Thursday, 31 July 2025

teli ka bail

 तेली का बैल

बहुत दिन पहले एक गाँव में एक मेहनती तेली रहता था। उसके पास तेल निकालने के लिये कोई भी बैल नहीं था इसलिये वह खुद ही तेल पिराता था। धीरे धीरे मेहनत कर उसने पैसा बचा लिया कि वह एक बैल खरीद सके। फिर अपना मकान बनवा लिया और एक जोड़ी बैल खरीद लिया और गाँव के धनी मानी व्यक्तियों में माना जाने लगा।

एक दिन उसकी जोड़ी का एक बैल मर गया। तेली को बहुत दुख हुआ। उसने एक नया बैल खरीद कर उस पुराने बैल के साथ बांध दिया। एक रात गाँव का एक व्यक्ति उधर से निकला, उसने दोनों बैलों को बात करते सुना। नया बैल कह रहा था,‘ मित्र तुम इस घर में पहले आये हो, मालिक का व्यवहार कैसा है।’

‘मुझसे क्यों पूछते हो?’ दूसरे ने कहा।

‘क्यांेकि तुम्हारे कंधे पर हल के चिन्ह हैं।’

‘मालिक चाहे अच्छा व्यवहार करे, चाहे बुरा मैं मालिक का कर्जदार हूँ, अभी मुझे मालिक के पांच हजार रुपये देने हैं। उनके मिलते ही मैं चला जाऊँगा।’

‘ तुम इतने रुपये कैसे चुकाओग’े?’

‘अगर पांच हजार रुपये पर मुझे राजा ने हाथी से लड़वाने को तैयार हो जाये तो जीत जाऊँगा मालिक को पांच हजार रुपये मिल जायेंगे और मेरा कर्ज उतर जायेगा। अगर ऐसा नहीं होता हे तो मुझे सारी जिन्दगी उनकी सेवा करनी पड़ेगी। अब अपनी बताओ तुम कितने दिन यहाँ रहोगे?’

‘मैं तो दो साल तक यहाँ काम करुंगा मेरा कर्ज चुक जायेगा।’

आश्चर्यचकित वह व्यक्ति तेली के पास आया और उसे सब बातें बताई। दूसरे दिन सारे गाँव को इस बात की सूचना मिल गई। अब सबने तेली पर दबाब डाला कि बैल को हाथी से लड़वाये। पर तेली बहुत डर रहा था कि राजा कहीं गुस्सा होकर देश निकाला न दे दे। गाँव के मुखिया ने इसकी जिम्मेदारी ली। मुखिया बोला यदि बैल जीत गया तो राजा से पांच हजार रुपये मिल ही जायेगे यदि हार गया तो कह देंगे तेली पागल हो गया है।

तेली और गाँव का एक अन्य व्यक्ति राजा के पास गये और तेली के बैल व हाथी की लड़ाई के लिये चुनौती दी। राजा बैल और हाथी की लड़ाई की सुनकर बहुत खुश हुआ। सारे शहर में मुनादी करा दी गई। निश्चित दिन भारी भीड़ इस अनोखी लड़ाई को देखने एकत्रित हो गई। 

प्रतियोगिता के दिन किसान ने बैल की खूब मालिश की और बढ़िया खाना खिलाया, उसके सींगों पर तेल लगाया। गले में घंटी बांधी और उसे खूब प्यार किया।

सब गाँव वाले और तेली पांच हजार रुपये लेकर राजा के पास पहुँचे। राजा मुस्करा रहा था कि दो मिनट में हाथी बैल को पछाड़ देगा। राजा का हाथी घंटा लटकाये सूंड पर चित्रकारी किये हुए लाया गया। फुंफकारते हुए बैल ने तेजी से दौड़कर हाथी के पेट में सींग घुसा दिये। राजा का हाथी दर्द से चिंघाड़ता भाग गया। तेली को पांच हजार रुपये दिय गये। उसी समय बैल ने तेली के सामने सिर झुकाया और एक तरफ चल दिया।



Tuesday, 29 July 2025

jhakkad Danav

 किसी गाँव में एक बुढ़िया रहती थी। उसका पुत्र बड़ा निकम्मा और आलसी था जबकि बुढ़िया लोगों का धान आदि कूट कर अपना व उसका पेट पालती थी। एक साल गाँव में अकाल पड़ा, बुढ़िया को वह काम भी मिलना बंद हो गया अब घर में फाके होने लगे तो लड़का लोगों के खेतों पर थोड़ी बहुत मजदूरी करने लगा। धीरे धीरे सभी काम काज बंद हो गये गाँव े में सभी परेशान रहने लगे। घर की गाय का दूध पहले तो बिक जाता था अब वह भी नही बिकता था गाय का चारा पानी नहीं मिल रहा था तो उसने दूध भी देना कम कर दिया। दो दिन से बचे दूध को बुढ़िया ने जमाया और मटकी में भरकर लड़के को देते हुए बोली,‘ बेटा जरा काम काज ढंग से कर। यह दही शहर ले जाकर बेच दे। वहीं से कुछ  पैसों का खाना और कुछ पैसों का ठेल लगाने लायक सौदा ले आना यहाँ बेच देंगे।’ यह कह के रस्सी की इंडुरी बनाकर लड़के के सिर पर मटकी टिका दी।

माँ ने खाना लाने के लिये थैला दिया और कहा कि लौटते में जंगल पड़ेगा कंद मूल तोड़ लाना। वही रास्ते में खा लेना। यह कहकर एक चाकू थैले मे डाल दिया। लड़के ने थैला गले में लटकाया और ‘दही लो दही’ की आवाज लगाता चल दिया।

चलते चलते लड़के को जंगल में एक मकान दिखाई दिया। लड़के ने सोचा कुछ देर आराम किया जाय फिर आगे चला जाय। वह उस खाली पड़े मकान में घुसा। चारों ओर देखा तो हैरान रह गया। बड़ी सी हांडी में खाना पक रहा था पर पकाने वाला कोई दिखाई नहीं दिया। उसने ‘कोई है! कोई है!’ की आवाज लगाई। किसी ने जबाब नही दिया तो ऊपर अटारी पर चढ़ कर लेट गया। लेटते ही उसे नींद आ गई।

वह मकान एक राक्षस का था। कुछ ही देर में वह वापस आया। घर में घुसा कि उसे मानुष गंध आई। वह चिल्लाया मानुष गंध! मानुष गध! लड़के की नींद खुली भयानक राक्षस की चारों ओर सूँ सूँ कर सूंघते देख एक बार तो डर गया परंतु हिम्मत नही खोई हांडी में मुँह दे जोर से धरधराती आवाज बनाता हुआ बोला ‘यह कौन मूर्ख है जिसने मेेरी नीद खराब की। उसकी शामत आई है क्या?’

राक्षस को ताज्जुब हुआ कि ऐसा कौन व्यक्ति आ गया जो उससे इस तरह बोल रहा है। अब तक उसने सबको घिघियाते ही देखा था वह अकड़ कर बोला, ‘मैं..मैं..अक्कड़ दानव हूँ।’

‘ तो लगता है तूने मेरा नाम नही सुना कभी , मैं झक्कड़ दानव हूँ। चल भाग यहां से मुझे सोने दे।’

   ‘क्या? ’अक्कड़ दानव को बहुत गुस्सा आया ,‘तू क्या समझता है अपने आपको। मेरे जैसा शक्तिशाली कोई नही है।’ 

‘अच्छा ’हा! हा! हा! कहकर लड़का जोर से हँसा,‘ अगर तू मुझसे बड़ा है शाक्तिशाली है तो मैं अपना बाल फेंकता हूँ अपने बाल से मिला लेना ’कहकर लड़के रस्सी फेंक दी। राक्षस इतना बड़ा बाल देख हैरान रह गया। फिर भी बोला ,‘मैं नहीं मानता’‘ अच्छा तो मैं थूकता हूँ तू भी थूक।’ राक्षस ने जोर से गला खखार कर थूका लेकिन लड़के ने दही उलट दिया। अब तो राक्षस डर गया पर फिर भी हिम्मत नही हारी बोला, ‘अच्छा देखते है जो ज्यादा खायगा वही बड़ा है।’

लड़के ने थैला कमीज के नीचे किया और अटारी पर से उतर आया। अपने सामने एक लड़के केा देख पहले तो जोर से हँसा फिर दो बड़ी बड़ी हंडिया में खाना परोसा। दोनों ने खाना शुरू किया। लड़का सारा खाना थैले में भरता जा रहा था कभी कभी दिखाने को एक दो ग्रास खा लेता। जब उसका थैला भर गया तो बोला अभी बस इतना ही खा सकता हूँ पहले इतना खाना निकाल दूँ तब और खाऊँगा यह कहकर चाकू से थैला चीर दिया। सारा खाना बाहर निकल आया। फिर खाने की तैयारी करने लगा। राक्षस का भी पेट भर गया था उसने सोचा यह तरकीब अच्छी है। उसने चाकू उठा कर पेट चीर लिया। राक्षस तड़प कर वही ढेर हो गया। लड़के ने राक्षस का सब धन बटोरा और वापस घर आ गया और माँ के साथ सुख से रहने लगा।


Monday, 28 July 2025

Rani komal

 रानी कोमल



बहुत दिन पहले की बात है किसी  देश में एक राजा था , उसकी रानी बहुत सुंदर  तथा कोमल थी। रात को   वह फूलों की शैया पर सोया करती थी । एक दिन भूल से  माली फूलों के साथ एक कली भी शैया पर बिछा गया । कली रानी के कोमल शरीर में गड़ गई। उसे बहुत देर तक नींद नहीं आई। वह उठ कर बैठ गई । राजा बोले,‘ रानी जी क्या बात है’ रानी बोली ,‘ महाराज ,यह कली शरीर पर चुभ रही  थी इसलिये नींद नहीं आई। कल इस माली को  दंड देना पड़ेगा’ । कली हटाकर रानी सो गई। दूसरे दिन राजा ने माली को बहुत डांटा और नौकरी से निकाल

 दिया

          दूसरी रात रानी को  स्वप्न आया, उसे लगा कोई कह रहा है‘,‘ रानी  आज एक कली के चुभने की  वजह से तुमने  माली को नौकरी से निकलवा दिया,जब बारह साल तक ईंटें ढ़ोनी पड़ेंगी ,तब क्या करोगी?’

   रानी चौंक कर उठ गई । उसने राजा को  स्वप्न सुनाया । राजा बोले ,‘ रानी जी स्वप्न तो आते रहते हैं, सो जाओ ।’ रानी सो गई।राजा के मंन्त्री के  भी एक कन्या थी । मंन्त्री चाहता था कि राजा से  उसकी कन्या का विवाह  हो जाये पर यह भी जानता था  कि जब तक रानी हैं राजा शादी नहीं करेंगे। 

मंत्री  ने एक दिन नदी में नहाती रानी को  अंदर ही अंदर गोताखोरों से ख्ंिाचवा लिया । सब समझे रानी को  मगर खींच ले गया । उघर  मंत्री ने एक सुंदर से बक्से में बेहोश  रानी को बिठा दिया । ताला लगाकर  ताली उसी मेंलटका दी ।

    बहते बहते बक्सा  राजा की बहन कुंतल के देश में पहुॅंचा । राजा का बहनोई कीर्तिवर्मा नदी के किनारे सेवकों के साथ घूम रहा था । इतना सुंदर बक्सा बहते देख उसने सेवकों से मंगवाया । बक्सा खोला गया तो देखा  उसमें रूपवती स्त्री लेटी है । राजा के बहनोई ने बक्सा वैसे ही बंद कर दिया और महल में भिजवा दिया और सेवकों से कह दिया कि संदूक तब तक न खोलें  जबतक  राजा न आ जायें।

सेवक संदूक महल में रख आये  राजा की बहन को चैन नहीं आया ,ऐसी क्या वस्तु है जो उसके पति उससे छिपा रहे हैं । उसने  चुपके  से  संदूक खोला तो  देखा एक अत्यन्त रूपवती स्त्री लेटी है । रानी कुंतला ने सोचा न हो  राजा इसे मेरी सौत बना कर  लाये हैं । उसने रानी के सारे  आभूषण  उतरवा लिये ,फटी धोती पहना दी और  कोयला शरीर पर पोत दिया । शाम हुई कीर्तिवर्मा महल में आये उन्होंने  रानी कुंतला से कहा ,‘ आओ तुम्हें एक वस्तु  दिखायें ।’

रानी कुंतला अनजान बन गई बोली ,‘ क्या दिखाओगे ’।

राजा  बोले ,‘ आज यह संदूक हमें नदी में बहता मिला । देखो इसके अंदर क्या है?’

राजा ने संदूक खोला तो भिखरिणी सी काली स्त्री को  देखकर चौंक गये । नजाने क्या है ? उन्होंने तो अत्यन्त रूपवती स्त्री  देखी थी । उन्होंने कुतला से कहा ,‘ इसे  अपनी बांदियों में रख लो न जाने कौन है ।’

रानी चुपचाप महल की अन्य बांदियों के साथ रहने खाने लगी बांदियों का काम करने लगी।

राजा कीर्तिवर्मा ने  एक दूसरा विशाल महल बनवाने  की सोची । महल के बहुत से  सेवक  और  बांदियॉं ईंटें गारा ढ़ोने के काम पर लगा  दी गई,उनमें रानी  भी थी। बारह साल तक रानी ने ईंटें ढ़ोईं महल पूर्ण हुआ तो राजा कीर्तिवर्मा ने विशाल भोज का आयोजन किया समीप के  सभी राजा महाराजा सामंत आदि निमंत्रित किये गये । रानी कुंतला ने  भी अपने  भाई के पास दूत भेजा कि  भाई भाभी जरूर आवें । राजा रूपवर्मा भी आये  । रात में रानी कुंतला ने रानी सुमति से कहा कि वह उसके  भाई के पैर दबा आये । रानी सुमति पति को देखते ही पहचान गई।वह पैर दबाती जाती  आंसू उसकी आंखों से गिरते जाते । एक  बूंद राजा के पैरों पर गिर पड़ी । राजा चौंक  गये बोले ,‘बांदी रोती क्यों है ।’

‘ कुछ नहीं महाराज ’ कहकर रानी पैर दबाने लगी ।

 राजा बोले,‘ नहीं रानी अपने  दुःख का कारण बता।’

 रानी बोली,‘ नही महाराज कुछ बीता याद आ गया ।’ 

‘हमें भी सुना ’।

 ‘ महाराज कहा जाता  है स्वप्न सच्चे नहीं होते लेकिन एक रानी का सपना सच हुआ। उसके  बारह  साल पहले ंएक कली शरीर में चुभ गई उसने माली को नौकरी से निकलवा दिया । रानी को  स्वप्न दिखा कि एक कली चुभने से तो  रानी तू इतनी परेशान हुई जब  बारह साल ईंटें  ढोयेगी तो क्या होगा ? उस रानी का सपना सच हुआ ।’

 बादीं की बात सुन कर राजा चौंक गया उसने रानी का घूंघट हटाया रानी को  देख वह बहुत खुश हुआ । राजा ने रानी से उसकी तकलीफों के लिये क्षमा मांगी । अपनी बहन और बहनोई को बुलाया  बहन भाभी को न पहचान पाने के लिये बहुत लज्जित हुई । भाभी से क्षमा मांगी । राजा ध्ूामधाम से रानी को  वापस लाया । मंत्री और उसकी पुत्री को देश निकाला  दे  दिया ।







