Thursday, 10 July 2025

ek aur cindrella

 एक और सिंड्रैला


दो बहनें थीं। बड़ी बहन बहुत सुंदर थी उसका नाम सुरुपा था। छोटी बहन के चेहरे पर चेचक के दाग थे उसका नाम कुरुपा था। कुरुपा सौतेली बहन थी और कर्कशा झगड़ालू थी। सुरुपा की असली माँ की मृत्यु उसके बचपन में ही हो गई थीं उसकी माँ मृत्यु के बाद गाय के रूप में पैदा हुई और उनके बगीचे में ही रहने लगी। सुरुपा गाय की सेवा करती लेकिन सौतेली माँ को गाय फूटी आँख नहीं सुहाती थी।एक दिन सौतेली माँ कुरुपा को साथ लेकर नाटक देखने गयी। सुरुपा ने साथ जाना चाहा तो सौतेली माँ बोली,‘ मेरे कमरे में सन पड़ा है उसे सुलझा कर सीधा करलो तो कल तुम्हें नाटक दिखाने ले चलूँगी।’

सुरुपा सन के गट्ठर के सामने बैठ गई और उसे सुलझाने लगी। घंटों सुलझाने के बाद भी वह केवल आधा सन ही सुलझा पाई। रोती हुई वह गट्ठर गाय के पास ले आई। गाय ने सारा गट्ठर चबा लिया और फिर वापस निकाला तो बिलकुल सीधा सुलझा हुआ था। सुरुपा ने खुश होकर सब लच्छियाँ सौतेली माँ के लौटने पर उसके सामने रख दीं और बोली, ‘अब तो मुझे कल नाटक देखने ले चलेंगी?’

दूसरे दिन सौतेली माँ ने फिर उसे ले जाने से मना कर दिया और कहा,‘ नहीं पहले सेम के बीज और फूला अलग-अलग छाँट लो फिर कल ले चलूँगी।’बेचारी लड़की की छाँटते-छाँटते आँखे दुःखने लगी तो वह गाय के पास आईं तो वह बोली,‘ बेटी जा उन्हंें पंखे की हवा करके अलग कर।’ जब सुरुपा ने पंखा किया तो फूला उड़-उड़ कर एक तरफ एकत्रित हो गये। सौतेली माँ सब काम हुआ देख चकित रह गईं कि आखिर सुरुपा ने यह काम किया कैसे?

‘तुमने किसकी सहायता ली?’ कड़ककर जब सौतेली माँ ने पूछा तो वह घबरा गई और उसने सच-सच बता दिया। सौतेली माँ को बहुत क्रोध आया उसने गाय को मारकर पका दिया। सुरुपा गाय को इतना प्यार करती थी कि वह उसका माँस खा ही नहीं पाई। सुरुपा ने गाय की हड्डियाँ एक बर्तन में रख दी और उसे अपने कमरे में छिपा कर रख दिया।

सौतेली माँ उसके बाद भी कई बार नाटक देखने गई लेकिन सुरुपा को साथ नहीं ले गई। ऐसे ही एक दिन जब सुरुपा घर में अकेली थी रोने लगी और खिसियाकर घर के सभी बर्तन तोड़-फोड़ दिये यहाँ तक कि हड्डी वाला बर्तन भी। जैसे ही वह बर्तन टूटा एक जोर की धमाके की आवाज हुई और एक सफेद घोड़ी एक जोड़ी नये जूते और सुंदर वस्त्र प्रगट हुए। चकित सुरुपा ने उन्हें पहना और घोड़े पर बैठ कर बाहर निकली।कुछ दूर चलने पर उसे पैर की एक जूती खाई में गिर गई। उसने उतर कर जूती उठानी चाही पर वह न तो जूती उठा पा रही थी और न ही उसे वहाँ छोड़ना चाह रही थी।वह परेशान खड़ी थी कि एक मछुआरा इधर से गुजरा‘भाई मछुआरे! कृपाकर मेरी जूती खाई में से उठा दो ’सुरुपा ने प्रार्थना की।

‘जरूर उठा दूँगा, लेकिन मुझसे शादी करनी पड़ेगी।’

‘तुमसे शादी कौन करेगा?’ सुरुपा ने कहा, ‘मछुआरों में से हर समय दुर्गन्ध आती रहती है।

मछुआरा आगे बढ़ गया। कुछ ही देर में एक चावल का व्यापारी उधर से गुजरा।

‘चावल के व्यापारी भाई ,क्या मेरी जूती उठा दोगे?’ सुरुपा ने उससे भी पूछा

‘जरूर उठा दूँगा,’ व्यापारी बोला, ‘लेकिन मुझसे शादी करनी पड़ेगी?

‘एक चावल के व्यापारी से शादी! कभी नहीं ऐसे लोग हर समय धूल से भरे रहते हैं।’ व्यापारी चला गया 

कुछ ही देर में एक तेली उधर से गुजरा उससे भी सुरुपा ने जूती उठाने की प्रार्थना की। तेली ने कहा,‘ लेकिन जूती तभी उठाऊँगा तुम मुझसे शादी करोगी?’‘ तुमसे शादी!’ सुरुपा ने आह भरी, ‘तेली तो हर समय चिकनाये रहते हैं।’

कुछ ही देर बाद एक राजकुमार उधर से निकला उससे भी सुरुपा ने जूती उठाने की प्रार्थना की। राजकुमार ने मुड़कर सुरुपा को देखा फिर कहा, ‘लेकिन मुझसे शादी करोगी?’

राजकुमार बहुत सुंदर था। सुरुपा उससे शादी करने के लिये तैयार हो गई। राजकुमार ने उसकी जूती उठा दी। सुरुपा को घर ले गया और अपनी पत्नी बना लिया। तीन दिन बाद सुरुपा माँ-बाप का आशीर्वाद लेने माँ के घर आयी। उसकी माँ और सौतेली बहन का व्यवहार एकदम बदला हुआ था उससे बहुत प्रेम और उत्साह से मिली। जिद करके सुरुपा को कुछ दिन के लिये अपने पास रोक लिया।

दूसरे दिन सुबह कुरुपा उसे कुएँ के पास ले गई और बोली, ‘बहन कुएँ के पानी में झाँक कर देखो। हम दोनों में कौन सुंदर है।’ बिना किसी प्रकार के संदेह के सुरुपा ने जैसे ही कुएँ में झांका कुरुपा ने उसे धक्का देकर कुएँ में गिरा दिया। सुरुपा

कुएँ में गिरते ही बेहोश हो गई और धीरे-धीरे डूब गई।


दस दिन हो गये। पत्नी लौट कर नहीं आई तो राजकुमार को चिंता हुई उसने एक दूत भेजा। सौतेली माँ ने दूत के द्वारा कहलवाया कि उसकी पत्नी को चेचक निकल आई है कुछ दिन तक घर नहीं आ सकेगी। राजकुमार को पत्नी की बहुत चिन्ता हुई और प्रतिदिन अंडे आदि खाने का सामान भिजवाने लगा जो सब कुरुपा के पेट में जाते।

