एक और सिंड्रैला
दो बहनें थीं। बड़ी बहन बहुत सुंदर थी उसका नाम सुरुपा था। छोटी बहन के चेहरे पर चेचक के दाग थे उसका नाम कुरुपा था। कुरुपा सौतेली बहन थी और कर्कशा झगड़ालू थी। सुरुपा की असली माँ की मृत्यु उसके बचपन में ही हो गई थीं उसकी माँ मृत्यु के बाद गाय के रूप में पैदा हुई और उनके बगीचे में ही रहने लगी। सुरुपा गाय की सेवा करती लेकिन सौतेली माँ को गाय फूटी आँख नहीं सुहाती थी।एक दिन सौतेली माँ कुरुपा को साथ लेकर नाटक देखने गयी। सुरुपा ने साथ जाना चाहा तो सौतेली माँ बोली,‘ मेरे कमरे में सन पड़ा है उसे सुलझा कर सीधा करलो तो कल तुम्हें नाटक दिखाने ले चलूँगी।’
सुरुपा सन के गट्ठर के सामने बैठ गई और उसे सुलझाने लगी। घंटों सुलझाने के बाद भी वह केवल आधा सन ही सुलझा पाई। रोती हुई वह गट्ठर गाय के पास ले आई। गाय ने सारा गट्ठर चबा लिया और फिर वापस निकाला तो बिलकुल सीधा सुलझा हुआ था। सुरुपा ने खुश होकर सब लच्छियाँ सौतेली माँ के लौटने पर उसके सामने रख दीं और बोली, ‘अब तो मुझे कल नाटक देखने ले चलेंगी?’
दूसरे दिन सौतेली माँ ने फिर उसे ले जाने से मना कर दिया और कहा,‘ नहीं पहले सेम के बीज और फूला अलग-अलग छाँट लो फिर कल ले चलूँगी।’बेचारी लड़की की छाँटते-छाँटते आँखे दुःखने लगी तो वह गाय के पास आईं तो वह बोली,‘ बेटी जा उन्हंें पंखे की हवा करके अलग कर।’ जब सुरुपा ने पंखा किया तो फूला उड़-उड़ कर एक तरफ एकत्रित हो गये। सौतेली माँ सब काम हुआ देख चकित रह गईं कि आखिर सुरुपा ने यह काम किया कैसे?
‘तुमने किसकी सहायता ली?’ कड़ककर जब सौतेली माँ ने पूछा तो वह घबरा गई और उसने सच-सच बता दिया। सौतेली माँ को बहुत क्रोध आया उसने गाय को मारकर पका दिया। सुरुपा गाय को इतना प्यार करती थी कि वह उसका माँस खा ही नहीं पाई। सुरुपा ने गाय की हड्डियाँ एक बर्तन में रख दी और उसे अपने कमरे में छिपा कर रख दिया।
सौतेली माँ उसके बाद भी कई बार नाटक देखने गई लेकिन सुरुपा को साथ नहीं ले गई। ऐसे ही एक दिन जब सुरुपा घर में अकेली थी रोने लगी और खिसियाकर घर के सभी बर्तन तोड़-फोड़ दिये यहाँ तक कि हड्डी वाला बर्तन भी। जैसे ही वह बर्तन टूटा एक जोर की धमाके की आवाज हुई और एक सफेद घोड़ी एक जोड़ी नये जूते और सुंदर वस्त्र प्रगट हुए। चकित सुरुपा ने उन्हें पहना और घोड़े पर बैठ कर बाहर निकली।कुछ दूर चलने पर उसे पैर की एक जूती खाई में गिर गई। उसने उतर कर जूती उठानी चाही पर वह न तो जूती उठा पा रही थी और न ही उसे वहाँ छोड़ना चाह रही थी।वह परेशान खड़ी थी कि एक मछुआरा इधर से गुजरा‘भाई मछुआरे! कृपाकर मेरी जूती खाई में से उठा दो ’सुरुपा ने प्रार्थना की।
‘जरूर उठा दूँगा, लेकिन मुझसे शादी करनी पड़ेगी।’
‘तुमसे शादी कौन करेगा?’ सुरुपा ने कहा, ‘मछुआरों में से हर समय दुर्गन्ध आती रहती है।
मछुआरा आगे बढ़ गया। कुछ ही देर में एक चावल का व्यापारी उधर से गुजरा।
‘चावल के व्यापारी भाई ,क्या मेरी जूती उठा दोगे?’ सुरुपा ने उससे भी पूछा
‘जरूर उठा दूँगा,’ व्यापारी बोला, ‘लेकिन मुझसे शादी करनी पड़ेगी?