Friday, 25 July 2025

Androcleege aur singh

 एन्ड्रोक्लीज और सिंह

दो हजार साल पहले ऐन्ड्रोक्लीज नाम का एक गुलाम रोम में रहता था। वह दयालु लड़का था। वह अपने अत्याचारी मालिक से बहुत डरता था। क्योकि मालिक गुलामों की छोटी से छोटी गलती की सजा कोड़ों से पीटकर देता था। ऐन्ड्रोक्लीज अपने मालिक के साथ अफ्रीका की यात्रा पर था उसने स्वतन्त्र होने का निश्चय किया। वह भाग गया। 

ऐन्ड्रोक्लीज घने जंगलों में भाग गया क्योकि वह जानता था वहाँ कोई भी उसका पीछा नही करेगा। उसके शरीर पर हलका सा झोगा था और पैर नंगे थे ।न ही किसी प्रकार का कोई हथियार था। ऐन्ड्रोक्लीज भागता चला गया । भागते भागते अंघेरा हो गया।वह थककर एक गुफा में लेट गया और गहरी नीद सो गया। जब सुबह होने लगी उसकी आँख खुली साथ ही उसे भयानक गुरहिट सुनाई दी जो गुफा में ही गूँज रही थी। मानों भूकम्प आ रहा हो। ऐन्ड्रोक्लीज ने देखा एक विशाल शेर गुफा के मुँह पर बैठा गुर्रा रहा है। 

शेर बिना आगे पीछे बड़े लगातार गुर्राये जा रहा था। ऐन्ड्रोक्लीज इंतजार करने लगा कि कब शेर उस पर हमला करे लेकिन तभी उसने देखा शेर के अगले पंजे से खून बह रहा है। 

‘वह घायल हो गया है शायद वह मुझ पर नही गुर्रा रहा वह दर्द से छटपटा रहा है बेचारा जानवर’ ऐन्ड्रोक्लीज बुदबुदाया। वह धीर धीरे सरक कर शेर के पास यह देखने पहुँचा कि किस बजह से खून बह रहा है। उसने देखा एक बड़ा काँटा उसके पैर में धंसा हुआ है। जिस बजह से उसके खून बह रहा है और दर्द हो रहा था। ऐन्ड्रोक्लीज शेर से बहुत प्यार से जैसे किसी दर्द से छटपटाते बच्चे से बोलते हैं बोलने लगा। 

‘देखो मैं कोशिश करता हूँ तुम्हारी सहायता कर सकूँ। ’उसने कहते हुए उसका घायल पंजा उठा लिया। बहुत सावधानी से उसने काँटा बाहर निकाल दिया। संभवत शेर समझ गया कि ऐन्ड्रोक्लीज उसकी सहायता कर रहा है जब काँटा बाहर निकल गया तो शेर ने अपनी खुरदुरी जीभ से प्यार से ऐन्ड्रोक्लीज का चेहरा चाटा।

ऐन्ड्रोक्लीज और शेर दोस्त बन गये। वे भाई भाई की तरह रहने लगे। शेर खरगोश हिरन मार कर लाता। ऐन्ड्रोक्लीज ने शेर को मारने से पहले मछली पकड़ना सिखाया। ऐन्ड्रोक्लीज झाड़ियो पर से फल तोड़ता खाता, शेर भी फल खाना सीख गया था लेकिन पसंद हिरन का माँस ही करता था। 

एक दिन ऐन्ड्रोक्लीज गुफा के पास अकेला बैठा था। एक रोमन सैनिकों की टुकड़ी वहाँ से गुजरी जो भागें हुए गुलामों की ही खेाज कर रही थी। वह टुकड़ी़ ऐन्ड्रोक्लीज को पकड़ कर ले गई। उन दिनों भगोड़े गुलामों को खूखांर जानवरों के आगे डाल दिया जात था। खूखांर जानवरों और मनुष्यों के लड़ने का खेल उन दिनों का सबसे अधिक प्रिय खेल था। कभी कभी हथियार बंद आदमी भी खूखांर जानवरों से लड़ते थे। जानवरों को ताकतवर बनाये रखने के लिये भगोड़े गुलामों को उनके आगे फेंक दिया जाता था। 

अंत में एक दिन ऐन्ड्रोक्लीज को भी भूखे शेर के सामने फेंके जाने का दिन आ गया। सारे रोमन वासी घेरे के चारों ओर बैठे उत्सुकता से देख रहे थे। ठहाके गूंज रहे थे ऐन्ड्रोक्लीज घेरे में लाया गया और दूसरे दरवाजे से एक विशाल भूखा शेर लपकता आया। ऐन्ड्रोक्लीज ने अपनी आँखें बंद कर ली और मौत का इंतजार करने लगा। एकाएक चारों ओर की हँसी चीख चिल्लाहट रूक गई और सब दम साधकर देखने लगे। पहले उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास नही हुआ। शेर ऐन्ड्रोक्लीज के टुकड़े टुकड़े करने के स्थान पर उसके सारे शरीर को जीभ से चाट रहा था और खुशी से कूद रहा था जैसे कुत्ता हो। यह ऐन्ड्रोक्लीज का अपना शेर था जो मित्र को पाकर खुश था। 

भीड़ ख्ुाशी से पागल हो उठी। उन्होनें समझा ऐन्ड्रोक्लीज जादूगर है और उसे भूखे शेरों को वंश में करना आता है। उन्होनें माँग की ऐन्ड्रोक्लीज को स्वतन्त्र कर दिया जाय। ऐन्ड्रोक्लीज सम्राट के पास ले जाया गया। सम्राट ने उसे जाने की आज्ञा देते हुए कहा कि वह गुलाम नही है साथ ही उसकी कोई इच्छा भी पूछी । ‘सीजर ’ऐन्ड्रोक्लीज ने झुकते हुए कहा,‘ मेरा मित्र शेर भी मेरे साथ जा सकता है क्या?’

सम्राट ने शेर को भी छोड़े जाने की आज्ञा दी। सब ने शेर और ऐन्ड्रोक्लीज को रोम की सड़कों पर साथ साथ जाते देखा। 



Thursday, 24 July 2025

Vyapari ki beti

 यापारी की बेटी


बात कुछ पुरानी है, एक व्यापारी ने अपनी छत की मरम्मत के लिये एक राज बुलाया। जिस समय राज छत का काम कर रहा था व्यापारी अपनी युवा पुत्री कंगना के साथ छत की मरम्मत का काम देखने आया। राज ने व्यापारी की बेहद सुन्दर लड़की देखी तो उसे देखता ही रह गया। काम करता जाता और चोर नजरों से कंगना को भी देख लेता था। बार बार देखने से उसका ध्यान जरा चूका और उसकी उंगली एक स्थान से कट गई । खून बहते देख कंगना के मुँह से ऑह निकला तो व्यापारी ने भी ध्यान दिया और दासी बुलाकर व्यापारी ने राज की उंगली पर मलहम पट्टी करवा दी। राज ने समझा, कंगना भी उससे प्यार करने लगी है। घर आकर वह कंगना के ध्यान में खो गया। धीरे धीरे वह बीमार रहने लगा और सूखता चला गया।

राज की माँ पुत्र की दशा देखकर बहुत परेशान हुई। उसने पुत्र को वैद्य को दिखाया परन्तु किसी प्रकार का लाभ नही हुआ। वैद्य ने कहा कि कोई बात तुम्हारे बेटे के मन में उमड़ घुमड़ कर रही है। माँ ने प्यार से दुलार से बेटे से पूछा कि आखिर ऐसी क्या बात हो गई है जो वह इतना चिन्तित है।

‘माँ ! अगर तुम मेरे कहे अनुसार करो तब तो मैं तुम्हें बताऊँ नहीं तो कोई फायदा नही,’ राज की माँ ने वादा किया कि वह उसके कहे अनुसार करेगी।

तब राज ने बताया वह कंगना से प्यार करने लगा है और उससे शादी करना चाहता है।

उसकी माँ बहुत उलझन में पड़ी, ‘हम यह सब कर कैसे पायेंगे। कंगना बहुत बड़े व्यापारी की बेटी हैै और तुम एक साधारण राज, कहीं भी तो मेल नही है।’

राज ने कहा, ‘माँ ! तुम ने मुझसे वादा किया था।’

‘वादा किया था यह तो ठीक है पर कहीं कहने का मुँह तो हो मुझे पागल खाने में और डाल दिया जायेगा। यह मैंने माना कि तुम अच्छे से राजकुंवर की तरह सुंदर सलोने हो पर हर माँ को अपना बच्चा सबसे अच्छा लगता है, परन्तु यहाँ आकर क्या इस टूटी खटिया पर उसे बिठाओगे, हम कैसे उसका निर्वाह कर पायेंगे।’

‘माँ यह सब बाद की बात है, तुम ऐसा करो,’ राज ने कहा,‘ तुम एक लकड़ी लेकर व्यापारी का दरवाजा खटखटाना, जब तक कि कोई बाहर न आ जाये, तुम कहना मुझे बस व्यापारी से बात करनी है, उसके आने पर मेरी इच्छा बताना, सुनकर अवश्य वह दरवाजा बंद कर लेगा। फिर तुम रोज जाना, अंत में झुंझला कर एक दिन अवश्य वह दरवाजा खोलकर तुम्हें बुलायेगा।’

उसकी माँ व्यापारी के दरवाजे पर जाकर दरवाजा खटखटाने लगी। सेवक ने द्वार खोल और राज की माँ को जाने के लिये कहा लेकिन माँ ने कहा वह व्यापारी से बात किये वगैर नहीं जायेगी। तंग आकर व्यापारी ने पूछा, आखिर वह चाहती क्या है। 

  ‘महोदय , मेरे पुत्र ने जब से आपकी पुत्री को देखा हे वह उससे प्रेम करने लगा है, अगर उससे शादी नहीं हुई तो वह मर जायेगा।’

व्यापारी कुछ देर सोचता रहा फिर बोला,‘ ठीक है मैं शादी तो कर दूंगा लेकिन तुम्हारे पुत्र को पहले तीन बहुमूल्य वस्तुऐं लानी पड़ेंगी। ये तीन चीजें हैंः पहली अजदहे के मुँह का मोती, दूसरी सुनहले कछुए का खोल, और तीसरी है सुनहला शेर। अगर ये तीनों चीजें वह ले आया तो मैं अपनी पुत्री की शादी उससे कर दूंगा।’

माँ के घर पहुंचते ही लड़का उठ कर खड़ा हो गया और पूछने लगा कि क्या हुआ

‘ व्यापारी शादी करने के लिये तो तैयार है, ’निराशा से सिर हिलाते हुए माँ ने कहा, ‘लेकिन आशा नही है तीन अनमोल वस्तुऐं चाहिये, अजदहे के मुँह में मोती, सुनहले कछुए का खोल, और सुनहला शेर। ये तीनों वस्तुऐं मिलने पर ही वह तुमसे अपनी पुत्री की शादी करेगा।’

‘अरे! ये तो बहुत आसान है। ’ लड़का बोला ,‘मैं जाकर ले आऊँगा।’

उसने पश्चिम की तरफ यात्रा प्रारम्भ कर दी क्योंकि उसने सुना था अनमोल वस्तुऐं पश्चिम की तरफ ही मिलती है।

उसे यात्रा करते करते कई दिन बीत गये, एक दिन उसे रास्ते में एक अजदहा मिला वह बोला, ‘तुम किधर जा रहे हो, अब आगे यहाँ से नहीं जा सकते।’

‘क्यों ? ’राज ने पूछा तो, अजदहा फुफकारते हुए बोला, ‘तुम बु( प्रदेश में जा रहे हो, वह पश्चिमी स्वर्ग है वहाँ तुम्हें बु( अवश्य मिलेंगे, अगर उनसे एक प्रश्न मेरे लिये पूछो तो में जाने दूंगा,’‘ बु( मिलेंगे तो जरूर पूछूंगा बताओ।’ युवक बोला। ‘तुम इस स्थान का नाम बताकर पूछना कि वहाँ रहने वाला अजदहा सैंकड़ो वर्षों से तुम्हारी सेवा कर रहा है फिर भी स्वर्ग क्यों नहीं जाता।’ राज ने उसे आश्वासन दिया वह अवश्य बु( से उसका प्रश्न पूछेगा और आगे चला।

काफी दूर चलने पर उसे एक विशाल कछुआ मिला। उसने अपना शरीर रास्ते में फैला लिया और राज का रास्ता रोक लिया। राज ने कहा कि उसे जरूरी काम से जाना है।

‘ जाने तो दूँ, पर बु( भगवान् से मेरी एक मुश्किल का हल पूछ लो तो जाओ।’ कछुऐ ने कहा ।

‘मुझे अपनी परेशानी बताओ में भगवान बु( से अवश्य पूछूंगा।’

‘तुम बु(ा से पूछना कि अमुक स्थान पर रहने वाला कछुआ एक हजार साल से सत्कर्म करते हुए रह रहा है फिर भी उसे स्वर्ग क्यों नही जाने दिया जाता।’ राज ने वादा किया वह बु( से उसका प्रश्न जरूर पूछेगा और आगे बढ़ा।

करीब पन्द्रह दिन तक वह चलता रहा। जंगल घना होता गया, उसे एक मन्दिर दिखाई दिया। वह आराम करने के लिये, वहाँ रुक गया। अंदर जाकर देखा भगवान की मूर्ति के आगे एक लम्बे लम्बे सुनहरे बालों वाला शेर बैठा है। राज एकदम चौंक गया क्योंकि उसे सुनहला शेर ही चाहिये था। उसने शेर से सहायता की प्रार्थना की तो शेर तैयार हो गया। राज ने कहा कि शादी के दिन आकर उसके ससुर के सामने बैठ जाये बस। यह कहकर आगे बढ़ गया।

चलते चलते वह बु( भगवान के सामने पहुँचा उसने बु( के सामने शीश नवाया। भगवान् ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा जो पूछना है पूछो। राज ने अजदहे और कछुए की समस्याऐं बु( को बताई तो वे बोले,‘ उस अजदहे के मुँह में दो मोती है जब कि अन्य अजदहों के मुँह में एक ही मोती होता है एक मोती थूक दे तो वह स्वर्ग चला जायेगा। कछुए के खोल के अंदर एक सुनहला खोल है जो बहुत खुरदुरा है अगर वह खोल फेंक दे तो वह स्वर्ग चला जायेगा।’

राज इन दोनों उत्तरों को सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ क्योंकि उसे वे ही दोनों वस्तुऐं चाहिये थी। उसने बु( को धन्यवाद दिया और वापस घर के लिये चल दिया। रास्ते में उसने कछुए और अजदहे को उनकी समस्या का हल बताया और कछुए से खोल और अजदहे से मोती लेकर आगे बढ़ा।

घर आते ही उसने दोनों चीजें व्यापारी को सौंप दी और सुनहले शेर के लिये वादा किया कि वह शादी के दिन देगा। अब तो अपनी पुत्री की शादी राज से करनी पड़ी। सुनहला शेर शादी के दिन उपस्थित हुआ। मेहमान तीनों अलभ्य वस्तुओं को देखकर चकित रह गये शादी के बाद राज घर पर ही रहने लगा। वह एक घन्टे के लिये भी पत्नी को सामने से नहीं हटने देता।

 एक दिन पत्नी ने पूछा ,‘तुम काम करने क्यों नही जाते’

 तो राज बोला,‘ मैं तुमसे अलग नहीं रह सकता।’