दो महिने हो गये। विद्वान प्रतिदिन दूत भेजता चिढ़कर सौतेली माँ ने राजकुमार को धोखा देने का निश्चय किया और सुरुपा के स्थान पर उसने कुरुपा को राजकुमार के पास भेज दिया। राजकुमार पत्नी का इतना बदसूरत चेहरा देखकर दहल गया, ‘नहीं! तुम मेरी पत्नी नहीं हो सकती। मेरी पत्नी इतनी बदसूरत कभी नहीं हो सकती।’ कुरुपा ने कहा ,‘अगर मेैं सुरुपा नहीं हूँ तो और कौन हूँ। यह तो तुम्हें मालुम ही था कि मैं बहुत बीमार पड़ गई थी। अब अगर तुम पत्नी बनाकर नहीं रखना चाहते तो मैं मर जाऊँगी! अपने आपको खत्म कर लूँगी।’ यह कह कर वह जोर-जोर से रोने लगी। सहृदय राजकुमार एकदम पिघल गया मन में उसके संदेह था फिर भी उसने कुरुपा को शांत किया।सुरुपा बुलबुल में बदल गई थी और जब भी राजकुमार को देखती गाने लगती,‘मैं सुुरुपा बन गई बुलबुल,धोखे से बहना मारी।

                                  बहन कुरुपा बन गयी दुल्हन,धोखा देकर मारीû

राजकुमार ने जब गाना सुना तो उसे शक हुआ। वह बुलबुल से बोला,‘ तुम यह क्या गाना गा रही हो?े अगर तुम वास्तव में मेरी पत्नी हो तो मैं तुम्हारे लिये सोने का पिंजरा बनवाऊँगा और उसमें रखकर खीर खिलाऊँगा। तुम तीन बार मुझे पुकारो।’ सुरुपा ने तीन बार बुलाया तो राजकुमार सोने का पिंजरा लेने चला गया।

कुरुपा ने बुलबुल को पकड़ा और मारकर बगीचे में फेंक दिया। तुरंत सुरुपा एक बॉंस में बदल गईं। कुरुपा ने उसे खाया तो उसके मुँह में घाव हो गये लेकिन राजकुमार ने खाया तो बहुत मीठा पाया। बाकी बचे बाँस की कुरुपा ने चारपाई बनवा दी। जैसे ही वह उस पर लेटी उसे हजारों सुइयाँ चुभने लगी जब विद्वान उस पर लेटा उसे बहुत आराम मिला। कुरुपा ने चारपाई बाहर फंेक दी।

उस राजकुमार से कुछ दूर पर एक बुढ़िया रहती थी । वह पर्स बेचती थी उसने चारपाई बाहर पड़ी देखी तो सोचा इस घर में कोई मरा तो है नहीं फिर चारपाई क्यों पड़ी हैे। वह चारपाई अपने घर उठा कर ले गई। उस रात वह उस पर आराम से सोई।दूसरे दिन बुढ़िया ने देखा उसका खाना बना रखा है। बुढ़िया ने खाना खा तो लिया पर उसे डर लगा कि आखिर उसका खाना बना किसने दिया। कई दिन तक जब वह पर्स बेचकर लौटती उसे खाना तैयार मिलता। एक दिन वह दोपहर में जल्दी घर वापस आ गई उसने देखा एक छाया चावल धो रही है। उसने छाया को कसकर कमर से पकड़ लिया और बोली,‘ तुम कौन हो? और मेरे लिये खाना क्यों पका देती हो?’

छाया ने कहा, ‘मैं तुम्हें अपनी कहानी बता दूँगी। मैं तुम्हारे पड़ोसी राजकुमार की पत्नी हूँ। मेरा नाम सुरुपा हैं। मेरी बहन ने मुझे कुँए में फेंक दिया मैं डूब गई लेकिन मेरी आत्मा अभी यही हैं। तुम चावल लकड़ी से मेरा शरीर बना दो तो मैं पहला रूप प्राप्त कर लूँगी।’ जैसा-जैसा सुरुपा ने कहा बुढ़िया ने कर दिया कुछ ही देर में सुरुपा सामने थी। बुढ़िया इतनी सुंदर लड़की देखकर बहुत खुश हुई। उसने शुरू से अंत तक उसकी कहानी सुनी। सुरुपा ने कहा, ‘माई मैं एक पर्स देती हूँ तुम उसे राजकुमार के महल के सामने जाकर बेचना और केवल उसी को बेचना। एक सुंदर सा कढ़ा पर्स उसने दिया।

दूसरे दिन बुढ़िया राजकुमार के घर के सामने खड़ी होकर चिल्लाने लगी ,‘पर्स ले लो...पर्स ले लो।’ बार-बार उसके आवाज लगाने से परेशान होकर राजकुमार बाहर आया और उसने पर्स दिखाने के लिये कहा बुढ़िया ने जब वह पर्स दिखाया तो राजकुमार चौंक कर बोला ,‘तुम्हें यह पर्स कहाँ से मिला, यह तो मैंने अपनी पत्नी को दिया था।’ तब बुढ़िया ने राजकुमार को पूरी कहानी सुनाई। सुनकर राजकुमार बहुत खुश हुआ कि उसकी पत्नी जीवित है। वह अपनी पत्नी को बुढ़िया के घर से वापस लाया।जैसे ही कुरुपा ने सुरुपा को देखा वह चीखने लगी कि कोई भूतनी, चुडै़ल सुरुपा का वेश बना कर आ गई है असली सुरुपा वह खुद है।

‘अगर सुरुपा भूतनी है तो मैं जाँच करता हूँ ’कहकर राजकुमार ने एक कढ़ाहे में तेल उबलवाया । कुरुपा ने सोचा सुरुपा जलते तेल में जल जायेगी। लेकिन सुरुपा के लिये तेल जैसे शीतल हो गया और कुरुपा जब उसमें बैठी तो खत्म हो गई । राजकुमार ने कुरुपा के शरीर को डिब्बे में बंद कर उसकी माँ के पास भिजवा दिया। सौतेली  माँ बड़ा सा डिब्बा आया देख बहुत प्रसन्न हुई कि दामाद ने उसके लिये बड़ा सा उपहार भेजा है लेकिन जब खोला तो देखा उसमें कुरुपा का जला शरीर है वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी।


Wednesday, 9 July 2025

angootha das kahani

 अंगूठादास

एक गरीब औरत एक दिन धूप में बड़ियाँ सुखा रही थी जैसे ही उसने बड़ी धूप में डाली सूर्य बादलों में छिप गया। उसने बड़ियों की डालिया समेट ली यह सोचकर कि बरसात होगी परन्तु जैसे ही बड़ियाँ समेटी धूप चमचमा उठी। यह इनती बार हुआ कि औरत को बहुत गुस्सा आया और सूर्य को कोसने लगी। औरत गर्भवती थी सूर्य ने गाली सुनकर औरत को श्राप दिया कि उसके लड़का होगा परन्तु केवल अंगूठे भर का। ठी समय पर एक लड़का हुआ और वह केवल अंगूठे भर का था इसलिये उसे नाम दिया अंगूठादास।

अंगूठादास का सब मजाक उड़ाते तो वह बहुत दुखी होता। जब वह सोलहसाल का हुआ तो उसने अपनी माँ से अपने अंगूठे भर का रह जाने का कारण पूछा जब उसे ज्ञात हुआ कि इसका कारण सूर्य है तो उसे बहुत गुस्सा आया वह अपनी माँ से बोला, माँ सुबह मेरे को चार रोटी दे देना मै। सूरज से लड़ने जाऊँगा।

सुबह वह रोटी लेकर पूरब दिशा की ओर सूर्य की खोज में चल दिया। गर्मियों के दिन थे खेत मैदान झुलस रहे थे और खाली पड़े थे। चलते चलते उन्हें एक झरने के किनारे खाली नाव मिली झरने का पानी सूख गया था और नाव रेत पर पीड़ी धूप में सूख रही थी।

