ताज कंुवरि
दिल्ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन एबक का शासन था। शहर कानपुर के पास किसोरा नामक एक छोटा सा हिन्दू राज्य था। उसके राजा थे सज्जन सिंह, क्षत्रिय राजपूत ,जैसा नाम था वैसा ही चरित्र था। राजा सज्जन सिंह धर्म प्रिय और प्रजा की देखभाल करने वाले सज्जन राजा थे। जनता उन्हें बहुत प्यार करती थी। उनके दो बालक थे पुत्री ताजकुंवरि और पुत्र लक्ष्मण सिंह। ताज कुंवरि और लक्ष्मण सिंह को राजा सज्जन सिंह ने साथ साथ शिक्षा दिलवानी प्रारम्भ की। अध्ययन के साथ-साथ उन्हें अस्त्र-शस्त्र चलाना घुड़सवारी आदि करने की शिक्षा वो स्वयं ही दिया करते थे।
एक दिन दोनों भाई बहन जंगल की तरफ शिकार करने निकले। लक्ष्मण सिंह बोला ‘‘ जीजी आगे घना जंगल लग रहा है। डर तो नहीं लग रहा है।’’
‘ डर मुझे डर क्यों लगेगा ?’
‘ नहीं लड़कियॉं जल्दी घबरा जाती हैं इसलिये कह रहा था।’ लक्ष्मण सिंह बोला।’
‘ अरे ! लड़कियाँ भी बहादुर ही होती हैं। वह कमजोर नही होतीं तुम क्या समझते हो मैं लड़की हूँ इसलिये तुम से कमजोर हूँ। नही यह भूलकर भी मत सोचना।’ ताज कंुवरि ने अपना घोड़ा आगे बढ़ाते कहा।
‘नही‘, जीजी किसी से भी पूछ लो यही उत्तर मिलेगा ंिक स्त्री पुरूष से अधिक वीर नही हो सकती क्योंकि स्त्री कमजोर होती है।’ लक्ष्मणसिंह ने हंसते हुए कहा ।
‘ नहीं, मैं नही मानती इस बात को’ ताजकुंवरि ने दृढ़ता से कहा,‘ यह ठीक है कि महिलाऐं शरीर से पुरूष के मुकाबले कम शक्तिशाली होती हैं परन्तु अगर मन से हम कमजोर नही होंगे तो हम वीरता में कम नही होते हैं। मैं तुमसे अधिक वीर बहादुर हूँ।’ लक्ष्मण सिंह के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई और उपेक्षा से कहा,‘ कहने से ही कोई वीर नही हो जाता अवसर आने दो पता चला जायेगा मैं अधिक वीर या तुम। ’
‘हाँ अवसर आने दो ’ ताजकुंवरि ने कहा,‘ सिद्ध हो जायेगा मैं वीर याा तुम अधिक वीर।’ पर दोनों भाई बहन को ज्ञात नही था कि जिस अवसर को आने के लिये वो कह रहे हैं वह अवसर सामने ही है। दोनों बालक बात करते चले जा रहे थे। वहीं पास में ही दस बारह मुगल एक झाड़ी में बैठे थे। आपस में कुछ परामर्श कर रहे थे दो बालकों को अकेले जाते देखा तो उन्होने लाठियों उठाई और हो हो कर उनके ऊपर आक्रमण कर दिया।
दोनों बालकों ने अपने ऊपर आक्रमण होते देखा तो बिजली की तेजी से म्यान से तलवारें निकाली और मुगल पठानों से युद्ध करने लगे। कुछ ही क्षण में लक्ष्मण सिंह ने बिजली की चमक सी तलवार चलाकर पाँच पठानों को मार गिराया तब तक ताजकंुवरि ने भी तीन पठान मार दिये थे। युद्ध करते हुए लक्ष्मण सिंह ताजकुंवरि को देख कर हँसा और तलवार चलाते बोला,‘ देखा जीजी मैंने कहा था न कि पुरुष अधिक वीर होते हैं स्त्री पुरुष से अधिक बलवान नहीं हो सकती। ’
ताजकुंवरि ने झुककर एक मुगल की गरदन पर वार किया । भाई की ओर देखा उसकी बात सुनी उसकी तलवार और तेजी से चलने लगी । बचे हुए चार पाँच मुगल उन पर वार कर रहे थे देखते देखते ताजकुंवरि ने दो पठान और मार गिराये बाकी बचे दो तीन पठान भाग निकले।
दस पठानों के शव पड़े थे। ताज कुंवरि ने कहा,‘ अब क्या कहते हो भाई अगर स्त्री अधिक वीर नही होती तो कम से कम बराबर तो होती ही है।’ दोनों भाई बहन हंस पड़े। बचे हुए पठान कुतुबुद्धीन के दरबार में पहुँचे वहाँ उन्होंने दोनों बालकों के शौर्य की गाथा सुनाई । कुतुबुद्धीन एबक से ताजकुंवरि की वीरता के साथ साथ उसकी सुन्दरता के भी विषय मैं बताया कि ऐसा फूल तो कहंीं दूर दूर तक नहीं है। वह तो आपके हरम में ही खिलना चाहिये। ऐसा हूर सा सौन्दर्य तो आपके हरम में है ही नहीं । क्या ही
