Saturday, 12 July 2025

pari katha chanchla

 चंचला

पश्चिम मंे एक राजा के सात पुत्र थे पिता की तरह सब पुत्र भी दयालु सहदय और बुद्विमान थे। सबसे छोटा राजकुमार बहुत सुन्दर था उसका नाम अतिरूप था। राजा ने अपने सातों पुत्रो का लालन पालन समान रूप से किया था यहां तक कि पोशाक बगैरह भी समान ही बनवाई। राजकुमारों के बडे होने पर अब राजा के सामने समस्या आई कि वह उनकी शादी के लिये बहुएं समान कैसे लाये। राजा के मंत्रियों ने कहा “ महाराज जब तदबीर काम नहीं करती तब तकदीर पर छोड़ देना चाहिये बाकी का काम ईश्वर के हाथ” राजा मान गया। राजा ने अपने सातों पुत्रों से दिया महल की सबसे ऊंची अटारी पर चढकर तीर फेंकने को कहा। जिस घर पर तीर गिरेगा उसी घर की लड़की से उस राजकुमार की शादी होगी। सातों पुत्रों ने यही किया छः पुत्रों के तीर तो राज्य के छः सम्मानित व्यक्तियों के यहां गिरे। कुछ अमीर कुछ गरीब लेकिन सब सम्मानित । अतिरूप का तीर एक पेड के तने से टकराया उस पर एक बंदरिया बैठी थी आस पास कोई घर भी नहीं था।

पुत्रों की सफलता से जो सबको हर्ष हुआ था अतिरूप के दुर्भाग्य से शोक मंे बदल गया। एक बार फिर कोशिश करो । राजा ने कहा हो सकता है अबकी बार तीर ठीक स्थान पर गिरे।

“ नही पिताजी ’अतिरूप ने कहा ,‘भाग्य यही चाहता है कि मै कंुवारा रहूॅ मै दुबारा कोशिश नहींकरूंगा। रही बंदरिया की बात तो उसे मैं पालतू बनाऊंगा।

छओं पुत्रो की शादी खूब धूमधाम से हुई। सब लोग खुश थे बस अतिरूप को अपने दुर्भाग्य पर दुख था।

बंदरिया का पालन खूब आराम से हो रहा था। उसके गले में सोने हीरे मानिक जड़ा पट्टा पड्ा था। मुलायम बिस्तर थे। राजकुमार उसके साथ खेलकर दिल बहलाया करता। धीरे धीरे राजकुमार उससे बातें करने लगा। शुरू शुरू मे तो केवल खाना खाने की कहता धीरे धीरे सब दिल की बात और पूर दिन का लेखा जोखा कहता सुनाता । बंदरिया कुछ बोलती तो न थी पर लगता जैसे सब समझ रही हो। राजकुमार ने उसका नाम चंचला रखा। राजकुमार का अब ज्यादा तर समय बंदरिया के साथ ही गुजरता क्योंकि बाहर आकर उस पर उदासी छा जाती । राजा देख रहा था कि राजकुमार अतिरूप किसी भी समारोह या उत्सव में भाग नहीं लेता है। लोग तरह तरह की बातें करने लगे पर राजकुमार किसी की भी बातें न सुनता।

इसी प्रकार एक साल बीत गया। छओ राजकुमार खुश थे परन्तु पिता का अतिरूप के लिये दया और प्यार देख चिन्तित भी थे। अतिरूप के लिये उन्हे दुःख भी होता और पिता को दिन पर दिन बढते प्यार को देख ईर्ष्या भी होती। उन्होने अतिरूप को शादी करने की सलाह देने की सोची। पत्नी पति का आधा धर्म निर्वाह करती है अतिरूप के कोई पत्नी नही थी इसलिये छओं भाईयों ने एक एक दिन बारी बारी अपने पिता को घर बुलाया। राजा खुशी खुशी उनके घर गया। सबसे बडे लडके का घर खूब सुन्दर सजा था। द्वार पर मालाऐं लगी थी। दोनो ओर तोरण बने थे । चांदी का लैम्प जल रहा था सारा घर सुगन्धित हो रहा था मधुर संगीत से सारा घर भरा हुआ था। एक सौ एक व्यंजन मेवे का दूध सोने चांदी के बर्तनों मे सजा हुआ था। बहू ने आदर और सम्मान से ससुर को भोजन कराया। राजा बहुत खुश हुआ। आते समय जब बडी बहू ने पैर छूए तो राजा ने नौलक्खा हार उपहार मंे दिया।