‘ऐसा करो, ’पत्नी बोली, ‘मैं अपनी एक तस्वीर बनाऊँगी उसे अपने साथ ले जाया करना। तस्वीर में तुम मुझे देखना और मैं तुम्हें हमेशा देखती रहूँगी।’

तब से राज जहाँ भी जाता पत्नी का चित्र साथ ले जाता। एक दिन हवा का तेज झोंका आया और तस्वीर हवा में उड़ गई राज उसके पीछे भागा लेकिन हवा उसे एकदम उड़ा ले गई। उड़ते उड़ते तस्वीर राजमहल में जाकर गिरी। राज वहाँ टहल रहा था उसने तस्वीर देखी, ‘क्या इतनी सुंदर लड़कियाँ भी हैं।’ राज ने हिजड़े से पूछा, ‘अगर इतनी सुंदर लड़की है तो उसे ढूँढ़ो में उसे अपनी पत्नी बनाऊँगा।’

हिजड़ा घर घर जाकर उसे ढूढ़ने लगा। अंत में से राज की पत्नी का नाम पता मिल ही गया। वह वहाँ पहुँच गया और राजा का संदेश सुना दिया। राज की पत्नी राज से बोली, ‘आप दुःखी मत होइये तीन साल बाद एक छः फुट लम्बी प्याज और मुर्गों के चूजों से बनी पोशाक पहन कर आना तब सब ठीक हो जायेगा।’

राज की पत्नी महल में आ तो गई लेकिन चेहरा पथरीला हो गया। न कभी हंसती न मुस्कराती। राजा से भी मिलने से उसने इंकार कर दिया। कहलवा दिया उसकी तबियत खराब है। ध्ीारे धीरे राजा की उत्सुकता उसमें समाप्त हो गई और वह अपने महल में अकेली रह गई। समय तेजी से बीतने लगा। तीन साल गुजर गये। दिन रात करके राज ने मुर्गे के चूजों के पंखों की पोशाक सिली और छः फुट लम्बी प्याज का डंडा बना कर महल के सामने गया। उसे देखकर उसकी पत्नी खिलखिला कर हंस पड़ी। राजा यह देखकर हैरान रह गया वह बोला, ‘मैंने तुम्हें तीन साल से हंसते नहीं देखा लेकिन इस बेवकूफ जैसे दिखने वाले व्यक्ति को देखकर कैसे हंस पड़ी।’

हंसते हंसते वह बोली, ‘अगर आप भी चूजों के पंखों की पोशाक पहन कर और प्याज का डंडा लेकर निकलें तो मुझे ऐसे ही आप को देखकर हंसी आयेगी।’

राजा ने सोचा रानी की खुश करने का बहुत आसान तरीका है उसने राज को इशारे से बुलाया अपने बढ़िया राजसी वस्त्र उसे पहनाये और उसकी पोशाक पहनकर प्याज का डंडा हाथ में लेकर सड़क पर निकल गया।

उधर राज की पत्नी ने हिजड़े को बुलाया ओर परों के वस्त्र पहनने वाले के सिर को कलम कर देने की आज्ञा दे दी। राजा को हिजड़ा उस पोशाक में पहचान ही नही पाया वह कुछ बोलता उससे पहले ही उसका सिर धड़ से अलग हो गया। राज राजा बन गया और वे सुख से रहने लगे।



Wednesday, 23 July 2025

chudel ki beti

 चुडै़ल की बेटी

बड़े-बड़े पहाड़ों के बीच में फूस की झोंपड़ी में एक बूढ़ा अपने तीन बेटों के साथ रहता था। प्रतिदिन बूढ़ा लकड़ी लाने जंगल चला जाता था। एक दिन जंगल में सफेद कपड़े पहने एक बुढ़िया मिली। वह चौरस पत्थर पर बैठी शतरंज खेल रही थी। लकड़हारे को खुद भी शतरंज का शौक था वह रुककर खेल देखने लगा।

क्या तुम खेलोगे उस विधवा स्त्री ने पूछा

हाँ हाँ बूढ़ा बोला

किस शर्त पर खेलोगे बुढ़िया बोली।

बूढें ने लकड़ी के गठ्ठर को दांव पर लगाया।

नहीं खाली लकड़ी के गठ्ठर पर नहीं खेलूँगी। तुम्हारे कितने बच्चे है जब बुढ़िया को मालुम हुआ लकड़हारे के तीन पुत्र हैं तो वह प्रसन्न हो गई और बोली यह ठीक है मेरे तीन पुत्रियाँ है। अगर तुम जीत गये तो मैं उन्हें दुल्हन बनाकर तुम्हारे घर तुम्हारे तीनों पुत्रों से शादी करने भेज दूंगी। यदि तुम हार गये तो तुम्हारे तीनों पुत्र मेरे घर दामाद बनकर आयेंगे और वहीं रहेंगे। बूढ़ा कुछ देर सोचता रहा फिर रजामंद हो गया और दोनों शतरंज ख्ेालने लगे। बूढ़ा एक एक कर सब बाजियाँ हार गया।

बूढ़ी उठी और एक अंधेरी घाटी की ओर इशारा करती हुई बोली, मेरा घर वहाँ है कल अपने बड़े पुत्र को भेजना, तीन दिन बाद मझले ओर उसके तीन दिन बाद सबसे छोटे पुत्र को भेजना। बुढ़िया के जाने के बाद लकड़हारा बिना लकड़ियां लिये घर आया और तीनों पुत्रों को बताया। तीनों पुत्र सुनकर बहुत खुश हुए।

अगले ही दिन बड़ा पुत्र धाटी में गया । तान दिन बाद दूसरी पुत्र घाटी में गया तीन दिन बाद तीसरा सबसे छोटा पुत्र गया वह इधर उधर बुढ़िया का घर ढूँढ़ रहा था उसे एक छोटी सी झोंपड़ी दिखाई दी उसमें एक साधु बैठा था। साधु ने लम्बी सी दाढ़ी थी। उसे देखकर साधु बोला, पुत्र तुम किधर जा रहे हो।

छोटा पुत्र बोला, महाराज मैं एक बुढ़िया की सबसे छोटी पुत्री से विवाह करने जा रहा हूँ। मेरे दो बड़े भाई भी आ चुके है। जगह यहीं बताई थीं।

साधु बोला, पुत्र वह बुढ़िया एक चुड़ैल है और उसके एक ही लडक़ी है। उससे शादी का प्रलोभन देकर बहुत से युवकों को बुलाकर मार डाला। तुम्हारे बड़े भाई को उसके महल के बाहर खड़े शेर ने खा लिया है। और मझले भाई को उसके अंदर के दरवाजे पर पहरा देने वाले चीते ने खा लिया था। सौभाग्य से तुम मुझे मिल गये हो यह कह कर साधु ने एक लोहे का मोती निकाल कर उसे देते हुए कहा, इसे बाहर द्वार पर बैठे हुए शेर के सामने फेंक देना। तथा एक लोहे की छड़ देते हुए कहा, 

इसे अंदर के दरवाजे की रखवाली कर रहे चीते के सामने फेंक देना। फिर साधु ने एक बलूत के पेड़ की डाल तोड़ कर झरने में डुबाया और उसे उसे देते हुए कहा, जब तुम तीसरे द्वार पर पहुंचो तब इससे द्वार ठेलना तुम अंदर सुरक्षित पहुँच जाओगे।

युवक ने साधु को धन्यवाद दिया और आगे घाटी की ओर बढ़ गया। शीघ्र ही उसे एक विशाल महल दिखाई दिया। बाहर द्वार पर शेर के सामने लोहे का मोती डाल दिया वह उसके साथ खेलने लगा। अंदर द्वार के सामने पहरा दे रहे चीते के सामने उसने छड़ डाल दी वह उससे खेलने लगा तीसरा द्वार कसकर बंद था जब छोटे पुत्र ने बलूत की डाली से उसे ठेला तो एक हजार किलो वजन का टुकड़ा गिरा और दरवाजा खुल गया। अगर उसके हाथ से दरवाजा खोला होता तो अवश्य दबकर मर गया होता।

चुड़ैल अपने कमरे में बैठी पोशाक सिल रही थीं, शोर सुनकर बाहर निकल आई। उसने बाहर आकर युवक को देखा, वह समझ गई कि यह लकड़हारे का तीसरा पुत्र है। उसे आश्चर्य हुआ कि युवक सब खतरे पारकर अंदर कैसे आ गया। लेकिन ऊपर से,खुश दिखाई देती हुई बोली, तुम बिलकुल ठीक समय पर आ गये। मेरे पास एक बोरी अलसी के बीज हैं जरा उसे खेत में वारिश से पहले बो आओ। वापिस आने पर मैं तुम्हारी शादी कर दूंगी।

युवक ने बाहर देखा काले बादल घिरे हुए थे किसी भी समय वारिश हो सकती थी। उसने बीजों का बोरा उठाया और बाहर खेत में निकल गया लेकिन खेत में तमाम घास फूस उगी हुई थी। युवक सोचने लगा बिना हल बैल के कैसे तो खेत जोता जाये और कैसे इतनी जल्दी बोया जाये। उसने हाथ से कुछ जंगली पौधे उखाड़ने की कोशिश की फिर थक कर सो गया। जब उसकी आंख खुली उसने देखा झुंड के झुंड घूस खेत को खोद चुके हैं। मिट्टी सब उलट पलट हो चुकी है उसने बीज बोया। घूसों को धन्यवाद दिया और बुढ़िया के पास वापस आ गया।

उसे वापस आया देख बुढ़िया परेशान हो गई। बोली, क्या काम खत्म हो गया। हाँ युवक ने कहा, लेकिन बुढ़िया बोली, क्या बीज बो आये। तुमने देखा नहीं कि बादल सब चले गये हैं चन्द्रमा चमक रहा है अब वारिश नहीं होगी बारिश नहीं होगी तो बीज फूटेगा नहीं और बेकार जायेगा। जाओ उन्हें बीनकर लाओ और ध्यान रहे एक भी बीज रह न जाये। वापस आओगे तभी शादी करा दूंगी। छोटे पुत्र ने खाली बोरा वापिस लिया और बीज ढूँढ़ने चल दिया। बड़ी देर तक बीज ढूंढ़ता रहा मुठ्ठी भर बीज भी नहीं मिले और झुके झुके उसकी कमर दर्द करने लगी। वह उदास चंद्रमा को देखने लगा कि वह आखिर निकल ही क्यों। एकाएक उसने देखा हजारों चींटियॉं जमीन में से एक एक बीज लेकर निकल आई और उसके बोरे में डाल दिये। और फिर से बीज लेने चलीं गई। कुछ ही देर में बोरा भर गया और वह चींटियों को धन्यवाद दे वापस आ गया।

बीज मिल गये बुड़िया के माथे पर बल पड़ गये।

हाँ लड़के ने कहा, बहुत ठीक बुढ़िया बोली, इस समय तो मैं सोने जा रही हूँ कल तुम्हें और काम दंूगी।

दूसरे दिन बुढ़िया बोली मैं छिप रही हूँ अगर तुमने मुझे ढूंढ़ लिया तो शादी कर दूंगी। यह कहते ही वह गायब हो गयी।

छोटा पुत्र उसे चारो ओर ढूंढ़ने लगा लेकिन कहीं भी दिखाई नहीं दी। वह निराश हो चला था कि उसे एक मधुर आवाज सुनाई दी। मेरी माँ बगीचे में छिपी है। वह दीवाल के पास लटके आधे हरे आधे लाल आडू की शक्ल में हैैं। हरा भाग उसकी पीठ है और लाल भाग मुँह। लाल भाग को काटना वह वापस आ जायेगी।

लड़के ने इधर उधर देखा कि कौन कह रहा है। ऊपर एक अधखिले कमल की गुलाबी पंखुड़ियों से गाल वाली सुंदर कन्या हरी पोशाक पहने खड़ी थी। वह समझ गण कि यह चुड़ैल की पुत्री है। वह जल्दी से बगीचे में गया वहाँ लटके आडू के लाल हिस्से को काटकर एक पत्थर पर पटक दिया। उसी क्षण मुँह से खून बहती बुढ़िया वहाँ खड़ी थी।

ओह पुत्र तुमने तो करीब करीब मुझे मार ही डाला वह बोली

‘ मुझे क्या मालुम तुम आडू बनी हुई हो। ’लड़के ने बुरा सा मुँह बनाया और बोला,‘ मैंने तो खाने के लिये तोड़ा था अच्छा नहीं लगा इसलिये फेंक दिया।’

लंगड़ाती बुढ़िया मुड़कर चली चलते चलते बोली, ड्रैगन राजा के यहाँ से सुलेमानी पत्थर का पलंग लेकर जाओ तब शादी होने दूंगी नहीं तो नहीं।

अभी यह बगीचे में मुँह लटकाये खड़ा था कि चुड़ैल की पुत्री वहाँ आई और उदासी का कारण पूछा।

तुम्हारी माँ ने ड्रैगन राजा का पलंग लाने के लिये कहा है, वह बोला, लेकिन उसके राज्य की सीमा में कोइ मनुष्य पैर नहीं रख सकता। धैर्य रखो। लड़की ने कहा, यह बहुत सरल है मेरे पास एक सोने का कांटा है तुम समुद्र में उससे लाइन खींचना और एक रास्ता बन जायेगा जो तुम्हें ड्रैगन राजा के महल तक पहुँचा देगा।

युवक ने कांटा लिया और समुद्र किनारे जाकर उससे पानी में लाइन बनाई तुरंत एक सड़क वहाँ दिखाई पड़ने लगी। युवक उसपर चलकर डैªगन राजा के महल तक पहुँचा उसने राजा से सफेद सुलेमानी पत्थर का पलंग मांगा। राजा के पास कई पलंग थे उसने अपने अनुचरों के साथ पलंग भिजवाया। वे बुढ़िया के महल के पास पलंग रखकर चले गये।

जब बुढ़िया ने देखा कि लड़का पलंग लेकर वापस आ गया है तो बोली, पश्चिम में बंदर राजा के पहाड़ पर से ड्रम लाओ उसे हम शादी पर बजायेंगे।

युवक जाने लगा तो बाहर बुढ़िया की पुत्री मिली, वह बोली, अब तुम्हें माँ ने क्या लाने के लिये बोला है।, बंदर राजा की पहाड़ी पर से उनका ड्रम चुराकर लाना है। 

मैंने सुना है बेटी ने बताया कि बंदर राजा पश्चिमी स्वर्ग की यात्रा पर गया हुआ है, अभी वहाँ से वापस नहीं आया है। पहाड़ी से पहले एक मिट्टी की नदी है तुम उसमें बंदरों की तरह लुढ़कते जाना। छोटे-छोटे बंदर तुम्हें अपना पूर्वज समझेगे और घर ले जायेेंगे। मैं तुम्हें एक सुई, कुछ नीबू और तेल देती हूँ अपने साथ ले जाओ खतरा देखकर पहले सुई फिर नीबू फिर तेल फेंकना।