अंगूठादास कहाँ जा रहे हो? नाव ने पूछा, मैं अपने दुश्मन सूर्य से लड़ने जा रहा हूँ अंगूठादास न जबाब दिया।

सुनते ही नाव बोली, अरे तब तो मुझे भी साथ ले लो, नाव सूरज की धूप से चिढ़ी बैठी ही थी।

ठीक हे अंगूठादास नेे कहा, लो यह एक रोटी खाओ और मेरे पेट में बैठ जाओ नाव ने वैसा ही किया।

अंगूठादास ने अपनी यात्रा जारी रखी आगे जल कर बबूल कांटा मिला उसने पूछा अंगूठादास कहाँ जा रहे हो।

मैं अपने दुश्मन सूरज से लड़ने जा रहा हूँ अरे तब तो मुझे भी साथ ले लो कांटा धूप में बिलकुल सुख गया था इसलिये चिढ़ गया था ठीक है अंगूठादास बोला रोटी खाओ और मेरे पेट में बैठ जाओ।

इसी प्रकार आगे चलकर काई और सड़े अंडे से मिला दोनो भी गर्मी से परेशान थे क्योंकि कई सब खतम हो गई थी वह जरा भी काई तो पेड़ की तली में रह गई थी और अंडे भी सब गये थे दोनों ही उसके साथ चल दिये।

इस प्रकार चारों सूरज के दुश्मनों को अपने पेट में बिठाये बढ़ता बढ़ता पूर्व की पहाड़ियों में पहुँचा जहाँ से उसे आशा थी कि दूसरे दिन सूर्य निकलेगउ। रात में आराम करने के लिये स्थान ढूँढ़ा क्योकि सब वीरान जंगल था। थोड़ी दूर पर उसे एक महान दिखाई दिया। अंगूठादास आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि वह जानता थी कि इतनी सुनसान और अकेली जगह में सिवाय देवता या राक्षस के और कोई नही रह सकता। मकान के चारों और घूम घूम कर उसने देखा कि मकान खाली है लेकिन इसका मालिक रात में सोने तो अवश्य आयेगा अंगूठादास ने सोचा और रात आराम से काटने के लिेय मुझे उससे लड़ना पड़ेगा।

उसी समय कांटा, काई और सड़ा अंडा उसे पेट से बाहर आये मालिक राक्षस से हमे लड़ने दो आप अपनी शक्ति सुबह के लिये बचा कर रखो अंगूठादास राजी हो गया और एक झाड़ी के पीछे छुप इंतजार करने लगा।

तीनों घर में घुसे सबसे पहले उन्होंने दियासलाई छुपा दी। कांटा बिस्तर में जा छुपा अंडा चूल्हे में और काई पानी के घड़े के पास। कुछ ही देर बाद राक्षस आया और बिस्तर पर लेट गया। उसके लेटते ही कांटे ने चारों ओर से चुभना शुरु कर दिया। राक्षस ने लैंप जलाने के लिये दियासलाई ढूँढ़नी चाही तो कहीं नहीं मिली वह रोशनी के लिये रसोई में गया जैस ही आग के लिये झुका अंडा जोर की आवाज करता फट गया। बहुत सी राख राक्षस की आंख में घुस गई। राक्षस दौड़कर आंख धाने घड़े के पास गया कि काई पर पैर पड़ने से धड़ाम से गिर जाया उसकी गर्दन टूट गई और वहीं मर गया। रातभर अंगूठादास आराम से सोये।

सुबह अपने तीनों साथियों के साथ सूर्य के पास पहुँचे और उसे लड़ने को ललकारा। सूर्य गुस्से से लाल बाहर आया और अपने को खूब तपाने लगा। अंगूठादास झूलसने लगा। अभी वह हार मानने ही वाला था कि एकदम से वारिश आ गई क्योंकि वारिश समझ गई कि कोई सूर्य से लड़ने आया है इसलिये उसकी सहायता के लिये आई और सूर्य के ताप को खत्म कर दिया। अंगूठादास और उसके साथी जोर जोर से हंसने लगे परन्तु जल्दी ही उनकी हंसी गायब हो गई क्यांेकि सूर्य की ठंडा करने के चक्कर में बरसात इतने जोर से हुई थी कि चारों ओर बाढ़ आ गई। उसी समय नाव उसके पेट में से बाहर आई और चारों उसमें बैठ कर अंगूठादास के गाँव की ओर चल दिये। वहाँ गाँव वालोकं ने अंगूठादास की जीत पर खूब हर्ष मनाया।


Sunday, 6 July 2025

veer balayen taj kunver

 ताज कंुवरि  


दिल्ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन एबक का शासन था। शहर कानपुर के पास  किसोरा नामक एक छोटा सा हिन्दू राज्य था। उसके राजा थे सज्जन सिंह, क्षत्रिय राजपूत ,जैसा नाम था वैसा ही चरित्र था। राजा सज्जन सिंह धर्म प्रिय और प्रजा की देखभाल करने वाले सज्जन राजा थे। जनता उन्हें बहुत प्यार करती थी। उनके दो बालक थे पुत्री ताजकुंवरि और पुत्र लक्ष्मण सिंह। ताज कुंवरि और लक्ष्मण सिंह को राजा सज्जन सिंह ने साथ साथ शिक्षा दिलवानी प्रारम्भ की। अध्ययन के साथ-साथ उन्हें अस्त्र-शस्त्र चलाना घुड़सवारी आदि करने की शिक्षा वो स्वयं ही दिया करते थे।

एक दिन दोनों भाई बहन जंगल की तरफ शिकार करने निकले। लक्ष्मण सिंह बोला ‘‘ जीजी आगे घना जंगल लग रहा है। डर तो नहीं लग रहा है।’’ 

‘ डर मुझे डर क्यों लगेगा ?’

‘ नहीं लड़कियॉं जल्दी घबरा जाती हैं इसलिये कह रहा था।’ लक्ष्मण सिंह बोला।’

‘ अरे ! लड़कियाँ भी बहादुर ही होती हैं। वह कमजोर नही होतीं तुम क्या समझते हो मैं लड़की हूँ इसलिये तुम से कमजोर हूँ। नही यह भूलकर भी मत सोचना।’ ताज कंुवरि ने अपना घोड़ा आगे बढ़ाते कहा। 

‘नही‘, जीजी किसी से भी पूछ लो यही उत्तर मिलेगा ंिक स्त्री पुरूष से अधिक वीर नही हो सकती क्योंकि स्त्री कमजोर होती है।’ लक्ष्मणसिंह ने हंसते हुए कहा ।

‘ नहीं, मैं नही मानती इस बात को’ ताजकुंवरि ने दृढ़ता से कहा,‘ यह ठीक है कि महिलाऐं शरीर से पुरूष के मुकाबले कम शक्तिशाली होती हैं परन्तु अगर मन से हम कमजोर नही होंगे तो हम वीरता में कम नही होते हैं। मैं तुमसे अधिक वीर बहादुर हूँ।’ लक्ष्मण सिंह के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई और उपेक्षा से कहा,‘ कहने से ही कोई वीर नही हो जाता अवसर आने दो पता चला जायेगा मैं अधिक वीर या तुम। ’