दूसरे दिन दूसरे पुत्र के यहां गया वहां भी उसी प्रकार से राजसी भोजन शान शौकत से कराया गया। इस बार अन्य तरह के व्यंजन थे। वहॉ भी राजा ने पुत्र बधू को नौलक्खा हार दिया। इस प्रकार छः दिन हंसी खुशी मंे बीत गये। राजा को अतिरूप का बहुत ख्याल आ रहा था। राजा राजमहल की छत पर शोक मे डूबे टहल रहे थे अतिरूप आया और पिता को अपने महल मे आने के लिये निमंत्रित किया। राजा आश्चर्य से भर उठा। इतना ही नही उसने सब मन्त्रियों दरबारी गणों और राजमहल के प्रत्येक व्यक्ति को तीन दिन तक वहॉं रहने का निमन्त्रण दिया था। परन्तु राजा ने चतुराई से आश्चर्य छिपाया और निमन्त्रण स्बीकार किया । पर मन ही मन वह सोच रहा था। यह हुआ कैसे?

हुआ यह था जब एक एक भाई राजा को अपने महल मे बुला रहे थे अतिरूप बहुत दुःखी और निराश हो गया। पांचवे दिन जब वह बहुत दुःखी हो गया तो उसने अपना दुःख चंचला के आगे रख दिया इसलिये क्योकि किसी से कहकर वह दिन का बोझ कम करना चाहता था

 ‘चंचला! मेरी मूक साथिन कैसा दुर्भाग्य है! भाई दरबारी वगैरह सब इन्तजार में है मै पत्नी के बिना कैसे पिता को बुलाऊॅगा यह तो शुरूआत है तुम बताओ मै क्या करूॅ सब कुछ खत्म हो गया ’ यह कह उदास कोहनी पर मुह टिका कर रोने की सी मुद्रा मे बैठ गया।

तभी चंचला बोली,‘ दुखी मत होओ मेरे देवता उन सबको बुलाओ राजा मन्त्री दरबारी रक्षक सारा राजपरिवार उन्हे तीन दिन के लिये बुलाओ सब कुछ ठीक हो जायेगा।’

  अतिरूप भौचक्का रह गया क्या वह सपना देख रहा है नही सत्य है । अभी चंचला कह रही थी ‘ जाओ राजकुमार इस समय राजा अकेले है और जैसा मैने कहा है वैसा ही कहना।’

बिना कुछ भी सोचे समझे अतिरूप जल्दी से राजमहल गया और सबको निमंन्त्रित कर आया। निमन्त्रण देने के बाद उसे अपनी जल्दबाजी करने का पछतावा हुआ कहीं गडबडी न हो जाय। वह सोच रहा था। यह सब होगा कैेसे? एक बन्दर बोला यह आश्चर्य है परन्तु क्या यह सब भी हो सकता है पर यह होगा कैसे ? यही सोचता वह चंचला के पास आया,‘ मैने सबको निमन्त्रण कर दिया है अब क्या करना है?’ चंचला ने उसकी ओर देखा बोली ,‘कुछ नहीं।’ अतिरूप पीला पड गया। मै बरबाद हो जाऊॅगा वह बोला ‘हाय मैंने यह क्या किया जल्दी बाजी क्या कर डाली पहले इंतजाम हो जाता तब ऐसा कदम उठाता चंचला सच बताओ क्या तुम ही बोली थी अगर तुम ही बोली थेी तो अब फिर बोल सकती हो’।’ लेकिन चंचला चुप रही अतिरूप ने उसे जोर से झकझोर दिया चंचला के हाथ मंे ताबे की प्लेट थी वह गिर पडी प्लेट को उठाते उसे लगा चंचला उस प्लेट की ओर इशारा कर रही है उसने प्लेट देखी तो उस पर लिखा था।

