Saturday, 19 July 2025

chatur maina

 चतुर मैना


बहुत दिन हुए सांरग नामक एक चित्रकार के पास एक मैना थी। प्रातः होते ही वह खिड़की पर जा बैठती और जोर जोर से बोलती,‘ बड़े भैया सुबह हो गई। बड़े भैया सुबह हो गई।’

एक बार हाकिम ने अपने नये महल को चित्रित करने का कार्य सारंग को सौंपा। सारंग के साथ मैना भी रोज जाती। यदि सारंग का ब्रश गिर जाता मैना चोंच में दाब लाती। कभी खतरनाक स्थानों पर खड़े होकर चित्रकारी करनी होती तो मैना उसे सावधान करती जाती ,‘बड़े भोया सावधान रहना। बड़े भैया सावधान रहना।’ अन्य कारीगर भी मैना को प्यार करने लगे। उन्होने उसे तरह तरह के गीत सिखा दिये। 

एक दिन सारंग गणेश जी का चित्र बना रहा था कि हाकिम वहाँ आया उसने पूछा,’’यह किसका चित्र है?’’ सारंग बोला, ’’ ये गणेश जी हैं भाग्य सफलता और दीर्घजीवन के देवता। तभी मैना भाग्य, सफलता, दीर्घजीवन के देवता।  भाग्य, सफलता, दीर्घजीवन के कहती फुदक कर सारंग के कन्धे पर जा बैठी। हाकिम को चिड़िया बहुत पसन्द आई वह बोले,’’ यह चिड़िया किसकी है?’’

मेरी! सरंग ने कहा।

हाकिम अपनी लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते मैना से बोले ?‘आओ तुम्हें कुछ खाने को दूँगा।’’मैना हाकिम के पास गई। 

दूसरे दिन हाकिम का सेवक चित्रकार के पास आया और बोला कि हाकिम की इच्छा है कि चित्रकार मैना को हाकिम कोे उपहार स्वरूप भेंट कर दे। वे बदले में तुम्हें सोना चाँदी भेंट करेंगे। चित्रकार ने कहा’’ जाओ हाकिम से कह दो मेरी चिड़िया बिकाऊ नहीं है। मैना छत के कुंदे से चिल्लाई मैना बिकाऊ नहीं,’’मैना बिकाऊ है सेवक चेहरे पर एक कठोर मुस्कराहट लिये चला गया। 

कुछ ही दिन बाद चित्रकार बीमार पढ़ गया। वह हाकिम के पास से पाँच चाँदी के सिक्के बतौर पेशगी लेने आया। लेकिन चित्रकार दो महीने तक बीमार रहने की बजह से काम पर नही जा पाया और अपना ऋण नहीं चुका पाया। 

सर्दियों में हाकिम अपने नये महल में गया उसने देखा पूर्व दिशा के बड़े कमरे की छत पर एक हिस्सा बिना चित्रित रह गया है। वह गुस्से में आग बबूला हो गया और सारंग को पकड़ बुलाया। हाकिम ने उसे आज्ञा दी कि इस नुकसान के बदले मैना दे और पाँच चाँदी के सिक्के वापस करें। चित्रकार ने मैना देने को मना कर दिया। हाकिमा ने उसे जेल में डाल दिया। 

मैना ने अपने मालिक को लगातार कई दिन तक खोजा। एक दिन उसे सफलता मिल गई। एक टूटे पाइप से वह जेल के कमरे में पहुँची ओर खुशी से सारंग की गोद में पंख फैलाकर बैठ गई। सारंग की आँखे आँसुओं से घिर आई। वह बोला,’’ मैना तू मुझे बहुत प्यार करती है न देख तेरे कारण हाकिम  मुझे मारता है उल्टा लटकाता है पर मैने तुझे बचपन से पाला है मैं तुझे दूसरे के हाथ में कैसे दे दूँ? मैना की आँखें भी बरसने लगी। 

मैना प्रतिदिन उसी रास्ते से सारंग के पास पहुँचने लगी और चित्रकार को ढांढस बँधाती। एक दिन एक संतरी ने उसे मैना से बातें करते देख लिया उसने हाकिम से शिकायत कर दी। हाकिम जब वहाँ आया तो मैना छत पर उड़ गई। सैनिकों को पकड़ने आते देख उड़ते हुए बोली ,‘हाकिम तुम सबको धोखा दे सकते हो पर मुझे नहीं।’ हाकिम गुस्से से पागल हो गया। उसने सब सैनिकों को और सेवकों को आज्ञा दी कि मैना को तीन दिन के अन्दर पकड़ लिया जाय नहीं तो सबको सजा मिलेगी। सैनिक पूरे राज्य में मैना को ढूँढते फिरे। 