‘हाँ अवसर आने दो ’ ताजकुंवरि ने कहा,‘ सिद्ध हो जायेगा मैं वीर याा तुम अधिक वीर।’ पर दोनों भाई बहन को ज्ञात नही था कि जिस अवसर को आने के लिये वो कह रहे हैं वह अवसर सामने ही है। दोनों बालक बात करते चले जा रहे थे। वहीं पास में ही दस बारह मुगल एक झाड़ी में बैठे थे। आपस में कुछ परामर्श कर रहे थे दो बालकों को अकेले जाते देखा तो उन्होने लाठियों उठाई और हो हो कर उनके ऊपर आक्रमण कर दिया। 

दोनों बालकों ने अपने ऊपर आक्रमण होते देखा तो बिजली की तेजी से म्यान से तलवारें निकाली और मुगल पठानों से युद्ध करने लगे। कुछ ही क्षण में लक्ष्मण सिंह ने बिजली की चमक सी तलवार चलाकर पाँच पठानों को मार गिराया तब तक ताजकंुवरि ने भी तीन पठान मार दिये थे। युद्ध करते हुए लक्ष्मण सिंह ताजकुंवरि को देख कर हँसा  और तलवार चलाते बोला,‘ देखा जीजी मैंने कहा था न कि पुरुष अधिक वीर होते हैं स्त्री पुरुष से अधिक बलवान नहीं हो सकती। ’

ताजकुंवरि ने झुककर एक मुगल की गरदन पर वार किया । भाई की ओर देखा उसकी बात सुनी उसकी तलवार और तेजी से चलने लगी । बचे हुए चार पाँच मुगल उन पर वार कर रहे थे देखते देखते ताजकुंवरि ने दो पठान और मार गिराये बाकी बचे दो तीन पठान भाग निकले। 

दस पठानों के शव पड़े थे। ताज कुंवरि ने कहा,‘ अब क्या कहते हो भाई अगर स्त्री अधिक वीर नही होती तो कम से कम बराबर तो होती ही है।’ दोनों भाई बहन हंस पड़े। बचे हुए पठान कुतुबुद्धीन के दरबार में पहुँचे वहाँ उन्होंने दोनों बालकों के शौर्य की गाथा सुनाई । कुतुबुद्धीन एबक से ताजकुंवरि की वीरता के साथ साथ उसकी सुन्दरता के भी विषय मैं  बताया कि ऐसा फूल तो कहंीं दूर दूर तक नहीं है। वह तो आपके हरम में ही खिलना चाहिये। ऐसा हूर सा सौन्दर्य तो आपके हरम में है ही नहीं । क्या ही 


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अच्छा होगा आप सज्जन सिंह से छीन कर ले आयें इससे आपके महल की रौनक तो बढ़ेगी ही मुगलों की मौत का बदला भी चुकेगा।’ 

ताजकंुवरि की वीरता और सौन्दर्य के विषय में सुनकर एबक बेचैन हो उठा। वह ताजकंुवरि को पाने के लिये उत्सुक था इसलिये सेना को कूच करने का आदेश दे दिया । तुरन्त किसारा राज्य को मुगल पठानों द्वारा घेर लिया गया। साथ ही सज्जन सिंह के पास पैगाम भिजवाया अगर अपनी खैर चाहते हो ताजकुंवरि को बादशाह की खिदमत में पेश कर दो। 

कुतुबुद्धीन का फरमान सुनकर राजपूतों की बाहें फड़कने लगीं झन झनाती तलवारें उनकी म्यान से निकल आईं और वे बादशाह की सेना पर टूट पड़ीं। लक्ष्मण सिंह और ताजकुंवरि किले की छत के कंगूरे से अपने वीर बहादुरों को लड़ते देख रहे थे। पर बादशाह की विशाल सेना के आगे उनके मुठ्ठी भर राजपूत एक एक कर गिरने लगे और सज्जन सिंह का पक्ष कमजोर होने लगा। 

दोनों बालक अपने पक्ष को कमजोर हेाते देख कर बेचैन हो उठे । ताज ने लक्ष्मण सिंह से कहा,‘ भाई क्या देख रहे हो ? अब खड़े खड़े देखते रहने का समय नही रहा। चलो रण क्षेत्र में हम दोनों चलते हैं । अब ही तो जो कुछ सीखा है काम में आयेगा।’ यह कहते वह अपना वेश बदलने अपने कक्ष की ओर बढ़ गई । लक्ष्मण सिंह भी अपने वस्त्र बदलकर तुरन्त आ गया और दोनों भाई बहन रण क्षेत्र में पहुँच गये और एक एक कर शत्रुओं को उनकी तलवारें काटने लगीं। न जाने कितने पठान उन दोनों भाई बहनों द्वारा मौत की नींद सुला दिये गये गिनती नही थी। 

कुतुबुद्धीन दूरबीन से युद्ध के दृश्य देख रहा था। ताजकुंवरि को देख कर बोला,‘ हूर  बहिश्त की हूर बला की खूबसूरत हैं सचमुच यह मेरे हरम के लायक ही है।’ फिर सिपाहियों से बोला ,‘जो भी इस हूर को मेरे पास जिंदा पकड़कर लायेगा मुँह माँगा इनाम पायेगा। ’

इनाम की सुनकर एक जुट होकर मुगल सज्जन सिंह की सेना पर टूट पड़े। सज्जन सिंह मारे गये और मुगल ताज को पकड़ने के लिये बढ़े। लक्ष्मण और ताज बिजली की गति से तलवार चला रहा था। उसके युद्ध कौशल को देखकर सब दंग रह गये ,किन्तु कब तक वे दोनों बालक और मुठ्ठी भर राजपूत मुगलों के विशाल दल को रोक सकते थे। मुगल ताज के चारों ओर घेराबन्दी करने लगे। ताज ने देखा वह घिरने लगी है तो उसने लक्ष्मण सिंह की ओर देखा और कहा, ‘भाई अपनी बहिन की रक्षा करो।’ 

लक्ष्मण ंिसह ने कहा ,‘अब रक्षा की संभावना कहाँ रह गई है जीजी ’। कहते लक्ष्मण सिंह का गला भर आया। ‘छिः तुम वीर राजपूत हो राजपूत होकर रो रहे हो। मेरे शरीर की नही मेरे धर्म की रक्षा करो यदि यवनों ने मेरे शरीर को अपने नापाक हाथों से छू भी लिया तो मेरा धर्म भ्रष्ट हो जायेगा।’ 

लक्ष्मण सिंह समझ गया और दूसरे ही क्षण लक्ष्मण सिंह ने तलवार उठाई और बहिन का सिर धड़ से अलग हो गया। बहिन को तलवार के घाट उतारकर लक्ष्मण सिंह भी अधिक देर तक युद्ध क्षेत्र में नहीं रहा और वीर गति को प्राप्त हो गया। 

कुतुबुद्धीन एबक ने अपना झंडा किले पर फहरा दिया और सिपाहियों को सम्बोधित करते हुए बोला,‘ मेरे बहादुर सिपाहियो हमने इस लड़ाई में फतह हासिल की है। इसके लिये अल्लाहताला का शुक्र है। लेकिन राजपूतों के ये फौलादी बच्चे किस मिट्टी से बने हैं यह पता नही चल सका। जीत कर भी अन्दर से हम अपने को हारा महसूस कर रहे हैं।’