‘एक चावल के व्यापारी से शादी! कभी नहीं ऐसे लोग हर समय धूल से भरे रहते हैं।’ व्यापारी चला गया
कुछ ही देर में एक तेली उधर से गुजरा उससे भी सुरुपा ने जूती उठाने की प्रार्थना की। तेली ने कहा,‘ लेकिन जूती तभी उठाऊँगा तुम मुझसे शादी करोगी?’‘ तुमसे शादी!’ सुरुपा ने आह भरी, ‘तेली तो हर समय चिकनाये रहते हैं।’
कुछ ही देर बाद एक राजकुमार उधर से निकला उससे भी सुरुपा ने जूती उठाने की प्रार्थना की। राजकुमार ने मुड़कर सुरुपा को देखा फिर कहा, ‘लेकिन मुझसे शादी करोगी?’
राजकुमार बहुत सुंदर था। सुरुपा उससे शादी करने के लिये तैयार हो गई। राजकुमार ने उसकी जूती उठा दी। सुरुपा को घर ले गया और अपनी पत्नी बना लिया। तीन दिन बाद सुरुपा माँ-बाप का आशीर्वाद लेने माँ के घर आयी। उसकी माँ और सौतेली बहन का व्यवहार एकदम बदला हुआ था उससे बहुत प्रेम और उत्साह से मिली। जिद करके सुरुपा को कुछ दिन के लिये अपने पास रोक लिया।
दूसरे दिन सुबह कुरुपा उसे कुएँ के पास ले गई और बोली, ‘बहन कुएँ के पानी में झाँक कर देखो। हम दोनों में कौन सुंदर है।’ बिना किसी प्रकार के संदेह के सुरुपा ने जैसे ही कुएँ में झांका कुरुपा ने उसे धक्का देकर कुएँ में गिरा दिया। सुरुपा
कुएँ में गिरते ही बेहोश हो गई और धीरे-धीरे डूब गई।
दस दिन हो गये। पत्नी लौट कर नहीं आई तो राजकुमार को चिंता हुई उसने एक दूत भेजा। सौतेली माँ ने दूत के द्वारा कहलवाया कि उसकी पत्नी को चेचक निकल आई है कुछ दिन तक घर नहीं आ सकेगी। राजकुमार को पत्नी की बहुत चिन्ता हुई और प्रतिदिन अंडे आदि खाने का सामान भिजवाने लगा जो सब कुरुपा के पेट में जाते।
दो महिने हो गये। विद्वान प्रतिदिन दूत भेजता चिढ़कर सौतेली माँ ने राजकुमार को धोखा देने का निश्चय किया और सुरुपा के स्थान पर उसने कुरुपा को राजकुमार के पास भेज दिया। राजकुमार पत्नी का इतना बदसूरत चेहरा देखकर दहल गया, ‘नहीं! तुम मेरी पत्नी नहीं हो सकती। मेरी पत्नी इतनी बदसूरत कभी नहीं हो सकती।’ कुरुपा ने कहा ,‘अगर मेैं सुरुपा नहीं हूँ तो और कौन हूँ। यह तो तुम्हें मालुम ही था कि मैं बहुत बीमार पड़ गई थी। अब अगर तुम पत्नी बनाकर नहीं रखना चाहते तो मैं मर जाऊँगी! अपने आपको खत्म कर लूँगी।’ यह कह कर वह जोर-जोर से रोने लगी। सहृदय राजकुमार एकदम पिघल गया मन में उसके संदेह था फिर भी उसने कुरुपा को शांत किया।सुरुपा बुलबुल में बदल गई थी और जब भी राजकुमार को देखती गाने लगती,‘मैं सुुरुपा बन गई बुलबुल,धोखे से बहना मारी।
बहन कुरुपा बन गयी दुल्हन,धोखा देकर मारीû
राजकुमार ने जब गाना सुना तो उसे शक हुआ। वह बुलबुल से बोला,‘ तुम यह क्या गाना गा रही हो?े अगर तुम वास्तव में मेरी पत्नी हो तो मैं तुम्हारे लिये सोने का पिंजरा बनवाऊँगा और उसमें रखकर खीर खिलाऊँगा। तुम तीन बार मुझे पुकारो।’ सुरुपा ने तीन बार बुलाया तो राजकुमार सोने का पिंजरा लेने चला गया।
