अंगूठादास
एक गरीब औरत एक दिन धूप में बड़ियाँ सुखा रही थी जैसे ही उसने बड़ी धूप में डाली सूर्य बादलों में छिप गया। उसने बड़ियों की डालिया समेट ली यह सोचकर कि बरसात होगी परन्तु जैसे ही बड़ियाँ समेटी धूप चमचमा उठी। यह इनती बार हुआ कि औरत को बहुत गुस्सा आया और सूर्य को कोसने लगी। औरत गर्भवती थी सूर्य ने गाली सुनकर औरत को श्राप दिया कि उसके लड़का होगा परन्तु केवल अंगूठे भर का। ठी समय पर एक लड़का हुआ और वह केवल अंगूठे भर का था इसलिये उसे नाम दिया अंगूठादास।
अंगूठादास का सब मजाक उड़ाते तो वह बहुत दुखी होता। जब वह सोलहसाल का हुआ तो उसने अपनी माँ से अपने अंगूठे भर का रह जाने का कारण पूछा जब उसे ज्ञात हुआ कि इसका कारण सूर्य है तो उसे बहुत गुस्सा आया वह अपनी माँ से बोला, माँ सुबह मेरे को चार रोटी दे देना मै। सूरज से लड़ने जाऊँगा।
सुबह वह रोटी लेकर पूरब दिशा की ओर सूर्य की खोज में चल दिया। गर्मियों के दिन थे खेत मैदान झुलस रहे थे और खाली पड़े थे। चलते चलते उन्हें एक झरने के किनारे खाली नाव मिली झरने का पानी सूख गया था और नाव रेत पर पीड़ी धूप में सूख रही थी।
अंगूठादास कहाँ जा रहे हो? नाव ने पूछा, मैं अपने दुश्मन सूर्य से लड़ने जा रहा हूँ अंगूठादास न जबाब दिया।
सुनते ही नाव बोली, अरे तब तो मुझे भी साथ ले लो, नाव सूरज की धूप से चिढ़ी बैठी ही थी।
ठीक हे अंगूठादास नेे कहा, लो यह एक रोटी खाओ और मेरे पेट में बैठ जाओ नाव ने वैसा ही किया।
अंगूठादास ने अपनी यात्रा जारी रखी आगे जल कर बबूल कांटा मिला उसने पूछा अंगूठादास कहाँ जा रहे हो।
मैं अपने दुश्मन सूरज से लड़ने जा रहा हूँ अरे तब तो मुझे भी साथ ले लो कांटा धूप में बिलकुल सुख गया था इसलिये चिढ़ गया था ठीक है अंगूठादास बोला रोटी खाओ और मेरे पेट में बैठ जाओ।
इसी प्रकार आगे चलकर काई और सड़े अंडे से मिला दोनो भी गर्मी से परेशान थे क्योंकि कई सब खतम हो गई थी वह जरा भी काई तो पेड़ की तली में रह गई थी और अंडे भी सब गये थे दोनों ही उसके साथ चल दिये।
इस प्रकार चारों सूरज के दुश्मनों को अपने पेट में बिठाये बढ़ता बढ़ता पूर्व की पहाड़ियों में पहुँचा जहाँ से उसे आशा थी कि दूसरे दिन सूर्य निकलेगउ। रात में आराम करने के लिये स्थान ढूँढ़ा क्योकि सब वीरान जंगल था। थोड़ी दूर पर उसे एक महान दिखाई दिया। अंगूठादास आश्चर्यचकित रह गया क्योंकि वह जानता थी कि इतनी सुनसान और अकेली जगह में सिवाय देवता या राक्षस के और कोई नही रह सकता। मकान के चारों और घूम घूम कर उसने देखा कि मकान खाली है लेकिन इसका मालिक रात में सोने तो अवश्य आयेगा अंगूठादास ने सोचा और रात आराम से काटने के लिेय मुझे उससे लड़ना पड़ेगा।
उसी समय कांटा, काई और सड़ा अंडा उसे पेट से बाहर आये मालिक राक्षस से हमे लड़ने दो आप अपनी शक्ति सुबह के लिये बचा कर रखो अंगूठादास राजी हो गया और एक झाड़ी के पीछे छुप इंतजार करने लगा।
तीनों घर में घुसे सबसे पहले उन्होंने दियासलाई छुपा दी। कांटा बिस्तर में जा छुपा अंडा चूल्हे में और काई पानी के घड़े के पास। कुछ ही देर बाद राक्षस आया और बिस्तर पर लेट गया। उसके लेटते ही कांटे ने चारों ओर से चुभना शुरु कर दिया। राक्षस ने लैंप जलाने के लिये दियासलाई ढूँढ़नी चाही तो कहीं नहीं मिली वह रोशनी के लिये रसोई में गया जैस ही आग के लिये झुका अंडा जोर की आवाज करता फट गया। बहुत सी राख राक्षस की आंख में घुस गई। राक्षस दौड़कर आंख धाने घड़े के पास गया कि काई पर पैर पड़ने से धड़ाम से गिर जाया उसकी गर्दन टूट गई और वहीं मर गया। रातभर अंगूठादास आराम से सोये।
सुबह अपने तीनों साथियों के साथ सूर्य के पास पहुँचे और उसे लड़ने को ललकारा। सूर्य गुस्से से लाल बाहर आया और अपने को खूब तपाने लगा। अंगूठादास झूलसने लगा। अभी वह हार मानने ही वाला था कि एकदम से वारिश आ गई क्योंकि वारिश समझ गई कि कोई सूर्य से लड़ने आया है इसलिये उसकी सहायता के लिये आई और सूर्य के ताप को खत्म कर दिया। अंगूठादास और उसके साथी जोर जोर से हंसने लगे परन्तु जल्दी ही उनकी हंसी गायब हो गई क्यांेकि सूर्य की ठंडा करने के चक्कर में बरसात इतने जोर से हुई थी कि चारों ओर बाढ़ आ गई। उसी समय नाव उसके पेट में से बाहर आई और चारों उसमें बैठ कर अंगूठादास के गाँव की ओर चल दिये। वहाँ गाँव वालोकं ने अंगूठादास की जीत पर खूब हर्ष मनाया।
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