 ‘परेशान मत होओ मैं और नहीं बोल सकती। उसी पेड़ पर जाओ जहां से मुझे लाये थे इस प्लेट को तने के खोखल मंे गिरा कर उत्तर की प्रतीक्षा करना।’ अतिरूप ने प्लेट ली और जल्दी से उस पेड पर पहुंचा। वह एक तीन सौ साल पुराना बरगद का पेड था। पेड बहुत विशाल था उसमें एक बहुत बडा खोखल था। अतिरूप ने प्लेट उसमंे गिरा दी और इंतजार करने लगा कुछ देर तक कुछ न हुआ। उसका संदेह फिर उभर आया। कुछ नहीं होगा मेरा सब कुछ चला जायेगा लेकिन अभी वह सोच ही रहा था कि एक अत्यन्त रूपवती कन्या बाहर आई। वह मूक हो गया। वह बोली,‘मेरे साथ आओ रानी आपका इंतजार कर रही है ’। अतिरूप पीछे पीछे गया। पेड के खोखल में बहुत अंधेरा था धीरे धीरे उजाला दिखाई पडने लगा काफी लम्बा गलियारा सा पार करके एक दम रोशनी दिखाई दी । तीव्र रोशनी से उसकी आंखें चका चाैंध हो रही थी। गोलाई में सौ मेहराबांे का महल बना था मैदान म्ेंा मखमली हरी घास बिछी हुई थी। रंगीन फूलांे का गलीचा सा विछा था । सुगन्धित वृक्षांे से खुशबू से वातावरण महक रहा था। रानी का दरबार लगा हुआ था अत्यन्त रूपवती रानी सोने के हीरे जवाहरात जड़े सिंहासन पर बैठी थी। दो रूपवती दासियां पंखा झल रही थी। कही भी कोई पुरूष नहीश् था। रानी के ऊपर इन्द्रधुनषी झालरें टंगी थी। हवा के पालने से झालरें झिलमिला उठती थी। तभी रानी की आवाज साफ स्वरों मे उभरी ,‘मै जानती हूॅ तुम्हंे चंचला ने भेजा है यंहां यह सब देखकर तुम्हे विश्वास हो गया होगा कि तुम्हारे पिता की दावत का इतजाम भली प्रकार से हो जायेगा जहां तक मै समझती हूॅ हम परियों का इंतजाम देखकर तुम खुश हो जाओगे।’

जैसे ही वह बोल कर चुकी अतिरूप ने अपने को बरगद के पेड़ के पास खड़े पाया। वह समझ गया चंचला परी है अब उसने अपने को भाग्य के सहारे छोड दिया।

दूसरे दिन राजा उठा तैयार होकर चिन्ता से भरा दरबार में आया सब दरबारी राजा केा देखकर उठे झुक कर अभिवादन किया और चल दिये।

महल से बाहर आकर उनकी भवें आश्चर्य से सिकुड गई। राजमहल से राज कुमार के महल तक मखमली गलीचा विछा था तोरण द्वार बने थे। सुगन्धित फूलों से मेहराब बने थे। सब द्वारों पर देा दो पहरे दार खडे सलाम कर रहे थे कही से संगीतज्ञो की टोली आई और गाती बजाती आगे चल दी जैसे ही सब राजकुमार के महल पर पहुंचे अतिशबाजी होने लगी और  गुलाब से महकती पानी की फुहारे सब पर आ गिरी। 

