तुम्हें एक महान जादूगर मिलेगा वह तुम्हे जादुई सैन्डल देगा वही तुम्हारी मन पसंद सैन्डल तुम्हे काकेशिया के पर्वतों पर ले जायेगा।’ राजकुमार फौरन चल दिया इस नई जानकारी ने उसमे नई जान भर दी ऊॅचे पर्वत को लांघते हुए लम्बी खाइयों को पार करते वह मृतप्राय सा जादूगर के पास पहुंचा जादूगर ने अतिरूप का उपचार किया । सारी कहानी सुन उसने जादुई सैन्डल का जोड़ा उसे दिया जो उसे परियों के देश मे ले गया।

वहां उसने बीना से मधुर धुन निकालनी प्रारम्भ कि और जादुई संगीत को सुन उसके पीछे झुंड के झुंड चलने लगे। परियों के देश मे अनेक संगीतज्ञ थे परन्तु जो मनहर संगीत युवक की वीना से निकल रहा था वैसा उन लोगों ने कभी नहीं सुना था। शीघ्र ही राजा का बुलाबा दरबार मंे संगीत सुनाने के लिये आया। लेकिन अतिरूप ने अनिच्छा प्रगट की तब मंत्री लोग आये और बोले कि राजकुमारी का सारा शरीर जलन से भरा हुआ है और सो नहीं पा रहीं है। अतिरूप समझ गया कि यह उसकी चंचला ही है उसका दिल जोर जोर से धडकने लगा। अपने भावांे को छिपाता वह विरति के स्वर मे बोला “ ठीक है तब चला चलता हूॅ भलाई करने मे पीछे नही रहता परंतु चाहता कुछ नही हूॅ हो सकता है तुम्हारी राजकुमारी ठीक हो जाय।”

मन्त्रीगण उसी समय अतिरूप को लेकर महल मे ले गये। एक ही नजर मे वह पहचाल गया कि यह वह चंचला ही थी। चंचला भी पहचान गई वह बोल ही पडती कि अतिरूप ने उसे चुप रहने का संकेत कर दिया तब राजा से बोला महाराज मेरे पास ऐसी मलहम है जिससे कैसे भी जले के छाले या घाव हो ठीक हो जाते है मेरा विश्वास है उससे राज कुमारी अच्छी हो जायेंगी।

यह कर कर उसने मुलतानी मिटटी नौकरानी को दी और कहा पहले पैर मै लगाये। तलुबे पर मिटटी के लेप ने राज कुमारी को एकदम शांती पहुॅचाई उसने सारे शरीर पर लगाने के लिये कहा। सब लोग कमरे के बाहर इंतजार करने लगे। आधा घटे मे राजकमारी चल फिर सकने लायक हो गई राजा बहुत प्रसन्न हुए और अतिरूप से जो चाहे सो मांगने के लिये कहा।

अतिरूप ने राजकुमारी का हाथ मॉगा। राजा अतिरूप की इस घृष्टता पर अत्यधिक क्षब्ु्रध हो गया और उसे नौकरों से धक्के देकर निकालने को कहा जैसे ही वे पकडने के लिये आये। जादुई डंडे ने उन्हे पीटना चालू कर दिया तब चंचला ने पूरी कहानी पिता को सुनाई राजा ने सुनकर कहा ,‘ठीक है बेटी तुम जाओ तुमने हमेशा अजीब इच्छा ही रखी।’

अतिरूप और चंचला की शादी परियो के रस्म रिवाज के मुताबिक हो गई और चंचला अपने घर आ गई। राजा और सब दरबारी चंचला की विदा पर खूब रोये।

चंचला की दो बहने बिलकुल उसकी सी और वे भी अपनी बहन के साथ जाना चाहती थी उन्हंे आने दो अतिरूप ने कहा मेरे दो राजकुमार मित्र हैं वो परी से शादी करने के लिये मरे जा रहे है राजा ने अपना स्वर्ण रथ दिया जिसपर बैठ कर वे हिमालय से उडकर आये ंरास्ते में उन दोनो युवकों को अपने साथ लेकर अतिरूप अपनी राजधानी आया। तीनों परी बहनों की शादी धूमधाम से तीनांे के साथ हो गई।


Friday, 11 July 2025

anokha sauda

 

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