Friday, 4 July 2025

akbar birbal ke kisse

 क बार गोनू झा के पिता जी ने कहा ,’’तुम सबको बेवकूफ बनाते हो मुझे भी बनाओ तो जानूॅ। ’’ उस समय तो बात खत्म हो गई । कुछ दिन बाद गोनू झा अपने ससुराल पहुँचे । रोनी सूरत बनाकर बताया कि पिताजी का स्वर्गवास हो गया है। श्वसुर ने धीरज धराया और श्राद्ध का दिन पूछा । वहाँ से लौटकर पिता के सामने रोनी सूरत बनाकर खड़े हो गये पिता के पूछने पर कहा कि श्वसुर का स्वर्गवास हो गया है । श्राद्ध का दिन समय वही बताया जो श्वसुर को बताया । निश्चित दिन दोनों अपने घर से निकले,रास्ते में दोनों ने एक दूसरे को देखा तो भूत भूत कर भाग लिये । एक राहगीर ने कारण पूछा दोनों ने एक ही कारण बताया कि दस दिन पहले दूसरे की मृत्यु हो गई  थी वह उसके श्राद्ध में जा रहा था । राहगीर समझ गया उसने पूछा ‘कहीं गोनू झा ने तो नहीं कहा था।’ उन्होंने उससे अपना संबंध बताया तो उसने कहा यह सब उसी का कमाल है। पिता ने फिर उन्हें चुनौती नहीं दी।

तेनाली राम विजयनगर के राजा कृष्ण देवराज के राज्य बिदूषक थे । इनकी बौद्धिकता चतुराई कहीं भी बीरबल से कम नहीं थी। गंभीर से गंभीर विषय को भी मात्र अपने परिहास द्वारा हल कर देना इनका विशिष्ट गुण था। तेनालीराम का जन्म गुन्टूर जिले के नलीपाडू नामक गा्रम के ईश्वर प्रसाद रमैया नामक गरीब ब्राह्मण के यहँा हुआ था तथा इनका नाम रामलिंगम् था जब ये तीन वर्ष के थे तभी इनके पिता का साया इनके सिर से हट गया बाकी का पालन पोषण इनके मामा के यहाँ तेनाली नामक ग्राम में हुआ । बुद्धि चातुर्य के कारण गरीब होते हुए भी गुरू के कृपा भाजन बने और शिक्षा प्राप्त की । 


बादशाह अकबर को भोेजन के प्श्चात् पान देने वाले सेवक से पान में चूना ज्यादा लग गया । बादशाह का गाल जरा छिल गया उन्होंने सेवक को आज्ञा दी,‘ बाजार से आधापाव चूना ले आ ।’ बादशाह की आज्ञानुसार जब वह व्यक्ति यह कहकर चूना ले रहा था कि बादशाह ने मंगाया है तो एक अनजान युवक उसकी बात सुन रहा था उसने कहा ,ऐसा कर तू पाव भर घी पीजा तब महल में जाना ।’उसने ऐसा ही किया। जब बादशाह के आगे उसने चूना पेश किया तो बादशाह ने कहा,‘ अच्दा अब इसे घोल कर पीजा, पान में अधिक चूना लगाने की यही सजा है।’’नोकर इतना चूना खाने से अवश्य मर


Monday, 30 June 2025

kahani ek aur bansurivala

 एक और बाँसुरीवाला

किसी शहर में एक किसान रहता था, उसके तीन पत्नियाँ थीं, बड़ी पत्नी से एक पुत्र जै था अैर दो पत्नियाँ निसंतान थी। पिता पुत्र को बहुत प्यार करता था लेकिन दोनों सौतेली माताओं को वह एक आंख नहीं भाता था। वे उसके लिये कोई न कोई परेशानी पैदा करती रहती थी। एक दिन उसकी माँ ने पति से कहा, तुम किसी तरह लड़के को यहाँ से हटा दो, इसे कहीं काम पर लगा दो नहीं तो इसकी जान मुश्किल में पड़ जायेगी।

पति ने कहा,‘ अभी वह बच्चा है, एक साल और पास रहने दो फिर उसे कहीं काम पर भेज दूंगा। नहीं तो इसे तो खेत पर काम करने के लिये भेज दूंगा और खेत के मजदूरों को घर के काम के लिये भेज दँूगा। एक साल बाद किसान ने लड़के को भेड़ें चराने के लिये भेजना प्रारम्भ कर दिया। पहले ही दिन उसे पोटली में खाना बांध कर दे दिया, वह गाता हुआ भेड़ों को चरते देखते एक पहाड़ी पर जा बैठा। तभी वहाँ एक वृद्ध आया और बोला,‘ बेटा भगवान तुम्हारा भला करें।’

‘बैठो बाबा, ’लड़का बोला,।

‘मैं बहुत भूखा हूँ ’वृद्ध ने कहा, ‘अगर तुम्हारे पास थोड़ा सा खाना हो तो मुझे खाना दे दो।’

‘हाँ बाबा, खाना तो है पर थोड़ा ही है,’ यह कहते हुए उसने खाना दे दिया।

वृद्ध ने तृप्ति से खाना खाया और बोला, ‘तुम दयालु लड़के हो तुमने अपना खाना मुझे दिया, इसलिये मैं तुम्हें तीन चीजें देना चाहूँगा। तुम बताओ तुम्हें क्या चाहिये।’

‘एक चिड़िया मारने के लिये धनुष होता तो अच्छा था ’लड़के ने सोचते हुए कहा,

‘ठीक है मैं ऐसा धनुष दूँगा जो जिंदगी भर टूटेगा नहीं और निशाना लगाओगे तो कभी खाली नहीं जायेगा।’ यह कहकर उसके एक धनुष अैार तीर अपने झोले में से निकाल कर दिया। लड़का बहुत खुश हुआ, फिर बोला,‘ एक छोटी ही सी सही बाँसुरी बजाने के लिए मिल जाती।’

‘ मैं तुम्हें बाँसुरी देता हूँ, वृद्ध व्यक्ति बोला, लेकिन यह अदभुत् है तुम्हें छोड़कर जो भी इसे सुनेगा नाचने लगेगा। अब तीसरी वस्तु बताओ।’ 

लड़का कुछ देर सोचता रहा फिर बोला, मुझे और कुछ नहीं चाहिये।

‘कुछ नहीं ’वृद्ध बोला, ‘कुछ तो बताओ, जो मांगोगे मिल जायेगा।’ तो लड़का सोच कर बोला, मेरी सौतेली माँ बहुत खराब है मुझे जरा भी प्यार नहीं करती बल्कि मेरे में कोई न कोई नुक्स निकालती रहती है जिससे पिता मुझे पीटते हैं मुझे पिटता देखकर हंसेती है, मैं चाहता हूँ वो मैं कहूँ तो इतना हंसे कि वो न हंसने के लिये गिड़गिड़ाये, जब मैं मना करूँ तो चुप हो जाये।’

ऐसा ही होगा, अच्छा अलविदा यह कहकर वृद्ध चला गया। शाम हुई वह घर चला जैसे ही उसने बाँसुरी बजाई उसकी भेडं़े नाचने लगी। घर पहुँचने पर उसने बाँसुरी बंद कर दी। बाँसुरी बंद करते ही उनका नाचना बंद हो गया।

घर पहुँचा तो लड़के का पिता खाना खा रहा था, लड़का बोला सारा दिन घूमते घूमते थक गया, मुझे बहुत जोर की भूख लगी है। पिता ने उसे अपने साथ खाने पर बिठा लिया तो सौतेली माँ ने आंखों ही आंखों में उसे डांटा और साथ ही सौतेली माँ ने हंसना प्रारम्भ कर दिया और हंसती चली गई, अंत में हंसते हंसते थक गई और जमीन पर गिर पड़ी। लेकिन हंसी नहीं रुकी वह अधमरी सी हो गई, यह देख लड़के ने कहा, ‘बस अब मत हंसो।’ यह कहते ही हंसी रुक गई यह देख सब आश्चर्य चकित रह गये।