राजकुमार आठ दस अंगरक्षकों के साथ बाहर आया और सबको लेकर अंदर गया।। अदर सारा आंगन बहुत सुन्दर अद्भुत रंगो के मेल से सजा हुआ था। इन सबसे ऊपर वे जिस बात से आश्चर्य चकित रह गये थे वह यह थी कि एक अत्यन्त रूपवती राजकुमारी उनके स्वागत के लिये खडी थी। उसने हल्के हरे रंग की साडी पहन रखी थी । उसने दोनेंा हाथ जोड़ कर नमस्ते की।  मुॅंह पर मोहक मुस्कान थी। जैसी वह सुन्दर थी वैसा ही अद्भुत उसका स्वागत था।

तीन दिन तीन पल के समान बीत गये राजा और साथी अत्यन्त प्रसन्न लौट कर आये। फिर अतिरूप ने अपने भाइयों को बुलाया। सब बहुत प्रसन्न हुए इस प्रकार परिवार एक हो गया।

लेकिन अतिरूप के सौभाग्य से सब उसके भाई जलने लगे। दावत के खत्म होन पर बडा भाई उसे एक तरफ ले गया और बोला,‘ अतिरूप भाई संभल कर रहना कही अपनी पत्नी को खो मत देना। वह परी है वह फिर से अपने पुराने रूप मे आ सकती थी गायब हो  सकती है।’

‘नहीं ,अब नहीं जा सकती ,’ अतिरूप भाई पर विश्वास करके बोला, ‘मैने इसकी बन्दर की खाल को बक्से मे बंद कर ताला लगा दिया है।’

‘अरे ! भाई परी के आगे उस बक्से की क्या मजाल सबसे अच्छा यही होगा तुम खाल को जला दो तभी ठीक रहेगा,’ भाई ने सलाह दी।

अतिरूप ने भाई का विश्वास कर खाल को आग मे झोंक दिया उसी समय कमरे मै से चंचला के चीखने की आवाज आयी ,‘मै जली मै जली जा रही हूॅ हाय मै जीवित जल जाऊंगी ’अतिरूप ने खाल पर जल्दी से पानी डाला और चंचला के कमरे मे भागा परंतु वहां पर एक जलती सी चमक के अलावा कुछ न दिखाई दिया चंचला गायब हो गई थी।

अतिरूप पागल सा महल से चीखता भागा। चंचला मेरी प्यारी वापस आ जाओ वापस आ जाओं भाइयों ने अंगरक्षको ने राहगीरों ने उसे बहुत रोकने की कोशिश कि परंन्तु जंगली भैसे की तरह डकराता वह शहर को फांदकर कपड़े फाड कर रेगिस्तान मंे भागता चला गया। कभी पूर्व कभी पश्चिम वह चंचला चंचला चिल्लाता दौडता रहा अंत मे थकर गिर गया । गरम बालू पर दौडता वह तब तक चलता जाता जब तक वह थक कर गिर नही जाता फिर उठता फिर चल देता। एक दिन वह बेहोशी की सी अवस्था मंे गिर गया और रात भर पडा सोता रहा। सुबह उसकी नींद एक आदमी का क्रंदन सुन कर खुली उसकी दाढी कम से कम छः महीने से बढ़ी हुई थी। कपडे फटे हुऐ थे। वह सोता हुआ सा चीखता चला जा रहा था  आजाओ वापस आ जाओ अगर तुम नहीं आईं तो मैं मर जाऊंगा।

अपने जैसा ही एक आदमी देखकर अतिरूप को उस पर दया आई । वह बोला ,‘क्या बात है मित्र तुम्हे क्या दुःख है?’