लड़का तीनों चीजें लेकर मिट्टी की नदी पर पहुँचा और उसमें लोटने लगा उसकी आंखे छोड़कर सारा शरीर मिट्टी में सन गया। वह जल्दी जल्दी पहाड़ी पर चढ़ा। छोटे बंदरों ने देखा तो चिल्लाए दादाजी आये हैं यह कहकर उसके चारों ओर एकत्रित हो गये और एक बड़ी सी डलिया में बैठाकर अपने रहने के स्थान पर ले गये लड़के ने ताली बजाकर कहा, ‘पुत्रो तुम्हारा दादा बहुत भूखा है। अपने बगीचे से कुछ फल तोड़कर लादो।’ सब बंदर दादाजी को खुश करने के लिए छोटी छोटी डलिया लेकर भागे। जैसे ही बंदर गये युवक डलिया में से निकला और छांह में रखे ड्रम को उठाकर भागा। अभी वह पहाड़ी अधिक दूर नहीं गया था कि उसे अपने पीछे बंदरों के भागने की आवाज सुनाई दी। वे चीख रहे थे। काला चोर काला चोर धोखेबाज हमारा दादा बनकर हमें धोखा देकर हमारा ड्रम चुकाकर भाग रहा है। पकड़ो पकड़ो भाग न पाये।

लड़के ने सुई अपने पीछे फेंकी वहाँ एक सुइयों का पहाड़ खड़ा हो गया। छोटे छोटे बंदर जगह जगह से घायल हो गये लेकिन वे भागत रहे। जब वे पास आने लगे तो उसने नींबू पीछे फेंक दिया। एक नींबू का पहाड़ खड़ा हो गया। बंदरों के घायल शरीर में नीबुओं का रस लग रहा था। तिलमिला रहे थे, कुछ मर गये कुछ पीछा करते रहे। अंत में लड़के ने तेल बोतल में से निकाल कर फेंका तुरंत ही एक चिकना फिसलने वाला पहाड़ खड़ा हो गया जरा भी बंदर चढ़ने की कोशिश करते तो फिसल कर गिर जाते इस प्रकार लड़का उन से बच कर वापस आ गया।

जब बुढ़िया ने देखा वह ड्रम भी ले आया है तो बोली, अभी तो सूर्यास्त होने में देर है। बगीचे में जाकर बबूल की लकड़ियाँ काट लाओ उनसे मसहरी बनानी है।

लड़का जाने लगा था लेकिन जाते जाते सोच रहा था कि अवश्य वहाँ कोई धोखा है उसने हिम्मत बांध कर चुड़ैल की बेटी से पूछा, वहाँ भी कुछ बात है। 

माली एक भयानक बालों वाला मनुष्य है, लकड़ी बोली उसे आदमियों की उंगली और बाल खाना बहुत पसंद है। उसने नारियल की जटाओं से बना कोट उसके कंधे पर डाल दिया। दसों उंगलियों में लकड़ी के खोल पहना दिये। एक तेज धारदार हंसिया देते हुए कहा, जल्दी से जाओ अब तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

लड़के ने बगीचे में जाकर बबूल का पेड़ ढूढ़ा और डालियाँ काट ही रहा था कि एक बालों वाला विशाल काय आदमी ने कंधे पर पड़े कोट केा खंीचा और दूसरे हाथ से उंगलियों के लकड़ी के खोल खींचे। उसके ख्याल से कोट लड़के की खाल और खाल उसकी उंगलियों थी वह उन्हें चबाने में लग गया, लड़का लकड़ियाँ उठाकर भाग लिय।

बुढ़िया ने कहा, मैने आटे की सेवंइयाँ बनाकर रसोई में रखी हैं तुमने कुछ खाया नहीं है जाकर खालो।

लकड़हारे के पुत्र को बहुत तेज भूख लगी थी। उसने रसोई में जाकर बर्तन का ढक्कन उठाया बढ़िया खुशबू आ रही थी। उसने सेवइयाँ खानी प्रारम्भ कर दी, लेकिन खाते ही उसके पेट में भयंकर दर्द होने लगा। तभी द्वार खुला एक नौकरानी लैम्प लिये बाहर आई और बोली, मेरी मालकिन ने बुलाया है। लड़का पुत्री के पास पहुंचा। पुत्री ने लड़के को छत की कड़ी से लटकवाया और लकड़ी से पीठ पर पिटाई की कुछ ही देर में लड़के के मुँह से लंबे लंबे सांप निकल कर गिरने प्रारम्भ हो गये। सांपों के निकलने के बाद लड़की ने युवक को सीधा करवाया और बोली, मेरी माँ ने तुम्हें सांप सिवइयों के रूप में खिलाये। अब तुम जाकर जल्दी से शादी की बात करो।

दूसरे दिन शाम को उनकी शादी हुई। राजा का ड्रम बजा कमरे में सुलेमानी पत्थर का पलंग सजा था उसपर मच्छरदानी लगी हुई थी। लेकिन जैसे ही वे पलंग पर आये एक नदी दोनों के बीच बहने लगी। लड़की ने मेज के नीचे रख्ेा घड़े केा निकाला उसमें एक लकड़ी का टुकड़ा तैर रहा था। उसे फेकते ही नदी गायब हो गई। लड़की युवक से बोली, हमें यहाँ से तुरंत निकलना चाहिये नहीं तो माँ हमें कुछ कुछ नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगी। उसने एक फटा छाता और एक मुर्गा लड़के को दिये। और आधी रात को वे भाग चले।

चंद्रमा की रोशनी पहाड़ों पर गिर रही थी तभी एक एक तेज सीटी की आवाज सुनाई दी। ओह माँ ने चाकू हमें मारने के लिये भेजा है। खून मिलते ही यह गिर जायेगा जल्दी से मुर्गा फेक दो चाकू इसे काट कर गिर जायेगा। मुर्गे के लगते ही चाकू गायब हो गया।

कुछ देर से सीटी की आवाज फिर सुनाई दी। ओह मुर्गे का  खून सीठा होता है और मानव का मीठा माँ ने पहचान कर दूसरा चाकू भेजा है।

‘मैं मर जाऊँगी लेकिन तुम भाग जाओ,’’

 लड़के ने कहा, नहीं मुझे मरने दो मेरे मरने के बाद मेरा शरीर मेरे घर भिजवा देना।

‘नहीं, ’लड़की बोली,‘ मुझे मरने दो मौत के बाद में फिर जीवित हो जाऊँगी मेरा शरीर घर ले जाना सात दिन बाद में फिर से जीवित हो जाऊँगी।’ अभी वह कह ही पाई थी कि सनसनाता चाकू लड़की के हृदय में धंस गया। और लड़की जमीन पर गिर पड़ी। रोता हुआ लकड़हारे का पुत्र उसे घर ले गया।

सुबह होने तक वह घर पहुँचा और पिता को सब बताया। अपने दोनों पुत्रों के मर जाने की खबर से वृद्ध लकड़हारा रोने लगा। लड़के ने लड़की का शरीर एक ताबूत में रख दिया और प्रतिदिन उसे देखता रहता।

छटवें दिन ताबूत में से कराहने की आवाज आई लड़के ने सोचा अगर ताबूत नहीं खोलेगा तो लड़की का दम घुट जायंगा उसकी पत्नी जीवित हो गई है। उसने ताबूत खोंल दिया।

लड़की का चेहरा बिलकुल सफेद था। चाकू अभी जरा सा उसके हृदय में गढ़ा था लड़की ने आंख खोली और बोली, यह तुमने क्या किया, एक दिन पहले क्यों खोल दिया शायद भाग्य भी नहीं चाहता कि हम मिले। अब मैं नहीं बचूंगी। मेरे मरने के बाद तुम सात बार छू करके चाकू को लाल कपड़े से ढक देना  यह मेरी माँ के पास चला जायेगा उसे मालुम पड़ जायेगा कि मैं मर गई।’

यह कहकर उसकी गर्दन एक ओर लुढ़क गई। पहले तो लड़का जार जार रोने लगा फिर उसने लाल कपड़ा डाल कर जैसे ही चाकू को सात बार छू किया कि चुडै़ल वहाँ आ पहुँची।

अपनी बेटी को देख कर वह फूट फूट कर रो पड़ी। उसने लडकी के हृदय से चाकू लगाया और गर्दन झुका कर बैठ गई चाकू उड़ा और चुडै़ल के गर्दन पर गिरा। उसकी गर्दन कट गई। और लड़की ने आंखे खोल दी। उसी ताबूत में चुड़ैल के शव को रखकर उन्होंने श्मशान में गाड़ दिया। चुड़ैल के मरते ही लड़की में से भी जादुई ताकत खत्म हो गई और सामान्य बन कर रहने लगी।


Tuesday, 22 July 2025

Bhulakkad gadbadiya

 

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Monday, 21 July 2025

Dayalu pari

 दयालु परी और विरूपा

घने जंगल में पहाड़ी के ऊपर महल मेें एक बहुत ही क्रूर और अत्याचारी राजा रहा करता था। उसका पुत्र भी निर्दयी था। कोई भी राजा के डर से जंगल में अंदर नहीं जाता था, क्योंकि राजा उसे पकड़ कर गुलाम बना लेता था। एक दिन एक सुंदर कन्या विरूपा जंगल में रास्ता भूल गई, घूमते घूमते वह महल के पास आ गई। अंधेरा घिरने लगा था, डरी हुई कन्या महल के समीप घर का रास्ता पूछनें के लिये आई। महल का दरवाजा खटखटाया तो एक क्रूर और भयानक चेहरे वाले नौकर ने दरवाजा खोला, 

“मुझे बस्ती का रास्ता बता सकते हो“ विरूपा ने पूछा। 

“नहीं मुझे नहीं मालुम हॉं मै मालिक को बुलाता हूॅ, शायद उन्हें पता हो, नौकर ने कहा। 

नौकर दरवाजे को धड़ाम से बंद करके चला गया, कुछ देर बाद एक बहुत ही क्रूर दिखने वाले आदमी ने दरवाजा खोला उसके पीछे वह नौकर भी झांक रहा था, वह बोला तुम घर से बहुत दूर हो अंधेरा हो गया है इसलिये इस समय तो घर नहीं जा सकती हो मेरे पीछे आओ तो मैं तुम्हें रात भर टिकने का ठिकाना बता दूॅ। 

कन्या उसके चेहरे को ही देखकर सहम रही थी सहमी सहमी उसके पीछे गईं। काफी दूर तक अंधेरे में चलने के बाद एक बहुत ही हल्की रोशनी वाले कमरे में पहुॅचें। कमरा सुदंर सजा हुआ था। वहॉं दो नौकर थे। राजा ने विरूपा को खाना देने के लिये कहा तथा सोने की जगह बताने के लिये कहकर चला गया। खाने के बाद उसे सोने के कमरे में पहुंचा दिया जहॉं वह अकेली रह गई। 

पलंग बहुत आराम दायक था लेकिन विरूपा को अपने घर की अपने मॉ बाप की बहुत ही याद आ रही थी। उसे चिन्ता भी हो रही थी कि मॉं बाप बहुत परेशन होंगे। वह आदमी भी कुछ अच्छा नहीं नजर आ रहा है क्या करूॅं वह बुड़बुड़ाई उसे सारी रात नींद आई, वह रोती और सिसकती रही। 

सुबह होते ही वह नीचे उतरी वहॉं राजा और उसका लड़का मिला उन्होने उससे नाश्ता करने के लिये कहा तो उसने मना कर दिया और कहा,“ बस मुझे घर जाने का रास्ता बता दीजिये। 

राजा ने उसे गुस्से से घूरा और कहा,“लड़की हमारे लड़के को तुम बहुत पसंद आई हो इसलिये अब हम तुम्हें घर नहीं जाने देगें। 

“विरूपा की आंखों में ऑंसू भर आये वह गिड़गिड़ाते हुए बोली, “नहीं मैं आपसे प्रार्थना करती हूॅ। मुझे आप घर जाने दो। 

“नहीं तुम घर नहीं जाओगी तुम मेरे लड़के से शादी करोगी,“राजा ने कहा राजा ने उसे तरह तरह की सुंदर वस्तुऐं भेंट देनी चाही पर विरूपा शादी के लिये कैसे भी तैयार नहीं हुई। गुस्से में आकर राजा ने महल के एक कमरे में लड़की को बंद कर दिया और आज्ञा दी जबतक विरूपा शादी के लिये तैयार न हो जाये ताला न खोला जाये, और लड़की से कहा,“ अगर तुम शादी नहीं करोगी तो तुम्हें मौत के घाट उतार दिया जायेगा। 

विरूपा फूट फूट कर रोने लगी। रोते रोते उसे लगा कोई खिड़की पर हल्के से थपथपा रहा है। खोलने पर खिड़की की चौखट पर एक बहुत सुंदर युवती खड़ी है। युवती ने लड़की से रोने का कारण पूछा तो लडकी ने बताया “अगर कल तक मैने राजा के लड़के के साथ शादी करने के लिये हॉ नही की तो राजा मुझे मौत के घाट उतार देगा। 

सुंदर युवती बोली, रोओ मत मेरे पीछे आओ“

वह युवती खिड़की के रास्ते अंदर आई और दरवाजा खोला और एक अधेंरे गलियारे में होती हुई महल के द्धार पर आई। युवती ने हाथ हिलाया और द्धार पर बैठै पहरेदार को नींद आ गई और चुपचाप वे लोग द्धार पर जंगल में आ गई। 

अभी कन्या बाहर निकली ही थी कि राजा ने नौकर को विरूपा को देखने के लिये भेजा। नौकर कमरे में घुसा तो देखा लड़की गायब थी। राजा कुŸाा और नौकर को ले लड़की को ढूंढने निकला। 

लड़की ने युवती से पूछा वह कौन है तो युवती ने बताया, मै एक परी हॅॅू। तुम्हें सहायता के लिये रोते देखा, इसलिये सहायता करने चली आई, पर अब मुझे तुम्हें यहीं छोड़कर जाना पड़ेगा। 

विरूपा सुनकर परेशान हो गई,“मुझे रास्ता तो मालुम नहीं है क्या तुम मुझे घर का रास्ता नहीं दिखाओगी। 

परी ने उसे एक अंगूठी दी और कहा, देखो यह अंगूठी लो और एक रिबन उस पर कस कर बॉध दो और इसे हमेशा अपने पास रखो यह तुम्हें पहुॅचा देगा, लेकिन ध्यान रखना अगर यह खो गई तो तुम फिर रास्ता भूल जाओगी और राजा तुम्हें पकड़ लेगा। यह कहकर परी अदृश्य हो गई। 

परी के जाने से विरूपा जंगल में घबड़ाने लगी फिर अंगूठी अपने सामने रखकर चलने लगी अंगूठी तैरती हुई उसके आगे आगे चल दी। 

कुछ दूर चलने पर उसे जंगल में सुंदर फूल खिले दिखाई पड़े वह उन्हें तोड़ने केे लिये रूक गई। फूल इक्कठ्ठा करते उसके हाथ से अंगूठी गिर गई। उसने बहुत ढूढने की कोशिश की लेकिन अंगूठी आगे बढ़ी। चलते चलते वह एक नदी के किनारे आई। उसकी समझ में न आया नदी कैसे पार करें। 

अभी वह नदी के किनारे घूम रही थी कि उसे कुत्ते के भौकने की आवाज आई साथ ही राजा की आवाज भी। विरूपा घबड़ा गईं। परी ने अंगूठी ध्यान से रखने के लिये दी थी, और मैने उसे खो दिया अब राजा पकड़ कर महल में ले जायेगा। यह सोचकर लड़की रोने लगी। 

रोते रोते उसे गाने की आवाज सुनाई दी साथ ही परी दिखाई दी, परी बोली,लगता है तुमने अंगूठी खो दी। 

विरूपा बोली, मैं फूल तोड़ने रूकी थी, वहीं मुझसे अंगूठी खो गई, अब नहीं मालुम कहॉं जाऊ, यह नदी कैसे पार करूॅ। राजा और कुत्ते मुझे ढूढं रहे हैैं। 