दूसरी रात चोरी चोरी मैना सारंग से बात कर रही थी कि सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। पाइप वे उसके घुसते ही बन्द कर आये थे। वे चिड़िया को हाकिम के पास लाये। हाकिम अपनी दाढ़ी सहलाते बोला,‘ काली चिड़िया अब बोल अब क्यों नही उड़ पाई? ’ चिड़िया उदास पिंजरे में चुप बैठी रही।‘ बहुत चबड़ चबड़ करती थी अब कहाँ गई सारी बोली। अब तुझे खा ही जाऊँगा। बोल उबालकर खाऊँ या भून कर?’’ उदास चिड़िया धीमे स्वर में बोली,‘हाकिम तुम तो हो ही माँस भक्षी मानव माँस खाते हो, रक्त पीते हो तो मै क्या चीज हूँ। खा लो मुझे जैसा तुम चाहो। एक दिन बोटी बोटी काट कर तुम्हारी कुत्तों को खिलायी जायेगी।’ 

हाकिम बम के गोले की तरह फट पड़ा,‘ ले जाओ इस कुतिया को। इसे जिन्दा काट कर तेल में तल डालो।’ रसोइये ने जल्दी जल्दी मैना के पर नोंचे चाकू और मैना को थाली में रख तेल लेने अन्दर भंडार गृह में गया। मैना ने जान बचाने की सोची। पंख हिलाये पर वह उड़ नही सकती थी। रसोइया वापस आ रहा था वह तेजी से गहरी नाली में घुस गई। 

बेचारी चिड़िया पूरा एक साल उस गन्दी नाली में छोटे छोटे कीड़ों को खाकर जिन्दा रही। बसन्त में मैना के नये पंख उग आये। वह चुपचाप चोरी चोरी नाली से बाहर आई और उड़ गई। उसने सारंग को फिर ढूढंना शुरू किया। सारंग  जेल से भाग कर पहाड़ियों में जा छुपा था मैना उसे ढूढं न सकी। एक दिन सारंग को ढूढंती ढूढंती वह राजमार्ग से गुजर रही थी कि उसने ढोल ओर ताशे की आवाज सुनी। उसने देखा कि हाकिम सालाना बलि चढ़ाने मन्दिर की ओर जा रहे है वह उधर ही उड़ गई।

धूप और दिया जलाकर हाकिम ने देवी को घुटने टेक कर प्रणाम किया कि देवी की मूर्ति बोली, ‘हे न्हाकिम आज तुम्हें सारे राज्यवासी धिक्कार करते हैं कहते हैं कि तुम लालची हो और स्वार्थ सिद्धि के लिए अपराध करते हो। हाकिम देवी के मुँह से कोप वचन सुन थर थर काँपने लगा। वह फर्श पर लेट गया ओर देवी के चरणों में नाक रगड़ने लगा। वह गिड़गिड़ा रहा था। देवी फिर बोलीं,’’ अगर तुम जोर जोर से बोल कर जनता के सामने अपने अपराधों को बयान करो तो मैं अब भी तुम्हें क्षमा कर सकती हूँ लेकिन एक बात याद रहे, कुछ भी झूठ बोलने की कोशिश मत करना, नही तो कुत्ते से भी बदतर जिन्दगी यापन करनी पड़ेगी। 

गिड़गिड़ाते हुए हाकिम ने अपने सब अपराधों को जोर जोर से बोला। जनता के मुँह आश्चर्य से खुले रह गये। देवी फिर बोली,‘ वैसे तो तुमने इतने अपराध किये हैं कि तुम्हारी जिन्दगी कुत्ते की जिन्दगी होनी चाहिये परन्तु तुम अपनी गलती पहचान गये इस लिये मैं तुम्हें हल्की सी सजा ही देती हूँ।’ हल्की सी सजा सुन हाकिम को बहुत संतोष हुआ वह फिर देवी के चरणों में झुक गया। 

मूर्ति से आवाज आई,’’ सबसे पहले तो अपनी दाढ़ी नोच लो जिससे तुम आम आदमी नजर आओ।’हाकिम ने फौरन दाढ़ी नोच डाली। सब बाल हटा दिये एक भी नहीं छोड़ा। देवी की आवाज फिर सुनाई दी,’’ अब मेरे आगे तीन सौ पैसठ साष्टांग दंडवत करो जिससे आगे से तुम निरपराधियों को दंड बैठक न लगवाओ। 

वह जल्दी जल्दी साष्टांग दण्डवत् करने लगा। चेहरा बालों के नुचने से लहूलुहान हो रहा था। बार बार ठोड़ी को जमीन पर टेकन से वह लस्त हो गया। बैठक पूरी करते न करते वह वेदी पर लुढ़क गया। तभी उसे अपने ऊपर चिचियाने की आवाज सुनाई पड़ी,’’हाकिम यह मैं हूँ। पिछले साल तुमने मेरे पंख नोचे मैने तुम्हारी दाढ़ी नुचवा दी। पिछले साल तुमने मेरे बड़े भैया के हाथ पैर तुड़वाये इस साल मैने तुम्हारे। 

हाकिम ने अपना सिर उठाया। वह समझ गया कि क्या माजरा था पर तब तक मैना ऊँची आकाश में उड़ गई। 


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