फटे कपडे वाले ने कहा “ मैने इधर से एक परी राजकुमारी को चिल्लाते मैं जली जा रही हूॅ मैं जली रही हूॅ जाते देखा एक बार देख लेने पर अब मै उसे दुबारा देखने को मरा जा रहा हूॅ।”

राजकुमार को आश्चर्य हुआ जरूर यह चंचला की ही कह रहा है उसने अजनबी को सारी कहानी सुनादी मै उसी को ढूॅढ रहा हूॅ जब तक वह मिल नहीं जायेगी मै रूकूंगा नहीं चाहे मर जाऊॅ।

अजनबी ने सफलता की कामना करते हुए कहा,‘ मित्र जाओ भगवान तुम्हारी सहायता करेगे। उसे जाकर ढूंढो। यह लोहे का डंडा लो यह जादू का है जो ही तुम इसे आज्ञा दोगे ,यह तुम्हारे दुश्मनों को पीटना शुरू कर देगा।

‘धन्यवाद मित्र वह किस रास्ते गई थी जरा बताओगे

‘वह पूर्व की ओर गई थी।’

अतिरूप पूर्व की ओर चल दिया थोडी ही दूर पर हरियाली मिलनी शुरू हो गई। फल फूल सब्जियां आदि भी शुरू हो गई शीघ्र ही वह एक नदी के किनारे जा पहुॅचा। पानी पीकर उसने प्यास बुझाई। अभी वह सोच ही रहा था कि नदी को पार कैसे किया जाय उसके एक दुःखी व्यक्ति बीणा पर जादुई संगीत बजाता दिखा। संगीत इतना मधुर था कि पक्षी सुनने के लिये चहचहाते रूक गये थे गाय घास चबाते चबाते उसकी ओर देखने लगी थी। युवक बीच बीच मे रूक जाता और कहता वापस आओ वापस आओ मै तुम्हे देख्ेा बिना जीवित नही रह सकता ।

अतिरूप को उत्सुकता हुई उसने युवक से पूछा,‘ क्यो भाई तुम किसे देखने को इतने भारी इच्छुक हो।’

‘क्या बताऊं ?’ युवक ने कहा एक परी ‘ मै जली जा रही हूॅ मै जली जा रही हूॅ ’ कहती इधर से निकली उसकी आवाज मे इतना माधुर्य था कि मै जब तक उस आवाज को दुबारा सुन नहीं लूंगा चैन नहीं पा सकता ।

अतिरूप समझ गया वह चंचला के लिये कर रहा है युवक को अतिरूप ने पूरी कहानी सुनाई और कहा ” मैं ही वह अभागा व्यक्ति हूॅ जिसकी बजह से यह दुःखद घटना हुई। जब तक मैं उसे पा नहीं लूूंगा जिन्दा नहीं रहंूगा।”

युवक यह जानकारी पाकर बहुत कृतज्ञ हुआ और बोला,‘ जाओ भई जाओ यह बीना लो इसके तारों से जादुई संगीत निकलता है।’ ‘वह किधर गई थी’ ? युवक से पूछा । ‘वह उत्तर की तरफ गई थी’ युवक ने कहा और अतिरूप उत्तर की तरफ बढ दिया।

रास्ते मे जंगल और पहाड़ मिले। पर्वत एक से एक ऊॅचे थे अंत मे वह सबसे ऊंचे पर्वत पर पहुचा सारी चोटियां बर्फ से ढंकी हुई थी। एक जगह एक साधु बर्फ से ढकी झोपडी मे बैठा था। वह वहां एक क्षण असमंजस मे खडा रहा कि अंदर जाये या नही कि अंदर से आवाज आई,‘ आओ अंदर आओ बेटे मुझे मालूम था कि तुम आ रहे हो।’ अतिरूप ने अंदर घुसकर योगी को प्रणाम किया योगी ने आशीर्वाद देते हुए कहा “ हिमालय के पार जाओ तिब्बत में तुम्हें एक महान जादूगर मिलेगा वह तुम्हे जादुई सैन्डल देगा वही तुम्हारी मन पसंद सैन्डल तुम्हे काकेशिया के पर्वतों पर ले जायेगा।’ राजकुमार फौरन चल दिया इस नई जानकारी ने उसमे नई जान भर दी ऊॅचे पर्वत को लांघते हुए लम्बी खाइयों को पार करते वह मृतप्राय सा जादूगर के पास पहुंचा जादूगर ने अतिरूप का उपचार किया । सारी कहानी सुन उसने जादुई सैन्डल का जोड़ा उसे दिया जो उसे परियों के देश मे ले गया।