परी गुस्से से बोली, तुम बहुत लापरवाह हो। मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया। खैर मुझे तुम पर दया आ गई है और तुम्हें दूसरी अंगूठी देती हूॅं इसके पीछे जाना यह तुम्हें घर पहुंचा देगी। यह कहकर परी गायब हो गई। 

तब तक राजा और कुत्ता उसके बहुत नजदीक आ चुके थे। लेकिन विरूपा अंगूठी के पीछे चलती एक पुल पर पहुॅची। पुल पार करते ही उसे अपने घर का बाड़ा दिखाई देने लगा। जल्दी से वह घर में घुस गई। कुछ देर तक कुत्ता बाहर भौकंता रहा फिर राजा और कुत्ता वापस चले गये। परेशान मॉं बाप को उसने पूरी कहानी सुनाई और परी को बहुत धन्यवाद दिया।


Sunday, 20 July 2025

chandrgrahan

 चंद्र ग्रहण

एक वृद्ध विधवा मृत्युशैया पर लेटी थी। उसके दोनों पौत्र पास ही खड़े थे। बच्चों वह बोली, और दादियों की तरह मैं तुम्हारे लिये सोना-चांदी तो छोड़ नहीं जा रही हूँ। बड़े के लिये सिल और छोटे के लिये बट्टा छोड़े जा रही हूँ यह कहकर मर गई। बड़े भाई ने सोचा मैं इस सिल को लेकर क्या करूँगा मुझे कोई रसोई में नौकरी तो करनी नही है। उसने सिल रसोई में ही छोड़ी और परदेश मेहनत करके कमाई करने लगा। और बड़ा आदमी बन गया।

छोटे भाई को दादी पर अटूट विश्वास था  जरूर बट्टे का कोई न कोई उपयोग जरूर होगा छोटे ने सोचा नहीं तो दादी क्यों देती? यह सोच कर वह जहाँ भी जाता उसे साथ ले जाता। अड़ोसी-पड़ोसी खूब हंसते। वह लकड़ी बेच कर अपनी रोटी का गुजारा करने लगा परंतु गरीब ही रहा।

एक दिन जब वह लकड़ी बीन रहा था एक सर्पिणी वहाँ आई। छोटा लड़का डर के मारे पेड़ पर चढ़ गया। सर्पिणी बोली, डरो नहीं मैं तो बस तुम्हारा बट्ट़ा उधार लेने आई हूँ। इसका क्या करोगी? छोटे भाई ने पूछा, मेरे पति अभी ही मर गये है सर्पिणी बोली अगर उनके नथुनों से यह जादुई बट्टा लगा दिया जाय तो वह फिर से जीवित हो जायंेगे।’’

‘ मैं नही जानता कि यह बट्टा जादुई है।’’ छोटे भाई ने आश्चर्य से पूछा,

‘मेरे साथ आओ तुम्हें पता चल जायेगा ।’’सर्पिणी ने कहा, वह उसके पीछे पीछे घने जंगल में गया वहाँ एक सर्प मरा पड़ा था। उसने अपना बट्टा उसके नथुनों से लगाया वह फौरन जीवित हो गया।

‘इस बट्ट़े की शक्ति इसकी सुगंध में है’’ सर्पिणी ने कहा ,‘परंतु यह तब ही तक रहेगी जब तक कि तुम किसी से बताओगे नहीं।’ तब दोनों छोटे भाई को धन्यवाद कह चले गये।

छोटा भाई गाँव के लिये चला रास्ते में उसे एक कुत्ते का शव मिला। उसे मरे देर हो चुकी थी इसीलिये उसकी देह अकड़ गई थी। उसने जैसे ही उसके नथुने से अपना बट्टा लगाया कुत्ता उछल कर खड़ा हो गया। छोटे भाई ने उसका नाम अकडू़ रखा। अकडू तब से अपने जीवनदाता का स्वामिभक्त वफादार साथ हो गया।

शीघ्र ही छोटा भाई मृत्यंुजय वैद्य के नाम से प्रसिद्ध हो गया। किसी को भी यह पता नहीं लग पाता था कि यह बट्टा है जिसके कारण रोगी ठीक हो जाते हैं। वे समझते वह बट्टा केवल दवा पीसने के लिये रखता है। कुछ दिन बाद राजा की लड़की का देहांत हो गया। राजा ने छोटे भाई को बुलाया छोटे भाई ने राजकन्या को जीवित कर दिया। बदले में राजा ने राजकुमारी की शादी छोटे भाई से कर दी।

एक दिन छोटे भाई ने सोचा अगर यह बट्टा मृत्यु को जीवन में बदल सकता है तो बुढ़ापे को भी जीत सकता है। यह सोचकर प्रतिदिन एक बार खुद सूंघता एक बार राजकुमारी को सुंघा देता। राजकुमारी सोचती यह वैद्यराज की कोई सनक होगी। कुछ वर्ष बाद छोटे भाई को लगा कि उसने बुढ़ापे की दवा ढूँढ़ ली है क्यांकि वह और राजकुमारी जरा भी उम्र में नहीं बढ़े थे। लेकिन चंद्रमा को दोनों मृत्युलोक के निवासियों से जलन होने लगी। सूर्य तक बुड्ढा हो रहा है चंद्रमा ने सोचा प्रतिदिन शाम को वह लाल भूरा सा कुम्हलाया हो जाता है वह बट्टा चुराने का मौका देखने लगा।

एक दिन बट्टा कुछ भीग गया इसीलिये छोटा भाई उसे धूप में बैठकर सुखाने लगा। ‘मेरे सरताज, राजकुमारी ने हठ करते हुए कहा आप एक राज्य के उत्तराधिकारी है आप एक बट्टे को लेकर धूप में सुखाने बैठे रहे कुछ अच्छा नहीं लगता। यह काम सैनिकों पर छोड़ दो राजकुमारी ने इतनी हठ की कि उसे छोड़ना ही पड़ा लेकिन उसे किसी का विश्वास नहीं था। इसलिये वह अकडू को वहाँ पर बिठा अंदर आ गया। अकडू बट्टा को देखने लगा। चंद्रमा को मौका मिला और वह बट्टा चुराने आकाश से नीचे आया। सूर्य की तेज रोशनी में धुंधलाया चांद अकडू को दिखाई न दिया और चांद बट्टे को लेकर भागा बट्टे की खुशबू के सहारे वह चंद्रमा के पीछे भागा।

तब से लगातार कुत्ता चंद्रमा का पीछा कर रहा है। रात में तो उसे चंद्रमा दिखाई देता है। परंतु दिन में वह बट्टे की सुगंध के सहारे पीछा करता है। क्यांेकि रातदिन वह बट्टे को सूंघता रहता है इसलिये वह अमर हो गया है। कभी वह उसे पकड़ लेता हे और निगलने की कोशिश करता है लेकिन कठोर होने की वजह से निगल नहीं पाता और उसे उगलना पड़ता है फिर से दौड़ शुरू हो जाती है।


Saturday, 19 July 2025

chatur maina

 चतुर मैना


बहुत दिन हुए सांरग नामक एक चित्रकार के पास एक मैना थी। प्रातः होते ही वह खिड़की पर जा बैठती और जोर जोर से बोलती,‘ बड़े भैया सुबह हो गई। बड़े भैया सुबह हो गई।’

एक बार हाकिम ने अपने नये महल को चित्रित करने का कार्य सारंग को सौंपा। सारंग के साथ मैना भी रोज जाती। यदि सारंग का ब्रश गिर जाता मैना चोंच में दाब लाती। कभी खतरनाक स्थानों पर खड़े होकर चित्रकारी करनी होती तो मैना उसे सावधान करती जाती ,‘बड़े भोया सावधान रहना। बड़े भैया सावधान रहना।’ अन्य कारीगर भी मैना को प्यार करने लगे। उन्होने उसे तरह तरह के गीत सिखा दिये। 

एक दिन सारंग गणेश जी का चित्र बना रहा था कि हाकिम वहाँ आया उसने पूछा,’’यह किसका चित्र है?’’ सारंग बोला, ’’ ये गणेश जी हैं भाग्य सफलता और दीर्घजीवन के देवता। तभी मैना भाग्य, सफलता, दीर्घजीवन के देवता।  भाग्य, सफलता, दीर्घजीवन के कहती फुदक कर सारंग के कन्धे पर जा बैठी। हाकिम को चिड़िया बहुत पसन्द आई वह बोले,’’ यह चिड़िया किसकी है?’’

मेरी! सरंग ने कहा।

हाकिम अपनी लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते मैना से बोले ?‘आओ तुम्हें कुछ खाने को दूँगा।’’मैना हाकिम के पास गई। 

दूसरे दिन हाकिम का सेवक चित्रकार के पास आया और बोला कि हाकिम की इच्छा है कि चित्रकार मैना को हाकिम कोे उपहार स्वरूप भेंट कर दे। वे बदले में तुम्हें सोना चाँदी भेंट करेंगे। चित्रकार ने कहा’’ जाओ हाकिम से कह दो मेरी चिड़िया बिकाऊ नहीं है। मैना छत के कुंदे से चिल्लाई मैना बिकाऊ नहीं,’’मैना बिकाऊ है सेवक चेहरे पर एक कठोर मुस्कराहट लिये चला गया। 

कुछ ही दिन बाद चित्रकार बीमार पढ़ गया। वह हाकिम के पास से पाँच चाँदी के सिक्के बतौर पेशगी लेने आया। लेकिन चित्रकार दो महीने तक बीमार रहने की बजह से काम पर नही जा पाया और अपना ऋण नहीं चुका पाया। 

सर्दियों में हाकिम अपने नये महल में गया उसने देखा पूर्व दिशा के बड़े कमरे की छत पर एक हिस्सा बिना चित्रित रह गया है। वह गुस्से में आग बबूला हो गया और सारंग को पकड़ बुलाया। हाकिम ने उसे आज्ञा दी कि इस नुकसान के बदले मैना दे और पाँच चाँदी के सिक्के वापस करें। चित्रकार ने मैना देने को मना कर दिया। हाकिमा ने उसे जेल में डाल दिया। 

मैना ने अपने मालिक को लगातार कई दिन तक खोजा। एक दिन उसे सफलता मिल गई। एक टूटे पाइप से वह जेल के कमरे में पहुँची ओर खुशी से सारंग की गोद में पंख फैलाकर बैठ गई। सारंग की आँखे आँसुओं से घिर आई। वह बोला,’’ मैना तू मुझे बहुत प्यार करती है न देख तेरे कारण हाकिम  मुझे मारता है उल्टा लटकाता है पर मैने तुझे बचपन से पाला है मैं तुझे दूसरे के हाथ में कैसे दे दूँ? मैना की आँखें भी बरसने लगी। 

मैना प्रतिदिन उसी रास्ते से सारंग के पास पहुँचने लगी और चित्रकार को ढांढस बँधाती। एक दिन एक संतरी ने उसे मैना से बातें करते देख लिया उसने हाकिम से शिकायत कर दी। हाकिम जब वहाँ आया तो मैना छत पर उड़ गई। सैनिकों को पकड़ने आते देख उड़ते हुए बोली ,‘हाकिम तुम सबको धोखा दे सकते हो पर मुझे नहीं।’ हाकिम गुस्से से पागल हो गया। उसने सब सैनिकों को और सेवकों को आज्ञा दी कि मैना को तीन दिन के अन्दर पकड़ लिया जाय नहीं तो सबको सजा मिलेगी। सैनिक पूरे राज्य में मैना को ढूँढते फिरे। 

दूसरी रात चोरी चोरी मैना सारंग से बात कर रही थी कि सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। पाइप वे उसके घुसते ही बन्द कर आये थे। वे चिड़िया को हाकिम के पास लाये। हाकिम अपनी दाढ़ी सहलाते बोला,‘ काली चिड़िया अब बोल अब क्यों नही उड़ पाई? ’ चिड़िया उदास पिंजरे में चुप बैठी रही।‘ बहुत चबड़ चबड़ करती थी अब कहाँ गई सारी बोली। अब तुझे खा ही जाऊँगा। बोल उबालकर खाऊँ या भून कर?’’ उदास चिड़िया धीमे स्वर में बोली,‘हाकिम तुम तो हो ही माँस भक्षी मानव माँस खाते हो, रक्त पीते हो तो मै क्या चीज हूँ। खा लो मुझे जैसा तुम चाहो। एक दिन बोटी बोटी काट कर तुम्हारी कुत्तों को खिलायी जायेगी।’ 

हाकिम बम के गोले की तरह फट पड़ा,‘ ले जाओ इस कुतिया को। इसे जिन्दा काट कर तेल में तल डालो।’ रसोइये ने जल्दी जल्दी मैना के पर नोंचे चाकू और मैना को थाली में रख तेल लेने अन्दर भंडार गृह में गया। मैना ने जान बचाने की सोची। पंख हिलाये पर वह उड़ नही सकती थी। रसोइया वापस आ रहा था वह तेजी से गहरी नाली में घुस गई। 

बेचारी चिड़िया पूरा एक साल उस गन्दी नाली में छोटे छोटे कीड़ों को खाकर जिन्दा रही। बसन्त में मैना के नये पंख उग आये। वह चुपचाप चोरी चोरी नाली से बाहर आई और उड़ गई। उसने सारंग को फिर ढूढंना शुरू किया। सारंग  जेल से भाग कर पहाड़ियों में जा छुपा था मैना उसे ढूढं न सकी। एक दिन सारंग को ढूढंती ढूढंती वह राजमार्ग से गुजर रही थी कि उसने ढोल ओर ताशे की आवाज सुनी। उसने देखा कि हाकिम सालाना बलि चढ़ाने मन्दिर की ओर जा रहे है वह उधर ही उड़ गई।

धूप और दिया जलाकर हाकिम ने देवी को घुटने टेक कर प्रणाम किया कि देवी की मूर्ति बोली, ‘हे न्हाकिम आज तुम्हें सारे राज्यवासी धिक्कार करते हैं कहते हैं कि तुम लालची हो और स्वार्थ सिद्धि के लिए अपराध करते हो। हाकिम देवी के मुँह से कोप वचन सुन थर थर काँपने लगा। वह फर्श पर लेट गया ओर देवी के चरणों में नाक रगड़ने लगा। वह गिड़गिड़ा रहा था। देवी फिर बोलीं,’’ अगर तुम जोर जोर से बोल कर जनता के सामने अपने अपराधों को बयान करो तो मैं अब भी तुम्हें क्षमा कर सकती हूँ लेकिन एक बात याद रहे, कुछ भी झूठ बोलने की कोशिश मत करना, नही तो कुत्ते से भी बदतर जिन्दगी यापन करनी पड़ेगी। 

गिड़गिड़ाते हुए हाकिम ने अपने सब अपराधों को जोर जोर से बोला। जनता के मुँह आश्चर्य से खुले रह गये। देवी फिर बोली,‘ वैसे तो तुमने इतने अपराध किये हैं कि तुम्हारी जिन्दगी कुत्ते की जिन्दगी होनी चाहिये परन्तु तुम अपनी गलती पहचान गये इस लिये मैं तुम्हें हल्की सी सजा ही देती हूँ।’ हल्की सी सजा सुन हाकिम को बहुत संतोष हुआ वह फिर देवी के चरणों में झुक गया। 

मूर्ति से आवाज आई,’’ सबसे पहले तो अपनी दाढ़ी नोच लो जिससे तुम आम आदमी नजर आओ।’हाकिम ने फौरन दाढ़ी नोच डाली। सब बाल हटा दिये एक भी नहीं छोड़ा। देवी की आवाज फिर सुनाई दी,’’ अब मेरे आगे तीन सौ पैसठ साष्टांग दंडवत करो जिससे आगे से तुम निरपराधियों को दंड बैठक न लगवाओ। 