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अच्छा होगा आप सज्जन सिंह से छीन कर ले आयें इससे आपके महल की रौनक तो बढ़ेगी ही मुगलों की मौत का बदला भी चुकेगा।’
ताजकंुवरि की वीरता और सौन्दर्य के विषय में सुनकर एबक बेचैन हो उठा। वह ताजकंुवरि को पाने के लिये उत्सुक था इसलिये सेना को कूच करने का आदेश दे दिया । तुरन्त किसारा राज्य को मुगल पठानों द्वारा घेर लिया गया। साथ ही सज्जन सिंह के पास पैगाम भिजवाया अगर अपनी खैर चाहते हो ताजकुंवरि को बादशाह की खिदमत में पेश कर दो।
कुतुबुद्धीन का फरमान सुनकर राजपूतों की बाहें फड़कने लगीं झन झनाती तलवारें उनकी म्यान से निकल आईं और वे बादशाह की सेना पर टूट पड़ीं। लक्ष्मण सिंह और ताजकुंवरि किले की छत के कंगूरे से अपने वीर बहादुरों को लड़ते देख रहे थे। पर बादशाह की विशाल सेना के आगे उनके मुठ्ठी भर राजपूत एक एक कर गिरने लगे और सज्जन सिंह का पक्ष कमजोर होने लगा।
दोनों बालक अपने पक्ष को कमजोर हेाते देख कर बेचैन हो उठे । ताज ने लक्ष्मण सिंह से कहा,‘ भाई क्या देख रहे हो ? अब खड़े खड़े देखते रहने का समय नही रहा। चलो रण क्षेत्र में हम दोनों चलते हैं । अब ही तो जो कुछ सीखा है काम में आयेगा।’ यह कहते वह अपना वेश बदलने अपने कक्ष की ओर बढ़ गई । लक्ष्मण सिंह भी अपने वस्त्र बदलकर तुरन्त आ गया और दोनों भाई बहन रण क्षेत्र में पहुँच गये और एक एक कर शत्रुओं को उनकी तलवारें काटने लगीं। न जाने कितने पठान उन दोनों भाई बहनों द्वारा मौत की नींद सुला दिये गये गिनती नही थी।
कुतुबुद्धीन दूरबीन से युद्ध के दृश्य देख रहा था। ताजकुंवरि को देख कर बोला,‘ हूर बहिश्त की हूर बला की खूबसूरत हैं सचमुच यह मेरे हरम के लायक ही है।’ फिर सिपाहियों से बोला ,‘जो भी इस हूर को मेरे पास जिंदा पकड़कर लायेगा मुँह माँगा इनाम पायेगा। ’
इनाम की सुनकर एक जुट होकर मुगल सज्जन सिंह की सेना पर टूट पड़े। सज्जन सिंह मारे गये और मुगल ताज को पकड़ने के लिये बढ़े। लक्ष्मण और ताज बिजली की गति से तलवार चला रहा था। उसके युद्ध कौशल को देखकर सब दंग रह गये ,किन्तु कब तक वे दोनों बालक और मुठ्ठी भर राजपूत मुगलों के विशाल दल को रोक सकते थे। मुगल ताज के चारों ओर घेराबन्दी करने लगे। ताज ने देखा वह घिरने लगी है तो उसने लक्ष्मण सिंह की ओर देखा और कहा, ‘भाई अपनी बहिन की रक्षा करो।’
लक्ष्मण ंिसह ने कहा ,‘अब रक्षा की संभावना कहाँ रह गई है जीजी ’। कहते लक्ष्मण सिंह का गला भर आया। ‘छिः तुम वीर राजपूत हो राजपूत होकर रो रहे हो। मेरे शरीर की नही मेरे धर्म की रक्षा करो यदि यवनों ने मेरे शरीर को अपने नापाक हाथों से छू भी लिया तो मेरा धर्म भ्रष्ट हो जायेगा।’
लक्ष्मण सिंह समझ गया और दूसरे ही क्षण लक्ष्मण सिंह ने तलवार उठाई और बहिन का सिर धड़ से अलग हो गया। बहिन को तलवार के घाट उतारकर लक्ष्मण सिंह भी अधिक देर तक युद्ध क्षेत्र में नहीं रहा और वीर गति को प्राप्त हो गया।
कुतुबुद्धीन एबक ने अपना झंडा किले पर फहरा दिया और सिपाहियों को सम्बोधित करते हुए बोला,‘ मेरे बहादुर सिपाहियो हमने इस लड़ाई में फतह हासिल की है। इसके लिये अल्लाहताला का शुक्र है। लेकिन राजपूतों के ये फौलादी बच्चे किस मिट्टी से बने हैं यह पता नही चल सका। जीत कर भी अन्दर से हम अपने को हारा महसूस कर रहे हैं।’
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