वहां उसने बीना से मधुर धुन निकालनी प्रारम्भ कि और जादुई संगीत को सुन उसके पीछे झुंड के झुंड चलने लगे। परियों के देश मे अनेक संगीतज्ञ थे परन्तु जो मनहर संगीत युवक की वीना से निकल रहा था वैसा उन लोगों ने कभी नहीं सुना था। शीघ्र ही राजा का बुलाबा दरबार मंे संगीत सुनाने के लिये आया। लेकिन अतिरूप ने अनिच्छा प्रगट की तब मंत्री लोग आये और बोले कि राजकुमारी का सारा शरीर जलन से भरा हुआ है और सो नहीं पा रहीं है। अतिरूप समझ गया कि यह उसकी चंचला ही है उसका दिल जोर जोर से धडकने लगा। अपने भावांे को छिपाता वह विरति के स्वर मे बोला “ ठीक है तब चला चलता हूॅ भलाई करने मे पीछे नही रहता परंतु चाहता कुछ नही हूॅ हो सकता है तुम्हारी राजकुमारी ठीक हो जाय।”

मन्त्रीगण उसी समय अतिरूप को लेकर महल मे ले गये। एक ही नजर मे वह पहचाल गया कि यह वह चंचला ही थी। चंचला भी पहचान गई वह बोल ही पडती कि अतिरूप ने उसे चुप रहने का संकेत कर दिया तब राजा से बोला महाराज मेरे पास ऐसी मलहम है जिससे कैसे भी जले के छाले या घाव हो ठीक हो जाते है मेरा विश्वास है उससे राज कुमारी अच्छी हो जायेंगी।

यह कर कर उसने मुलतानी मिटटी नौकरानी को दी और कहा पहले पैर मै लगाये। तलुबे पर मिटटी के लेप ने राज कुमारी को एकदम शांती पहुॅचाई उसने सारे शरीर पर लगाने के लिये कहा। सब लोग कमरे के बाहर इंतजार करने लगे। आधा घटे मे राजकमारी चल फिर सकने लायक हो गई राजा बहुत प्रसन्न हुए और अतिरूप से जो चाहे सो मांगने के लिये कहा।

अतिरूप ने राजकुमारी का हाथ मॉगा। राजा अतिरूप की इस घृष्टता पर अत्यधिक क्षब्ु्रध हो गया और उसे नौकरों से धक्के देकर निकालने को कहा जैसे ही वे पकडने के लिये आये। जादुई डंडे ने उन्हे पीटना चालू कर दिया तब चंचला ने पूरी कहानी पिता को सुनाई राजा ने सुनकर कहा ,‘ठीक है बेटी तुम जाओ तुमने हमेशा अजीब इच्छा ही रखी।’

अतिरूप और चंचला की शादी परियो के रस्म रिवाज के मुताबिक हो गई और चंचला अपने घर आ गई। राजा और सब दरबारी चंचला की विदा पर खूब रोये।

चंचला की दो बहने बिलकुल उसकी सी और वे भी अपनी बहन के साथ जाना चाहती थी उन्हंे आने दो अतिरूप ने कहा मेरे दो राजकुमार मित्र हैं वो परी से शादी करने के लिये मरे जा रहे है राजा ने अपना स्वर्ण रथ दिया जिसपर बैठ कर वे हिमालय से उडकर आये ंरास्ते में उन दोनो युवकों को अपने साथ लेकर अतिरूप अपनी राजधानी आया। तीनों परी बहनों की शादी धूमधाम से तीनांे के साथ हो गई।


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