वह जल्दी जल्दी साष्टांग दण्डवत् करने लगा। चेहरा बालों के नुचने से लहूलुहान हो रहा था। बार बार ठोड़ी को जमीन पर टेकन से वह लस्त हो गया। बैठक पूरी करते न करते वह वेदी पर लुढ़क गया। तभी उसे अपने ऊपर चिचियाने की आवाज सुनाई पड़ी,’’हाकिम यह मैं हूँ। पिछले साल तुमने मेरे पंख नोचे मैने तुम्हारी दाढ़ी नुचवा दी। पिछले साल तुमने मेरे बड़े भैया के हाथ पैर तुड़वाये इस साल मैने तुम्हारे। 

हाकिम ने अपना सिर उठाया। वह समझ गया कि क्या माजरा था पर तब तक मैना ऊँची आकाश में उड़ गई। 


Wednesday, 16 July 2025

adbhut bansuri

 अदभुत बांसुरी


एक समय की बात है किसी गांव में एक बहुत मेहनती और धनी किसान रहता था लेकिन अपना कहने के नाम पर उसके पास केवल एक कुत्ता और एक बांसुरी थी जिस पर वह अदभुत संगीत बजाया करता था। 

सारा दिन खेत में मेहनत करने के बाद जब वह बांसुरी होठों पर लगाकर धुन निकालता तो सारा वातावरण अदभुत संगीत से भर जाता । उसकी धुन सुनकर चिड़ियाऐं जानवर आदमी सब खिंचे चले आते । सबको उस बांसुरी वाले से बहुत प्यार था ।

गांव के धनी जमींदार की लड़कियां चाहती थीं कि बांसुरीवाला उनसे षादी करले लेकिन बांसुरी वाला जब देखता कि उन लड़कियों को मेहनत करने की जरा भी आदत नहीं है तो वह उनसे बात भी करना पसंद नहीं करता। एक दिन चिढ़कर उन लड़कियों ने उसे एक गहरे गड्डे में धक्का दे दिया । लड़का कुछ देर के लिये बेहोष हो गया। होष में आने पर उसने गड्डे में से निकलने की कोषिष की। उसका कुत्ता जोर जोर से भौंक रहा था।

 ‘ मेरी बांसुरी दो ’ लड़के ने कुत्ते से कहा । बांसुरी मिलने पर लड़के ने उसे बजाना ष्षुरू किया। कुछ बंदर पास ही संगीत सुनने के लिये गड्डे के चारो ओर एकत्रित हो गये। पर लड़के को गड्डे से बाहर निकलने में असहाय देख पास ही खड़े वृक्ष की डाली गड्डे में झुका दी जिसे पकड़ कर वह बाहर आ गया।

जब लड़कियों ने उसे सही सलामत देखा तो खिसियाकर उसे खाई में धक्का दे दिया। खाई बहुत गहरी थी लेकिन लड़के का ष्षरीर मजबूत था उस पर वह लताओं पर गिरा ,वह बच गया। कंद मूल खा खा कर किसी तरह कई दिन में वह बाहर आया। वह काफी कमजोर हो गया था। उसके बाल बढ़ गये थे। चलते चलते वह एक धान के खेत में पहुंचा। उस खेत में दो बहनें धान की रखवाली कर रही थीं। बड़ी बहन उसको देखकर भय से चीख कर भागी और षिकारियों को आवाज लगाने लगी ,लेकिन छोटी बहन को युवक की दीन दषा देख दया आई उसने उसे आगे बढ़कर सहारा दिया,

‘ लगता है तुम भूखे प्यासे हो’ यह कहकर उसने अपने हिस्से का खाना उसके सामने रख दिया। बड़ी बहन को छोटी बहन का व्यवहार जरा भी अच्छा नहीं लगा वह उसे क्रोध भरी निगाह से देख रही थी। खा पीकर जब लड़का तृप्त हुआ तो उसने सिर काढ़ने के लिये कंधा मांगा। बड़ी बहन बोली ,‘ हां कुछ देर में कहना कपड़े देदो ।’

लेकिन छोटी बहन ने उसे कंधा लाकर दिया। अब युवक ने मुंह धोया सिर काढ़ा फिर कमर में बंधी बांसुरी निकाल कर बजाना प्रारम्भ किया तो बड़ी बहन मुग्ध हो उठी। लड़कियों के पिता को युवक बहुत अच्छा लगा । उसने उससे अनुरोध किया कि वह उसकी किसी लड़की से ष्षादी कर वहीं रहे। इसके लिये पिता ने दोनों लड़कियों से छोटे छोटे घर बनाने के लिये कहा । पिता ने देखा कि युवक छोटी बहन की घर बनाने में सहायता कर रहा है उसने उसी के साथ उसकी षादी कर दी ।


Tuesday, 15 July 2025

chatur hasan

 चतुर हसन

बहुत दिन पहले की बात है एक बहुत ही क्रूर सुल्तान था उसके सात बेटे थे। एक गरीब भाई था जिसके सात लड़कियाँ थी। गरीब भाई प्रतिदिन सुबह आकर भाई की कोर्निश बजाता और कहता सात पूतों के पिता सदा आबाद रहो और सुल्तान जबाब देता शांति मिले सात खैरातों के पिता। एक दिन गरीब भाई को किसी प्रकार का काम नही मिला उसने अपनी एक पुत्री सुल्तान के पास भेजी। लड़की सुल्तान से बोली मेरे पिता आज अपनी बीमारी की बजह से नही मिल पायेगें आज वे कुछ कमा कर भी नही ला पाये हैं क्या आप कुछ सहायता करेगें?

सुल्तान ने कहा ,‘जाओ भंडार से ज्वार ले जाओ। ’दूसरे दिन जब गरीब भाई सुल्तान से मिलने गया सुल्तान ने कहा ,‘मैने तुम्हारा पालन पोषण आदि किया तुम बदले में मुझे ऐसा पानी लाकर दो जो न कुऐं का हो न नदी का न वर्षा का नही तो मैं तुम्हारा सिर उड़ा दूँगा।’ 

गरीब भाई रोता हुआ घर आया पुत्रियों को बताया सबसे छोटी पुत्री बोली,‘ पिताजी जरा भी परेशान न होईये मैं वह पानी दूँगी।’ उसने माँ और बहनों से नहाने के लिये कहा नहाकर उसने उन्हें आग के चारों ओर बैठा दिया । गर्मी से पसीना बह उठा । उसे ऊँट की खाल की बोतल में भर कर पिता को सुल्तान के पास ले जाने के लिये दे दिया। 

गरीब भाई ने सुल्तान को पानी दिया और कैसे एकत्रित किया यह भी बताया। तब सुल्तान बोला 

‘मुझे ऐसा दूध लाकर दो जो किसी जानवर या महिला का न हो।’

 गरीब भाई फिर उदास होकर घर आया छोटी पुत्री सुनकर हँसी और बोली,‘ पिताजी यह तो बहुत सरल कार्य है आप क्यांे परेशान होते हो। ’वह सब बहनों को लेकर ंजगल में गई वहाँ कई वृक्षों की डाली तोड़ने पर दूध निकलता था उसे एकत्रित किया और पिता को लाकर दिया और कहा ,‘पिताजी ऐसे तो सुल्तान आपको परेशान करता रहेगा। आप आज सभा में पूछना कौन ज्यादा अच्छा है सात पुत्र या पुत्रियाँ? वे यही कहेगें कि सात पुत्रियाँ पुत्रों के नाखून के बराबर भी नहीं तो आप कहना ऐसी बात है तो आप अपने सब से बड़े सबसे बहादुर बेटे को लायें मैं अपनी सबसे छोटी बेटी को लाऊँगा दोनों को कुछ रूपया देना । दोनों उनसे व्यापार करके लाये ,अगर मेरी बेटी आपके बेटे से कम पैसे कमा कर लाये तो उसका सिर काट लेना अगर मेरी बेटी ज्यादा कमा कर लाती है तो तुम्हारे पुत्र के साथ मेरी जो इच्छा होगी करूँगा। ’

गरीब भाई ने लड़की के कहे अनुसार भरी सभा में बात दोहराई ।सुल्तान तैयार हो गया। सुल्तान का बड़ा पुत्र और गरीब भाई की पुत्री आई उन्हें एक एक घोड़ा तलवार और थोड़ा रूपया देकर भेज दिया। जैसे ही दोनों बाहर निकले राजा के पुत्र ने लड़की को फातिमा कहकर पुकारा तो पुत्री ने क्रोध से कहा,‘ खबरदार अब से मुझे केवल चतुर हसन कहना नही तो तुम्हारा सिर काट डालूँगी। ’

आगे दो सड़कें थी एक पर लिखा था आगे खतरा है दूसरी पर लिखा था सुरक्षित मार्ग। लड़की ने राजपुत्र से पूछा,‘ किस मार्ग से जाना पसंद करोगे तो राजपुत्र बोला ,‘सुरक्षित मार्ग से। ’राजपुत्र सुरक्षित मार्ग से आगे बढ़ा जबकि लड़की खतरे वाले मार्ग से चलते चलते एक शहर के बाजार में पहुँची ंवहाँ उसने बाजार का सबसे कीमती सामान पूछा वहाँ पता लगा नमक सबसे मँहगा है उसने नमक का व्यापार शुरू किया। वहाँ वह लड़को के कपड़े पहन कर लड़के के वेष में सुल्तान के पुत्र के साथ उसका मित्र बनकर रहने लगी। 

लेकिन सुल्तान पुत्र को सदा संदेह रहता था। एक दिन उसने अपनी माँ से कहा हसन के गाल एकदम लड़कियों जैसे चिकने है लेकिन बेटे माँ ने कहा कहीं लड़कियाँ इस प्रकार के व्यापारिक कार्य कर सकती हैं वैसे मैं उसका एक इम्तहान लूँगी अगर वह सफल होता है तो लड़का है असफल तो लड़की। मैं चाय के साथ खजूर दूँगी अगर खजूर दाँत से कुतर कर उसकी गुठली नीचे डाले तो लड़की अगर तोड़ कर खाये गुठली दूर फैंके तो लड़का। 

लेकिन चतुर हसन ने खजूर तोड़ा और गुठली दूर फेंक दी। लड़का माँ से बोला,‘ माँ तुम्हारी परीक्षा में हसन सफल हुआ लेकिन फिर भी मैं मानने के लिये तैयार नही हूँ क्योंकि उसके गाल बिल्कुल चिकने हैं’।

‘  अच्छा तो उसे शिकार के लिये ले जाओ अगर शिकार जिन्दा पकड़े तो वह लड़का है नहीं तो लड़की।’।

लड़की ने एक जानवर दूर देखा तेजी से उसके पीछे घोड़ा दोड़ा दिया ।उसका तब तक पीछा किया जब तक कि जीवित पकड़ नही लिया। सुल्तान पुत्र की माँ बोली बेटा यह पुरूष ही है। लेकिन सुल्तान पुत्र को यकीन नही आया तो माँ ने कई अन्य तरह से परीक्षा ली जैसे पेड़ पर चढ़ना पुरूषोंचित ढंग से खाना, कपड़ा पसंद करना आदि लेकिन सबमंे लड़की सफल होती गई तो माँ बोली ,‘अच्छा मैं एक आखिरी परीक्षा लेती हूँ। इसके बाद कोई शक नही रह जायेगा उससे जल में नहाने की कहना।’ 

सुल्तान पुत्र के नदी में नहाने की इच्छा से लड़की पेरशान हो उठी वह भगवान से प्रार्थना करने लगी हे ईश्वर तुम जानते हो मैने घर किन परिस्थितयों में छोड़ा है तुम मेरी सहायता करना। यह कहकर वह सुल्तान पुत्र के साथ निकली। जैसे ही वह आगे बढ़ी उसके और सुल्तान पुत्र के बीच में बरात आ गई जिस समय सुल्तान पुत्र नही के किनारे पहुँचा वह आखिरी कपड़े पहन रही थी। सुल्तान पुत्र ने फिर से नहाने के लिये कहा तो उसने मना कर दिया कि उसे बुखार आ जायेगा। अब तक लड़़कांे के पास काफी धन एकत्रित हो गया था उसने सबसे विदा ली और सुल्तान पुत्र के पलंग पर लिख कर रख आई एक लड़की की तरह मैं आई लड़की ही मैं जाती हूँ लेकिन कोई भी मुझे पहचान नही पाया पकड़ नही पाया। 

सुल्तान पुत्र ने माँ को पत्र दिखाया और कहा मैं उसके घर तक पीछा करूँगा तब पकडूँगा। उधर राज पुत्र एक शहर में गया वहाँ वह जुआ खेलने लगा धीरे धीरे वह सारा रूपया गंवा बैठा बाद में एक सराय में नौकर हो गया। हसन उस शहर से गुजरी और उसी सराय में खाना खाने गई उसने अपने और अपने दासों के लिये खाना मंगाया। जब चचेरा भाई खाना लेकर आया तो उसने पूछा कि वह पहचाना या नही। चचेरा भाई बहुत शर्मिन्दा हुआ। लड़की ने सराय के मालिक से चचेरे भाई को मुक्त करा कर साथ ले जाना चाहा तो सराय मालिक ने कहा कि उसने चचेरे भाई को बहुत सा रूपया उधार दिया है। अगर वह चुका दे तो ले जा सकती है। 

रास्ते में अपने सारे दासों के चचेरे भाई के साथ भेज दिया ओर स्वंय अकेले गई। अपने शहर में पहुँचने पर जब लोगें ने राजा के पुत्र को दासों के साथ और लड़की को अकेले आते देखा तो बहुत प्रसन्न हुए और सुल्तान को खबर दे दी। 

जब सब लोग दरबार में पहुँचे तो सुल्तान हँस रहा था और लड़की का पिता जोर जोर से रो रहा था। लड़की ने अपना घोड़ा अपने पिता की ओर किया साथ ही सारे गुलाम सारे धन दौलत से लदी गाड़ी भी लड़की के साथ चल दी और सुल्तान पुत्र अकेला ही अपने पिता की ओर बढ़ा। लड़की ने अपने रोते हुये पिता का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा पिताजी आपकी बेटी लड़के से कम नही है। यह दृश्य देख सदमें से सुल्तान वही मर गया। 

अपने धन से लड़की ने पिता का घर फिर से बनवाया। सुल्तान की मृत्यु के बाद गद्दी बड़े लड़के ने संभाल ली वह चाचा के पास आया कि आपस की शत्रुता पिता के साथ गई। हम सात भाई हैं आपके सात पुत्रियाँ हैं आपस में विवाह कर दीजिये। मैने क्योंकि फातिमा के साथ यात्रा की थी इसलिये में फातिमा से शादी करूँगा। 

फातिमा के पिता तो तैयार हो गये लेकिन फातिमा ने इंकार कर दिया बोली ,‘पिताजी यदि मैं शर्त हार गई होती तो क्या ये लोग मुझे जिन्दा छोड़ते इसलिये मैं यह मानने के लिये तैयार नही। उधर सुल्तान का बेटा भी उसके पीछे पीछे पहुँच गया। फातिमा को जैसे ही ज्ञात हुआ है कि सुल्तान पुत्र आया है वह तुरन्त पुरूषों के कपड़े पहन कर आई दोनों बातें करने लगे। बाते करते करते सुल्तान पुत्र ने कहा हसन क्या तुम्हारे देश में लड़के कान में बाली पहनते हैं। फातिमा का हाथ अपने कानों पर चला गया सुल्तान पुत्र हँस पड़ा फातिमा अपनी गलती समझ गई और शर्मिन्दा हो गई।