कुरुपा ने बुलबुल को पकड़ा और मारकर बगीचे में फेंक दिया। तुरंत सुरुपा एक बॉंस में बदल गईं। कुरुपा ने उसे खाया तो उसके मुँह में घाव हो गये लेकिन राजकुमार ने खाया तो बहुत मीठा पाया। बाकी बचे बाँस की कुरुपा ने चारपाई बनवा दी। जैसे ही वह उस पर लेटी उसे हजारों सुइयाँ चुभने लगी जब विद्वान उस पर लेटा उसे बहुत आराम मिला। कुरुपा ने चारपाई बाहर फंेक दी।
उस राजकुमार से कुछ दूर पर एक बुढ़िया रहती थी । वह पर्स बेचती थी उसने चारपाई बाहर पड़ी देखी तो सोचा इस घर में कोई मरा तो है नहीं फिर चारपाई क्यों पड़ी हैे। वह चारपाई अपने घर उठा कर ले गई। उस रात वह उस पर आराम से सोई।दूसरे दिन बुढ़िया ने देखा उसका खाना बना रखा है। बुढ़िया ने खाना खा तो लिया पर उसे डर लगा कि आखिर उसका खाना बना किसने दिया। कई दिन तक जब वह पर्स बेचकर लौटती उसे खाना तैयार मिलता। एक दिन वह दोपहर में जल्दी घर वापस आ गई उसने देखा एक छाया चावल धो रही है। उसने छाया को कसकर कमर से पकड़ लिया और बोली,‘ तुम कौन हो? और मेरे लिये खाना क्यों पका देती हो?’
छाया ने कहा, ‘मैं तुम्हें अपनी कहानी बता दूँगी। मैं तुम्हारे पड़ोसी राजकुमार की पत्नी हूँ। मेरा नाम सुरुपा हैं। मेरी बहन ने मुझे कुँए में फेंक दिया मैं डूब गई लेकिन मेरी आत्मा अभी यही हैं। तुम चावल लकड़ी से मेरा शरीर बना दो तो मैं पहला रूप प्राप्त कर लूँगी।’ जैसा-जैसा सुरुपा ने कहा बुढ़िया ने कर दिया कुछ ही देर में सुरुपा सामने थी। बुढ़िया इतनी सुंदर लड़की देखकर बहुत खुश हुई। उसने शुरू से अंत तक उसकी कहानी सुनी। सुरुपा ने कहा, ‘माई मैं एक पर्स देती हूँ तुम उसे राजकुमार के महल के सामने जाकर बेचना और केवल उसी को बेचना। एक सुंदर सा कढ़ा पर्स उसने दिया।
दूसरे दिन बुढ़िया राजकुमार के घर के सामने खड़ी होकर चिल्लाने लगी ,‘पर्स ले लो...पर्स ले लो।’ बार-बार उसके आवाज लगाने से परेशान होकर राजकुमार बाहर आया और उसने पर्स दिखाने के लिये कहा बुढ़िया ने जब वह पर्स दिखाया तो राजकुमार चौंक कर बोला ,‘तुम्हें यह पर्स कहाँ से मिला, यह तो मैंने अपनी पत्नी को दिया था।’ तब बुढ़िया ने राजकुमार को पूरी कहानी सुनाई। सुनकर राजकुमार बहुत खुश हुआ कि उसकी पत्नी जीवित है। वह अपनी पत्नी को बुढ़िया के घर से वापस लाया।जैसे ही कुरुपा ने सुरुपा को देखा वह चीखने लगी कि कोई भूतनी, चुडै़ल सुरुपा का वेश बना कर आ गई है असली सुरुपा वह खुद है।
‘अगर सुरुपा भूतनी है तो मैं जाँच करता हूँ ’कहकर राजकुमार ने एक कढ़ाहे में तेल उबलवाया । कुरुपा ने सोचा सुरुपा जलते तेल में जल जायेगी। लेकिन सुरुपा के लिये तेल जैसे शीतल हो गया और कुरुपा जब उसमें बैठी तो खत्म हो गई । राजकुमार ने कुरुपा के शरीर को डिब्बे में बंद कर उसकी माँ के पास भिजवा दिया। सौतेली माँ बड़ा सा डिब्बा आया देख बहुत प्रसन्न हुई कि दामाद ने उसके लिये बड़ा सा उपहार भेजा है लेकिन जब खोला तो देखा उसमें कुरुपा का जला शरीर है वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी।
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