सौतेली माँ का भाई टोपा अधिकतर घर आता था। सौतेली माँ ने उससे लड़के की शिकायत की कि किस प्रकार उसे हंसा हंसा कर बेदम कर दिया था। शायद लड़के पर कोई प्रेत भूत चढ़ गया उसे निकाल दो। 

‘ठीक है मैं ऐसा पीटूँगा कि उसका प्रेत झट पट भाग लेगा’ सौतेली माँ के भाई ने कहा, 

दूसरे दिन जब सुबह लड़का ढोर लेकर जंगल के लिये चला, पीछे पीछे सौतेली माँ का भाई चला जब जंगल वे पहुँच गये तब टोपा बोला, तूने अपनी माँ के साथ बहुत बुरा किया है, मुझे सच सच बताओं तुमने यह किया कैसे जो कुछ भी किया, अगर मुझे विश्वास नहीं हुआ तो तुम्हें पीटूँगा।’

‘ओ हो तो तुम इसलिये मेरे पीछे पीछे परेशान से आ रहे थे,’ लड़का बोला, ‘चलो तुम्हें दिखाऊँ मैं क्या क्या कर सकता हूँ, मैं छोटा जरूर हूँ पर बहुत दूर की चिड़िया मार कर दिखाऊँगा।’

‘ठीक है निशाना लगाओ,’

अपने छोटे से धनुष से खींच कर एक तीर उसने दूर उड़ती हुई चिड़िया के मारा। जैसे ही टोपा ने चिड़िया उठाई लड़के ने बाँसुरी बजाना प्रारम्भ कर दिया। भाई के हाथ से चिड़िया गिर गयी और वह नाचने लगा, जैसे जैसे बाँसुरी का संगीत ऊँचा होता गया उसका नाचना भी तेज होता गया। वह अपने कपड़े फाड़ने लगा यहाँ तक कि उसकू पैरों से खून बहने लगा।

‘रोको, भगवान के लिये रुक जाओ,’ टोपा गिड़गिड़ाने लगा, ‘अगर थोड़ा और नाचा तो मैं मर जाऊँगा, मैं वादा करता हूँ आगे से में तुम्हें कभी नहीं सताऊँगा।’

‘पीछे कूदो’ लड़का बोला, ‘और भाग जाओ।’

टोपा तेजी से पलटा और भाग लिया। घर पहुँचा तो सब हैरान रह गये कि उसकी यह गत कैसे बनी।

‘यह सब तुम्हारे बेटे ने किया है ’टोपा चिल्लाया‘ जरूर उस पर किसी राक्षस का साया पड़ा है और कोई इतना कुछ नहीं कर सकता।’

‘ आखिर उसने किया क्या है।’

‘उसने मुझे मारने की हद तक नचाया, पता नहीं उस बाँसुरी में क्या था कि मेरा नाचना रुका ही नहीं’

 शाम को जब घर आया तो पिता ने पूछा।

‘पिताजी मैंने कुछ नहीं किया बस बाँसुरी बजाई थी ’लड़का भोला सा मुँह बना कर बोला।

‘ठीक है बाँसुरी मुझे भी बजा कर सुनाओ ’पिता बोले

‘बाप रे बाप’ टोपा बोला ‘बाँसुरी मत बजाना’

‘रुको,’ टोपा बोला, ‘अगर आपको बाँसुरी सुननी ही है तो मुझे पहले पहले खंम्भे से बांध दें क्योंकि अब मुझमें नाचने की हिम्मत जरा भी नहीं है। मैं जरूर मर जाऊँगा।’

सबको टोपा की खस्ता हालत देखकर बहुत हंसी आ रही थी, उन्होंने उसे खम्भे से बांध दिया।

‘अब बाँसुरी बजाओ,’ पिता ने कहा, 

‘ठीक है मैं बाँसुरी शुरु करता हूँ, लेकिन जब आप बंद करने की कहेंगे मैं बंद कर दूँगा।’ जै ने कहा

जैसे ही जै ने बाँसुरी बजाना शुरु किया सबने उछलना कूदना शुरु कर दिया यहाँ तक कि टोपा खम्भे से सिर टकराने लगा और दर्द से चीखने लगा। कोई मेज पर कूद रहा था तो कोई कुर्सी हवा में उठाये नाच रहा था जै गली में निकल गया सब उसके पीछे पीछे नाचते चलने लगे। जो भी बाँसुरी की आवाज सुनता घर से दीवार फांदता निकल आता। यहाँ तक कि सोते हुए व्यक्ति भी उठ बैठे और नाचने लगे। जब नाचने नाचते बहुत थक गये तो पिता ने जै से बाँसुरी बजाना बंद करने के लिये कहा, लड़के ने जैसे ही बाँसुरी बजाना बंद किया सबके कदम अपने आप रुक गये।

‘ ऐसा मधुर संगीत मैंने आज तक नहीं सुना ’पिता प्रसन्न होकर बोला,

‘ ठहर जा दुष्ट लड़के, ’जब सब घर वापस आ गये तो टोपा बोला, ‘मैंने कल पंचायत बुलाई है मैं तुझे  पंचायत में मजा चखाऊँगा।’

‘भगवान करे कल जल्दी आये,’ जै हंसता हुआ बोला,

दूसरे दिन टोपा और सौतेली माँ पंचायत के सामने पहुँचे, सारा गाँव एकत्रित हो गया। टोपा ने पंचों के सामने सारा किस्सा रक्खा ,और कहा जरूर यह तंत्र मंत्र जानता है और पूरे गाँव को नष्ट कर देगा।

‘इस पर चुड़ैल आती है’ सौतेली माँ ने जै को घूरते हुए कहा, लेकिन एकाएक उसका भाव बदल गया। पहले उसके चेहरे पर मुस्कान आई फिर हंसी और वह जोर जोर से हंसने लगी।

मुखिय चिल्लाया,‘ ए औरत पागलों की तरह हंसना बंद कर।’ लेकिन उसकी हंसी तब तक नहीं रुकी जब तक जै ने टोका नहीं।

तब टोपा बोला, ‘देख लीजिए हजूर, यह तो कुछ भी नहीं बाँसुरी बजाकर तो आप सब की वो गत बनायेगा कि आप भी इससे तौबा कर जाओगे।’

‘जै हम भी सुनना चाहेगे, तुम्हारी बाँसुरी।’

‘अरे नहीं नहीं ’टोपा चिल्लाया ‘यह गजब मत कीजिये। पहले से बाँसुरी की आवाज से ही दूर भाग जाऊँ।’

टोपा सिर पर पैर रखकर वहाँ से भागा।

जैसे ही जै ने बाँसुरी में फूंक मारी सारे के सारे गाँव वालों के हाथ पैर अपने आप उठ गये और सब उछल कूद करने लगे। मुखिया चौकी पर खड़ा कूद रहा था।  अब वह थक गया तो चिल्लाया ‘जै इसे बजाना बंद करो।’

‘लेकिन मैं तब ही बजाना बंद करूँगा, माँ और टोपा मामा यह वादा करेंगे कि मुझे कभी नहीं सतायेंगे।’ जै ने कहा,