अब फातिमा का भेद खुल गया और सुल्तान पुत्र ने फातिमा केे पिता से फातिमा का हाथ माँग लिया। 


Monday, 14 July 2025

chand chamak utha

 चाँद चमक उठा


बहुत दिन पहले की बात है इतने पहले की कि सूर्य चन्द्र का पृथ्वी पर चमकने का ढंग ही अलग था। दोनों पृथ्वी पर ही तेजी से चलते थ्ेा और एक जगह पर जरा जरा देर रहते थे। सूर्य क्योंकि बड़ा था इसलिये ज्यादा देर हर देश में चमकता उसमें इतनी तेज रोशनी थी कि वह जब दूसरे देश चला जाता तब भी हल्की रोशनी पहले देश में रहती। लेकिन चन्द्रमा की रोशनी शीतल थी। वह ठंडा था तो गर्म रहने के लिये काला लबादा पहन लेता। जब वह मुँ खोलता एकदम उजाला हो जाता, पूर्णमासी का सा और फिर लबादा पहन कर आगे चला जाता। तो अंधकार छा जाता। अंधकार छाते ही चोर डाकू अपने घरो से निकल पड़ते और राहगीरों को लूट लेते थे। जनता परेशान थी कि क्या करें। अंधेरे में दिखाई देता नहीं था। चोर डाकू पहचाने भी नही जाते थे। चाँद केा जब यह ज्ञात हुआ कि उसके लबादा पहनने ही जनता में भय पैदा हो जाता है तो बहुत परेशान हुआ। 

एक दिन चाँद काला लबादा पहन कर सड़कों पर आ गया और चोर डाकुओं केा पकड़ने के लिये इधर उधर घूमने लगा। बारिश की वजह से जगह जगह कीचड़ हो रहा  था और गड्डो में पानी भर गया था। चन्द्रमा का पैर इधर उधर पड़ जाता उससे लबादा हट जाता उससे जरा जरा झलक हो जाती और अंधेरे में वह देखता कि साये इधर उधर घूम रहे हैं। चाँद हल्के हल्के पॉव रखते चला जा रहा था कि एक पत्थर से पैर टकराया उसने पास की टहनी पकड़ ली लेकिन यह क्या टहनी हाथ की हथकड़ी बन गयी। चाँद ने बहुत छुड़ाने की कोशिश की लेकिन हथकड़ी न छुड़ा सका। चाँद को पास से किसी की चीख सुनाई पड़ी वह समझ गया कोई राहगीर अंधेरे में भटक गया है। चाँद ने देखा चोरों ने उसे गले से पकड़ लिया है। और भी हाथ उसकी ओर बढ़ रहे हैं तभी चाँद के मुँह से जरा लबादा खिसक गया और उस व्यक्ति को रास्ता दिखाई पड़ गया रोशनी देखकर चोर पीछे हट गया। वह व्यक्ति चाँद केा धन्यवाद देता हुआ चला गया। चाँद ने अपने को बहुत छुड़ाने की कोशिश की लेकिन छुड़ा नहीं पा रहा था। चोर डाकुओं ने अपने सबसे बड़े दुश्मन को अपने कब्जे में देखा तो प्रसन्न हो गये उन्होंने पीछे से जाकर उसको बाँध दिया उसका लबादा पूरा ढका और एक साथ सबने मिलकर पकड़ लिया  और लताओं से कसकर बाँध दिया। सारी रात वे चाँद केा ठिकाने लगाने की सोचते रहे। लेकिन समझ नहीं आ रहा था क्या करे। भोर की पहली किरण के साथ ही उजाला होने लगा अब चोर डाकू घबड़ा गये कि कि कैसे करें। कुछ चोरों ने कहा मार दें और दबा दें। पर कुछ ने कहा नहीं हत्या नहीं करेंगे क्योंकि कुछ भी हो चाँद करता तो सेवा ही है ऐसे व्यक्ति की हत्या करके महापाप नहीं करेंगे। अंत में जब अधिक उजाला फैलने लगा तो एक चोर ने पास ही पानी भरे गहरे गड्डे में उसे फेंक दिया और गड्डे पर भारी पत्थर रख दिया। चाँद को दबाकर सब अपने अपने घर चले गये। जब तक पूरा सुबह का उजाला हुआ चाँद पानी में डूब चुका था।

दिन गुजरते गये लेकिन चाँद नहीं निकला जनता बहुत परेशान थी क्योंकि अब तो चोर डाकू निर्द्वन्द्व होकर लूटपाट करते उन्हें किसी का डर ही नही रह गया 

दिन गुजरते गये लेकिन चाँद नहीं निकला तो जनता को बहुत चिन्ता हुई। आखिर चाँद को हो क्या गया। चोर डाकुओं की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि अब वे मुँह ढक कर घरों के आस पास घूमते रहते कोई भी बाहर निकलता पकड़ लेते और उसे लेकर घर में घुसकर लूटपाट कर लेते।

परेशान होकर वे लोग शहर की एक बुढ़िया के पास गये। उसे सि(ि प्राप्त थी वह खोये लोगों का पता बता देती थी। उन्होंने पूछा आखिर चाँद कहाँ चला गया बुढ़िया मेज पर काले पकड़े से ढके आइने को देखकर मंत्र पढ़ती बुदबुदाती जाती थी फिर आइने में देखकर बताती थी। उसने देखा कहीं पानी में रोशनी हो रही है पर किधर यह नहीं दिखाई दे रहा था। उसने उन लोगों से कहा एक नारियल गुड़हल का फूल और नीबू की टहनी सात दरवाजों पर रखना और जो कुछ भी देखा आकर बताना।

उधर जिस राहगीर को चाँद की चमक दिखाई दी थी वह शहर से वापस आ गया था। चारों ओर चाँद की चर्चा सुनकर 



वह बोला,‘ मैंने चाँद को चोरों के पीछे जंगल में जाते देखा था। मैं भी वही से शहर जा रहा था कि मैं वहाँ रास्ता भटक गया। मुझे चोरो ने पकड़ लिया, वही पर चाँद घूम रहा था, मुझे चाँद की झलक दिखाई दी तो चोरों के चंगुल से मैं तो बच गया था। 

फिर वहाँ क्या हुआ मुझे नहीं मालुम।’

सबने जाकर जो कुछ राहगीर ने देखा था बुढ़िया को बताया। बुढ़िया ने बहुत ध्यान से किताब, आइने और जादुई पात्र में देखा अंत में बहुत हल्की सी चाँद की चमक दिखाई दी। बुढ़िया ने कहा नीम की टहनी में लेकर जाये, जहाँ टहनी झुकने या हरकत करने लगे वहीं खोजे।

सब लोग झुंड बनाकर घने जंगल में गये। चारों ओर घना अंधेरा था क्योंकि वृक्ष इतने घने थे कि सूर्य की रोशनी दिन में भी वहाँ नहीं पहुँचती थी। एक स्थान पर सबकी दहनियाँ बड़ी तेजी से हिलने लगी और जैसे कोई उन्हें खींच रहा हो। उन्होंने देखा एक बड़े पत्थर के नीचे से हल्की सी रोशनी झलक रही है। उन्होंने पत्थर हटाया और देखा चाँद गहरे जल में डूबा हुआ था। 

एक साथ सबने ईश्वर से प्रार्थना की तो धीरे से चाँद ऊपर आया। सबने उसे बाहर निकाला। चाँद उन्हें आर्शीवाद देता आकाश में चला गया और चमकने लगा। तब से ही चन्द्रमा जिस रात गड्डे से निकला पूरी रात चमकता है। और पूरे महिने में बस एक दिन दूसरे देश में जाता हैं बाकी अपना थोड़ा थोड़ा हिस्सा हर जगह छोड़ता जाता है जिससे हर जगह रोशनी रहे और चोर डाकू जनता को परेशान न कर सके।



Saturday, 12 July 2025

pari katha chanchla

 चंचला

पश्चिम मंे एक राजा के सात पुत्र थे पिता की तरह सब पुत्र भी दयालु सहदय और बुद्विमान थे। सबसे छोटा राजकुमार बहुत सुन्दर था उसका नाम अतिरूप था। राजा ने अपने सातों पुत्रो का लालन पालन समान रूप से किया था यहां तक कि पोशाक बगैरह भी समान ही बनवाई। राजकुमारों के बडे होने पर अब राजा के सामने समस्या आई कि वह उनकी शादी के लिये बहुएं समान कैसे लाये। राजा के मंत्रियों ने कहा “ महाराज जब तदबीर काम नहीं करती तब तकदीर पर छोड़ देना चाहिये बाकी का काम ईश्वर के हाथ” राजा मान गया। राजा ने अपने सातों पुत्रों से दिया महल की सबसे ऊंची अटारी पर चढकर तीर फेंकने को कहा। जिस घर पर तीर गिरेगा उसी घर की लड़की से उस राजकुमार की शादी होगी। सातों पुत्रों ने यही किया छः पुत्रों के तीर तो राज्य के छः सम्मानित व्यक्तियों के यहां गिरे। कुछ अमीर कुछ गरीब लेकिन सब सम्मानित । अतिरूप का तीर एक पेड के तने से टकराया उस पर एक बंदरिया बैठी थी आस पास कोई घर भी नहीं था।

पुत्रों की सफलता से जो सबको हर्ष हुआ था अतिरूप के दुर्भाग्य से शोक मंे बदल गया। एक बार फिर कोशिश करो । राजा ने कहा हो सकता है अबकी बार तीर ठीक स्थान पर गिरे।

“ नही पिताजी ’अतिरूप ने कहा ,‘भाग्य यही चाहता है कि मै कंुवारा रहूॅ मै दुबारा कोशिश नहींकरूंगा। रही बंदरिया की बात तो उसे मैं पालतू बनाऊंगा।

छओं पुत्रो की शादी खूब धूमधाम से हुई। सब लोग खुश थे बस अतिरूप को अपने दुर्भाग्य पर दुख था।

बंदरिया का पालन खूब आराम से हो रहा था। उसके गले में सोने हीरे मानिक जड़ा पट्टा पड्ा था। मुलायम बिस्तर थे। राजकुमार उसके साथ खेलकर दिल बहलाया करता। धीरे धीरे राजकुमार उससे बातें करने लगा। शुरू शुरू मे तो केवल खाना खाने की कहता धीरे धीरे सब दिल की बात और पूर दिन का लेखा जोखा कहता सुनाता । बंदरिया कुछ बोलती तो न थी पर लगता जैसे सब समझ रही हो। राजकुमार ने उसका नाम चंचला रखा। राजकुमार का अब ज्यादा तर समय बंदरिया के साथ ही गुजरता क्योंकि बाहर आकर उस पर उदासी छा जाती । राजा देख रहा था कि राजकुमार अतिरूप किसी भी समारोह या उत्सव में भाग नहीं लेता है। लोग तरह तरह की बातें करने लगे पर राजकुमार किसी की भी बातें न सुनता।

इसी प्रकार एक साल बीत गया। छओ राजकुमार खुश थे परन्तु पिता का अतिरूप के लिये दया और प्यार देख चिन्तित भी थे। अतिरूप के लिये उन्हे दुःख भी होता और पिता को दिन पर दिन बढते प्यार को देख ईर्ष्या भी होती। उन्होने अतिरूप को शादी करने की सलाह देने की सोची। पत्नी पति का आधा धर्म निर्वाह करती है अतिरूप के कोई पत्नी नही थी इसलिये छओं भाईयों ने एक एक दिन बारी बारी अपने पिता को घर बुलाया। राजा खुशी खुशी उनके घर गया। सबसे बडे लडके का घर खूब सुन्दर सजा था। द्वार पर मालाऐं लगी थी। दोनो ओर तोरण बने थे । चांदी का लैम्प जल रहा था सारा घर सुगन्धित हो रहा था मधुर संगीत से सारा घर भरा हुआ था। एक सौ एक व्यंजन मेवे का दूध सोने चांदी के बर्तनों मे सजा हुआ था। बहू ने आदर और सम्मान से ससुर को भोजन कराया। राजा बहुत खुश हुआ। आते समय जब बडी बहू ने पैर छूए तो राजा ने नौलक्खा हार उपहार मंे दिया।

दूसरे दिन दूसरे पुत्र के यहां गया वहां भी उसी प्रकार से राजसी भोजन शान शौकत से कराया गया। इस बार अन्य तरह के व्यंजन थे। वहॉ भी राजा ने पुत्र बधू को नौलक्खा हार दिया। इस प्रकार छः दिन हंसी खुशी मंे बीत गये। राजा को अतिरूप का बहुत ख्याल आ रहा था। राजा राजमहल की छत पर शोक मे डूबे टहल रहे थे अतिरूप आया और पिता को अपने महल मे आने के लिये निमंत्रित किया। राजा आश्चर्य से भर उठा। इतना ही नही उसने सब मन्त्रियों दरबारी गणों और राजमहल के प्रत्येक व्यक्ति को तीन दिन तक वहॉं रहने का निमन्त्रण दिया था। परन्तु राजा ने चतुराई से आश्चर्य छिपाया और निमन्त्रण स्बीकार किया । पर मन ही मन वह सोच रहा था। यह हुआ कैसे?

