क बार गोनू झा के पिता जी ने कहा ,’’तुम सबको बेवकूफ बनाते हो मुझे भी बनाओ तो जानूॅ। ’’ उस समय तो बात खत्म हो गई । कुछ दिन बाद गोनू झा अपने ससुराल पहुँचे । रोनी सूरत बनाकर बताया कि पिताजी का स्वर्गवास हो गया है। श्वसुर ने धीरज धराया और श्राद्ध का दिन पूछा । वहाँ से लौटकर पिता के सामने रोनी सूरत बनाकर खड़े हो गये पिता के पूछने पर कहा कि श्वसुर का स्वर्गवास हो गया है । श्राद्ध का दिन समय वही बताया जो श्वसुर को बताया । निश्चित दिन दोनों अपने घर से निकले,रास्ते में दोनों ने एक दूसरे को देखा तो भूत भूत कर भाग लिये । एक राहगीर ने कारण पूछा दोनों ने एक ही कारण बताया कि दस दिन पहले दूसरे की मृत्यु हो गई थी वह उसके श्राद्ध में जा रहा था । राहगीर समझ गया उसने पूछा ‘कहीं गोनू झा ने तो नहीं कहा था।’ उन्होंने उससे अपना संबंध बताया तो उसने कहा यह सब उसी का कमाल है। पिता ने फिर उन्हें चुनौती नहीं दी।
तेनाली राम विजयनगर के राजा कृष्ण देवराज के राज्य बिदूषक थे । इनकी बौद्धिकता चतुराई कहीं भी बीरबल से कम नहीं थी। गंभीर से गंभीर विषय को भी मात्र अपने परिहास द्वारा हल कर देना इनका विशिष्ट गुण था। तेनालीराम का जन्म गुन्टूर जिले के नलीपाडू नामक गा्रम के ईश्वर प्रसाद रमैया नामक गरीब ब्राह्मण के यहँा हुआ था तथा इनका नाम रामलिंगम् था जब ये तीन वर्ष के थे तभी इनके पिता का साया इनके सिर से हट गया बाकी का पालन पोषण इनके मामा के यहाँ तेनाली नामक ग्राम में हुआ । बुद्धि चातुर्य के कारण गरीब होते हुए भी गुरू के कृपा भाजन बने और शिक्षा प्राप्त की ।
बादशाह अकबर को भोेजन के प्श्चात् पान देने वाले सेवक से पान में चूना ज्यादा लग गया । बादशाह का गाल जरा छिल गया उन्होंने सेवक को आज्ञा दी,‘ बाजार से आधापाव चूना ले आ ।’ बादशाह की आज्ञानुसार जब वह व्यक्ति यह कहकर चूना ले रहा था कि बादशाह ने मंगाया है तो एक अनजान युवक उसकी बात सुन रहा था उसने कहा ,ऐसा कर तू पाव भर घी पीजा तब महल में जाना ।’उसने ऐसा ही किया। जब बादशाह के आगे उसने चूना पेश किया तो बादशाह ने कहा,‘ अच्दा अब इसे घोल कर पीजा, पान में अधिक चूना लगाने की यही सजा है।’’नोकर इतना चूना खाने से अवश्य मर
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