सब घर वालों ने उछलते कूदते पंचों के सामने कसम खाई कि वे कभी जै को परेशान नहीं करेंगे। और उसकी सहायता करेंगे।

जै ने बाँसुरी बजाना बंद कर दिया और फिर किसी ने उसे नहीं सताया।

डॉ॰ शशि गोयल


Sunday, 29 June 2025

Mulla nasruddeen

 तुरंत जबाव लीजिये -  

                     बुखारा के मुल्ला नसरूद्दीन अपने आप में अपनी मिसाल 

थे । उनके किस्से दूर दूर तक मशहूर थे । एक आदमी ने सुन रखा था कि मुल्ला नसरूद्दीन बहुत ही समझदार है । उसके पास हर समस्या का हल ,हर सवाल का जवाब मौजूद रहता है।  वह बड़ी दूर से चलकर मुल्ला नसरूद्दीन के पास पहॅुचा और बोला‘,‘ मैंने आपकी बहुत तारीफ सुनी है ,और मैं बहुत दूर से चलकर आया हॅू। एक सवाल मुझे बहुत देर से परेशान किये हुए है ,‘जिन्दगी में आदमी को क्या याद रखना चाहिये और क्या भूल जाना चाहिये ? कृपया मुझे इस बात का जबाव दीजिये ।’ क्षण भर को मुल्ला ने सोचा और फिर बोला ,‘किसी ने आपके लिये अच्छा किया हो उसे याद रखना चाहिये और अगर किसी ने बुरा किया हो तो भूल जाना चाहिये ।’’

मुल्ला नसरूद्दीन दोस्तों के साथ बैठे गुफ्तगू का मजा ले रहे थे एक दोस्त ने गप्प मारी ,’’ मेरे दादा बड़े तैराक थे। एक बार उनके सिर पर तैरने का ऐसा जनून सवार हुआ कि चार दिन और चार रात लगातार तैरते रहे। ’’ मुल्ला ने दोस्त की बात काटते हुए कहा,’’ यह तो कुछ भी नहीं , मेरे दादा के तो पासंग में भी नहीं ’ दोस्त ने पूछा ,’’ वह कैसे ,’’ बड़ी शान से छाती फुलाकर मुल्ला ने कहा,’’ पचास वर्ष पहले वे झील में तैरने गये थे और आज तक नहीं लौटे।’

’मुल्ला नसरूद्दीन एक दिन बाजार में चले जा रहे थे कि एक दलाल ने कहा,’’ मैनें सुना है कि शैतान के साथ तुम्हारी खूब पटती है। जरा मुझे शैतान का हुलिया तो बताओ कि उसकी शक्ल सूरत कैसी है?’

’’ तुमने ठीक सुना है,’’ मुल्ला ने जबाव दिया ,’’ जरा शीशे में अपना मुॅह देखलो ।’’

एक दिन बादशाह मुल्ला नसरूद्दीन से बातें कर रहा था बातों ही बातों में उसने मुल्ला से पूछा,’’ मुल्ला यह तो बताओ मौत के बाद में स्वर्ग में जाउंगा या नर्क में ।’

’मुल्ला ने तुरंत कहा , ’’ में निश्चय पूर्वक कह सकता हँू नर्क में ।’ यह सुनना था कि बादशाह एकदम आग बबूला हो गया गुस्से में उसकी आँखें लाल हो गईं । इस अपमान से वह तिलमिला उठा ।

‘भगवान आपका भला करे इतना गुस्सा मत कीजिये ,’’ बादशाह को शांत करने के लिये मुल्ला ने कहा ,’’ मैने सोच समझकर ही ऐसा कहा है । बात यह है कि स्वर्ग जाने योग्य बहुत से ऐसे लोगों को आपने कत्ल करवा दिया है अब वहाँ इतनी भीड़ भाड़ हो गई होगी कि आपके लिये जगह ही नहीं बची होगी ।’

दरभंगा नरेश के घने घुंघराले केश थे , जबकि गोनू झा की चंदियॉं चमचमाती जरा जरा से केश इधर उधर थे । एक बार विनोद में महाराज ने कहा , क्या बात है गोनू झा मेरे सिर पर तो इतने घने केश हैं और आपका सिर बंजर धरती बना हुआ हैं।ै 

’’ मेरी खोपडी़ में अंदर विधाता ने गोबर भरने में कंजूसी कर दी ,’’ गोनू झा का छूटते ही जबाब था। महाराज कट कर रह गये । 


Saturday, 28 June 2025

eshi patel kahani

 एशी पटेल

लेगार्थ देश के समृद्ध किसान के पास बहुत से खलिहान थे,  उसकी पत्नी बहुत खर्चीली थी। उसके सात पुत्र और एक पुत्री थी। सबसे छोटा पुत्र एशी पटेल सारा दिन इधर उधर भागता रहता था और एसे ही धूल मिट्टी में सो जाता इसलिये अन्य सब बड़े पुत्र उसे दुत्कारते रहते थे । उसे सारे छोटे छोटे काम करने के लिये दिये जाते थे। सबके लिये वह हंसी का पात्र था लेकिन उसकी बहन उसे बहुत प्यार करती थी। एशी पटेल तरह तरह की दानवों और राक्षसों से लड़ने की बहादुरी की कथाऐं सुनाता था जिसका नायक वह खुद होता था। उसके भाई सुनते और मजाक उडाते थे।

एक दिन राजकुमारी जैमलवली वहां घुमनें आई नदी में एशी पटेल की बहन तैर रही थी। राजकुमारी को एशी पटेल की बहन इतनी अच्छी लगी कि उसने उसका घर पता लिया और पिता से कहकर अपने महल में अपनी सहेली बनाने के लिये बुलवा लिया। वह प्रतिदिन सुबह अच्छें अच्छे कपडे पहन कर टट्टू पर चढकर महल में चली जाती थी इससे एशी पटेल और भी अकेला हो गया था।

चारों ओर खबर फैली कि समुद्र की राह भयानक जानवर आ रहा है जिसकी सांस में जहर है जिसको भी उसकी सॉस की हवा लग जाये वह व्याक्ति मर जाता है और जमीन बंजर हो जाती है।

वह जानवर आया और चारों ओर हाहाकार मच गया। वहंी एक मांत्रिक रहता था जिसे सब ज्ञात था लेकिन राजा उसकी सहायता नहीं लेना चाहते थे। क्योकि कभी कभी वह धोखेबाजी कर देता था। रानी ने एक टोहनी का पता लगाया वह एक लम्बे चौडे शरीर वाली स्त्री के पास ले गई जिसने एक अन्य मांत्रिक का पता लगाया जो बहुत बुद्विमान और शक्तिशाली मंा़िंत्रक था। सूर्योदय होने पर उसे सूर्य की अभ्यर्थना की और बताया कि जहरीले जानवर को हर हफ्ते सात कुंवारी कन्याओं की बलि चढा़ने पर ही प्रसन्न किया जा सकता है। अगर इससे भी वह सन्तुष्ट नहीं हुआ तो एक अन्य उपाय है यद्यपि उपाय बहुत खतरनाक है उसे आवश्यकता होने पर ही बताया जायेगा। राजा हर हफ्ते सात कुंवारी कन्याऐ जहरीले जानवर के पास भेजता । वह अपनी लंबी जीभ बाहर निकालता और एक ही झपेटे में उन्हे अंदर समेट लेता। सब व्यक्ति दृश्य देख देख कर रोते थंे। एक दिन एशी पटेल बोला ।