हुआ यह था जब एक एक भाई राजा को अपने महल मे बुला रहे थे अतिरूप बहुत दुःखी और निराश हो गया। पांचवे दिन जब वह बहुत दुःखी हो गया तो उसने अपना दुःख चंचला के आगे रख दिया इसलिये क्योकि किसी से कहकर वह दिन का बोझ कम करना चाहता था

 ‘चंचला! मेरी मूक साथिन कैसा दुर्भाग्य है! भाई दरबारी वगैरह सब इन्तजार में है मै पत्नी के बिना कैसे पिता को बुलाऊॅगा यह तो शुरूआत है तुम बताओ मै क्या करूॅ सब कुछ खत्म हो गया ’ यह कह उदास कोहनी पर मुह टिका कर रोने की सी मुद्रा मे बैठ गया।

तभी चंचला बोली,‘ दुखी मत होओ मेरे देवता उन सबको बुलाओ राजा मन्त्री दरबारी रक्षक सारा राजपरिवार उन्हे तीन दिन के लिये बुलाओ सब कुछ ठीक हो जायेगा।’

  अतिरूप भौचक्का रह गया क्या वह सपना देख रहा है नही सत्य है । अभी चंचला कह रही थी ‘ जाओ राजकुमार इस समय राजा अकेले है और जैसा मैने कहा है वैसा ही कहना।’

बिना कुछ भी सोचे समझे अतिरूप जल्दी से राजमहल गया और सबको निमंन्त्रित कर आया। निमन्त्रण देने के बाद उसे अपनी जल्दबाजी करने का पछतावा हुआ कहीं गडबडी न हो जाय। वह सोच रहा था। यह सब होगा कैेसे? एक बन्दर बोला यह आश्चर्य है परन्तु क्या यह सब भी हो सकता है पर यह होगा कैसे ? यही सोचता वह चंचला के पास आया,‘ मैने सबको निमन्त्रण कर दिया है अब क्या करना है?’ चंचला ने उसकी ओर देखा बोली ,‘कुछ नहीं।’ अतिरूप पीला पड गया। मै बरबाद हो जाऊॅगा वह बोला ‘हाय मैंने यह क्या किया जल्दी बाजी क्या कर डाली पहले इंतजाम हो जाता तब ऐसा कदम उठाता चंचला सच बताओ क्या तुम ही बोली थी अगर तुम ही बोली थेी तो अब फिर बोल सकती हो’।’ लेकिन चंचला चुप रही अतिरूप ने उसे जोर से झकझोर दिया चंचला के हाथ मंे ताबे की प्लेट थी वह गिर पडी प्लेट को उठाते उसे लगा चंचला उस प्लेट की ओर इशारा कर रही है उसने प्लेट देखी तो उस पर लिखा था।

 ‘परेशान मत होओ मैं और नहीं बोल सकती। उसी पेड़ पर जाओ जहां से मुझे लाये थे इस प्लेट को तने के खोखल मंे गिरा कर उत्तर की प्रतीक्षा करना।’ अतिरूप ने प्लेट ली और जल्दी से उस पेड पर पहुंचा। वह एक तीन सौ साल पुराना बरगद का पेड था। पेड बहुत विशाल था उसमें एक बहुत बडा खोखल था। अतिरूप ने प्लेट उसमंे गिरा दी और इंतजार करने लगा कुछ देर तक कुछ न हुआ। उसका संदेह फिर उभर आया। कुछ नहीं होगा मेरा सब कुछ चला जायेगा लेकिन अभी वह सोच ही रहा था कि एक अत्यन्त रूपवती कन्या बाहर आई। वह मूक हो गया। वह बोली,‘मेरे साथ आओ रानी आपका इंतजार कर रही है ’। अतिरूप पीछे पीछे गया। पेड के खोखल में बहुत अंधेरा था धीरे धीरे उजाला दिखाई पडने लगा काफी लम्बा गलियारा सा पार करके एक दम रोशनी दिखाई दी । तीव्र रोशनी से उसकी आंखें चका चाैंध हो रही थी। गोलाई में सौ मेहराबांे का महल बना था मैदान म्ेंा मखमली हरी घास बिछी हुई थी। रंगीन फूलांे का गलीचा सा विछा था । सुगन्धित वृक्षांे से खुशबू से वातावरण महक रहा था। रानी का दरबार लगा हुआ था अत्यन्त रूपवती रानी सोने के हीरे जवाहरात जड़े सिंहासन पर बैठी थी। दो रूपवती दासियां पंखा झल रही थी। कही भी कोई पुरूष नहीश् था। रानी के ऊपर इन्द्रधुनषी झालरें टंगी थी। हवा के पालने से झालरें झिलमिला उठती थी। तभी रानी की आवाज साफ स्वरों मे उभरी ,‘मै जानती हूॅ तुम्हंे चंचला ने भेजा है यंहां यह सब देखकर तुम्हे विश्वास हो गया होगा कि तुम्हारे पिता की दावत का इतजाम भली प्रकार से हो जायेगा जहां तक मै समझती हूॅ हम परियों का इंतजाम देखकर तुम खुश हो जाओगे।’

जैसे ही वह बोल कर चुकी अतिरूप ने अपने को बरगद के पेड़ के पास खड़े पाया। वह समझ गया चंचला परी है अब उसने अपने को भाग्य के सहारे छोड दिया।

दूसरे दिन राजा उठा तैयार होकर चिन्ता से भरा दरबार में आया सब दरबारी राजा केा देखकर उठे झुक कर अभिवादन किया और चल दिये।

महल से बाहर आकर उनकी भवें आश्चर्य से सिकुड गई। राजमहल से राज कुमार के महल तक मखमली गलीचा विछा था तोरण द्वार बने थे। सुगन्धित फूलों से मेहराब बने थे। सब द्वारों पर देा दो पहरे दार खडे सलाम कर रहे थे कही से संगीतज्ञो की टोली आई और गाती बजाती आगे चल दी जैसे ही सब राजकुमार के महल पर पहुंचे अतिशबाजी होने लगी और  गुलाब से महकती पानी की फुहारे सब पर आ गिरी। 

राजकुमार आठ दस अंगरक्षकों के साथ बाहर आया और सबको लेकर अंदर गया।। अदर सारा आंगन बहुत सुन्दर अद्भुत रंगो के मेल से सजा हुआ था। इन सबसे ऊपर वे जिस बात से आश्चर्य चकित रह गये थे वह यह थी कि एक अत्यन्त रूपवती राजकुमारी उनके स्वागत के लिये खडी थी। उसने हल्के हरे रंग की साडी पहन रखी थी । उसने दोनेंा हाथ जोड़ कर नमस्ते की।  मुॅंह पर मोहक मुस्कान थी। जैसी वह सुन्दर थी वैसा ही अद्भुत उसका स्वागत था।

तीन दिन तीन पल के समान बीत गये राजा और साथी अत्यन्त प्रसन्न लौट कर आये। फिर अतिरूप ने अपने भाइयों को बुलाया। सब बहुत प्रसन्न हुए इस प्रकार परिवार एक हो गया।

लेकिन अतिरूप के सौभाग्य से सब उसके भाई जलने लगे। दावत के खत्म होन पर बडा भाई उसे एक तरफ ले गया और बोला,‘ अतिरूप भाई संभल कर रहना कही अपनी पत्नी को खो मत देना। वह परी है वह फिर से अपने पुराने रूप मे आ सकती थी गायब हो  सकती है।’

‘नहीं ,अब नहीं जा सकती ,’ अतिरूप भाई पर विश्वास करके बोला, ‘मैने इसकी बन्दर की खाल को बक्से मे बंद कर ताला लगा दिया है।’

‘अरे ! भाई परी के आगे उस बक्से की क्या मजाल सबसे अच्छा यही होगा तुम खाल को जला दो तभी ठीक रहेगा,’ भाई ने सलाह दी।

अतिरूप ने भाई का विश्वास कर खाल को आग मे झोंक दिया उसी समय कमरे मै से चंचला के चीखने की आवाज आयी ,‘मै जली मै जली जा रही हूॅ हाय मै जीवित जल जाऊंगी ’अतिरूप ने खाल पर जल्दी से पानी डाला और चंचला के कमरे मे भागा परंतु वहां पर एक जलती सी चमक के अलावा कुछ न दिखाई दिया चंचला गायब हो गई थी।

अतिरूप पागल सा महल से चीखता भागा। चंचला मेरी प्यारी वापस आ जाओ वापस आ जाओं भाइयों ने अंगरक्षको ने राहगीरों ने उसे बहुत रोकने की कोशिश कि परंन्तु जंगली भैसे की तरह डकराता वह शहर को फांदकर कपड़े फाड कर रेगिस्तान मंे भागता चला गया। कभी पूर्व कभी पश्चिम वह चंचला चंचला चिल्लाता दौडता रहा अंत मे थकर गिर गया । गरम बालू पर दौडता वह तब तक चलता जाता जब तक वह थक कर गिर नही जाता फिर उठता फिर चल देता। एक दिन वह बेहोशी की सी अवस्था मंे गिर गया और रात भर पडा सोता रहा। सुबह उसकी नींद एक आदमी का क्रंदन सुन कर खुली उसकी दाढी कम से कम छः महीने से बढ़ी हुई थी। कपडे फटे हुऐ थे। वह सोता हुआ सा चीखता चला जा रहा था  आजाओ वापस आ जाओ अगर तुम नहीं आईं तो मैं मर जाऊंगा।

अपने जैसा ही एक आदमी देखकर अतिरूप को उस पर दया आई । वह बोला ,‘क्या बात है मित्र तुम्हे क्या दुःख है?’

फटे कपडे वाले ने कहा “ मैने इधर से एक परी राजकुमारी को चिल्लाते मैं जली जा रही हूॅ मैं जली रही हूॅ जाते देखा एक बार देख लेने पर अब मै उसे दुबारा देखने को मरा जा रहा हूॅ।”

राजकुमार को आश्चर्य हुआ जरूर यह चंचला की ही कह रहा है उसने अजनबी को सारी कहानी सुनादी मै उसी को ढूॅढ रहा हूॅ जब तक वह मिल नहीं जायेगी मै रूकूंगा नहीं चाहे मर जाऊॅ।

अजनबी ने सफलता की कामना करते हुए कहा,‘ मित्र जाओ भगवान तुम्हारी सहायता करेगे। उसे जाकर ढूंढो। यह लोहे का डंडा लो यह जादू का है जो ही तुम इसे आज्ञा दोगे ,यह तुम्हारे दुश्मनों को पीटना शुरू कर देगा।

‘धन्यवाद मित्र वह किस रास्ते गई थी जरा बताओगे

‘वह पूर्व की ओर गई थी।’

अतिरूप पूर्व की ओर चल दिया थोडी ही दूर पर हरियाली मिलनी शुरू हो गई। फल फूल सब्जियां आदि भी शुरू हो गई शीघ्र ही वह एक नदी के किनारे जा पहुॅचा। पानी पीकर उसने प्यास बुझाई। अभी वह सोच ही रहा था कि नदी को पार कैसे किया जाय उसके एक दुःखी व्यक्ति बीणा पर जादुई संगीत बजाता दिखा। संगीत इतना मधुर था कि पक्षी सुनने के लिये चहचहाते रूक गये थे गाय घास चबाते चबाते उसकी ओर देखने लगी थी। युवक बीच बीच मे रूक जाता और कहता वापस आओ वापस आओ मै तुम्हे देख्ेा बिना जीवित नही रह सकता ।

अतिरूप को उत्सुकता हुई उसने युवक से पूछा,‘ क्यो भाई तुम किसे देखने को इतने भारी इच्छुक हो।’

‘क्या बताऊं ?’ युवक ने कहा एक परी ‘ मै जली जा रही हूॅ मै जली जा रही हूॅ ’ कहती इधर से निकली उसकी आवाज मे इतना माधुर्य था कि मै जब तक उस आवाज को दुबारा सुन नहीं लूंगा चैन नहीं पा सकता ।

अतिरूप समझ गया वह चंचला के लिये कर रहा है युवक को अतिरूप ने पूरी कहानी सुनाई और कहा ” मैं ही वह अभागा व्यक्ति हूॅ जिसकी बजह से यह दुःखद घटना हुई। जब तक मैं उसे पा नहीं लूूंगा जिन्दा नहीं रहंूगा।”

युवक यह जानकारी पाकर बहुत कृतज्ञ हुआ और बोला,‘ जाओ भई जाओ यह बीना लो इसके तारों से जादुई संगीत निकलता है।’ ‘वह किधर गई थी’ ? युवक से पूछा । ‘वह उत्तर की तरफ गई थी’ युवक ने कहा और अतिरूप उत्तर की तरफ बढ दिया।

रास्ते मे जंगल और पहाड़ मिले। पर्वत एक से एक ऊॅचे थे अंत मे वह सबसे ऊंचे पर्वत पर पहुचा सारी चोटियां बर्फ से ढंकी हुई थी। एक जगह एक साधु बर्फ से ढकी झोपडी मे बैठा था। वह वहां एक क्षण असमंजस मे खडा रहा कि अंदर जाये या नही कि अंदर से आवाज आई,‘ आओ अंदर आओ बेटे मुझे मालूम था कि तुम आ रहे हो।’ अतिरूप ने अंदर घुसकर योगी को प्रणाम किया योगी ने आशीर्वाद देते हुए कहा “ हिमालय के पार जाओ तिब्बत में तुम्हें एक महान जादूगर मिलेगा वह तुम्हे जादुई सैन्डल देगा वही तुम्हारी मन पसंद सैन्डल तुम्हे काकेशिया के पर्वतों पर ले जायेगा।’ राजकुमार फौरन चल दिया इस नई जानकारी ने उसमे नई जान भर दी ऊॅचे पर्वत को लांघते हुए लम्बी खाइयों को पार करते वह मृतप्राय सा जादूगर के पास पहुंचा जादूगर ने अतिरूप का उपचार किया । सारी कहानी सुन उसने जादुई सैन्डल का जोड़ा उसे दिया जो उसे परियों के देश मे ले गया।

वहां उसने बीना से मधुर धुन निकालनी प्रारम्भ कि और जादुई संगीत को सुन उसके पीछे झुंड के झुंड चलने लगे। परियों के देश मे अनेक संगीतज्ञ थे परन्तु जो मनहर संगीत युवक की वीना से निकल रहा था वैसा उन लोगों ने कभी नहीं सुना था। शीघ्र ही राजा का बुलाबा दरबार मंे संगीत सुनाने के लिये आया। लेकिन अतिरूप ने अनिच्छा प्रगट की तब मंत्री लोग आये और बोले कि राजकुमारी का सारा शरीर जलन से भरा हुआ है और सो नहीं पा रहीं है। अतिरूप समझ गया कि यह उसकी चंचला ही है उसका दिल जोर जोर से धडकने लगा। अपने भावांे को छिपाता वह विरति के स्वर मे बोला “ ठीक है तब चला चलता हूॅ भलाई करने मे पीछे नही रहता परंतु चाहता कुछ नही हूॅ हो सकता है तुम्हारी राजकुमारी ठीक हो जाय।”

मन्त्रीगण उसी समय अतिरूप को लेकर महल मे ले गये। एक ही नजर मे वह पहचाल गया कि यह वह चंचला ही थी। चंचला भी पहचान गई वह बोल ही पडती कि अतिरूप ने उसे चुप रहने का संकेत कर दिया तब राजा से बोला महाराज मेरे पास ऐसी मलहम है जिससे कैसे भी जले के छाले या घाव हो ठीक हो जाते है मेरा विश्वास है उससे राज कुमारी अच्छी हो जायेंगी।

यह कर कर उसने मुलतानी मिटटी नौकरानी को दी और कहा पहले पैर मै लगाये। तलुबे पर मिटटी के लेप ने राज कुमारी को एकदम शांती पहुॅचाई उसने सारे शरीर पर लगाने के लिये कहा। सब लोग कमरे के बाहर इंतजार करने लगे। आधा घटे मे राजकमारी चल फिर सकने लायक हो गई राजा बहुत प्रसन्न हुए और अतिरूप से जो चाहे सो मांगने के लिये कहा।

अतिरूप ने राजकुमारी का हाथ मॉगा। राजा अतिरूप की इस घृष्टता पर अत्यधिक क्षब्ु्रध हो गया और उसे नौकरों से धक्के देकर निकालने को कहा जैसे ही वे पकडने के लिये आये। जादुई डंडे ने उन्हे पीटना चालू कर दिया तब चंचला ने पूरी कहानी पिता को सुनाई राजा ने सुनकर कहा ,‘ठीक है बेटी तुम जाओ तुमने हमेशा अजीब इच्छा ही रखी।’

अतिरूप और चंचला की शादी परियो के रस्म रिवाज के मुताबिक हो गई और चंचला अपने घर आ गई। राजा और सब दरबारी चंचला की विदा पर खूब रोये।

चंचला की दो बहने बिलकुल उसकी सी और वे भी अपनी बहन के साथ जाना चाहती थी उन्हंे आने दो अतिरूप ने कहा मेरे दो राजकुमार मित्र हैं वो परी से शादी करने के लिये मरे जा रहे है राजा ने अपना स्वर्ण रथ दिया जिसपर बैठ कर वे हिमालय से उडकर आये ंरास्ते में उन दोनो युवकों को अपने साथ लेकर अतिरूप अपनी राजधानी आया। तीनों परी बहनों की शादी धूमधाम से तीनांे के साथ हो गई।


Friday, 11 July 2025

anokha sauda

 

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