‘इस राक्षस से मै लडूंगा इस तरह तो यह सबको थोडा थोडा करके खा जायेगा ’भाइयों ने उसे खूब मारा जब पिता बचाने आये तो एशी पटेल ने कहा घबराइये नहीं पिता जी मै उन सबको मार गिरा सकता था लेकिन मै अपनी शक्ति जहरीले जानवर से लड़ने के लिये बचा रहा हूॅ।

जब कई हफ्ते बीत गये और जहरीले जानवर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता तो राजा ने मान्त्रिक से दुसरा उपाय पूछा । मान्त्रिक ने सिर झुका कर कहा यह जहरीला जानवर तब ही जायेगा जब राजकुमारी जैमलवली को उसके हवाले किया जाये। सुनकर राजा का चेहरा पीला पड़ गया और दिल दुःख से भर गया फिर भी बोला मै यह कार्य करूंगा। लेकिन राजा ने जैमलवली को दानव के हवाले करने के लिये तीन हफ्ते का समय मांगा।

राजा ने पूरे शहर में मुनादी करवा दी कि जो कोई भी जहरीले जानवर को मारेगा उसकी राजकुमारी से शादी करा दी जायेगी तथा राज्य का उत्तराधिकारी बना दिया जायेगा। उसे जादुई तलवार और जादुई खंजर दी जायेगी अगर यह उपाय भी कारगर न हुआ तो जैमलवली को दानव के हवाले े कर दिया जायेगा। अगर तब भी रााक्षस नहीं गया तो मांत्रिक को भी जहरीले दानच के सुपुर्द कर दिय जायेगा।

रानी सुनकर बहुत प्रसन्न हुई क्योकि वह जैमलवली की सौतेली मॉ थी। छत्तीस शक्तिशाली विजेता पधारे लेकिन बारह जानवर की शक्ल देखते ही बीमार पड़ गये। बारह भाग गये। बारह  राजा के मेहमान बने । यद्यपि राजा ने तरह तरह के पकवान बनवाने नाच गाने का प्रोग्राम रखा लेकिन उनके चेहरे पर मुर्दनी छायी हुई थी जब सब योद्धा सोने चले गये तो राजा उन्हे देख हताश हुआ। उसने जादुई खंजर तलवार बाहर निकाली और बोला अपनी पु़त्री का बलिदान वे अपने हांथों से करेगा। उसने सुबह नाव तैयार करायी। क्षण भर मे यह खबर पूरे लेगार्थ में फैल गई और बच्चा बच्चा राजकुमारी का बलिदान देखने के लिये बलिस्थल पर पहुंचने लगा।

एशी पटेल ने रात को सोते में पिता को मॉं से कहते सुना कि उसकी मॉ टीगांेग नामक घोडे के पीछे पीछे चले। टीगोंग बहुत तेज दौडने वाला घोडा था लेकिन उसे चलाना केवल एशी पटेल के पिता ही जानते थे। एशी पटेल की मॉ ने पूछा आखिर उस घोडे को तुम चलाते कैसे हो।

पिता ने कहा, किसी को कहना मत मै बता रहा हूॅ जो भी इसका राज जान जायेगा वह घोडा ले उडा तो कोई भी उसकेा पकड़ नहीं पायेगा। बांयी तरफ कान पर एक ताली का मतलब है खडा हो जाये। दो दायें कंधे पर खूब तेज और तीखी पाइप की आवाज मतलब पूरी तेजी से दौडे।

जब पिता सोया हुआ था एशी पटेल ने पिता के सिरहाने से रखा पाइप चुरा लिया और टीगांेग की पीठ पर चढ़ गया। टीगोंग ने जैसे ही महसूस किया कि उसक मालिक उसकी पीठ पर नहीं वह हिनहिना उठा। बूढा जागा उसने अपने पुत्रों को जगाया वो अस्तबल की ओर भागे। बूढा जैसे ही चिल्लाया उसकी आवाज हे हे हो टीगोंग हो सुनकर स्थिर खडा़ हो गया लेकिन एशी पटेल ने पाइप बजा दिया और टीगोंग पूरी तेजी से भाग खडा़ हुआ। और बूढा और उसके बेटे निराश वापस लौट गये।

प्रातः होते ही एशी पटेल समुद्र के किनारे पहुंच गया वहां उसने देखा कि राजा की नाव किनारे खडी है राजा के अंगरक्षक वगैरह नाव में बैठे है। एशी पटेल ने इधर उधर देखा उसे सामने एक झोंपडी नजर आई चुपचाप वहां गया चूल्हें में से एक हांडी में आग लगाकर बाहर चुल्हा बनाने का सा बहाना करने लगा। मिटटी खोदने लगा खोदते खोदतेे चिल्लाया सोना सोना जैस उसे मिट्टी खोदने मिला हो नाव में से लोग उतरकर देखने लगे। एशी पटेल आग की हांडी लेकर जल्दी से नाव खोलकर उसमे चढ़ गया और भयानक समुद्री दानव के रहने के स्थान के लिये चला। अजगर कई मील के दायरे मे पसरा पडा था उसकी जीभ भी मील भर लम्बी थी एक झपट में अनेको बस्तुओं को लपेटकर ले सकती थी उसके छुरे जैसे नुकीले दांत थे। एशी पटेल सीधे उसके मुंह की तरफ नाव खेता रहा उसने नाव का मस्तूल ऊॅचा कर दिया था और पतवार नीची । अजगर ने जम्हाई ली और सारा पानी बहाव के साथ अजगर के मुॅह में चला गया जिसमें एशी पटेल की नाव भी चली गई लेकिन उसका मस्तूल अजगर के तलवे में अटक गया और पतवार ने नीचे जबडे पर पकड कर ली एशी पटेल हांडी लेकर अंदर पेट में चलता चला गया यहां तक कि उसका जिगर आ गया। जल्दी जल्दी जिगर मे गडढा खोदकर उसने आग की हांडी रखदी और वापस नाव में चढ गया। अजगर के पेट का तेल जलने लगा और वह अंदर से काफी जल गया। उसकी जवान दर्द से ऐंठने लगी। धीर धीरे जीभ मंुह से बाहर आ गई और लंबी पसर गई वह सख्त होगई वह समुद्री टापू सी बन गई । आजकल यह वही टापू है जो डेनमार्क को स्वीडन और नार्वे से अलग करा है। दानव ने अपना सिर दर्द से इधर उधर पटका तो दांत निकल कर इधर उधर गिर गये जो बाद में आर्कन शैट लैंड और फराओ द्वीप बने । खुद अजगर ने कुंडली मारली वह आइस लौंड बन गया वह  अंदर  से अब भी जल रहा है और ज्वालामुखी के रूप मंे फटता रहता है।

राजा ने एशी पटेल को आशीर्वाद दिया और अपनी पुत्री की शादी कर दी। टीगांग घोडे पर सवार राजकुमारी को लेकर ऐशी पटेल वापस चला वह कुछ ही दूर गया था कि रानी के सवार आते दिखे उन्होने एशी पटेल को जान से मारने की कोशिश की मांत्रिक भी साथ था क्योकि सारा राज्य एशी पटेल का हो जाने वाला था इससे रानी घबरा गई लेकिन जादुई तलवार और खंजर उडे़ और रानी और मांत्रिक के पेटों मे घुस गये। खून का दरिया सा बह गया।

एशी पटेल और राजकुमारी राजा रानी बन गये। राजा ने सन्यास ले लिया और समय समय पर उन्हे सलाहे देेने लगा।